पत्थर के ही इंसा पाये हैं.....


बुतखाना समझते हो जिसको
पूछो न वहां क्या हालत है
हमलोग वहीं लौटे हैं
बस शुक्र करो लौट आये हैं
तुम शहर ए मोहब्बत कहते हो
हम जान बचाकर आए हैं
हम सोच रहे हैं मुद्दत से
अब उम्र गुज़ारे भी तो कहां
सहरा में खुशी के फूल नहीं
शहरों में ग़मों के साये हैं

सुदर्शन फ़ाकिर की लिखी ये ग़जल बार बार सुनता रहता हूं। क्यों सुनता हूं मालूम नहीं। शायद ख़ुद की सफ़ाई के लिए। अपने भीतर की उस हिंसा को बार बार पहचानने के लिए जो किसी के जवाब में तुनक आती है। जो हिंसा किसी सवाल करने वाले के भीतर इस कदर बैठी है कि वो हैवानियत में देख ही नहीं पाती कि नेता ने उसे किस कदर भांड बना डाला है। बार बार सुनता हूं ये ग़ज़ल। कई बार लगता है कि इतनी ख़ूबसूरत बातें लिखने वालों की बातों को ज़माने ने समझा क्यों नहीं। क्या ये सारी पंक्तियां किसी एकांत में किसी महबूब को याद करने का बहाना भर थी। हमने क्या सीखा इनसे। शायरी कविता हमारे भीतर कोई दूसरा शख्स ढूंढने में मदद करती है या हम उनके इस काम में मदद ही नहीं करना चाहते। हम इन पंक्तियों को सुनते हुए ख़ुद से भागने लगते हैं। वक्त को गुज़र जाने का इंतज़ार करने लगते हैं।

नेताओं ने अपना लाउडस्पीकर खोल दिया है। चौरासी के नरसंहार का ज़िक्र अब २००२ के गुजरात दंगों के सामने फुटबाल मैच की तरह होने लगा है। गोधरा हुआ या इंदिरा की हत्या हुई। दंगे तो और भी बहुत हुए। पहले होते थे अब नहीं होते । हम क्या कह रहे हैं हमें ही नहीं मालूम। बस अपनी अपनी राजनीतिक निष्ठाओं की भांडगिरी हो रही है। दो चार नेताओं को खलनायक बनाकर अनगिनत लोग जाने किस तफरीह से इन बहसों को सुनते होंगे जो बसों और जीपों में लद कर आए और इंसानों को गाजर मूली की तरह काट कर चले गए। तिस पर ये नाकामी नश्तर की तरह चुभती नहीं कि उन दो चार नेताओं को भी कौन सी सज़ा हुई आज तक। टाइटलर बनाम फुल्का,मोदी बनाम नीतीश सारी लड़ाई अब शहर के इस नाले पर हो रही है। समाज तब भी बुज़दिल की तरह चुप था, अब भी है। वो इन नेताओं के पीछे छिप कर अपनी बुज़दिली ज़ाहिर करता है। इनके नाम पर लड़कर बहादुर बनता है। एक नाइंसाफी की मिसाल देकर दूसरी नाइंसाफी के लिए रियायत मांगता है। इस पूरी कवायद में उनकी चिंताएं और आवाज़ें धीरे धीरे पीछे हटती चली जाती हैं जिन पर दंगे का कहर टूटता है। वे अखबारों की हेडलाइन से गायब हो जाते हैं और वो भीड़ सामान्य जीवन में लौट कर फिर से उसी राजनीति के रास्ते सत्ता की सीढ़ियां चढ़ आती हैं। चौरासी बनाम २००२ के दंगों का नतीजा यही है कि जब तब कुछ नहीं हुआ तो अब क्यों हों। एक अफसोस करता है और एक नहीं करता। क्या यही इन नरसंहारों का अंतिम इंसाफ है। या ये है कि जो भी शामिल था उसे सज़ा मिले।


८४ या २००२ में सिर्फ नेता नहीं थे। एक भीड़ थी जो उनके इशारे पर काम करती थी। उस भीड़ का अपना मज़हब होगा। इसके अलावा असंख्य लोगों की वो भीड़ होगी जो अपने घरों में चुप यह तमाशा देखती होगी। जिसका भी एक मज़हब होगा। जिसने भी गीता और कुरआन पढ़ा होगा। इंसाफ किसे मिला है। जिन दलों पर आरोप लगे वो इन सबके बावजूद अलग अलग जगहों में बारी बारी से हुकूमत करते रहे हैं। वो आगे भी हुकूमत करेंगे।

कोई हारेगा कोई जीतेगा। मरेगा वही जो दंगों से बचा होगा। वो बार बार मरेगा। अहमदाबाद में, भागलपुर में और लाजपतनगर और नंदनगरी में। जो बुज़दिल होंगे वे जगजीत सिंह की गाई इस ग़ज़ल को सुनकर सुदर्शन फाकिर को भूल जायेंगे। हम जान बचाकर लौटे हैं, शुक्र करो लौट आये हैं। इन ग़ज़लों का बार बार पाठ किया जाना चाहिए। अलग अलग संदर्भों में।
पत्थर के खुदा
पत्थर के सनम
पत्थर के ही इंसा पाये हैं

25 comments:

suchak said...

law & order has 2 major enemies: the full truth and the complete lie---full truth causes revolutions,complete lie causes riots

In 2002 and '84 Leaders use this formula to ....:(

प्रवीण पाण्डेय said...

