मुलायम के एकलव्य

एकलव्य फिल्म देख ली । फिल्म के साथ साथ इंटरवल में समाजवादी पार्टी का विज्ञापन भी देखा। पूरी फिल्म और विज्ञापन के अमिताभ में फर्क करना मुश्किल हो गया। दोनों ही जगहों पर अमिताभ सेवक यानी एकलव्य की तरह लग रहे थे। वैसे भी पर्दे के अमिताभ और असली ज़िंदगी के अमिताभ में फर्क करना मुश्किल होता है। सुपर स्टार भले ही इस अंतर को सहजता से जीते हों उनके दीवानों के लिए यह मुमकिन नहीं।

महाभारत की परंपरा में एकलव्य का किरदार एक बेईमान गुरु और एक मूर्ख शिष्य की कहानी है। द्रोण ने कपट किया और कम प्रतिभाशाली अर्जुन को अमर करवाया। होनहार धनुर्धर एकलव्य के पास मौका था नई परंपना गढ़ने का। मगर वह द्रोण की चालाकी में फंस गया। आज के सरकारी स्कूलों में पढ़ाने वाले मास्टर भी द्रोण है। वो सवाल करने की शिक्षा नहीं देते बल्कि सवालों का दक्षिणा मांग लेते हैं। एकलव्य ने अपना अंगूठा देकर इतिहास और दलितों को एक महानायक देने का मौका गंवा दिया। वो परंपराओं के अहसान तले दब गया। फिल्म की शुरुआत में उस एक लव्य को चुनौती दी जाती है । एक बच्चा कहता है मैं नहीं मानता एकलव्य सही था। बच्चे की आवाज़ में एकलव्य की मानसिकता को चुनौती दी जाती है। एक संदेश है कि धर्म वो नहीं जो शास्त्र और परंपरा है। धर्म वो है जो बुद्धि है।

अमर सिंह ने अमिताभ बच्चन का साथ दिया है। कांग्रेस ने भी अमिताभ की दोस्ती का इस्तमाल किया है। समाजवादी पार्टी ने पहले मदद की अब इस्तमाल कर रही है। फिल्म देखते देखते यही सब सवाल उठने लगते हैं। कि समाजवादी पार्टी के विज्ञापन वाले अमिताभ और एकलव्य के किरदार वाले अमिताभ में क्या फर्क है? क्या अमिताभ दोनों ही जगह अहसानों से दबे एकलव्य हैं? उनके सामने परंपरा मजबूरी खड़ी कर रही है। मदद करने वालों को भूला देने पर इतिहास कुछ और कहता है। इसलिए अमिताभ समाजवादी पार्टी के विज्ञापन में एक सेवक भाव की तरह नारे लगा रहे हैं। अहसान धर्म का भाव। एकलव्य भी यहीं मजबूर था। वो द्रोण की प्रतिमा का अहसानमंद हो गया। यहीं पर फिल्म और विज्ञापन का भेद मिटने लगता है। फिल्म का एकलव्य नौ पीढ़ियों के नाम पर धर्म की रक्षा करता है। हत्या करता है। सच को छुपाता है। झूठ के सहारे जीता है। सच कहने का साहस नहीं कर पाता। फिल्म के आखिर में पुलिस अफसर के झूठे चिट्ठी की बात पर भी धर्म का पालन कर सच नहीं बोलता। बल्कि झूठ के सहारे एक और ज़िंदगी जीने का रास्ता चुनता है। कहानी में एक जगह सैफ अली कहता है धर्म वो है जो बुद्धि है। मगर एकलव्य के रुप में एक सेवक बहादुरी से अपनी बुज़दिली को छुपाने की कोशिश करता है। सच से भाग जाता है।

