पत्रकारिता का जनपद- ख़बरों की दलाली

पत्रकारिता एक देश की तरह राष्ट्रीय, राज्य और जनपद, तहसील में बंटी हुई है । यहां भी भ्रष्टाचार की शुरूआत नीचे से ऊपर की होती है । या ऊपर से नीचे पहुंची होगी । कई बार लोगों से किस्से सुनता रहा हूं इस करप्शन के बारे में । आज लिख देना चाहता हूं । उनके लिए जो इस पेशे में नहीं हैं ।
हमारे पेशे में बड़ी संख्या में चोर दलाल घुस आए हैं । पहले से ही घुसे रहे हैं । दिल्ली के बड़े राष्ट्रीय दलाल पत्रकारों की तरक्की जनपदीय दलालों से अलग होती है । पत्रकारिता का राष्ट्रीय दलाल प्रतिष्ठित होता है । उसके रसूख से लेकर विचार तक काम में लाए जाते हैं । उसकी संपत्ति के बारे में लोग बात करना छोड़ देते हैं । वो अपनी ज़रूरतों के नाम पर घर भरने के बाद पेशे की भी ज़रूरत बना रहता है । वह किसी न किसी बड़ी संस्था में रहता है जहां की ख़बरें उसे दूसरे गैर दलाल पत्रकारों के बीच महत्वपूर्ण बनाए रखती हैं । वह भी देश में भ्रष्टाचार पर लेख लिखता है । इनके बारे में बात करने की कोई हिम्मत नहीं जुटाता । यह सबके दोस्त होतें हैं । नाइस पर्सन कहलाते हैं ।

मैं इसे छोड़ कर जनपद की तरफ चलता हूं । स्ट्रींगर । यह वो कड़ी है जिससे पत्रकारिता अंतिम छोर पर बैठे आम आदमी से जुड़ती है । हमारे देश में बहुत सारे विवादास्पद विषय इन्हीं स्ट्रींगरों की देन रहे हैं जिनकी खबरों को हड़प कर राष्ट्रीय पत्रकारों ने दिल्ली और लंदन में ईनाम पाएं हैं । स्ट्रींगर वो है जिसकी ख़बरों को हज़ार दो हज़ार में राष्ट्रीय पत्रकार खरीद लेता है । फिर अपनी खबर बना कर दुनिया के सामने महान बन जाता है । क्योंकि स्ट्रींगर को बाइलाइन नहीं मिलती । उसका नाम नहीं छपता । चेहरा टीवी में नहीं दिखाया जाता । उसकी मेहनत मामूली रकम के बदले लूट ली जाती है । इसे नहीं बदला जा सकता क्योंकि कोई चाहता नहीं । चैनलों को सस्ते में खबर मिल जाती है और स्ट्रींगर को एक लाइसेंस । जिसकी चर्चा अगले पैरा में । पर इतना ज़रूर है कि यही बेचारे स्ट्रींगर दिल्ली से जनपदों में जाने वाले पत्रकारों की हर ज़रूरत बनते हैं । इन्हीं के दिए तमाम विश्लेषण दिल्ली के अखबारों और टीवी की खबरों के आधार बनते हैं ।

जनपद पर दिल्ली का डाका पड़ता रहता है । स्ट्रींगर मामूली रकम के लिए मेहनत करता रहता है । वो हर खबर पर जाता है मगर उसकी हर खबर नहीं लगती । उसकी मेहनत बेकार जाती है । खबर तक पहुंचने की कोई रकम नहीं मिलती । यह है उसके पेशेगत मजबूरी और मेहनत की आदर्श कहानी । बिल्कुल सच ।

