दोस्तों के बिना....

ज़िंदगी बेकार है। बहुत लोग कहते हैं। मुझे लगता था कि बेकार की बातें हैं। सही नहीं कहते हैं। बीस साल पहले तमाम दोस्तों से घिरा रहा। दिन रात उनके बीच। धीरे धीरे लगा कि दोस्ती एक दिन छूट जाती है। ज़िंदगी बदल जाती है। ऐसा होने भी लगा। जो बचपन के दोस्त थे, गायब होने लगे। जो जवानी के दोस्त थे,कम होने लगे। कंपनी के काम में कंपनी मिलती है दोस्ती नहीं बनती। बहुत सारी चीज़ें दोस्त नहीं बनने देती।


जिन लोगों ने दफ्तर में अच्छे दोस्त हासिल किए वो वाकई दिलदार होंगे। मेरे भी दफ्तर में कुछ ऐसे ही दोस्त हैं। कह नहीं सकता कि मैं दिलदार हूं। लेकिन वो मेरे लिए किसी खजाने से कम नहीं। मिलकर, बात कर अच्छा लगता है। सब कुछ बता आता हूं। बिना परवाह किए कि उन बातों का क्या होगा। कहीं गलत इस्तमाल तो नहीं हो जाएगा। यही भरोसा काफी है कि जिसे बता रहे हैं उसे आप दोस्त समझते हैं। ये और बात है कि ऐसे दोस्त बहुत कम हैं। उनके खो जाने का डर भीतर से खाली कर देता है।बदल जाने का डर मार देता है।साथ मिलने का अहसास ज़िंदा रखता है। कई साल से वो दोस्त हैं। दिन रात बात करता हूं। खोजता रहता हूं। ये मेरा व्यक्तिगत मामला है। फिर क्यों लोगों की नजर होती है कि ये या वो दोस्त क्यों हैं? आप से कोई नाराज़ हुआ तो दोस्त को लपेट लिया। दफ्तर में दोस्ती बैड क्यों मानी जाती है? लोग घबराते क्यों हैं कि कोई किसी का दोस्त है।

मैं तो कहता हूं हजार दोस्त हों। क्यों ऐसा है कि दोस्त एक या दो ही होते हैं। दस बीस क्यों नहीं हो सकते। वर्ना हमने बारह साल की अपनी नौकरी में कई लोगों को देखा है। प्रतिस्पर्धा के बहाने दोस्ती दागदार होती रहती है। आप किसी के लिए दिल से संवेदनशील नहीं रह जाते। सिर्फ अपनी बात कहने के लिए या फिर अपनी बात कहने के बहाने किसी के दिल तक उतरने के खेल में माहिर हो जाते हैं। तमाम सूचनाएं किसी को न बताने की शर्त पर चुपचाप इधर से उधर हो जाती है। कुछ लोग तो रोने के लिए भी मिलने लगते हैं। रोने के बाद उसी को रुलाने में लग जाते हैं जिसके साथ रोते रहते हैं। दोस्तों के बिना आदमी खूंखार हो जाता है।


बहुतों को देखा है। एक ही गाड़ी से आते हैं। एक ही शिफ्ट में काम करते हैं। करीब जाने पर पता चलता है दोनों दोस्त नहीं। वो दफ्तर में दोस्त होने के लिए काम नहीं करते। कुछ हासिल करने के लिए काम करते हैं। इसीलिए हमारे संबंध बहुत जटिल होते हैं। हम संबंधों का इस्तमाल करते हैं। अपने आप को बचाने के लिए तो किसी को गिराने के लिए। सवाल है कि क्या आप संबंधों के बिना जी सकते हैं।

बस मैंने अपने पुराने दोस्तों की तलाश शुरू कर दी। बारह साल में इंटरव्यू के अलावा किसी व्यक्तिगत काम से कम ही लोगों से मिला हूं। दफ्तर के बाहर कोई ज़िंदगी नहीं रही। तो दोस्त भी नहीं रहे। अब मुझे मेरे तमाम दोस्त याद आते हैं। जो दोस्त हैं लगता है कि कैसे इन्हें संभाल लिया जाए। बचा लिया जाए ,उन पलों के लिए जहां ज़िंदगी अपना मतलब ढूंढती है। तीन महीने में मैंने दस दोस्तों को ढूंढ निकाला। बचपन और जवानी के दोस्त। ज़िंदगी में कुछ कामयाब तो कुछ असफल। जिसने भी बात की लगा कि सब मेरा ही इंतज़ार कर रहे थे। मेरे फोन का। पुराने दोस्तों के मिलने की खुशी ठीक उसी तरह है जैसे सर्दी के दिनों में बक्से से कोट निकाला और कोट की जेब से पिछले साल का रखा दस रुपया निकल आया हो। इस पैसे से आप कुछ कर तो नहीं सकते मगर खुशी जो मिलती है, वो खरीद नहीं सकते। पुराने दोस्तों का मिलना भी वैसा ही लगा। दोस्त मिलते रहने चाहिए। उससे ज़्यादा बनते रहने चाहिए।

