मोदी का सांप्रदायिक विकास

नरेंद्र मोदी को सिर्फ गुजराती नज़र आते हैं। साढ़े पांच करोड़ गुजराती। उन्हीं के विकास के लिए नरेंद्र मोदी दिन रात काम करना चाहते हैं। सड़कों का विकास किया है। बिजली दी है और शिक्षा दी है। नरेंद्र मोदी अल्पसंख्यकवाद और बहुसंख्यकवाद को बकवासवाद मानते हैं। नरेंद्र मोदी कहते हैं कि जनता उनके साथ है। उन्हें किसी की परवाह नहीं।


किसी ने कहा है क्या कि सांप्रदायिक सिर्फ नेता होता है? वोटर नहीं होता। नरेंद्र मोदी अक्सर सांप्रदायिकता से जुड़े सवालों को जनता के काम और विकास से जोड़ कर बच निकलते हैं। जनता भी सांप्रदायिक होती है। सांप्रदायिकता के खिलाफ की लड़ाई सिर्फ नेताओं से नहीं बल्कि उनका साथ देने वाले वोटर से भी है। बिहार में कई सालों तक वोटर ने भ्रष्ट औऱ गुंडे नेताओं को चुना। तो क्या वोटर के बहाने नेता अपना पाप धो लेगा? वोटर भी अपराधी है। बाद में जब वोटर को अहसास हुआ तो आज शहाबुद्दीन जेल में है। ऐसे नेताओं को शह देने वाली सरकार बाहर है। नई सरकार बहुत अलग नहीं है। मगर हाशिये पर दिखने वाले जनमत का दबाव तो है कि नीतीश लालू से कितने अलग है।

लोकतंत्र में लड़ाई नेता से नहीं बल्कि वोटर से और उसके बीच भी होती है। यह एक निरंतर प्रक्रिया है। किसी एक चुनाव का नतीजा उस लड़ाई का अंतिम फैसला नहीं होता। कई चुनावों के बाद भी फैसला हो सकता है। जैसे बिहार की राजनीति का अंतिम फैसला अभी नहीं हुआ है। लेकिन हो रहा है।

नरेंद्र मोदी जानते हैं कि वो हिंदुत्व की लड़ाई में कमज़ोर पड़ रहे हैं। हारे नहीं हैं। जिस आलोचना को वो हाशिया कहते हैं उसी का दबाव है कि वो अब खुलकर इस पहचान की बात नहीं करते। इसलिए वो विकास के लहज़े में हिंदुत्व की बात करते हैं। सांप्रदायिकता को नई धार देने के लिए। पांच करोड़ गुजराती की बात करते हैं। जैसे सारे गुजराती मोदी के बोरे में आ गए हैं। जैसे पांच करोड़ गुजराती देश से अलग होने का फैसला कर लें तो बाकी भारत के लोग मान लेंगे। बाकी के कई करोड़ भारतीय इस सांप्रदायिकता के खिलाफ हैं उनका क्या करेंगे। नरेंद्र मोदी वोटर के नाम पर अपने पाप धोने की कोशिश न करें। सांप्रदायिकता की कीमत पर अगर विकास को चुनना होगा तो यह भयानक है। ऐसे विकास को उसी तरह खारिज कर देना चाहिए जैसे आर्थिक उदारीकरण को खारिज करने की मुहिम है।

गुजरात के वोटर से बात करनी चाहिए। क्या उसका सांप्रदायिकता को समर्थन है? क्यों नहीं जनता ने मोदी का विरोध किया? क्या पांच करोड़ गुजराती की बात कर मोदी अपने सांप्रदायिक राजनीति में उसे भी सहभागी बना रहे हैं? गुजराती से पूछना चाहिए। क्या इस पांच करोड़ गुजराती में वो भी शामिल हैं जो मोदी के साथ नहीं है। चाहे वो जितने भी हैं। एक करोड़ ही सही। इतने लोग तो होंगे ही जो कांग्रेस या बीजेपी के विरोधियों को वोट देते होंगे या फिर मोदी के साथ नहीं होंगे। फिर किस हक से मोदी सभी गुजरातियों को एक ही बाड़े में हांक रहे हैं। गुजरात में पटेल की कालोनी में कोई दलित नहीं रह सकता। पटेलों के किसी अपार्टमेंट में दलित फ्लैट नहीं खरीद सकता। तो क्या गुजरात में जातिवाद की आलोचना बंद कर दें क्योंकि सारे पटेल ऐसा करते हैं। वो किसी दलित को पड़ोस में नहीं रहने देते। अगर गुजराती किसी समस्या से ग्रस्त हैं तो उसकी आलोचना हर हाल में होनी चाहिए। उसका इलाज होना चाहिए। मोदी संख्या न दिखायें।