लेकिन इस तस्वीर का दूसरा पक्ष भी है । कई स्ट्रींगर दलाली के सूत्र बन गए हैं । किसी भी चैनल या अखबार के हों । वो खुद लुटता है तो इसी के नाम पर वो भी खबरों की दलाली से कमा रहा है । कुछ स्ट्रींगर जनपदीय माफिया , अफसरों को ढंकने का काम करते हैं । उनकी ख़बरे दिखा देने के नाम पर हज़ारों नहीं लाखों कमा रहे हैं । किसी चैनल के स्ट्रींगर बनने पर उनकी कमाई पांच हज़ार से अधिक हर महीने नहीं होती । फिर भी इसके लिए मारा मारी मची रहती है । उनके पास तीन तीन फोन होते हैं । उनके साथ तीन तीन लोग घूमते हैं । कार होती है । पता चल रहा है कि ये लोग थानों से हर महीने सट्टेबाज़ी होने देने के बदले थानेदार और सट्टेबाज दोनों से हफ्ता लेते हैं । फिर इन्हीं का चेहरा ढंक कर राष्ट्रीय चैनलों के लिए एक्सक्लूसिव खबरें भी बना देते हैं । स्थानीय बिल्डर की करतूतों को छाप देने की धमकी के बदले रकम लेते हैं । दिल्ली से आए पत्रकारों के सामने बेचारे बने घूमते हैं और उनके रवाना होते ही इनका धंधा चालू हो जाता है । अब तो कई स्थानीय अखबार इसे औपचारिक करने में लगे हैं । वो अब अपने रिपोर्टरों को इन बिल्डरों और अफसरों से विज्ञापन लाने के लिए कहते हैं । जनपदों में कई सारे चैनल आईडी ऐसे दिखते हैं जिनका काम कहीं नहीं दिखता । मगर इन चैनल आईडी के नाम पर खूब वसूली हो रही है । ये वो लोग हैं जो असली खबरों को बाहर से आए पत्रकारों तक नहीं पहुंचने देते । अपनी मेहनत और गरीबी के नाम पर लूट मचा रखी है । मेरे एक कैमरामैन ने कहा कि कुछ ईमानदार पत्रकारों के खुलासे का ये अपने इलाके में इस्तमाल करते हैं । कहते हैं फलां चैनल पर किस तरह ठेकेदारों को एक्सपोज किया गया है । आपका भी वही हाल होगा । आप जानते नहीं मीडिया की ताकत । बस चोर अफसर झांसे में आ जाता है । और लूट का खेल चालू हो जाता है । मैंने वेतन हासिल कर रहे कई पत्रकारों से सुना है कि किसी ज़िले में स्ट्रींगर बनवा दीजिए वहां चला जाऊंगा । बस एक बार किसी राष्ट्रीय चैनल से जुड़ने का मौका मिल जाए । यह सब छलावा होता है । आज नब्बे फीसदी स्ट्रींगर दलाली कर रहे हैं । इनके पास यही तर्क होता है पेट के लिए करना होता है । क्या करें चैनल में तीन हज़ार की भी खबर नहीं चलती । परिवार भी तो चलाना है । क्या ये दलील काफी है । तो फिर इस तर्क से भारतवर्ष में कोई भी बेईमान नहीं है । सब परिवार के लिए ही तो चोरी कर रहे हैं ।

33 comments:

shailendra said...

