मेरा नंबर ही मेरी पहचान है



नाम ग़ुम जाएगा, चेहरा ये बदल जाएगा, मेरी आवाज़ ही पहचान है। ग़र याद रहे। बॉलीवुड का यह गाना मेरे पसंदीदा गीतों में से एक है। पहचान के तमाम निशानों के मिट जाने के बाद भी आवाज़ पहचान बनी रहेगी,कवि की कल्पना की दाद देनी चाहिए। हम वैसे ही कई पहचानों के साथ सहजता से जीते हैं। हिन्दुस्तान के साइनबोर्ड का अध्ययन करें तो आप पायेंगे कि मोबाइल नंबर तेजी से उभरता हुआ एक नया पहचान है।



मोबाइल नंबर को बड़ा करके छापा जा रहा है। दुकान का नाम रखने का चलन कम होता जा रहा है। कई दुकानदार तो सिर्फ नंबर लिख देते हैं। बहुत हुआ तो काम लिख देते हैं। आप इन तस्वीरों में देखेंगे कि कैसे लोगों ने कलाकृति बनाई है। रेडिएटर और पानी के टैंकर की तस्वीर कवि की नवीन कल्पना लगती है। दीवार पर ठेकेदार सिर्फ अपना नाम और नंबर लिख गया है। कार सीखाने वाले ने भी नंबर को ही प्रमुखता दी है। एक दुकान ने अपनी शटर के ऊपर नंबर ही लिख डाला है।



तब से सोच रहा हूं कि क्या अब मोबाइल का नंबर हमारी पहचान का नया हिस्सा बन चुका है। क्या अब हम नंबर से पहचाने जाने लगे हैं। फोन नंबर को लेकर हमारी झिझक खतम हो गई है। पहले हम नंबर सभी को नहीं बताते थे। छुपाते थे। अब नाम से पहले नंबर या नाम के साथ नंबर ज़रूर बताते हैं। दोनों एक दूसरे के बिना अधूरे लगते हैं।


हमारे देश में पहचान को लेकर सरकारी और व्यक्तिगत स्तर पर कोशिशें चलती रहती हैं। कैंलडरों में हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई की छवि गढ़ी गई है। दूरदर्शन पर मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा काफी मशहूर हुआ है। हम कई चीज़ों को मिलाकर एक चीज़ बनाने की कोशिश करते रहे हैं। विविधता को स्वीकार ही नहीं किया। उसे पहचाना लेकिन एक नई पहचान बनाने के पंचफोरन मसाले के रूप में। इस बीच आइडिया वाले विज्ञापन लेकर आ गए। पांडे शर्मा हटाकर अपार्टमेंट के नामों की पट्टी पर नंबर लिख दिया। लोग हैरान थे कि ये भी होगा क्या। मगर ये तो हो ही रहा है। लोग अपनी पहचान खुद गढ़ रहे हैं। कई कारीगर दीवारों पर सिर्फ नंबर छोड़ कर अनंत संसार में गुम हो जाते हैं। डायल कीजिए और आपको मिल जायेंगे। नंबर अलग अलग होता है। एक नाम के सौ लोग होते हैं। एक इलाके और एक भाषा के सौ लोग होते हैं। एक नंबर का एक ही आदमी होता है। नंबर तभी मिलता है जब आपकी पहचान सत्यापित होती है। पता सही होता है। मोबाइल नंबर है तो आदमी फर्ज़ी नहीं हैं। ये भाव पैदा हो रहा है। यह एक बड़ा बदलाव हमारे समाज में हो चुका है।



सारी बातें दिमाग़ में इसलिए घूम रही हैं क्योंकि सरकार यूनिक पहचान नंबर ला रही है। क्या हम देख पा रहे हैं कि नंबर अभी से ही हमारी पहचान का हिस्सा बन चुका है। यूनिक पहचान नंबर पर भी लिखूंगा लेकिन समझने की कोशिश कर रहा हूं कि यह कैसे हो रहा है कि नाम की जगह नंबर प्रमुख होता जा रहा है। मेरा नंबर ही मेरी पहचान है। ग़र याद रहे। क्या ऐसे भी गाना गाया जाएगा।

35 comments:

शिक्षामित्र said...

यह आलेख फोटो पत्रकारिता का उत्तम उदाहरण है।

सतीश पंचम said...