ये कोई सलीम जावेद की थर्ड क्लास कहानी नहीं है। पुराने दोस्तें के मिलने के अहसास को बांट रहा हूं। प्रमोद सिंह ने कहा कि मिला जुला करो। वो खुद मेरे घर आ गए। अच्छा लगा। दोस्त हुए या नहीं पर इतना तो लगा ही कि कोई दोस्त जैसा ही आया है। संजय श्रीवास्तव ने कहा कि अरे रवीशवा... तुम हमलोग के बिना कैसे रह लेता है रे। एतना अच्छा लगा है कि का कहे। संजय बोलता रहा और पूछता रहा कि रवीशवा तू अभी भी हंसता है कि नहीं। मस्त है न। चिंता मत करना। हम लोग तो है ही। कोई काम हो तो बोल देना। जब से पत्रकार बना हूं लोग मुझे किसी काम के बहाने फोन करते हैं। पहली बार किसी ने कहा कि तुम्हें काम हो तो बोलना। ये कोई दोस्त ही कह सकता है। दोस्त होने चाहिए। बनते रहने

8 comments:

काकेश said...

चलिये आपने पाठक से दोस्त का सफर तय करवाया अच्छा लगा. ठीक है आप दोस्त मानते हैं तो आपका आभार वैसे लिंक रोड पर चन्द दोस्त ही नजर आये.

http://kakesh.com

जोगलिखी संजय पटेल की said...

दोस्ती एक रूहानी ख़ुशबू देती है. मज़ा ये है कि जिस दोस्ती को इत्र का आप दूसरे के कपड़े पर मलते हैं तो उसकी खु़शबू आपके हाथों को भी महका देती है. दोस्ती का मज़ा तब तक ही है जब तक आप अपने दोस्त को और आपके दोस्त आपको गुण-दोष सहित स्वीकार करें.सिर्फ़ मीठा गप्प और कड़वा कड़वा थू से दोस्ती निभति नहीं.बिना पूर्व सूचना के किसी के घर जाया जा सके ऐसे दोस्त भी नहीं बचे और ज़िन्दगी भी उतनी आसूदा नहीं रही.

विनीत कुमार said...

सबसे बडी दिक्कत है दोस्ती और कूलिगनेस के बीच की विभाजन रेखा को समझना और आपने उसे भाषा के जरिए समझ लिया कि कोई गरियाकर, रविशवा बोलकर बतियाये तो लगता है कि सही में दोस्त है। सच पूछिए सरजी बहुत अच्छे ढंग से कोई पेश आए तो सही मे डर लगता और कि एक और दोस्त होते-होते रह गया। शहर में अपनी तरफ के लात-जूते बहुत याद आते हैं

अनामदास said...

अबके हम बिछड़े तो शायद ख्वाबों में मिलें
जैसे सूखे हुए फूल किताबों में मिलें

जैसा मार्मिक है आपका दस का नोट.

कोट से दस का नोट निकालकर आपने बस मोह लिया.

पुराने दोस्तों से दोस्ती बनाए रखने के लिए कलेजा चाहिए, असली दोस्ती तभी होती है जब मतलब से नहीं, मन से लेन-देन हो. पुराने दोस्त अनमोल होते हैं, मेरे एक-दो ही हैं. लेकिन सच बात ये है कि उनसे संवाद बहुत मुश्किल होता है, उसे आपको उसी दौर में ले जाना होता है जिस मोड़ पर आप दोस्त थे. मेरे सारे दोस्त क़स्बाई हैं, जिनके जीवन के हर पहलू को मैं शायद समझ पाता हूं लेकिन वे मुझे एक सफल आदमी के रूप में देखते हैं लेकिन मेरे दुख-दर्द को समझ नहीं पाते, या शायद मैं उनका और अपना, दोनों का भरम तोड़ना नहीं चाहता. लेकिन दोस्तों की ज़रूरत बनी रहती है, दोस्त जितने पुराने उतने अच्छे.

आपको ढेर सार दोस्त मिलें, यही मेरी शुभकामना है.

neelima sukhija arora said...

रवीश जी ,
दस साल बाद कोई पुराना दोस्त करता है तो वो खुशी बयान नहीं की जा सकती , बस महसूस की जा सकती है।

Rajesh Roshan said...

Cool thoughts. Its not just word i can feel it. :) Hurrahh...

abhishek said...

wakai patreakar hone ke baad swchchi dosti ek talash hi rah jati hai, patrakarita se pahle ki jindagi ke log bhi ab kanhi na kanhi matlab sadhte lagate hain .

Neeraj Kumar said...

netao ke bare me likhane/bolne wale bahoot log hai lekin is tarah ka lekh likhane wale bahoot kam log hai......10 ka note milna aur dost ka ye kahna ki koi kam ho to batana...wakai bahoot sachai hai isme.
Yui hi nahi Ravish ki Report itni dil ko chooti hai,Ab to tai hai ki ye sab keval TRP ke liye nahi balki sachhai darshane ke liye apne kiya.