दर दर गंगे


अच्छे संपादन की कमी से कई बार एक अच्छी किताब बहुत अच्छी किताब होने से रह जाती है। अच्छा संपादक होता तो इस किताब को ग्रंथ में बदल देता। पर शायद गंगा की तरह किसी को ग्रंथ भी तो नहीं चाहिए।  पेंगुइन बुक्स ने दर दर गंगे नाम की एक किताब छापी है। लेखक के नाम हैं अभय मिश्र और पंकज रामेंदु। अलग अलग चरणों में तीन साल तक गंगा के किनारे बसे इलाकों की यात्रा कर यह किताब लिखी गई है। इसमें गंगा को लेकर पौराणिक गान नहीं है बल्कि हमने अपने जीवन के लिए गंगा को कैसे इस्तमाल किया है उन छोटी छोटी कहानियों के ज़रिये यह किताब आपको गंगा की शानदार यात्रा करवाती है। गंगोत्री से लेकर गंगा सागर तक तीस शहरों बस्तियों और कस्बों की कथाओं के सहारे गंगा की त्रासदी का वर्णन है। गंगोत्री, उत्तरकाशी, टिहरी, देवप्रयाग, ऋषिकेश, हरिद्वार, गढ़मुक्तेश्वर, नरौरा,गंगा नहर, कन्नोज, बिठुर,कानपुर, कड़ा मनिकपुर, इलाहाबाद, विंध्याचल,बनारस,गाज़ीपुर, बक्सर, पटना, बख़्तियारपुर,मुंगेर,सुल्तानगंज, भागलपुर, कहलगांव,राजमहल, फरक्का, मायापुरी, कोलकाता और गंगासागर। आप इन जगहों के किस्सों के बहाने गंगा से जुड़े जीवन में आए बदलाव को पढ़ सकते हैं। कैसे गंगा बदलती है तो इनके किनारों का जीवन बदलता है। कैसे लोगों ने गंगा का इस्तमाल किया है। यह किताब अपने तरीके से दस्तावेज़ बन जाती है जो गंगा के नहीं बचने पर शायद ज्यादा काम आएगी। आप तीस शहरों की यात्रा के साथ गंगा और उसके जन जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों की एक लाइव डोक्यूमेंट्री तो देख ही सकते हैं।


गुरूजी विल्सन का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि गंगा को तो हमने बहुत पहले ही बेचना शुरू कर दिया था जो आज भी जारी है। विल्सन द्वारा भागीरथी में ऊपर से काट कर डाले गए पेड़ ऋषिकेश में निकाल लिये जाते थे। काफी समय बाद यही तरीका अंग्रेजों ने अपनाया और मात्रा ४५० रुपये में टिहरी नरेश से टिहरी और उत्तरकाशी के जंगल खरीद लिये। इन जंगलों से बड़ी मात्रा में पेड़ काटे गए। काटे गए पेड़ों को भागीरथी के ट्रांसपोर्टेशन के हवाले कर दिया जाता और तेजी से यह पेड़ नीचे ऋषिकेश पहुंच जाते। जिनका इस्तेमाल रेल पटरी और कोच बनाने में होता था। स्थानीय लोग तूमड़ी(नाव) में बैठकर इन लट्ठों को पकड़ा करते थे। वक्त बीतते बीतते गंगा विकास की आंधी में फंस गई ।

गुरूजी यह कहानी सुनाते सुनाते रूक जाते हैं। राज्य में एक फौजी मुख्यमंत्री बना तो उसने सभी अवोध निर्माण ध्वस्त करने की ठान ली फिर वो चाहे धार्मिक हो या व्यावसायिक। इसी कड़ी में एक आश्रम का नंबर आया जिसने गंगा की धारा के बीच में चबूतरा बनाकर शिवजी की विशाल मूर्ति स्थापित कर दी थी। लेकिन मुख्यमंत्री नहीं माने तो मुनि जी दिल्ली गए और गंगा दशहरा पर आयोजित कार्यक्रम में मुख्यमंत्री जी की पार्टी के अध्यक्ष को मुख्य अतिथि बनाकर आश्रम आने का न्योता दे आए। पार्टी अध्यक्ष भी बेहद धार्मिक व्यक्ति थे। फिर हुआ यों कि गंगा दशहरा पर शिव जी के चबूतरे के पास आरती हुई जिसमें आरती की थाल अध्यक्ष जी के हाथ में थी,मुख्यमंत्री जी घंटा बजा रहे थे और मुनी जी शंख से ध्वनि निकाल रहे थे।