जहां तक नंबरों को पहचान मान लिए जाने की बात है तो वह पहले केवल तीन डिजिट वाले सरकारी नंबर थे 100, 101 , 139 वगैरह....लेकिन बाद में डर्टी
टॉक का दौर आया जिसमें विज्ञापन देकर मादक अदाएं लिए छरहरी ललनांएं दिखती थीं और कुछ अंकों के नंबर दिखते थे।

यही डर्टी टॉकिंग नंबर किसी को चिढ़ाने के लिए भी काम में लिए जाते थे कि अबे वो तो 1800....वाला है....साले का आधा पगार उसी में जाता है......सरकारी कार्यालयों से इन नंबरों पर खूब वार्तालाप हुए.........वही, तीन डिजिट वाले....इन दस बारह डिजिट वालों को तवज्जो दे पाते थे, बाकी तो आम इंसान उन डर्टी कॉल्स के रेट देखकर ही भाग लेता :)

नंबर वाकई में पहचान बन रहे हैं। अच्छी पोस्ट।



अब, लोग

honesty project democracy said...

अगर कोई इमानदार और सच्चा इन्सान है तो उसकी कोई भी एक पहचान काफी होती है / लेकिन इस देश में जहाँ मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के कई-कई चेहरे रोज सामने आते हैं / ऐसे में unik हो या ununik पहचान पत्र सबकी विश्वसनीयता संदेह के घेरे में ही रहेगी /

Aditya Tikku said...

Ye lekh padhkar - atyant kasht hooa.

Jis desh mai 85% loog din ka Rs20 kama ne keliye sangharsh karte hai. vaha aap jase bhudhijivi ye soch ne lage hai ki mobile no pehchan banta ja rha hai - Dhanya ho

ya aap bhi vahi bechne lage hai jo matr 8 Crore Indians ko chahiye- kyo ki Bharat ke aadmi ke pass toh net hai nhi - aap ke pass to adhik sateek aakde honge.

ravishndtv said...

आदित्य

हर दिन हर समय ग़रीबी पर लिखता रहूं वो भी ठीक नहीं है। ज़रूरी नहीं कि सभी मुद्दों पर लिखूं। इस हफ्ते बहुत सारी चीज़ें हुईं जिस पर मैंने नहीं लिखा। लेकिन किसी और ने लिखा है। ऐसा नहीं है कि कोई बुद्धिजीवी गरीबी पर नहीं लिख रहा है।

मैं जिस शहर को समझने की कोशिश कर रहा हूं उसका एक हिस्सा है यह लेख। कुछ बेचने की कोशिश नहीं है।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

नम्बर तो पहचान बहुत पहले से हैं। संस्कृत साहित्य में और संस्कृत की विज्ञान, गणित और ज्योतिषीय पुस्तकों में नंबरों से व्यक्तियों, स्थानों, चीजों आदि को इंगित किया जाता रहा है। हम भी दस नंबरी, चारसौबीस आदि संख्याओं का इस्तेमाल किन्हीं खास अर्थों में करते हैं।

Srijan Shilpi said...

दिलचस्प!

लोग अब नंबरों में भी अपनी अस्मिता की विशिष्टता रेखांकित करने की कोशिश करेंगे। पहचान के संकेतक भले बदल जाएं, लोगों के मन में गहरे बसी पदानुक्रमवादी वर्ण-व्यवस्था तो नहीं बदलेगी।

कल टीओआई में जग सुरैया ने यूनिक आइडेंटी नंबर पर अपने खास अंदाज़ में कुछ ऐसा ही लिखा था।

Aditya Tikku said...

Ravishji - Aap likhe ya nhi - mai vo nhi keh raha hoo. Batt mude ki hai aap ise swikare ya nhi ye aap pe nirbhar hai.

Iss hafte kafi mudde huye - aap ne kis samsya pe likha?

kasab?
nirupmaji?
Maowadi pe vichar rakhne par pratibhand

jab aap free ho to plz mujhe forward kardijiyega @
atikku@gmail.com

Vivek Rastogi said...

पहचान एक नंबर होगा, एक ईमेल आई.डी. होगा, अगर किसी को गायब करना हो तो, उसका वह नंबर गायब कर दो नेताओं के लिये तो और आसान खेल होता दिख रहा है, पता नहीं गाँववालों को कितना लूटा जायेगा, इस खेल में, नजर रखियेगा अपनी इस ओर भी।

Aflatoon said...

