चुनाव की पनबिजली

अंधेरे में रहने वाले देशवासियों

आज तक किसी को फिक्र नहीं थी। तुम्हारे घरों में घंटों बिजली नहीं आती थी। जो तुममें अमीर था उसने जेनरेटर और इंवर्टर से बिजली का उत्पादन शुरू कर दिया। फिर भी बिजली की कमी बनी रही। गांव गांव और दिल्ली मुंबई जैसे शहरों के कई हिस्से में बिजली, बिजली की तरह की आती रही है। घंटों कटौती। याद कीजिए कब बिजली को लेकर राजनीतिक दलों में घमासान मचा है। अभी तक मुफ्त बिजली देने को लेकर युद्ध होता था इस बार बिजली पैदा करने की तकनीक को लेकर मार मची है। परमाणु ऊर्जा से बिजली बने इसलिए मनमोहन सिंह अमरीका से करार कर आए तो करात साहब को अच्छा नहीं लगा। क्या वो नहीं चाहते कि आज न सही कम से कम दो हजार बीस तक लोगों के घरों में बिजली आ जाए। घंटों कटौती न हो।

खैर यह ज़रूरी नहीं है कि किसे अच्छा लगा या नहीं लगा। लेकिन यह तय हो गया कि कभी भी हो सकने वाला अगला चुनाव उन लोगों की बातें करेगा जो घंटों बिजली के नहीं आने से तौलिये और लुंगी से पंखा करते आए हैं। वो छात्र अब खुश हो सकते हैं कि इस बार मोमबत्ती की रौशनी में बोर्ड इम्तहान देने के दुख पर बड़े बड़े नेता बात करेंगे। वादे करेंगे। तब आप छत पर खटिया लगा कर तारे देखते हुए बिजली की बातें और वादे सुना कीजिएगा।

कांग्रेस वाले कहेंगे कि हम परमाणु बिजली पैदा कर अंधेरा दूर करना चाहते थे। कब तक २०२० तक। तब तक दो और चुनाव हो जाएंगे। बीजेपी कहती है कि दो चुनाव बाद पैदा होने वाली बिजली के करार की शर्तें दिखाओ। करात कहते हैं देशवासियों तुमने साठ साल अंधेरे में ज़िंदगी काट दी। कुछ साल और सही । मगर अमरीका के सामने झुकना मत। देशहित बिजली की रौशनी से कहीं ज़्यादा महान है। सो करात का फरमान है करार नहीं हो। ज्योति बसु कह रहे हैं कि प्रणब बाबू की सुन लो भई। करात और राजा कहते हैं कि उनकी नहीं सुनेंगे। अपनी कहेंगे।

इसीलिए कहता हूं अंधेरे में रहने वाले लोगों आपकी ज़िंदगी में उजाला आने वाला है। बिजली नहीं आएगी मगर बिजली की कमी पर बातें होंगे। अभी तक बिजली कटौती की खबरें अखबारों के कोने में छपती थी। टीवी तो दिखाता ही नहीं था। लेकिन इस बार लोग खूब बोलेंगे कि भइया वोट देना तो बिजली पर। वो भी परमाणु बिजली पर। पनबिजली पर नहीं। प्रकाश करात के झांसे में मत आओ। कहते हैं कि भारत अपनी बिजली बना सकता है। तो बना क्यों नहीं रहा था। बिजली विभाग के कर्मचारी इनदिनों नए नए इलाकों में बन रहे अपार्टमेंट्स में मीटर लगाने के कमीशन में मालामाल हो रहे हैं। इधर हाल है कि इनके लिए सरकार गिर रही है। मैं तो कहता हूं कि इस देश में बिजली नहीं आएगी। जितनी आ गई काफी है। बस घंटों कटौती को हफ्तों कटौती में बदल दो।

इसलिए इस पूरे बहस में मैं खुश हूं। कम से कम बिजली की बात तो हो रही है। अभी तक बिजली का चुनावी ज़िक्र बिजली सड़क पानी के नारे को पूरा करने के लिए होता था। नेता बिजली और पानी को छोड़ जवाहर रोजगार योजना के तहत सड़क बनवाने में ही रह जाता था। अब बिजली बनेगी। अंधेरा दूर होगा। गिरने दो साली सरकार को। हम तो चाहते हैं कि अभी गिरे। अगर ये सरकारें बिजली पैदा करती रहती हैं तो आज यह नौबत न आती। तीन साल में बिजली के लिए ढेले भर काम नहीं किया तिस पर से तुर्रा यह कि परमाणु बिजली से देशभक्ति तय करेंगे। कीजिएगा। जून के महीने में किसी स्मॉल टाउन जहां घंटो बिजली नहीं होती है वहां जाकर।