मुलायम के एकलव्य भी विधु विनोद चोपड़ा के एकलव्य की तरह हैं। राजनीति से दूर रहने की बात करने वाला हमारे समय के इस महानायक को राजनीतिक विज्ञापन से परहेज़ नहीं है। वो सेवक की तरह सच को सामने रखता है। सिस्टम की बुराइयों से लड़ने की कहानियों से अमर हुआ यह महानायक सिस्टम की बुराइयों को आंकड़ों से झूठलाने के सियासी खेल में सेवक बन गया है। निठारी के मासूम बच्चों की तरफ नहीं देखता। उसमें अब बगावत नहीं है। सियासत है। नेता के प्रति परंपरागत समर्पण। यह एंग्री यंग मैन नहीं हो सकता। क्लेवर ओल्ड मैन लगता है। अमिताभ ने एंग्री यंग मैन के किरदारों से लाखों लोगों को दीवाना बनाया अब समाजवादी पार्टी के विज्ञापन से दीवानों को वोटर बना रहे हैं। द्रोण मुलायम ने एकलव्य अमिताभ का अंगूठा मांग लिया है।

मैं नहीं जानता कि विधु विनोद चोपड़ा ने महानायक के लिए सेवक का किरदार क्यों चुना? क्या उन्होंने आज के अमिताभ की हकीकत को एक किरदार के ज़रिये पर्दे पर उतार दिया है? या चोपड़ा अमिताभ को एक रास्ता दिखाना चाहते हैं? एकलव्य मत बनिये। हर दीवार को गिरा देने वाली दीवार फिल्म का विजय एकलव्य में सेवा की दीवार बनता है। यह एक महानायक का पतन तो नहीं? उससे कहीं ज़्यादा बड़ा किरदार संजय दत्त का है। एक दलित पुलिस अफसर का किरदार। वो देवीगढ़ के राणा के दो हज़ार साल के शाही विरासत को अपने पांच हज़ार साल के शोषण की मिसाल से चुनौती देता है। संजय दत्त के पुलिस अफसर ने एकलव्य की मजबूरी को निकाल फेंका है। यह एक दलित पुलिस अफसर का आत्मविश्वास नहीं बल्कि उसकी बुद्धि का इस्तमाल है। वो प्रतिभा और परंपरा में फर्क करता है। अपनी प्रतिभा के बल पर वर्तमान में जगह बनाता है। आने वाली दलित पीढ़ियों के लिए एक परंपरा बनाता है । वो कह रहा है मैं एकलव्य का मुरीद हो सकता हूं क्योंकि उससे छल हुआ मगर एकलव्य नहीं हो सकता। मुझे कोई मेरी जाति के नाम से गाली नहीं दे सकता ।काश अमिताभ संजय दत्ता वाला किरदार करते तो मेरी ज़हन में महानायक ही रहते। यूपी में दम है क्योंकि जुर्म बहुत कम है। इस विज्ञापन को देख कर अपने अंदर रोता रहा जैसे अमिताभ एकलव्य के किरदार में अपनी साहचर्य के मौत पर सिसकते रहे। क्या वो एकलव्य की मानसिकता से निकलता चाहते हैं? एकलव्य को कौन याद करता है। एकलव्य एक सबक है। जो छला गया वो एकलव्य है। महानायक नहीं।

8 comments:

sarokar said...

Amitabh real life mein sirf ek baar use kiye gaye, Rajiv Gandhi dwara (waise bhi Nehru ke baad unke pariwar ne logon aur is desh ko bhi istemal hi kiya hai. Mulayam-Amar ke liye Amitabh jo kar rahe hain wah thoda ahsanon ka badla hai aur jayada Congress virodh ki politics ke jariye apni aur family ke liye broader political positioning kar rahe hai. We Eklavya nahi hain, Arjun hain. Ajeet Dwivedi

OM said...

Kaash Amitabh ise padh sakte. Main to Chahta hun ki aisa ho.

Mujhe nahin Lagta isse safgoi aur sapat tariqe ke is baare kuch kaha ja sakta hai.