भाइया रवीश जी, बात तो आपने ठीक कही है, सिक्के के दो पहलू होते हैं। अगर स्ट्रींगर की दलाली को उसके परिवार से देख कर जोड़ा जाएगा, तो इसके मायने बदल जाते हैं, लेकिन इसके साथ एक और कड़वा सच जुड़ा होता है। जो पत्रकार महोदय दिल्ली से कथित बॉस बनकर जनपदों में जाते हैं और उनके सामने वो स्ट्रींगर काफी शरीफ दिखता है, जैसा कि आपने लिखा है और उनके वापस जाने के बाद ही वसूली शुरू कर देता है। दसअसल होता ये है कि जो कथित बॉस रूपी पत्रकार जिलों के दौरों पर जाते हैं, वो स्ट्रींगरों को इतना कंगाल बना देते हैं कि (ये सभी पर लागू नहीं होता है) वो बेचारा न घर का रहता है और ना घाट का। अगर वो चाहे भी कि वो दूसरों से पैसा नहीं ले, तो अगले तीन चार-महीने की कमाई उसकी एक-दो दिन में ही गड़प हो जाती है। ये वैसा ही है, जैसे कोई थानेदार अगर ईमानदारी से रहना चाहे, तो उसके विभाग के अधिकारी उसे ईमानदार नहीं रहने देते, तरह-तरह की डिमांड करते हैं और अगर वो इसको पूरा नहीं करता, तो उसे थानेदारी से हाथ धोना पड़ता है। अगर स्ट्रींगर अपने कथित बॉस के आदेश का पालन नहीं करे, तो उसकी तो स्ट्रींगरी गयी...दिल्ली लौटकर वो रिपोर्ट लगा देगा...कि बड़ी शिकायत है उसकी। उसे हटा देना चाहिए। फिर आप तो जानते ही हैं कि अगर किसी के मुंह में एक बार भ्रष्टाचार रूपी खून लग गया तो फिर वो कहां मानने वाला है। यहां मैं ये नही दलाल स्ट्रींगरों की हिमायत नहीं कर रहा है, लेकिन ये भी एक सच्चाई है। रही बात स्ट्रींगर की...तो ये शब्द धीरे-धीरे बहुत बड़ा होता जा रहा है क्योंकि हर स्ट्रींगर के पास कम से कम दो कैमरा मैन होते हैं, जो स्टोरी करके लाते हैं और वो अपने ऑफिस में बैठकर ब्यूरो चीफ का रूआब झाड़ता है। स्ट्रींगर का एक पहलू ये भी होता है। इसे मैंने ईटीवी में रहते हुए ना केवल देखा है बल्कि महशूश भी किया है। मैं आपके विचारों को काटा नहीं, बल्कि उसके कुछ और पहलुओं को सामने लाने की कोशिश की है।

Raag said...

ये तो बिलकुल नए किस्म का भ्रष्टाचार है।

Pramod said...

रवीश जी,
मुहल्ले की गलियों में टहलते हुए आपके लेख पर नज़र गयी। जायेगी भी क्यों नही, हिन्दी पत्रकारिता जगत में गिने चुने नाम ही तो है, जो खरी-खरी कहने और लिखने की हिम्मत करते है। एक दिल्ली वाले का दूर जनपद पर इतने तीक्ष्ण और सूक्ष्म अवलोकन की झांकी देख बहुत ही अच्छा लगा। लेकिन आप से अनुरोध है कि इस बार जब दिल्ली लौटियेगा तो यहां भी इर्द-गिर्द जरुर झाकियेगा, कुछ वैसी ही लेकिन थोड़ी जुदा किस्म की सच्चाई आपको यहां भी दिख जायेगी। जो यहां डेस्क पर बैठे बाबाओं के इर्द-गिर्द ध्यान देने से बरबस ही दिख पडेगी। उम्मीद करता हूं कि आपकी पारकी नज़र उन जी और हाड़ तोड़ते हुए रंगरुटो पर जरुर जायेगी, जिनकी प्रतिभाएं डेस्क बाबाओं की, उपर से आकर्षक लेकिन प्रतिभशून्य चहेतियों के आगे दम तोड़ रहीं है।

Aflatoon said...

इस प्रसंग मेँ भ्रष्टाचार नीचे से शुरु हुआ ? स्ट्रिंगर्स को 'रेटेनर' कितना मिलता है? या वह अखबार बेचनेवाला और विग़्यापन जुटाने वाला है इसलिए रिटेनेर देने की भी जरूरत नहीं है ? पिछले पन्द्रह सालोँ में पत्रकारिता से जुडी ऊपर की तनख्वाहों के बारे मेँ गैर पत्रकारोँ को सूचित कौन करेगा ? दिल्ली का अखबार या चैनल यानी राष्ट्रीय अखबार या राष्ट्रीय चैनल ? उसकी दरमाह ?
भ्रष्टाचार के खात्मे की शुरुआत जरूर नीचे से शुरु होगी लेकिन उसकी गंगोत्री तो ऊपर है |

SHASHI SINGH said...

