हर फ्रिज़ कुछ कहता है-दो


फ्रिज़ की कहानी कई टिप्पणीकारों के संस्मरण से आगे बढ़ती जा रही है । रतलामी जी जानना चाहते हैं कि हमारे फ्रिज़ में क्या रहता है ? इससे मेरे और आस पास के जीवन या खान पान मे आए बदलाव को समझा जा सकता है । वैसे इसमें खान पान के वो तत्व शामिल नहीं हैं जो हम बाहर खाते हैं । बहरहाल मेरे फ्रिज़ में कई बार ढेरों विदेशी चाकलेट्स होते हैं । जिससे पता चलता है कि मेरे दोस्त या रिश्तेदार अब विदेश आने जाने लगे हैं । दस साल पहले जिनकी सीमा दिल्ली के बाद खत्म हो जाती थी । या फिर दिल्ली में बिकने वाले विदेशी चाकलेट्स के खरीदार हो गए हैं । रोज़ या खाने के दिन खरीद कर लाई जाने वाली मछली अब पूरे हफ्ते के लिए खरीदी जाती है ।
फ्रिज़र में रखते हैं । मछली खरीदने के लिए वक्त कम होता है । हफ्ते भर की सब्ज़ियां फ्रिज़ में ढूंस दी जाती है । बीयर नहीं होती । क्योंकि इसकी आदत नहीं । बचे हुए खानों के लिए फ्रिज़ में हमेशा जगह निकाल ली जाती है । दो छोटे कटोरे को एक के ऊपर रखकर या मिठाई की खाली होती डिब्बी को फेंक कर । बची हुई एक दो मिठाई किसी छोटी कटोरी में रख दी जाती है । इससे जगह निकल जाती है । जैसे दिल्ली की डीटीसी बसों में कंडक्टर लोगों को भरता जाता है और कहता है बस अभी खाली है । फ्रिज़ भी उसी आधार पर भरा जाता है । अब सबके पास फ्रिज़ है इसलिए पड़ोस से कोई मांगने नहीं आता । कभी कभी कहीं बर्फ खत्म हो जाए तो घंटी बजती है । शराब की पार्टियों में बर्फ कम हो जाती है । फ्रिज़र में दूध के पैकेट के लिए भी जगह होती है । जो पत्थर बन कर कुछ दिन तक बहने की थकान मिटा लेता है । बाद में हम उसे शीतकाल से निकाल कर ग्रीष्म काल में पिघला देते हैं । फिर से जमाने के लिए । दही ।

अब फ्रिज़ को देखता हूं तो लगता है कि कितना बदल गया है । फ्रिज़ नहीं, मेरा जीवन । भागती ज़िंदगी के कारण अब छोटे फ्रिज़ की जगह बड़ा और उससे भी बड़ा फ्रिज़ खरीदा जाने लगा है । दुकानदार भी छोटे फ्रिज़ के लिए उत्साहित नहीं करता । कहता आपका दिन बदलेगा । दिल्ली में तीन घंटा बस या कार में चलेंगे तो घर आकर कैसे बनायेंगे । सब्ज़ी खरीदने का टाइम नहीं होता । इसलिए बड़ा फ्रिज़ लीजिए ताकि स्टोर कर सकें । फ्रिज़ स्टोर है । शाकाहारी घरों में बदलाव की कहानी इसमें दर्ज नहीं । मैं मांसाहारी हूं । सलामी, कबाब भी रखा जाता है । भारत में मधुमेह के मरीज़ बढ़ते जा रहे हैं । इसलिए फ्रिज़ का इस्तमाल इंसुलिन रखने में भी हो रहा है । कई दवायें भी फ्रिज़ में रखी जाती है । हमारी बदलती ज़िंदगी के कारण फ्रिज़ के भीतर धक्कामुक्की बढ़ गई है । जिसका सबसे ज़्यादा ख़मियाजा टमाटर और धनिये की पत्ती को उठाना पड़ता है । धनिये की पत्ती तो कहीं दबकर सूख भी जाती है । और टमाटर जितना घर लाते वक्त झोले में नहीं पिचकता उससे कहीं ज़्यादा फ्रिज़ में । सिर्फ लौकी या कद्दू फ्रिज़ के भीतर अपनी अस्मिता बचा पाते हैं । फ्रिज़ के लिए अब जेनेटिक तकनीक से मज़बूत टमाटर या धनिये की पत्ती की खोज हो रही होगी । पता नहीं ।

फ्रिज़ के दरवाज़े पर कई घरों में बच्चों की कविताएं, स्कूल की चिट्ठी, रूटीन, क्या करना है की सूची, दूध वाले का हिसाब, इन सब चीज़ों को मैगनेट से चिपका कर रखा जाता है । फ्रिज़ का डोर नोटिस बोर्ड का काम करता है । कई घरों में फ्रिज़ छोटे बच्चों के लिए ड्राइंग बोर्ड का काम करते हैं । कहीं कहीं रंगों के निशान बता देते हैं कि इस घर में कोई बच्चा या बच्ची बड़ी हो रही है । वो चित्रकार बनना चाहतें है । लेकिन फ्रिज़ को बचाने की खातिर मां बाप इन चित्रकारों को इतना हतोत्साहित कर देते हैं । जिससे कई प्रतिभायें वहीं खत्म हो जाती है ।

