फेसबुक्रांति

फेसबुक,ट्विटर,ब्लॉग,यू ट्यूब को अनर्गल सोशल मीडिया बता कर खारिज करने वाले जानकारों को एक बार फिर से अपनी समझ के गिरेबां में झांक लेना चाहिए। खाली वक्त में किसी फालतूपने की अभिव्यक्तियों का माध्यम नहीं है सोशल मीडिया। यह एक एक व्यक्ति के मन का एक ऐसे नेटवर्क की दुनिया में विस्तार है जहां कई मन जुड़ जाए तो देश में सियासी बवाल खड़ा हो सकता है। मीडिया पर नियंत्रण के ज़रिये सत्ता सुख भोगने की आदी सरकारों को सोशल मीडिया के ये खुदरा क्रांतिकारी गंभीर चुनौती दे रहे हैं।

मिस्र में होस्नी मुबारक के ख़िलाफ आंदोलन को हवा देने में फेसबुक,ट्विटर,मोबाइल फोन और यू ट्यूब का बड़ी भूमिका सामने आ रही है। लोग महंगाई से तड़प रहे हैं, सरकार भ्रष्टाचार में डूबी है, मुख्यधारा की मीडिया सत्ता से सांठगांठ कर शांत तो जनता क्या करती। वो सोशल मीडिया के ज़रिये आपस में बात करने लगी। होस्नी मुबारक के सलाहकार इस ताकत को तब तक नहीं समझ पाए जब तक ट्यूनिशिया से चली आंधी उनके महल को उखाड़ने न आ पहुंची। फेसबुकियों ने अपनी आलोचनाओं से ऐसी हवा खड़ी कर दी कि हज़ारों लाखों लोग तहरीर स्कावयर की तरफ निकल पड़े। मिस्र के एक प्रसिद्ध ब्लॉगर अब्बास को सरकार ने गिरफ्तार भी कर लिया। अब्बास ने भी आश्चर्य व्यक्त किया कि इतने प्रदर्शनकारी तो कभी देखे ही नहीं। मुबारक विरोधी एक फेसबुक समूह से तो नब्बे हज़ार लोग जुड़ गए। इतनी बड़ी संख्या तो आज किसी नेता की सभा में नहीं होती है। पैसे देकर भी लोग लाए जाएं तब भी इतनी भीड़ नहीं आएगी।

अभी तक हम यही समझते रहे हैं कि लोग फेसबुक पर चैट करने वक्त अपने एकाकीपन की बोरियत को खाली कर रहे हैं। ब्लॉगर आत्ममुग्धता का शिकार है। ट्विटर करने वाला बेकार है। सिर्फ इस बात से खुश होना चाहता है कि वह अमुक फिल्म स्टार के ब्लॉग या ट्विटर से जुड़ा है। हिन्दुस्तान में ही लोग महंगाई और भ्रष्टाचार से त्रस्त है। राजनीतिक दलों से उनका विश्वास उठ रहा है तो वो आपस में बात कर रहे हैं। दलों के प्रवक्ता प्रेस कांफ्रेंस में एक दूसरे के बयानों की धज्जियां उड़ाकर खुश हैं। ठीक है कि हिन्दुस्तान में करीब सात करोड़ लोग ही इंटरनेट का इस्तमाल करते हैं। इस सात करोड़ में से ज्यादातर मुंबई,दिल्ली और हैदराबाद जैसे कोई दस महानगरों में ही रहते हैं। फिर भी इनकी ताकत को अनदेखा करना किसी राजनीतिक मूर्खता से कम नहीं है। मैसूर में रामसेने के खिलाफ दिल्ली की एक लड़की ने फेसबुक पर पिंक चड्ढी कैंपने चलाकर अच्छा खासा आंदोलन खड़ा कर दिया था। आज भी फेसबुक पर कई तरह के ग्रुप बने हुए हैं जिनसे हज़ारों लोग जुड़े हुए हैं। ये सभी अल्पकालिक आंदोलनकारी कभी भी पूर्णकालीक आंदोलनकारी में बदल सकते हैं।