इन दो प्रसंगों को सुनाते सुनाते अभय और पंकज हरिद्वार आ जाते हैं । गंगा सभा और गरीबों के नाम पर खाना खिलाने का गोरखधंधा कई छोटे छोटे जीवंत प्रसंगों से उजागर कर देत हैं। पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि आप भी वहीं हैं और ये सब देख रहे हैं या देख चुके हैं। गढ़मुक्तेश्वर का प्रसंग दिलचस्प है। कैसे गंगा के संकटग्रस्त होने से मल्लाह अन्य पेशों की तरफ जा रहे हैं। कई मल्लाह ज़बरन पुरोहित बन गए हैं। लोगों को मोक्ष दिला रहे हैं। बीते दस सालों में उन्हीं पुरोहितों को पीछे छोड़ मलकू सहित कई दूसरी जातियों ने अपनी दादागिरी से यहां पंडागिरी शुरू कर दी है कुछ पेट की आग की वजह से पुरोहित बन गए और कुछ को लालच ने झुलसाया।

"गढ़मुक्तेश्वर जहां लोग खुद को मुक्त करने की कामना करने आते थे, वहां गंगा खुद के मोक्ष की कामना करती नज़र आती है। वास्तव में गढ़मुक्तेश्वर का दूसरा रूख ज़्यादा दर्दनाक है,जिसे आज गढ़मुक्तेश्वर के रूप में प्रचारित किया जाता है जो वास्तव में बृजघाट है,गढ़ में तो गंगा सौ साल पहले बहा करती थी,अब वहां १०० सीढ़ियों वाला गंगा मंदिर ही बचा है और बचे हैं पुराने पंडे जिनके पास अब कोई भूला भटका ही जजमान चला आता है। बृजघाट दिल्ली रोड पर पड़ता है इसलिए लोग इसी को गढ़मुक्तेश्वर समझ कर स्नान कर लेते हैं।" ठीक यही बात हरिद्वार के संदर्भ में कही गई है। हरिद्वार की रचना कुछ इस तरह से की गई है कि हर की पैड़ी जिसे अगर नहर कह दिया जाए तो गंगा सभा से लेकर वे तमाम प्रकार की सभाएं नाराजड होकर आपको गंगा में विसर्जित करके ही दम लेंगे जो कितनी भी आम होने के बाद भी गंगा के लिए खुद को खास बी बताती हैं। उस महत्वपूर्ण हर की पैड़ी से गुज़रे बगैर आप किसी भी तरह शहर से मुलाकात नहीं कर सकते हैं। इस वजह से हर की पैड़ी ने अपना स्थान अग्रणी भी रखा हुआ है।


इस किताब में ऐसे अनेक प्रसंग हैं जिनका यहां ज़िक्र करने लगूं तो पूरी किताब फिर से टाइप हो जाएगी। गंगा को राजनीतिक नारेबाज़ी से शोर मुक्त माहौल में मानवीय किस्सों की त्रासदी से समझने के लिए ये एक अच्छी किताब है। कम से कम मेरी प्रिय पुस्तकों में से एक हो गई है। कई बार हम बड़ी तस्वीर देखने के चक्कर में उन तस्वीरों को नहीं देख पाते जो दरअसल उस संकट को रोज़ाना जी रही होती हैं। किसी को कहीं बेचैनी नहीं है कि गंगा मर रही है। शोर भर है । गंगा के नाम पर हम आसानी से बरगलाये जा रहे हैं। इसलिए नहीं कि हम नासमझ हैं। इसलिए कि अब गंगा हमारे लिए प्रासंगिक है तो सिर्फ ढोंग के लिए। दर दर गंगे की लघु कथायें उस महावृतांत को समृद्ध करेगी जो गंगा के विलीन हो जाने पर विलाप करने के लिए रची जायेंगी। गंगा को बचाने के लिए नहीं बल्कि गंगा को अंतिम विदाई देने के लिए तो यह किताब पढ़ ही सकते हैं। लेखकों को विशेष बधाई।

9 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

गंगा का भी संपादन हो जाये, बहुत आवश्यक है

गिरधारी खंकरियाल said...

kitab kanha milegi?