सेल फोन के नम्बर के बाद अब एक अन्य पहचान आ रही है - अत्यन्त खतरनाक। सेल फोन की तरह आप खुद उसको पहचान का साधन नहीं बनायेंगे। हां, जॉर्ज साहब को जैसे अमेरिका कपड़े उतरवाये गये थे उसी तरह सरकार का अतिक्रमण मुमकिन बनाते हुए मर्दुम शुमारी के साथ-साथ दसों उंगलियों के निशान लिया जाना होगा। निरंकुशता के दौर में दमन का एक हथियार होगी यह पहचान।

Anoop Aakash Verma said...

रवीश जी को सादर प्रणाम....भाई जी ये तो बहुत बडा परिवर्तन है,सोचिये!एक नाम के तो कितने ही लोग होते है,अगर लोग नम्बरों से पहचाने जायें....तो कभी कोइ गुम ना होने पायेगा..नाम भले गुम जायेगा..चेहरा भले बदल जायेगा..सबका नम्बर ही सबकी पहचान है....गर याद रहे.........

JC said...

रविश जी, 'मेरा भारत महान' है... यहाँ जेरो ('०') अनंत का; एक (१) अदिति/ आदित्य यानी सूर्य का, दो (२) नंबर चन्द्रमा का, इत्यादि, इत्यादि '०' से '९' नंबर हमारे पूर्वज दे गए, दस (१०) तक और उन्हें मानव की तुलना में सौर मंडल के विभिन्न अमृत सदस्यों के साथ जोड़ गए (दिग्गजों, अथवा दशानन और दशरथ से, यानी दश दिशाओं के अलग अलग '८' राजा, और दो विपरीत गुण वाले दो राजाओं तक उपरी और नीची दिशाओं के लिए),,,और हर मानव को इन 'ग्रहों' के सार से बना एक अत्यंत अस्थायी पुतला जिसे कलियुग में कोई अज्ञानी नंबर देना चाहता होगा, जैसे जेल में कैदियों को दिए जाते हैं,,,और मजा यह है कि हमारे ज्ञानी पूर्वज 'अमृत आत्मा' को 'अस्थायी शरीर' के भीतर आम कैदी समान कैद बता गए,,,जो एक दिन बिना खबर किये निकल जाता है और किसी दूसरे नंबर के शरीर में चला जाता है बिना कोई संकेत छोड़े,,,और वो दूसरा नंबर किसी जानवर का भी हो सकता है! जिस कारण कुत्ते बिल्लियों आदि को भी नंबर देना आवश्यक है (जो शायद परमात्मा के बस का ही है :) यह कलियुग यानी अंधेर युग की निशानी है शायद...

Rakesh said...

"मेरा नंबर ही मेरी पहचान है", शायद इसका उचित उदहारण यह Ad है .....

"अब मेरा भी नंबर है..."

Rakesh said...
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sahespuriya said...

इस दौर की हक़ीक़त यही है....
बहुत कुछ बदल गया.......ये भी उसी का हिस्सा है.
अच्छा लेख या यू कहिए अच्छी फोटो पत्रकारिता..

अन्तर सोहिल said...

ईस्माइला हरियाणा गांव में दो गांव हैं 9 और 11
परगना 24, महम चौबिसी, 36गढ
उसके बाद कालोनियों के नम्बर आये नाम की बजाय सेक्टर-1, 2, 3….…।
काफी इमारतें और फ्लैट तो नम्बरों से जानी जाती हैं।
अब आदमी भी……………बढिया है। वाह

जातिवाद फैलाने वाले अब इसमें जातिवाद फैला सकते हैं।
ये रिलायंस है, ये आयडिया है, ये टाटा वाला आदमी है :-)
बढिया पोस्ट के लिये धन्यवाद

M VERMA said...

सुन्दर आलेख
नम्बर ही पहचान है

विजय प्रकाश सिंह said...

सर जी,

प्रश्न यह है कि आप किस तरह से आइडेन्टीफाई होते हैं ? बहुत जल्द श्री नन्दन नीलकेनी जी देश के सारे नागरिकों को एक नम्बर देने वाले हैं तब सचमुच वही हमारी पहचान बन जायेगा । ध्यान दीजिएगा ,पहले से ही हमारे तीन नाम होते हैं एक जन्म कुंडली वाला राशि के अनुसार , दूसरा घर पर प्रिय जनों द्वारा पुकारे जाने वाला और तीसरा स्कूल के सर्टिफिकेट वाला ।

इनमे अब जुड़ रहे हैं - नये उभरते चौथे नाम जिसकी तरफ आप ने इशारा किया है यानी यह मोबाइल नंबर वाली पहचान , पांचवा भी जल्द जुड़ेगा जब यूनीक नम्बर मिलेगा नागरिकता की पहचान के रूप में ।

इन सब मे उलझ कर रह जायेगी आपकी असली पहचान ।

Girdhari khankriyal said...

unique no ka idia achha hai. mobile no apne aaap mein ek pachan ban gaya hai. kewal no likh kar hi vigyapit karna nai vidha ban gai hai.