आखिर लोग कहां जाए। न्यूज़ चैनलों से आम लोग ग़ायब हैं। कुछ बड़े लोगों के आस-पास ख़बरें घूम रही हैं। उनके इस्तीफा देने या खंडन कर देने भर से पत्रकारिता का महिमामंडन हो जाता है। हिन्दुस्तान में न सही काहिरा और ट्यूनिशिया में उसे एक नया मंच मिल गया है। इसकी ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि मिस्र में फेसबुक, ट्विटर, न्यूज साइट पर प्रतिबंध लगा दिया गया। कई क्षेत्रों में मोबाइल सेवाएं बंद कर दी गईं। इससे यह धारणा भी बदल जानी चाहिए कि आंदोलन के लिए राजनीतिक दल या नेता को होना ज़रूरी है। कम से कम ट्यूनिशिया या मिस्र में घोषित तौर पर ऐसा नहीं दिखता। लोग अपनी रोज़मर्रा की दिक्कतों से इतने आज़ि़ज आ चुके हैं कि ट्युनिशिया के दक्षिणपंथी इस्लामी संगठन के पीछे खड़े हो गए। मगर जब विपक्षी दल के नेता देश लौटे हैं तो ऐसे भी नारे लगे कि हमें मज़हब के नाम पर बेतुके कानून नहीं चाहिए।

सबक यह है कि सरकारें प्रेस खरीदने या निंयत्रित करने की कोशिश न करें। लोगों के हाथ में सोशल मीडिया नाम का अस्त्र हाथ लग गया है। ट्यूनिशिया में ही कई ब्लॉगर, नेट आंदोलनकारी जगह-जगह से सूचनाएं और वीडियो अपलोड कर रहे थे। जब तक सरकार उन तक पहुंचती, वे सभी किसी और छद्म नाम से और अधिक लोगों तक पहुंच चुकी होती थीं। सरकारी सेंशरशिप का जवाब मिल चुका है। इंटरनेट तकनीकी की भाषा में इसे साइबरसबवर्ज़न कहते हैं। मतलब आप मेन रोड से नहीं जाने देंगे तो हम गली कूचों से निकल कर गंतव्य तक पहुंच जायेंगे। किसे पता था कि तानाशाहों के मुल्क में सोशल मीडिया लोकतंत्र कायम करने का हथियार बन जाएगा।

इन्हें प्रतिबंधित करने का रास्ता और जोखिम भरा है। ईरान और पाकिस्तान ने भी फेसबुक और यू ट्यूब पर बैन लगा कर देख लिया है। सीरिया में भी फेसबुक के चैट पर रोक लगाई जा चुकी है। चीन में नेट नेशनलिस्ट से सरकार को भी डर लगने लगा है। चीन की विदेश नीति का हिस्सा बनता जा रहा है कि किसी फैसले का इंटरनेट से जुड़े समूह किस तरह की प्रतिक्रिया व्यक्त करेंगे। सरकारों को यह समझ लेना चाहिए कि उनके फैसले से आम जनता के बीच बढ़ने वाली खाई किसी भी मंच को राजनीतिक बना सकती है। वो अगर सोशल मीडिया पर अंकुश लगाने की तैयारी में जुटेंगी तो लोग कोई और रास्ता ढूंढ लेंगे। ग्लोबल जगत की पैदाइश ये सोशल मीडिया तथाकथित उदारीकरण से जन्म ले रही असामनताओं को आवाज़ दे रही हैं।

22 comments:

सम्वेदना के स्वर said...

रवीश भाई! अब तो आपने सचमुच बाँध लिया है.. बनाए रखिये यह प्रवाह!!

dehri said...

sir
u hv picked a vry important point.. i wd like to add one more point tht history says revolution bcame successful wen young mind joined it....likewise as younsters r netfrndly no govmnt cud stop them from any Xpression.

dehri said...

sir
u hv picked a vry important point.. i wd like to add one more point tht history says revolution bcame successful wen young mind joined it....likewise as younsters r netfrndly no govmnt cud stop them from any Xpression.

Dinesh said...

रविश जी, आप तो जानते हैं कि पारम्परिक मीडिया या तो कारपोरोट लाबीइस्ट के हाथों बिक चुके है या सरकार के इशारों पर नाच रहे है. एसे समय में इंटरनेट ने ही तो दूरियां कम कम कर संवाद को आगे बढाया है.

आज हर तानाशाह इंटरनेट से घबरा रहा है. चीन का सर्च इंजन तो इजिप्ट नाम से कोई परिणाम नहीं दिखा रहा. सारे के सारे शुतुर्गमुर्ग अपनी मुंडी जमीन में घुसेड़े बैठे हैं.

सोनिया, आडवानी, मनमोहन और सित्ताराम येचुरी सब करप्शन के खिलाफ बोलते दिख रहे हैं. सरकार घबरा चुकी है. कल अशोक चव्हाण के खिलाफ एफआई आर दाखिल हुई, आज राजा गिरफ्तार हुये. 7 फरवरी को आगे और क्या होगा वह भी देखिये.