लुटे तभी थे,
और आज भी,
लुटे जा रहे,

जो जीते थे,
अब रीते हैं,
दूल्हा, दुल्हन,
बेगाने से,
बने बराती,
जुटे जा रहे।

Vivek Khanna said...

पत्थर के खुदा
पत्थर के सनम
पत्थर के ही इंसा पाये हैं !
पर ये किसने कहां आप पत्थर दिल हो ??

Profcomm said...

I agree that we politicize riots too much. We forget that people suffer, commit atrocities, or simply live through riots. We need to remember and seek justice for those who suffered. These riots are our national shame, and unless we take a strong stance against them--the way so many spoke out against what our brave Nirbhaya had to endure--we will keep looking at them through our politics. You have made a very good point in a very subtle way. -- Anish Dave

Ankur Jain said...

ultimate......

DJ_knight said...

सोचिये ये दंगे ना होते तो आपकी रोजी रोटी कौन चलाता.. आखिर मरहम लगाने के बजाय घाव का सबसे ज्यादा गहरा भी तो आपने ही है...

Pathik Patel said...

1984 के दंगो में और 2002 के दंगो में कोमन मिडिया का कोंग्रेस के तरफदारी का रोल है ।

Pathik Patel said...

सिख समुदाय के भाई सबूतों के साथ कह रहे है की 1984 के दंगे कोंग्रेस के नेतायो ने करवाया ।
फिर भी आप मजहब वाले इंसानो को ढूंड रहे हे ?

डॉ. मोनिका शर्मा said...

विचारणीय ..... सोचना तो होगा ही , तभी शायद स्वयं को हिंसक होने से बचा सकें

om sudha said...

Main tumko.aisi afeem khilaunga ki.AIDS.ke vishanu bhi kaamp.jayenge. -dharm

Pankaj Kumar said...

हमारे भीतर राम और रावण के बीच की लड़ाई अनवरत चलती रहती है. इसमें विजित का पक्ष ही उसके कर्म को निर्धारित करता है. फुरुसबुकनी देना आसान होता है उसपर अमल करना मुश्किल. चिंता वाजिव है.

NEHAL SHARMA said...

sir apka picha nahin chadunga .. apke wajah se twitter join kiya tha...ab aap wahan nahin to yaheen sahi


duck said...

@RavishKumarNDTV kya aapka naya twitter account. purana kyon badla

shailesh khanduri said...

Sir aapka pura blog aaj chaan marne ke baad khud bhi likhne ka man kiya likha bhi hai, kahan/kaise bhejenge aapko? yahan sabke saamne? Na. my E-Mail id is shailesh_khanduri@yahoo.co.in will wait for your message over there so that i can send you back story(pehli baar kuch likha hai) :)

Akhilesh Jain said...
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Akhilesh Jain said...

कल जब इस आलेख को पढ़ा तो समझ ना आया की ये कहाँ जाकर पूर्ण होगा। बेचैन था और पहला पैरा पढ़कर बंद कर दिया, आज फिर खोल और पढ़ा। लेखनी की ऐसी क्रूरता सामने तभी आती है जब अन्दर ज्वार हो। जो जीपों गाड़ियों में भरकर आये और काटकर चले गए अगर वो इसे पढ़ें तो शायद रिहाई मांगे। पर पढ़ें कैसे पढने और समझने के लिए तो दिल चाहिए।

Akhilesh Jain said...
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Akhilesh Jain said...
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Ranjit Kumar said...

दंगे हुए जिन शहरों में पूछो ना वहाँ क्या हालत थी ...ऐसी मेरी हालत पहले तो ना थी ...
भागलपुर के दंगे में वहीं था और गुजरात के दंगों में भी वहीं था ...दंगों का दर्द कोई हमसे पूछे तो कैसे ...भोगे हुए का दर्द देखे सुने हुवों के दर्द से गहरा होता है ...

Piyu said...

दंगों में बस भीड़ होती है जो नेताओं के इशारों पर मारती जाती है।

madho das said...

इतंहा हो गई इनतजार की....

गाते गाते गला बैठ गया

punam gupta said...

दंगें या सन् 1984 के हो या फिर 2002 में हुए गुजरात के, इन सब ने देश को ही दर्द दिया है। एक ऐसी टीस और दंश जिसका न जवाब दिया जा सकता है न भुलाया जा सकता, पर इतना जरूर है कि इन दंगों की आंच चाहे ठण्डी क्यों न पड़ गई हो देश के नेता अपनी राजनीति की रोटी सेंकेने के लिए इन दंगों की आंच को हवा जरूर देते रहेंगे। आज राजनीति में छाए ज्यादात्तर नेताओं की ही चाहत है कि चाहे दंगा पीड़ितों को न्याय मिले या न मिले बस उन्हें सत्ता जरूर मिलनी चाहिए।

nptHeer said...

'Wrong' har surat main 'wrong' hai--chahe Indira gandhi ho sabarmati express main zinda jalaye gaye log ya uss baat ko lekar hue dange aur uska rājnaitik upyog + uske liye ki gai voting all-are-wrong...simply uncultured...isn't it ravishji?

Abhinava Srivastava said...

http://www.youtube.com/watch?v=YJudO8FjPj4

GAURAV MANTRA said...

तुम शहरे मोहब्बत कहते हॊ
हम जान बचा कर आये है