तब की बात है जब अक्तूबर में हल्की सर्दी आने लगती थी। दुर्गा पूजा के पंडाल के खंभे सितंबर की बरसात में ही गड़ने लगते थे। बारिश के खत्म होते ही दिन छोटा होने लगता। शाम धुंधली होने लगती। सुबह सुबह ओस की बूंदे दिन की गरमाहट को कम कर देती।
तब फुल स्वेटर से पहले हाफ स्वेटर निकला करता था। पुराने के साथ साथ नया बुनता था। मनोरमा पत्रिका में छपी डिज़ाइन या किसी के हाथ का फन। हर बार स्वेटर कुछ नया होने की ज़िद करता था। रंग वही होते थे।गाढ़े लाल। नारंगी। सफेद। नीला। पीला। आज कल ऐसे रंगों से बने स्वेटर देहाती कहलाते हैं।तब स्वेटर का बनना तमाम लड़कियों और घर-पड़ोस की औरतों की कारीगरी हुआ करता था। बेटों के रंग चटकदार होते ही थे ताकि लगे कि कोई इस पितृसत्तामक समाज में उन्हें दुलार रहा है।
हाफ स्वेटर जल्दी बन जाता था। दस दिन में।सब मिलकर बना देते। सामने का पल्ला बड़ी दीदी ने बुन दिया। तो पीछे का पल्ला पड़ोसी की चाची ने। मेरे घर के ठीक पीछे गीता दीदी अक्सर स्वेटर का बार्डर तैयार कर देती थी। और हमारी उम्र की लड़कियां। उनके हाथों में अपना स्वेटर बुनता देख बहुत अच्छा लगता था। रोमांस तो नहीं लेकिन रोमांस जैसा ही लगता था। स्वेटर का बुनना एक संसार का बनना लगता था।
घीरे घीरे बुनता था स्वेटर। हर चार अंगुल की बुनाई पर नाप लेने का सिलसिला। कंधे से पहले कमर। कमर के बाद पीठ। पीठ के बाद गर्दन। गर्दन तक पहुंचने की बेकरारी चार अंगुल के नाप से तय होती रहती थी। पटना मार्केट से खरीदा गया ऊन का गोला। धीरे धीरे उघड़ता जाता। खुल कर बुनता जाता।
स्वेटर के साथ रिश्ते भी बुन जाते। इतनी मेहनत से कई दिनों तक बुना गया होगा। कभी बुआ, कभी बहन तो कभी मां। कभी कभी वो लड़कियां भी, जिनसे कभी बात करने की हिम्मत न हुई लेकिन उनका बुना हुआ स्वेटर पहन कर शहर में घूमते रहे। आखिर स्वेटर में उनका भी हिस्सा होता ही था।
अब कोई स्वेटर नहीं बुनता। स्वेटर का कांटा और ऊन का गोला...लोग अब भी खरीदते होंगे। लेकिन मेरी ज़िंदगी के दायरे से ऐसे लोग दूर हो गए हैं। अब किसी पड़ोसी को नहीं जानता। बहनों से दो साल में एक बार मिलता हूं। लेकिन कोई सात साल पहले तक ऐसे ही बुने स्वेटरों से मेरी सर्दी का संसार भरा था। चेक की डिज़ाइन हो या फिर रंग बिरंगे ऊन से बनती आड़ी तिरछी रेखाएं। बहुत शान से पहनकर एनडीटीवी आ गया । नया नया रिपोर्टर बना था। लगा कि इस स्वेटर का रंग कैमरे पर कितना खिल उठेगा। तभी प्रोड्यूसर ने कहा कि इन्हें उतार दो। बाय सम नाइस स्वेटर। यू कांट वेयर देम ऑन कैमरा। मैं सदमें आ गया। इस कदर इतनी मेहनत से बने स्वेटर को रिजेक्ट होते देखना। मौके पर मेरी एक सहयोगी खड़ी थी। पहली पहचान थी। हंसती रही। बहुत देर तक। स्वेटर पुराना पड़ गया। सात साल बाद वो मेरी दोस्त हैं। एक अच्छी दोस्त।
लेकिन एक बात खलती है। हंसते हंसते उसने कह दिया कि चेक वाले स्वेटर नहीं चलेंगे। वो पहली बार मिली थी लेकिन बात साफ साफ कह गई। बदल जाओ। नहीं तो बेटा ये दुनिया तुम्हारा मजाक उड़ाएगी। मेरे पास विकल्प नहीं था। आदेश था। हमेशा के लिए कई हाथों से बुना वो स्वेटर उतार दिया गया। नया स्वेटर है। नए दोस्त हैं। वो दोस्त अब भी हैं। हर सर्दी में चेक स्वेटर की याद दिला देती हैं।
अब बुना हुआ स्वेटर नहीं पहनता। अक्तूबर कब आता है कब जाता है पता नहीं चलता। सर्दी कम हुई है तो हाफ स्वेटर पहनने का चलन भी कम होने लगा है। स्वेटर के साथ रिश्ते नहीं पहनता। ब्रांड पहनता हूं। मांटे कार्लो। कासाब्लांका। होते बहुत रद्दी हैं। लेकिन पहनता हूं।
स्वेटर
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14 comments:
स्वेटर के साथ नहीं पहनता। अच्छा लिखा।
लगता है आज समीरलालजी की तरह आप भी बिते पलों को याद कर सेंटीयाने के मूड में है. दो सलाईयों पर ऊन नहीं रिश्ता और प्यार बुना जाता था.
