चित्रा..अंग..अदा..ये साली..ज़िंदगी

निर्देशक अपनी नज़र से फिल्म बनाता है और दर्शक अपनी नज़र से देखता है। इस फिल्म को देखते वक्त यही लगा कि सुधीर मिश्रा तमाम किस्सों में उस लड़की के सौंदर्य की कसक को पाने या उभारने की कोशिश कर रहे हैं जो इसकी नायिका है। उनका कैमरा हर बार उस लड़की को ढूंढ लाता है जिसका नाम प्रीति है। गोवा से दिल्ली ले आता है। वो चित्रांगदा की कशिश में फंसे नज़र आते हैं। हर तरह के हालात में कैमरे ने उसकी खूबसूरती का मोह नहीं छोड़ा है। बहुत तराशी हुई नज़र से कैमरा उसकी दिलफेंक अदाओं पर नज़रे लुटाता है। वो अपनी बेबसियों और बदमाशियों के बीच सेक्स के सामान की तरह भीतर से खोखली मगर बाहर से एक ज़िंदादिल लड़की कहानी को ढोती नज़र आती है। किरदार उसे पा लेना चाहते हैं। भोग लेना चाहते हैं। इसलिए वो आखिर तक संबंधों से आज़ाद नज़र आती है। बंधती नहीं है। खुलती जाती है। एक अच्छी अदाकारा हैं चित्रांगदा। निर्देशक ने बड़े हुनर से तमाम तरह की अंधेरी गुफाओं में ले जा कर भी चित्रांगदा को बेदाग़ निकाल लिया है। उससे नफ़रत पैदा नहीं होती। लगाव भी पैदा नहीं होता। बस उसकी ख़ूबसूरती एक कहानी की तरह फिल्म में घूम रही है। आज़ाद कहानी की तरह।

तिहाड़ जेल,जामा मस्जिद,पुरानी दिल्ली और पुराना क़िला। बाहरी दिल्ली की उन बची हुई पहाड़ियों में जहां आए दिन गोरखधंधा चलता रहता है। विस्तार के दौर में दिल्ली में किसी एक राजनेता पर सवाल खड़े नहीं किये गए। जैसे बिहार में लालू और यूपी में मुलायम,मायावती और हरियाणा में चौटाला या हुड्डा के साथ हुआ। दिल्ली में यह खेल राजनीतिक आरोपों से दूर चुपचाप खेला गया। सुधीर मिश्रा के तमाम प्लॉट ने इसे उधेड़ने की कोशिश की है। जगह-जगह पर कब्ज़े हुए। किसी नेता या दल को सज़ा नहीं मिली। सुधीर मिश्रा ने कम से कम दिल्ली को रोमांस कथा में नहीं बदलने दिया। बस जामा मस्जिद के ऊपर उड़ते कबूतरों और दीवार फांदते लफंगों से अनजाने में एक छवि बन गई है। दिल्ली छह की उसी पुरानी छवि को चुपके से मज़बूत कर जाती है जिसके बारे में वहमी लोग दबी ज़ुबान में बातें करते हैं। वैसे दुनिया में कोई जगह पवित्र नहीं होती। हर तरह के किस्से होते ही हैं। गनीमत है कि सुधीर मिश्रा ने किसी मुस्लिम किरदार को नहीं चुना। कुलदीप पुरानी दिल्ली का बाशिंदा है।

यहां वो एक नई छवि भी देने की कोशिश करते हैं मगर कहीं न कहीं कुलदीप बाहरी ही लगता है। जबकि पुरानी दिल्ली में जितने हिन्दू है उतने ही मुसलमान भी। गज़ब की साझा ज़िंदगी है वहां। यहां आप घर से निकले नहीं कि पचास लोगों की निगाहें उठ जाती हैं मगर सुधीर का कुलदीप आता-जाता रहता है और किसी की नज़र नहीं पड़ती है। निर्देशक थोड़ी सी और डिटेलिंग कर लेते तो अच्छा रहता। कुलदीप को मुनिरका में होना चाहिए था। पुरानी दिल्ली की छतों से कोई लटक कर बंदूक ताने रहेगा और किसी की नज़र नहीं पड़ेगी हो नहीं सकता। आज कल के निर्देशक भी बेवकूफियां करते हैं। हां छतों का रास्ते की तरह इस्तमाल करना अच्छा लगा। उस पुरानी दिल्ली के सेट अप में कुलदीप की पत्नी की पीठ सहलाते कैमरे से पूछने का मन किया कि कभी देखा है रे ऐसा वहां। इतना खुलेआम। ठीक है निर्देशक की अपनी मर्ज़ी। आंखें जहां गड़ जाए। एक बेबस लड़की को ख़ूबसूरत बनाने का खेल सामंती ही है। उसकी बेचारगी लिप्स्टिक की तरह लाल लगती है। लैपटॉप वाले गुंडे बदमाशों को दिखा कर भी ठीक किया। आज कल के गुंडे फ्लैट बेचते हैं। ईमेल से ग़ायब होने की बात करते हैं। पुराना मारवाड़ी भी खत्म नहीं हुआ है।