सही नब्ज़ पकड़ी है रवीश भाई अभी आपने। इन दिनों चैनलों पर तथाकथित क्राइम से जुड़े कर्यक्रमों ने तो इस धंधे को और भी रंगीन बना दिया है। मुसीबत ये है कि हम पत्रकार सारी दुनिया को तो आईना दीखाते फिरते है मगर अपना चेहरा उस आईने में देखना कतई पसंद नहीं हमें। दूसरों की क्या कहें हम और आप हमारे साथी पत्रकार बने उन दलालों को बहुत अच्छी तरह से जानते पहचानते हैं। यहां आपने एक व्यवस्था के रूप में उनका उल्लेख करके दिल की भड़ास तो निकाल ली मगर नाम लेकर उन पर ऊंगली उठाने की हिम्मत अभी भी आप नहीं कर पाये। फिर भी आपकी ईमानदारी का कायल हुये बिना नहीं रह सकता। आपको आपके चंपारण की माटी का वास्ता है मत बुझने देना इस दीये को... आंदोलनो की मशालें इन्हीं दीयों की जलती है। - शशि सिंह

रंजन said...

सलाम...hats off..

बहुत सटीक लेख है.. आपकी रिपोर्टॊं का तो सदैव कायल रहा हु . पर ये तो बिल्कुल off beat हे.. अपेने ही पेशे के लोगो के बारे मे लिख्नना वाकई ..हिम्म्त का काम हे..

कुछ टिप्पणी:
ये लेख पता नहीं कुछ अधुरा सा लगा.. लगा कुछ कडियां गुम हे..

ये शायद प्रिन्ट मिडीया के लिये भी उतना ही सच हे.. और उपर के लेवल पर शायद कुछ
अलग तरह का.."वैचारिक दलाली" ..


पु:न धन्यवाद !!

ravish said...

दोस्तों,
यह प्रिंट मीडिया के लिए भी सही है । शैलेंद्र की बात भी सही है कि दिल्ली से जाने वाले पत्रकार इन पर रौब झाड़ते हैं । और स्ट्रींगर उन्हें खुश करने के लिए कबाब से लेकर होटल के किराये में डिस्काउंट तक दिलाता है । इनके नाम लिये जा सकते हैं । मुझे इसमें कोई दिक्कत नहीं है । बात यह है कि मैं दो चार बचे ईमानदार स्ट्रींगरों का ही नाम क्यों न लूं । जो सिर्फ दो चार रह गए हैं । निन्यानबे फीसदी स्ट्रींगर ईमानदार नहीं रहे । रही बात दिल्ली में भी पत्रकारिता करने वालों की तो यहां भी अब सुनने को मिल जाता है । कई नाम हैं जिनकी चर्चा होती है तो कुछ लोग मुस्कुरा देते हैं । नाम लेने में एक खतरा भी है । कई बार आपसी प्रतिस्पर्धा में दलाली एक हथियार बन जाता है किसी को बदनाम करने का । इसलिए नाम नहीं लिया । मैं इसकी चपेट में नहीं आना चाहता था । मगर जो बात है वह रख दी गई है ।

Jitendra Chaudhary said...

मेरे ख्याल से वो दिन दूर नही, जब पत्रकारों को भी उतनी ही इज्जत बख्शी जाएगी जितनी नेताओं की बख्शी जाती है। लोकतन्त्र के इस स्तम्भ पर जनता की आखिरी आस थी, लेकिन शायद अब इनसे भी मोहभंग होता दिखायी दे रहा है।

पत्रकारों (और स्वयंभू पत्रकारों) की इस दुर्दशा का जिम्मेदार और कोई नही, स्वयं पत्रकार ही है। जनता जहाँ नेताओं पर थूकती थी, पत्रकारों की हालत तो उस से भी बुरी हो सकती है। हाँ दु:ख इस बात का जरुर होगा कि गेहूँ के साथ घुन भी पिसेंगे।

अभी भी वक्त है, पत्रकार व्यवसाय वाली सोच छोड़कर, स्वतंत्र और बेबाक सोच के साथ आगे आए, नही तो अल्लाह ही मालिक है। लेकिन किसी पत्रकार मे हिम्मत है इतनी?

Rajesh Roshan said...

Apne profession ke bare mein sunkar accha laga ki kisi ne sach likha. Nahi to hum dost yahi baat karte rahte the ki yaar isko (Media) ko kaun sudahrega. Press Club mein milte hain aur sab gum bhula kar ek ho lete hain. Aap stringer ki baat kar rahe hain phir shayad aapne TOP mein baithe logo ki kartoot nahi suni hai ya dekhi hai, ya aap likhna nahi chahte. Khair jo bhi ho achha likha hai.

ravish said...