नरेंद्र मोदी का अब भारत नहीं रहा। वो सिर्फ गुजरात है। एक ऐसी पहचान की राजनीति जो सांप्रदायिक सोच से अपना चेहरा ढांकती है। मोदी के गुजरात में सिर्फ गुजराती हैं। मोदी किसी अलगाववादी नेताओं की तरह बात कर रहे हैं। गुजरात गौरव क्या होता है? गुजरात की अच्छी सड़कों पर गाड़ी चलाते हुए यह समझना होगा कि आखिर कार का मालिक इतनी अच्छी सुविधाओं के बाद भी सांप्रदायिकता जैसी संकीर्ण सोच क्यों रखता है? लगातार बिजली और अधिक पैसा सांप्रदायिकता की बीमारी को हवा देती है। अधिक पैसे से कई बीमारियां समाज में फैल रही हैं। मोबाइल फोन से कान खराब हो रहे हैं, सेक्स की क्षमता कम हो रही है। तो मोबाइल फोन के सीमित इस्तमाल की बात हो रही है या नहीं? मोदी को बताओ कि विकास अंतिम सत्य नहीं है। जैसे किसी एक या दो चुनाव का नतीजा अंतिम फैसला नहीं।

4 comments:

संजय बेंगाणी said...

मुझे लगता है आप यह मान कर चल रहे हैं की मोदी चुनाव जीत रहे हैं. :)

चलिये अच्छा है आज आपने मोदी ही नहीं सारे गुजरात को साम्प्रदायिक करार दे दिया. अच्छा है.

तय कर लें मोदी पाँच करोड़ की बात करते हैं या साड़े पाँच करोड़ की. यहाँ साड़े पाँच लिखा है, कविता में पाँच लिखा है.

Natasha said...

Didn't someone once say we get what we deserve..How true!

हर्षवर्धन said...

"गुजरात की अच्छी सड़कों पर गाड़ी चलाते हुए यह समझना होगा कि आखिर कार का मालिक इतनी अच्छी सुविधाओं के बाद भी सांप्रदायिकता जैसी संकीर्ण सोच क्यों रखता है? लगातार बिजली और अधिक पैसा सांप्रदायिकता की बीमारी को हवा देती है। अधिक पैसे से कई बीमारियां समाज में फैल रही हैं। मोबाइल फोन से कान खराब हो रहे हैं, सेक्स की क्षमता कम हो रही है। तो मोबाइल फोन के सीमित इस्तमाल की बात हो रही है या नहीं?"

रवीशजी
ये आपके लेख के आखिरी पैरा की लाइनें हैं। इन्हें पढ़कर तो, ऐसे लगता है कि ये विकास के दुष्परिणामों पर लिखा लेख हैं। वैसे जिस तरह मोदी किसी भी बात को गुजरात गौरव से जोड़कर दूसरी बातों को खारिज कर देते हैं। वैसे ही आप भी मोदी विरोध के लिए अजीब तर्क गढ़ रहे हैं।

अनिल पाण्डेय said...

modi hi nahi har politician election ate hi deshbhakt ban jata hai. ise desh ka durbhagya hi kahenge ki hamari janta ki yaddasht bahut kamjor hai. wo sab kuchh bhool jati hai. yahan yah batana bhi jaruri hai ki vikas ki shart par sampradayikta bilkul bhi swikarya nahi hogi.