Mujhe to dukh is baat ka hai ki apni baaton aur naayaki se itna suljha hua dikhne wala insaan aisi galtiyan baar baar kyu karta hai. Main nahin maanta ki Big B ko sahi aur galat ki pahchaan na ho. Lekin Amar Singh ke ehsaanon ko chukanen ke woh logon ke saath anyaay nahin kar sakte. Hum nahin jaante ki woh kitne bure insaan hain, unme kya khamiyan hain. Lekin Media ke saamne Apne aapko public figure batate hue sahi aur galat ke farq ke dhindhora peetne waala koi insaan sirf zimmedaari ke ehsaas dikha kar kuchh bhi karne ki chhoot nahi paa jaata.

Filmi Eklavya ki tarah inki aankhen Photo-sensitive ho sakti hain. Lekin aahat to sun lete hain. To sunen log kya chahte hain. Abhi bhi khud ko is sabse alag kar len. Aur apni ahmiyat ko samajhte hue logon par ye ehsaan kar daalen.

Om Prakash, India TV

SHASHI SINGH said...

मजबूरी का सटीक विश्लेषण. लेकिन मैं भी मानता हूं कि यह मजबूरी खुद की ओढ़ी हुई है जो महानायकों को अशोभनीय है.

SHASHI SINGH said...

रवीशजी,
इस लिंक पर जाकर अपने कस्बे को रजिस्टर कर दें. यह हिंदी चिट्ठाकारों का सार्वजनिक मंच है. ऐसा करने से आपके कस्बे में लोगों की चहल बढ़ेगी.
http://narad.akshargram.com/register/

धन्यवाद

नीरज दीवान said...

बारीक़ पिसाई का कमाल है वाह उत्तम लेख रवीश. सच है अमिताभ बाज़ार में खर्च होने वाली शख्सियत बनकर रह गए हैं. सात महीने पहले अमिताभ पर मैंने भी कोशिश की थी कुछ लिखने की.. आपके चिट्ठे पर आकर वो ताज़ा हो गया

यहां देखें
http://neerajdiwan.wordpress.com/2006/07/11/amitabh/

Jagdish Bhatia said...

बहुत अच्छा लिखा रवीश जी। इस विज्ञापन को देख हमारा दिल भी परेशान होता है, अब यह तो देखने वाली बात है कि क्लेवर अमिताभ हैं या अमर सिंह और मुलायम।
यहां देखें
http://aaina2.wordpress.com/2007/02/17/amitabh/
और यहां भी
http://aaina2.wordpress.com/2007/01/06/nithari/

अनूप शुक्ला said...

यह विडम्बना है कि जो लोग हमारे समाज के नायक/महानायक हो सकते हैं वे भांड़/दरबारी बने हुये हैं। लेख अच्छा लगा!

arun kumar said...

कमाल का लेख है रवीश जी। वाकई तुमने हम सबके दिल में जो सवाल उठ रहे थे उनका सवालों के जरिए शानदार जवाब दे दिया। अमिताभ वाकई शर्मनाक हरकतें करके सबको शर्मसार करने पर उतारू हैं। मुझे इस बात से ज्यादा मतलब नहीं कि वो सेवक की तरह क्या क्या करेंगे मुलायम और अमरसिंह के लिए, पर मुझे ये बात सालती है कि अमिताभ का जो फैन क्लब भी कठघरे में खड़ा होता है। अमिताभ की अभिनय क्षमता के खिलाफ खड़े होने वालों में मैं नहीं हूं, पर पर्दे के बाहर उनकी हरकतें वाकई परेशानी की वजह हैं। ये तो तय है कि अमिताभ के इस ऐलान पर कि जुर्म यूपी में कम हैं, कोई भी यकीन नहीं करेगा, पर जो आदमी आंकड़ों की बात करके ये बात साबित करना चाहे उसे क्या कहेंगे।
एकलव्य फिल्म को अमिताभ की वास्तिविक जिंदगी से जोड़ने का ये स्टाइल कमाल रवीश ने पूरे Perfection से किया है