राजेश जी
मैंने टाप पर बैठे लोगों के बारे में भी सुनी है । यहां स्ट्रींगर की बात कर रहा हूं तो इसे इसलिए मत हल्का होने दे कि मैं फिर बाकी पेशे में बेईमानी के बारे में क्यों नहीं बोल रहा हूं । मैं अभी भी मानता हूं कि दिल्ली में कई बेईमान पत्रकार हैं । मगर उनकी संख्या भी बहुत कम नहीं है जो ईमानदार हैं । कारण अच्छा वेतन हो सकता है । मगर यहां ईमानदार लोग तो है हीं । उन्होंने ईमानदारी से पत्रकारिता की है और कर रहे हैं । कुछ स्ट्रींगर ऐसे भी हैं जो ईमानदार हैं । पर इस लेख में मैने शुरु में ही दिल्ली के बेईमानों के बारे में लिख दिया था । नाम लेने की बहादुरी या कहें तो आपकी चुनौती से समस्या का समाधान नहीं है । नाम तभी लें जब प्रमाण हों । स्ट्रींगरों के बारे में जो कुछ भी लिखा है वो कई साल तक सुनते रहने के बाद लिखा है । इसलिए उनके बीच से भी कोई नाम नहीं लिया है । मगर कह सकता हूं उनके बीच से लोग दलाली कर रहे हैं । यह जानता हूं । होते देखा है । आप नाम ले लीजिए अगर किसी का है तो । मैं छाप दूंगा ।

ओम said...

जितेन्द्र जी ने भी ठीक कहा। मैं तो अभी ठीक से पत्रकार बना भी नहीं हूं। लेकिन कामकाज के बारे में जब पूछा जाता है तो पत्रकार होने की बात किसी गर्व से नहीं बता पाता। ऐसे बताता हूं जैसे सिर्फ ये साफ करना चाहता हूं कि मैं बेरोज़गार नहीं हूं। और ये सुनकर लोग ऐसे मुस्कुराते हैं। जैसे बड़ा माल वाला धंधा है। तगड़ी जान पहचान होगी। लगता है काम बताते ही भ्रष्ट घोषित कर दिया गया। फिर वो बताते हैं कि उनका भी एक भाई पत्रकार है। मतलब तुम्हारे ख़तरनाक होने की स्थिति में मेरे पास भी काट है। कहने का मतलब है लोग पत्रकारिता को ताकत और ताकत के दुरुपयोग के तौर पर तो देखते ही हैं।

दिल्ली में तो फिर भी गनीमत है। रवीश जिन स्ट्रींगर्स की बात कर रहे हैं। उन्होंने ऐसा गंध फैलाया हुआ है कि बिहार में पत्रकार होने का मतलब ही निकाला जाता है बेकार होना। इमेज इतनी ख़राब है जानने वाले लोग मेरे पेशा के बारे में मालूम होने पर पीछे कहते हैं मुझे पहले ही मालूम था ये कुछ नहीं करेगा। इसके लक्षण शुरू से ही ठीक नहीं लग रहे थे।

shailendra said...

रवीश भाइया, आपने मेरी बात को स्वीकार किया, इसके लिए मैं आपका आभारी हूं।

Pramod Chaturvedi said...

रवीश जी,
मै चाहता हूं कि मेरे उठाएं हुए मुद्दे पर भी चर्चा हो। उम्मीद करता हूं कि आप इस अनुज का आग्रह स्वीकार करेंगे।

Sanjeet Tripathi said...

मान गए रविश भाई। बहुत सही नब्ज़ पकड़ी है आपने। छत्तीसगढ़ जैसे इलाके के पत्रकारिता जगत मे सक्रिय रहकर मैनें यही सब देखा है जो आपने लिखा है। एक पत्रकार होकर भी अपने ही हमपेशा लोगों के बारे में, पेशे में व्याप्त बुराईयों पर लिखने के लिए आप तारीफ़ के पात्र हैं। वैसे एक बात है, आपको सुनने से ज्यादा आपको पढ़ना ज्यादा अच्छा लगता है शायद इसलिए कि लिखता सिर्फ़ रविश कुमार है जबकि टी वी पर स्टाफ़ रविश कुमार बोलता है।

Soochak said...