यह भारत का पहला चुनाव होगा जो बिजली को लेकर लड़ा जाएगा। सड़क और पानी को लेकर नहीं।

9 comments:

MUKHIYA JEE said...

kafee dino ke baad "Kasbaa" se gujar raha hun ! Kal ek mitra ne PATNA se khabar di ki naye waale KADAMBINI me "RAVISH jee " ke baare me kuchh chhapa hai ! ab lagataa hai - KADIMBINI kharidana hi hoga !

"CHUNAV" najdeek hai - MOTIHARI ya POORVI DELHI se ladane ke baare me kya VICHAAR hain , aapake ?

Ranjan
http://daalaan.blogspot.com

Aarish said...

gr8 work.. nice thoughts.. as usual.. just a suggetion- put a live chat box from cbox.ws on the blog.. r ye nusrat ji ko hata dijiye.. shaanti bhang ho jati hai kabhi kabhi..

thank you..

p.s.- abhisar ko kya hua? aajtak par dikhe the!!

Aarish said...

cbox.ws

राजीव जैन said...

बॉस कादम्बिनी ही नहीं
जयपुर में भी हुई एक वेब जर्नलिज्‍म की सेमिनार में रवीशजी का नाम खूब सम्‍मान से लिया
ये समझ ल‍ीजिए कि इलेक्‍टॉनिक मीडिया को दिन रात गरियाने वालों ने भी रवीशजी की इस मामले में तारीफ की। उनके ब्‍लॉग का एडेस तो बुजुर्गो को भी पता है।
राजीव
http://www.shuruwat.blogspot.com/

abhishek said...

हां, शायद रवीश जी की यह ख्याल सही साबित हो और पहली बार चुनाव जाति, धर्म, आरक्षण के जिन्न से अलग हटकर किसी बिजली या करार जैसी समझदारीभरी बात पर लड़ा जाए,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
पर मुझे नहीं लगता अभी चुनाव जैसे कोई हालात हैं....

पर यदि कोई भी पत्रकार चुनाव लड़े तो सोच समझ कर ही लड़े, क्योंकि वो कह गए हैं ना कि...
काजल की कोठरी में कैसो ही सयानों जाए.....- अभिषेक

सुबोध,लखनऊ said...

बिजली के मुद्दे पर चुनाव तो तब हों रवीश जी..जब जून के पसीने में लोगों के सर से जाति का भूत उतारे ..सरकार गिरे या बने..लोगों की दिलचस्पी खत्म समझिये..बिजली आए या भाड़ में जाए..किस्मत और पैसे से सबकुछ खरीदने का ख्वाब बुनने में लगे हैं सबके सब..

Sonu said...

Khair aapke likhe hue per to kuchh nahi kahunga ...achhi report hai..jahir hai ..bijali ki tarah hi Importent hai..aapke blog ka jikra webdunia me padhane ko mila so abhi filhal dekha..achha blog hai...khasakar nusarat sahab ki gazal kafi achhi hai...
baharhal aapka kasaba ek khushhal mahanagar ho..shubhechha ke sath...
aap bijali ki tarah yahan jagmagate rahain...aapko aapke achhe try ke liye.....badhaiyan...

Sonu Upadhyay

shashikant awasthi said...

रविश जी नमस्‍कार । मै आपके ब्‍लाग का नियमित पाठक रहा हू न जाने क्‍यूं आपकी हर रचना अपने सी लगती है । करीने से किये गये व्‍यंग समाज की वस्‍तु स्थिति को दर्शाते हुयें एक चुभन का एहसास करा जाते है । आपकी करवाचौथ पर रचित रचना ने सोचने पर अवश्‍य मजबूर किया है । मै आपसे व्यक्तिगत रूप से बात करना/मिलना चाहता हू अगर आपके लिये संभव हो तो मेरे ई-मेल awasthi.shashikant@gmail.com पर अपना संदेश दे दें ।
शशिकान्‍त अवस्‍थी
पटकापुर कानपुर ।

manna said...

hi raveesh...

loved reading ur post..:)

reached ur blog after coming to know about it from....we the people ...will be a regular visitor here from now on!!

I am yet to read ur archive posts..especially the one about fridge u mentioned during that show...:)