गिरधारी खंकरियाल said...
This comment has been removed by the author.
nptHeer said...

aap ne khud hee kitne prayaas kiye honge?ganga,yamuna par repoarts,documentries,shows,debates,blogs,even tweets:) aap unhi ko jagaa sakte ho jo soye hue ho-unko nahin jo jaagte hue bhi sonte rahne ka dikhava kar raha ho-actual problem ye dikhava hai patrakar mahoday!:)

shailesh khanduri said...

aur wo Fauji Mukhiyamantri hain Hamare Dada ji, Mr. B.C. Khanduri...

Profcomm said...

This sounds like an excellent book. It's the kind of book that one wishes he or she would write. The 30 places around Ganga that it covers have been inhabited since god knows how many centuries. The stories from the book you have briefly restated are the stuff of social, cultural, historical, and economic analyses. I hope that Ganga remains with us for an eternity. It is true that our economic greed has taken and will continue to take a significant toll on this holy river. I remember a few decades ago our politicians wanted to clean up Ganga. I wonder what happened to the project or if there is any status report that was prepared.

If this book succeeds in some small way to reignite the debate about cleaning Ganga, its worth will have been realized many times over. I join you in congratulating the writers. It is high time we explore our natural and historic wonders and write about them for an audience in the twenty-first century. Thanks for the piece! -- Anish Dave

विकास शिशोदिया said...

really good book

ram milan said...

कहने को बहुत कुछ है सुनने की ख्वाइश है ,
फ़िलहाल बस इतना चाहता हु के कोई सिखाने को तैयार नहीं ,बस इक गुरु चाहता हु ऋषि सम्भूक जैसा न की गुरु द्रोणाचार्य जैसा ,
बहुत तलाशने के बाद भी कोई एस नजर नहीं आता जो खुद को झूठा साबित करके किसी और को सच्चा बनाये !
बहुत अजीब है मेरी बाते बहुत अजीब हु ,मैं उससे जद अजीब है मेरी जिज्ञासा ऐसा मैं नहीं ज्ञानी लोग कहते है जो समझ नहीं पाते और समझाने की कोसिस करते है ! और हो भी क्यों न जिस इन्सान ने खुद के वजूद पर ही सवालिया निशान लगा दिया हो जो सिर्फ एक पहेली बन कर रह गया हो जिसे हर वो इंसान एक सवालिया अंदाज़ में नजर आता है जो खुद को सर्वज्ञता समझता है ,जो मेरी समझ की कसौटी से कोसो दूर नजर आता है उन सबके लिए ही मैं एक महा मुर्ख हु क्योंकि महाज्ञानियों को मुर्ख कहने वाला महा मुर्ख ही होता है ,पर क्या करू कुछ अजीब है इस दुनिया की सच्चाई जहा सिर्फ उलझन ही भरी हुई है !
फ़िलहाल मैं आप से कुछ सीखना चाहता हु दुनिया को आप की नजर से देखना चाहता हु !देखना है जो इंसान इतना बेबाक और सटीक बोलता है वो लगों की नजर में खटकता क्यों है !
क्या आप मेरे गुरु बनेगे रविश भाई ?
मेरे पास देने को अंगूठा नहीं क्योंकि मैं कोई महँ धनुर्धर नहीं हु ,और न ही आप ने किसी को सर्वश्रेस्ट बनाने का वचन दिया होगा!
आप का छोटा भाई माने तो ,
नहीं तो महामूर्ख तो हु ही !
मुझे आप के उत्तर का इंतजार रहेगा !
R.M.Batham
cell no 8423077641
mail id yognandni2010@gmail.com
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Pathik Patel said...

नदियो को प्रदुशित हम आप जेसे शहरि लोगो ने जितना किया हे उतना सायद हि किसि और ने किया है ।