कितनी आसानी से भ्रष्ट्रचार की एक कड़ी को आप बिना किसी कारण से जोड़कर लिख गए। वो बेइमान है तो, चैनल ईमानदार। बात किसी व्यक्ति की न करें, तो पत्रकारिता की मूल धारणा में सन्निहित शक्ति के अहसास की भावना से समस्या शुरू होती है। आप पत्रकार है। आप के परिचय तमाम लोगों, मंत्रियों, अधिकारियों और रसूख वालों से है। तो आप कैसे ईमानदार है। आपने संबंध बनाने में और उन्हे निभाने में, चैनल की विचारधारा, जी हां, से जुड़े लोगों पर ऊंगली न उठाने में कभी भी काम किया हो, तो ईमानदार बनाने वाले वसूलों की कहना सुनना बेमानी है। स्ट्रिंगर कमाता है। स्थानीय एडिटर कमाता है। रीजनल एडिटर लाभ लेता है। ब्यूरो एडिटर पाता है। और चैनल निवेश करवाता है। तो कहां से लाएंगे ईमानदारी। क्या आपको नहीं पता है कि किस किस का पैसा किन किन चैनलों में लगा है।

ravish said...

संजीव जी
पत्रकारों को सूत्र तो ऱखने ही होते हैं । उसे आप रसूख मत कहें । सूत्र रसूख तब होता है जब आप उसका इस्तमाल खबर के अलावा किसी और काम में करने लगते हैं । चैनल फ्री में नहीं चल सकता । वहां जो पैसा लगा है वह सरकार की संस्था सेबी जानती है । किनका । बड़ा हिस्सा जनता का है जिसने शेयर खरीदे हैं । हां यह बात दावे के साथ नहीं कहा जा सकता कि अमुक चैनल के सियासी संबंध नहीं है । मैंने किसी व्यक्ति का तो नाम ही नहीं लिया । रही बात अपनी तो कह सकता कि कभी कोई बेईमानी नहीं की । और उन पर भी सवाल उठाए जिनके बारे में आपको लगता है कि चैनल की विचारधारा के खिलाफ कुछ नहीं किया जा सकता । वाकई दिलचस्पी रखते हों जानने में मिलिए बता दूंगा । एक नहीं सैंकड़ों खबरे हैं । बहस को ऐसे सीमित मत कीजिए । दुनिया बेईमान है तो क्या यह तर्क काफी है हम ईमानदारी पर बात न करें । मैं एक बेईमान को जानता हूं । बड़ा कंपनी वाला है । कहता है हर दिन रिश्वत देनी पड़ती है । लेकिन उसकी शिकायतों से हजारों करोड़ों के घोटाले सामने आए हैं । संजीव जी आपके हिसाब से तो इस बेईमान को ईमानदारी पर बात करने का हक नहीं है । उसे भी होना चाहिए । हो सकता है वो परेशान हो । लेकिन वो बेईमानी से लड़ भी तो रहा है । हालांकि मामला पेचिदा है मगर एक हद तक समझा जा सकता है । उसे भी क्लीन चिट नहीं दिया जा सकता ।

arun said...

arun singh said
ravish bhai, apka khana thik hai. lekin stingar ke shath maliko ke bare me bhe lekhiye, kyoki yah to sabse bade dalal hai. aap media me hai, eshleye achee tarah jante hai ke satta ke kaise dalale ke jati hai. kya media me ramnath goyanka jaisa malik phir aaya.

tanveer said...