इरफान का स्टारडम उनका अभिनय है। वो चॉकलेटी नहीं हैं। सलेटी हैं। कुलदीप का अभिनय भी अच्छा है। बहुत सारे प्लाट्स ने फिल्म को बेहतर ही किया है। दिल्ली के बारे में नई समझ पैदा करती है। किस्सा कहने का अंदाज़ बहुत अच्छा है। फिल्म हर मोड़ पर कोई अचरज लिए खड़ी रहती है। चौंकाती है। कुछ भी तय नहीं लगता। बस चित्रा-अंग-अदा का मोह निश्चित लगता है। निर्देशक उसकी खूबसूरती को अंत में पकड़ ही लेता है। जब चित्रांगदा इरफ़ान से कहती है होल्ड मी।

20 comments:

amit said...

badhiya vishleshan hai. mazaa aaya. film shaniwar ko maine bhee dekhee, par ab tak tay nahin kar paya tha ki kya likhoon iske baare mein. behtareen chitran.

संतोष कुमार said...

रविश जी,
आप जादूगर है, दिल्ली के देहात से सीधे चित्रगंधा का चित्रण. लाजवाब .......
मुद्दा कोई भी हो , आपकी विश्लेषण की शैली अर्दभूत है.

झकास पोस्ट है , (मुम्बईया स्टाइल में कहा )

Parul said...

film dekhne ki dilchaspi badha di aapne!

Rajeev Bishnoi said...

ummid hain ravish ki report me kuch aasa hi dekhne ko milega......aap bhi to shabdo ke Bazigar hain ravish ji

विरमा राम said...

गजब का विश्लेषण/चित्रण... चीजों की बारीकियों को पकड़ने की आपकी कला का कोई सानी नहीं..जितना आपसे सीखें उतना कम है..

MANOJ KUMAR said...

aapne to tital ka bhi achha postmartam kar diya.

प्रवीण पाण्डेय said...

अभिनेत्री के तीनों पक्ष आपने स्पष्ट कर दिये, देखने योग्य फिल्म है।

babanpandey said...

इरफान का स्टारडम उनका अभिनय है। वो चॉकलेटी नहीं हैं। सलेटी हैं। //
waah //

Anupam Singh said...

"Aapne kuchh toh aisa kiya hoga jo mujhe woh lag raha hai jo aapko lag raha hai ki mujhe lag raha hai".. Irfan ke is ek line se Chitrangada Irfan ke sambandh ko paribhaashit kiya ja sakta hai.
Achhi Film!

kahi ankahi said...

सही कहा आपने , हम सोचते हैं कुछ,ये जाती कहीं और है,...इस भाव की तरह फिल्म
का निर्देशन और पटकथा एक पल को भी ठहराव या निश्चितता का आभास नहीं होने देते। फ्रेम दर फ्रेम
फिल्म ' बुलेट ' की तरह कलेजे से घुसकर ज़ेहन में कहीं ठहर जाती है ।

Manpreet said...

ravis ji muje nahi pata ki me aapki report ko pasand karta hu ya aapki chavi ko
or muje ye bhi pata h aap logo me apni chavi banane ke liye reporting nahi krye h
aapki car delhi ke देहात se dhool mitti me sani hui thi or jb delhi ki chamakti hui city me aayi to kasi lag rahi thi
plz. reply me am waiting

अमृत कुमार तिवारी said...