फ्रिज़ को लेकर बहुत तरह की हिदायतें होती हैं । यह घर में अनुशासन का केंद्र होता है । हालांकि अब भी लोग फ्रिज़ को रसोई घरों में रखते हैं मगर इसकी जगह बदली है । जगह की कमी के कारण फ्रिज़ ड्राइंग रूम में भी रखा होता है । खाने की मेज के सामने भी होता है । इसकी सफाई , इनके टॉप कवर का रंग सब मिलकर खास तरह के सौंदर्य अनुशासन का निर्माण करते हैं ।

फ्रिज़ की उपयोगिता लगातार बढ़ रही है इसलिए उसकी हैसियत का पता चल जाता है । फ्रिज़ की हैसियत तो है मगर फ्रिज़ से अब हैसियत नहीं बढ़ती । गांवों में अभी फ्रिज़ हैसियत के कारण खरीद कर रखी जा रही है । ताकि गांव में रहते हुए शहर से कम होने की भावना न आ जाए । बिजली नहीं होती फिर भी कई घरों में फ्रिज़ होता है । महानगरों के एक्सचेंज ऑफर में बदले गए फ्रिज़ गांवों में पहुंच रहे हैं । या फिर महानगर की झुग्गियों में रहने वालों के घर में । गांवों में फ्रिज़ को लेकर हैसियत का दबाव है । और बदलाव भी । वहां भी दूर बाज़ार जाकर सब्ज़ी खरीदने का काम मुश्किल होता जा रहा है । लोग नहीं हैं । बच्चें शहरों में होते हैं । बूढें मां बाप को मुश्किल होती है । बस बिजली आ जाए और देखिये गांवों में कैसे फ्रिज़ में हफ्ते भर की सब्ज़ी खरीदी जाने लगेगी । फ्रिज़ अनंत फ्रिज़ कथा अनंता ।

7 comments:

Pramod Singh said...

बडा डॉकूमेंटेशन वाला राइटिंग कर रहे हैं, महाराज! वैसे 'कथा अनंता' का टाइटिल सही है..

मनीषा पांडेय said...

अनंत कथा की दूसरी कड़ी पढ़कर मजा आ गया। फ्रिज की जगह रसोई या डाइनिंग रूम अब होने लगी है। पहले तो 15 बाई 15 फुट की रसोई होने पर भी फ्रिज ड्रॉइंग रूम में ही सजाया जाता था ताकि हर आने-जाने वाले को फ्रिज के दर्शन हो सकें, उत्‍तर भारत में विशेष रूप से। इलाहाबाद-बनारस-प्रतापगढ़ की ऐसी ढेरों यादें हैं। हां, समृद्ध शहरों-परिवारों की बात अलग थी। मुंबई में बेशक ऐसा नहीं होता था। लेकिन अब फ्रिज की वो औकात नहीं रही। मोबाइल की तरह फ्रिज भी अब दाल-भात हो गया है।

अभय तिवारी said...

लेख अच्छा है.. शीर्षक मरियल है.. मैं होता तो रखता फ़्रिज और तत्व विचार.. जिसे आप कूड़ा कह सकते थे..

अनूप शुक्ला said...

अच्छा लगा इसे बांचना। दिन पर दिन आपका लिखा पढ़ना जरूरी काम में शामिल होता जा रहा है।

ravish kumar said...

आप सब की टिप्पणियां पढ़कर यही लगा कि फ्रिज़ के संस्मरण अपार हैं । हम उपभोक्ता चीज़ों के आस पास हो रहे बदलावों को दर्ज कर सकें तो अच्छा रहेगा । आप सब की सराहना से मेरा उत्साह इतना बढ़ गया कि मैने तीन किस्त लिख डाले । बहुत बहुत धन्यवाद आप सबका ।

रंजु said...

:) :)अच्छा है फ्रिज पुरान...

amit said...

रवीश जी
आपने बिलकुल ठीक कहा .. फ्रिज बदल रहा है। या ये कहे कि समय वदल रहा है। फ्रिज का रंग रूप भी बदल रहा है। नहीं बदल रहा तो बस उसके रखने की जगह जो आज भी कुछ चुनिंदा है। रविश जी फ्रिज में बदलाव आया है। वो ये कि अब फ्रिज औकात आंकने की चीज मात्र नहीं रह गया है। वो तो बस ठंडा करना जनता है। वो तो जमाना जानता है। बात निकली है तो रविश जी दूर.... तलक जाएंगी...