खिये इलैक्ट्रोनिक मीडिया में काम करने वालों के लिए ब्लॉग में लिखना काफी अच्छा है क्योंकि इलैक्ट्रोनिक मीडिया की स्क्रीप्ट लिखने में पत्रकार चाह कर भी बहुत सी बाते नहीं लिख पाता है क्योंकि कम से कम शब्दों में जो लिखना होता है फिर जो कुछ लिख भी देता है वो स्क्रीप्ट चैक करने वाला अपनी सीनियोरिटी दिखाने के लिए काट देता है अगर वो काटे नहीं तो लगता है कि स्क्रीप्ट चैक ही नहीं हुई..तो भईया खूब लिखो यहां कोई कांट छाट नहीं करेगा।

तनवीर अहमद राणा,पत्रकार,दिल्ली

prabin said...

sir aap ki bat sahi hai...lakin 1 saval hai aap to NDTV k varist patrkar hai fir aap kyo aap k stringer ko rasta nahi dikha dete...aap k stringer bhi to honda city le kar ghumte hai...sentro extra hoti hai...2-3 camera man...khud snatk bhi nahi huve aur NDTV k stringer ban gaye galat certificate dikhakar...lakin NDTV ko gumrah kiya gaya hai...fir kuch bhi galat hoga NDTV k jariye se savalo ki bouchar kar dege...un ko kya adhikar hai???khud ko dekhe ki vo kya hai...sir main kis aur issra karta hu aap samaj sakte hai...main imandari ka sath deta hu is liya aap ko ye sab bato se aavgat karta hu...ab ye burai ko mitane ki suruaat bhi aap hi kare hamara pura sahyog rahega....aur naam is liye nahi diya ki main bhi un ki chapet main nahi aana chata hu....jo bat thi vo rak di....prabin barot hope u remember me...

prabin said...
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prabin said...

ravish ji aap hamari baat ka javab is blog par de ya fir us(action)main de lakin javab to dena hi hoga...hum bhi to jane aap ki majburi....

April 25, 2007 5:47 PM

ravish said...

प्रवीण जी
आप इशारे में बता सकते हैं कि ये किस शहर के स्ट्रींगर है । इसमें कोई मजबूरी नहीं है । अगर सही पाये गए तो कार्रवाई होगी । मेरा वादा है । पर ध्यान रहे कि किसी व्यक्ति विशेष पर लांछन न लगे । जब हम किसी को ज़ीरो इन कर लेते हैं तो प्रमाण की खोज करनी चाहिए । और अगर ये मिल गया तो कोई मजबूरी नहीं है ।

prabin said...
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suhas said...

भाई रवीश ,
आपसे सम्वाद बनाकर कितना सुखद महसूस कर रहा हुं। आपको ndtv पर सुनकर लगता था कि किससे जाकर आपकी चर्चा करे। आपकी शैली और अन्दाजे बयां अनोखा है,आपको कथादेश सम्मान मिलने पर हजारो शुभकामना ।
लिखना तो स्थानीय पत्रकारिता प्रिंट या इलेक्ट्रानिक पर चाह्ता था।पर दूबारा ***
हां इतना जरूर कहुंगा कि कुछ होना जरूर चाहिए।
आपकी कलम और जुबां दोनो में धार कायम रहे और सीने की आग जलती रहे !आमीन

prabin said...

ravishji aap ko javab mila ki nahi...agar nahi to kahe...

prabin said...

sir aap ne jase likha hai thik usi tarha aap k stringer ne bhi story ka mudda apni jeb se nikala tha....fanna film gujarat main nahi chalne di to aapp k NDTV k stringer ne 5 bande chun kar bombay movie dek ne bhej diya...amir khan kajol ki t-shirt reliance k web world main chapvai ....pvr main ticket book karvai ....aur bana diya duniya ko bevkuf ki gujarat k kuch ladke bombay fana dekne k liye ravana....sir karvai ho....hamare pass bahut bate hai jo aaj tak hame sarminda kar rahi hai aur sunte hi aap bhi vyathit hoge...burai ko aachay se majbut nahi hone dena cahiye...aap ko bhi sarm se sar jukana pade aasa stringer hai aap ka…..sari bate yaha nahi bata sakta aasa ho to aap kahiye hum aap ko call kar dege...fursad se sab bate hogi....aur ha hum bahut hi confidunt hai sir aap ko sarminda nahi hona padega...bharosa rakhe....mane praman ki khoj kar hi aap k samne bat raktahu….hum ne bhi sab bato ka aache se mulyankan kiya hai…..sukriya…..

prabin said...