लेकिन कल आपके चैनल पर कल विनोद दुआ इंडिया अगेंस्ट करप्शन को भाव न देने की बात करते कितना हास्यास्पद लग रहे थे. अरे भाई जब इजिप्ट में होस्नी मुबारक के कब्जे में सारा का सारा मीडिया था वह धरा का धरा रह गया तो बाकी किसकी क्या बिसात?

वो कौन लोग थे जो कल तक इंटरनेट को खाये पिये अघाये लोगो का शौक बता रहे थे?

संतोष कुमार said...

सच कहा आपने .... बिलकुल सहमत हूँ.
पर पता नहीं आज की सरकारे ये क्यों नहीं समझती.

अब कहना है की ........

" वक़्त का तकाजा है जुझू तूफा से,
कहाँ तक चलोगे किनारे - किनारे."

सतीश पंचम said...

बढ़िया पोस्ट है।

Sumit said...

Aapse bilul sahmat hoon. Sarkaar niyantran aur propganda ke din lad chuke hain....locally CWG, Radia Tape, 2G ghotale...isi ke udaharan toh hain.

प्रवीण पाण्डेय said...

निश्चय ही फेसबुक ने क्रान्ति को हवा दी है पर कितने लोग क्रान्तिमय उपयोग करते हैं। यहाँ शान्तिमय उपयोग में समय व्यर्थ हो रहा है।

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

अल्पकालिक आंदोलनकारी ...
यह शब्द सब कुछ कह रहा है... बेहतरीन विषय और सटीक विश्लेषण..... सब समय गवाने के साधन बन गए हैं .....

शिक्षामित्र said...

जब तक सब कुछ अमरीका के मुताबिक चलता रहता है,ठीक है। अगर उसकी कोई पोल लीक हुई,तो समझिए आपके खाते को होस्ट करने वाला सर्वर मिलना भी मुश्किल!

Atul Shrivastava said...

अच्‍छी पोस्‍ट। सच में ब्‍लागिंग से क्रांति पैदा की जा सकती है, यह महसूस होने लगा इसे पढकर।

Shuchita Vatsal said...

Nice post,
This is what we may call utilizing our available means not just for entertainment but as a mean to express ourselves..
Karl Marx ki lines shayad fir se kaam aane lagi hain.."Workers on of the world unite,you have nothing to loose but your chains.."
Aaj is slogan mein 'workers' ki jagah 'responsible citizens' of the wolrd unite" likha jaye toh it will be more appropriate. Sir, everyone craves for positive change, all we need is to UNITE!-
Off course for this social media & networking can be good means.

राजेश चड्ढ़ा said...

ये प्रहार इस वक़्त ज़रूरी है....इतिहास गवाह है... हर विधा में प्रयोग....क्रांति के सूत्र-धार रहे हैं......सब कुछ आपने स्पष्ट कर ही दिया...शेष बची ... शुभकामनाएं....स्वीकार करें

Arvind Mishra said...

बिलकुल ,हंगामाखेज है मीडिया का यह नया फेस -इसकी ताकत को पहचानना होगा !

शालिनी कौशिक said...

बहुत शानदार पोस्ट प्रस्तुत की है आपने .शायद ब्लॉग जगत में ऐसी पोस्ट पढने से ही इसकी सार्थकता साबित होती है .बधाई .

शालिनी कौशिक said...

बहुत शानदार पोस्ट प्रस्तुत की है आपने .शायद ब्लॉग जगत में ऐसी पोस्ट पढने से ही इसकी सार्थकता साबित होती है .बधाई .

शेष said...

एक जरूरी दखल...

दरअसल, शुतुरमुर्ग अपना सिर रेत में गाड़ लेता है और मान लेता है कि तूफान खत्म हो गया...

यह माध्यम शायद वह चुप्पा तूफान है, जिसके असर की झलक साफ दिखनी शुरू हो गई है...

विरमा राम said...

एक बार फिर बेहतरीन लेख..जानकारी और तथ्य लाजवाब..

मनहर said...

संचार हमेशा से ही क्रांतिकारी रहा है नवीन आगाज का प्रतीक

अशोक कुमार पाण्डेय said...

हर तकनीक के अपने मायने हैं…तकनीक से भागने वाले मुंह की खाते हैं…इसका सही इस्तेमाल हमेशा ही आपको नये रास्ते दिखाता है। मैं आपके विश्लेषण से काफ़ी हद तक सहमत हूँ।

anoop said...

Bhut hi umda post logo ko kranti ke nye madhyam se rubaru karane ke liye. Kisi ne sahi kha hai ki kranti ko kabhi khatm nhi kiya ja skta sirf madhyam ko hi khatm kiya ja skta hai.aage aur bhi tareeke aayenge kranti ya virodh ke mujhe aisa lagta hai.

satish said...

I like now this is also true for India against corruption.