बहुत सुंदर रविश जी!!
सच कितना सच है.
जब हम अम्मा-दीदी की सलाई से ताज़ा-ताज़ा उतरा लाल स्वेटर पहनकर मोर की तरह शान से मुहल्ले के चक्कर लगाते थे. मुहल्ले की सब लड़कियाँ और औरतें हमें बार-बार देखतीं तो लगता हम बहुत अच्छे दिख रहे हैं, लेकिन उनके लिए एक नया डिज़ाइन जा रहा होता था. मोहल्ले की गली ही रैंप थी और हम मॉडल. लड़कियाँ तो बस देखती रहतीं, कोई चाची जी आवाज़ देती, मुन्ना ज़रा स्वेटर दिखाना, फिर दो-तीन महिलाओं का तकनीकी विश्लेषण शुरू होता, कितना फंदे, कितने उल्टे, कितने सीधे, बॉर्डर कैसा बना...वूल हाउस नाम की एक मशहूर दुकान थी, इस बार गया तो देखा वहाँ म्युज़िक स्टोर खुल गया था, सीडीज़ बिक रहे थे.
याद आ गए वो दिन जब ठंड शुरू होते ही घर भर उन और सलाइयां ही बिखरी दिखतीं थीं .माँ स्वेटर बुनती थी और कोशिश करती हम भी कुछ सीख लें .हम शुरू करते और फंदे का जोड़ घटाना कुछ ऐसा हो जाता की माँ बोलती ..क्या घर बार सम्भालोगी अपना .अब कार्पोरेट जगत की व्यस्तता और घर बार के झंझट में जो लुप्त हो गया वो हैं ये सारी विधाएं और स्वेटर के रिश्ते
आपका लेख पढकर बचपन की सारी धुंधली यादें पुन:सजीव हो गयीं।बहुत ही मार्मिक वर्णन है।
हमने आपने बनाया है इस ब्रांड संस्कृति को. लेकिन उससे ऊपर पिछले साल मुझे लगा की मुझे बुना हुआ स्वेटर चाहिए टू मैंने अपनी माँ से कह कर बनवाया. हा ये अलग की बात है की उसे पहन कर कैमरे के सामने नही जाया जा सकता है.
जब आप इसी स्वेटर पर पैकेज़ बनायेंगे तब उसे पहनियेगा. वो भी मजेदार बात होगी. फिलहाल तो आपने ये महसूस किया इस बात को जानकर ही मैं खुश हो रहा हू
बहुत ही सुन्दर और कोमल लिखा है, रविश भाई. कितना कुछ याद दिला गये.
"होते बहुत रद्दी हैं। लेकिन पहनता हूं।" बडा ही अन्तरंग वक्तव्य है,मगर क्या करें'इस लेबल की दुनिया में "पोनी" की सलाईयों के रिश्ते नहीं देखे जाते। यहां तो बस हर व्यक्ति अपने और दूसरे के स्वेटर को अपनी आंख के "कैमरे" से देखता है। लेबल दिख गया तो ठीक नहीं तो तुम 'गांव' वाले।
रवीश, बिहार से दो चार स्वेटर दिल्ली ले आओ जब दिल करे घर में पहन लेना अच्छा लगेगा तुम को भी आईने को भी और जिसने बनाया उसको भी.
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ये झटका हम सभी सह चुके है। हम जिस शहर में आये है,वहां तो हंसने रोने और बोलने के भी प्रोटोकाल है। ना आप अपनी पंसद से रह सकते हा ना कुछ कर सकते है। ये कुछ ना कर पाना ही मुझे सबसे ज्यादा अखरता है।
दीप्ति।
आपके लेख ने स्वेटर से जुड़ी मेरी यादें ताज़ा कर दीं। मेरे कई स्वेटर अभी भी बक्से में पड़े हुए हैं। जब भी गर्म कपड़े निकालने के लिए या किसी और काम से बक्सा खोलता हूँ तो उन्हें देखकर मायूस हो जाता हूँ। पहन नहीं पाता क्योंकि अब ऐसे रंग डिज़ाइन नहीं चलते, पर मैं त्यागने की हिम्मत नहीं है। सीधे मां का चेहरा सामने आ जाता है।
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