Aur ha sir buray k samne ki laday main issaro main kya bat karna..hum khul kar bat karege...aur sab bate yaha batana is liyr nahi cahta ki main ptrkarita ka duniya k samne nicha nahi dikhana cahta....aakhir ye bhi to hamare ghar ka mamla hai...aur papa ne sikhaya hai ghar ki bato ko bahar nahi kiya karte....

राजू सजवान said...
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Dilip said...

kya bat hai sir ji aaj muze mere expirence is artical main dikhai de rahe hai....
acha laga sir ji is artical ko padh k aisa laga k jaise hum logo ki koi to parwah kar raha hai thank you sir ji

Dilip Singh

Dilip said...
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Dilip said...

sir ji main aap ko mera ek expirence share karna chaunga ki main intership k liye amdavad ki ek bahot hi badi news channel main jo national channel hai usmain laga to news repoting to dur ki bat rahi sir unho ne muze pahle cha pani mangvya ek mahine tak fir jab time kahtam hone ko aaya to muze kaha tum jaise log aate hi kyun ho patrkarita main...koi kam nahi hai tum logo ka is fild main jab ki wo maha sy khud dusro ki story chori karte the...aur netao k kam bus usi din se maine than liya tha ki aab bahle hi kuch hojaye main kisi ki chatr chaya k niche kam nahi karunga srugale karunga kuch bhi karunga lekin kisi bade reporter ki cha pani bolne nahi jaunga...
lekin tab se leke aaj tak srugle hi kar raha hu jaha jata hu wahi ya to pehchan mangte hai ya to phir exprience puchte hai... ab aap hi bataie ki jab tak aap hame mauka nahi denge to hamare paass exprience kaha se aayega... phir bhi sangrsh jari hai....aap logo ko dekh hame bhi inspireation milti hai sir is masal ko jlaye rakhna...

DILIP SINGh

bablooobaba said...

Resp Rivesh ji,
me bhi ek stringer hoo. shayad aap ke 100% ke 3 ya 2 % imandar manta hoo apney ko, hum 2 re pidhi ke patrakar hi, pita ji karrorpati ki santan they, press photographey me sab kuch luta diya, phir hum padh likh kar patrakar baney , unchi padhai ki, Maa ney awav dekha tha to un ki ichanahi ti per bhi baney, is liye ki , yah chaln ho gaya tha ki bina padha photographer , bekam padhalikha patraka,
aaj mum chote darjey ke shar me patrakarita kar rahey hi, mare pass car hi, mobile hi, our bhi bahutkuch hi per channel ki stringership ki dam per nahi , Na hi DALLI ya ghooskhori ki dam per, pita ji ko bina paisoo ke awav me deekha tha, is liye apna isi line ka kam shuru kiya, lakin aap ya padney waley kahengey ki yah bhi to patrakarita ke dam per ho raha hoga , sir, kisi bhi jagah hum yah nahi batatey ki hum fala chenel key patrakar hi, banta kam bigad jata hi,
aab ke our dastan bhi sun hi lijiye, pahiley pahal humeu 5000 rs per story milta tha, phir3500, phir 2500, phir 1500 .........ab to sharam aati hai.
isi chennel me mery karib karib santh hi judney waley delhi, ya bureo ke patrkaroo ko 50000 se jada , har sal incriment, our bahutkuch,
hamari jo shyad imandari ka path papa sey padey hi, kon suneyga,
kam roj karna hi, kharchey bhi roj hi per stor... ?
sir yadi me bhi apni aaye ke nai stritra nahi khojta to patrakrita ko ho bech rah hota,
vasey bhi stand er 2-3 rs nahidee, Dr. ki fees nahi di, naka ka tax nahi diya, kyoo bhai hum falaney chennel ke reporte hi, yahi har din 50 rs key liyr humney apney sansthan ko girwi rakhdiya, bhai aapney sahi likha hi jab 3-4 story jangey to bechara karey kay../ nahi imandari ky kuch kam our bhi hai jaroorat hi talshney ki,
yadi jada ho gaya ho to mafi, pahli bar likh raha hoo.
baba

avi said...

hi ravis..mai j he avgat hua apke is blod se..so chala aya apse gufgu k liye..bhavisya mai apse ek achi bahas hogi..namaskar