काफी समय बाद ऐसी फिल्म देखी...जो हॉल से निकलने के बाद सुखद एहसास दे। नहीं तो अधिकांश ऐसी थी..जिससे मन किचाहिन हो गया। खैर प्रभु आपका विश्लेषण का क्या कहना...स्टोरी को पकड़ने का नज़रिया तो आपके पास है। शनिवार को आपकी बाहरी दिल्ली के गांवो वाली स्टोरी रवीश की रिपोर्ट देखी...मेरे गांव से मित्र के बड़े भाई आए हैं...साइन ऑफ होने पर उन्होंने बकायदा उठकर ताली बजाई.. फिर चर्चा छिड़ गई थी..मेरे कमरे पर..। फिर टीस ही टीस सीने में थी। आप जब बाथरुम का जिक्र कर रहे थे..तब आपका गुस्सा आपके चेहरे पर दिख रहा था...अच्छा लगा कोई आदमी दोमुही बात नहीं करता है.।। फिर फटी हुई दरी को हिंदुस्तान के आईना रूप में पेश करना...सोचने पर मज़बूर कर दिया। न्यूज चैनलों के नाच गानों से आपका निराश होना लाजमी है...लेकिन ये रिपोर्ट वो लोग देख कर भी क्या उखाड़ लेंगे..जिनकी रुचि नचनिया- बजनिया में होगी। ये रिपोर्ट उन सभी बच्चों को देखना चाहिए, जो समाज और राजनीति को समझना शुरू कर दिए..हैं...शायद खुदा ना खस्ता अगर वे कोई अधिकारी या कोई पद भार ग्रहण करते हैं..तो जरूर ही इस प्रोग्राम का संस्कार उनके दिल में टीस पैदा करेगा कि वे बेहतर काम करें। जय हिंद --सदा सलामत रहें।

V!Vs said...

shandaar review.......

गुड्डा गुडिया said...

रवीश भाई ने कई परतें तो उघाड़ी हैं लेकिन जो अपशब्दों के बारें मैं प्रयोग किया है उसे हम क्या कहें ? मुझे लगता है जिस समुदाय की बात सुधीर मिश्र कर रहे हैं, उसकी यह एक सहज अभिव्यक्ति है और सहज रूप मैं ही हमारे सामने आती है , जो कि एक बार भी आपको यह नहीं अहसास नहीं होने देती कि हम कुछ और नहीं देख रहे है जो अलग सा है, बल्कि वही देख रहे हैं जो घटित होता है उधर | मुझे याद आ रहा है भोपाल मैं मैंने विभा मिश्र जी के निर्देशन मैं झुग्गी के बच्चों के साथ एक प्ले किया था जिसमें बच्चों ने बेबाक गालिया दी थीं | नाटक के पहले तक तो हमारी भरपूर आलोचना हुई लेकिन बाद मैं नाटक देखकर लोगों ने कहा, अरे यह तो सहज अभिव्यक्ति है |

लेकिन एक जगह सुधीर मिश्र जैसा निर्देशक चुकता नजर आता है जब वह कुलदीप के बच्चे से यह कहलवाता है कि दिमाग मैं तो बस.....................!!!!!!! सवाल यह है कि हम बच्चों को क्या दिखाना और उनसे क्या करवाना चाहते हैं ....? क्या सुधीर मिश्र आगामी समय के नौजवान को केवल हिंसक देखना चाहते हैं ? मुझे लगता है हम सभी को इस विषय मैं जरुर सोचना और लिखना चाहिए कि सुधीर जी कम से कम बच्चों से उनका बचपन एइसे मत छीनिए !! आप फ्रायड को भी पढेंगे तो वह भी यह कहता है कि बच्चे परिवेश से चीजें सीखते हैं लेकिन वह यह भी कहता है कि वे खुद भी विश्लेषण करते हैं सही और गलत का..... लेकिन सुधीर जी बच्चे को विश्लेषण का मौका नहीं देते बल्कि अपने बाप जैसा बना देते हैं जबकि वो ज्यादा समय तो अपनी उस मान के पास ही रहा जो कुलदीप के कम से नफरत और बच्चे से प्यार करती हैं |

Manish Kumar said...

सुधीर की हर फिल्म उनके हर छोटे बड़े किरदार पर की गई उनकी मेहनत दर्शाती रही है। कहना ना होगा कि इस फिल्म से भी यही उम्मीदें थी। अभी तक देखी नहीं है पर आपकी बातों से लगता है कि उन्होंने अपने पुराने तेवर बरक़रार रखे हैं।

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

प्रभावी विश्लेषण ...अब फिल्म देखने का मन है......

निखिल आनन्द गिरि said...

ये फिल्म सिर्फ इरफान खान की वजह से देखी जा सकती है...चित्रांगदा इस फिल्म की सबसे कमज़ोर कड़ी है....फालतू...अरुणोदय सिंह को मिर्च के बाद दोबारा देखना अच्छा लगा....वो आने वाली फिल्मों के बड़े नायक होंगे...सुधीर मिश्रा फिल्म में की जगह लाजवाब हैं मगर कुल मिलाकर फिल्म मास्टरपीस नहीं बन सकी है....

अभिषेक मिश्र said...

शब्दों से फिल्म का बेहतर चित्रण किया है आपने. मगर दिल्ली में तो दर्शकों का ज्यादा रुझान 'हमदोनो' की ओर देखा मैंने.

सदाबहार देव आनंद

कि दिल अभी भरा नहीं

अभिषेक मिश्र said...
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anil yadav said...

अच्छी फिल्म है