Jai Prakash Pathak said...

namaskaar.

is duniyaa men pahachaan to mile chaahe numbar se hi mile.

mobile ke chalan ne bahut kuchh badal diyaa hai. aadami nambar ban kar raha gayaa hai

aapakaa blaag aur tippaDiibaajon kii tippaDiyaan dono hii majedaar hotii hain. isii bahaane desh duniyaa kii charchaa ho jaataa hai.achhaa hai.

vaise aapakaa naam nahii nahii nambar kyaa hai. aap apanaa nambar dene men kyon darate hai. yahaan jitane log tippadii likhe hain kisii kaa nambar kisii ko pataa nahiin hai.

namaskaar.

नवीन कुमार 'रणवीर' said...

रवीश जी,
आपकी बात से सहमत हूं। जब से मोबाइल आया है आदमी की अहमियत बस फोन बुक में एंट्री के मात्र रह गई है। कभी राह भटके फिर मुलाकात हो गई तो हमनें पूछ लिया "कैसे हो? नंबर तो वही है ना?" चाहे सालो फोन ना किया हो उसे पर उसका नंबर होना उसका आपके ज़हन में होना का संकेत है।
थोड़े दिन बाद लोगों के राशन कार्ड से ज्यादा अहमियत टेलीफोन(मोबाइल) नंबर की हो जाएगी। कंपनी वाले आपके होनें वाले बच्चों के लिए मोबाइल नंबर सुझाएंगे। नाम रखनें में पंडित का खर्चा भी होगा। और फिर जब हम किसी का नंबर लिखते है तो उसका नाम भी लिखना पड़ता है, कितनी मुश्किल होती है, जैसे रिमोट ना मिलरहा हो और आपको बैड से उठकर टीवी का चैनल चेंज करना पड़े, ऐसे में हम सोचते हैं कि हम चैनल को आंख दिखाए औऱ वो फौरन चेंज हो जाए।
मोबाइल आ गया आदमी आलसी हो गया।

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

इस भागती हुयी सदी मे जब लोग आईडेन्टिटी क्राईसिस मे है... मोबाईल नम्बर लोगो को एक नयी आईडेन्टिटी देने मे सफ़ल होते है...

आपको पढता रहता हू.. टिप्पणी नही कर पाता क्यूकि कभी कभी लगता है इतने लोगो के बीच मे खो न जाऊ.. वो कहते है न ’आईडेन्टिटी क्राईसिस’ :)

वेरी नाइस पोस्ट

श्यामल सुमन said...

रवीश जी - आपके पोस्ट को पढ़ने के बाद, कुछ ही दिन पूर्व खुद की लिखी रचना का यह टुकड़ा याद आया -

बच्चों के भी नामकरण का पहले बहुत विधान।
सम्भव आने वाले कल से नम्बर हो पहचान।
कोमल भाव हृदय के तब तो होंगे सदा उदास।
भैया जी ऽऽऽऽऽऽऽ क्योंकि वक्त नहीं मेरे पास।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com

JC said...

रविश जी, आपको 'बेल-मुंड' ज्योतिषी आदि से अधिक लगाव नहीं है इस लिए यह केवल याद दिलाने के लिए संक्षिप्त में है कि एक विषय है जो अनादिकाल से चला आ रहा है और उसे 'न्यूमरोलोजी' कहते हैं,,,जिसमें हर व्यक्ति अपने जन्म की तिथि के अनुसार १ से १२ नंबर (जोडिएक चिन्ह द्वारा) जाना जाता गया है और उसके अनुसार हर व्यक्ति के संभावित गुणों को भी दर्शाया जाता रहा है,,,

जबकि किसी भी व्यक्ति के जन्म-कुंडली में भी १२ 'घर' दिखाए जाते हैं 'महान भारत' में अनादि काल से,,,किन्तु इसमें राशि नंबर और उसके आधार पर नामकरण के लिए चन्द्रमा जिस घर में बैठा है उसको अधिक महत्व दिया गया, क्यूंकि चाँद के एक चक्र को एक माह जाना गया,,, और चन्द्रमा यानी इंदु को गुरु माना 'हिन्दुओं' ने, जहां तक मानव मष्तिस्क का प्रश्न है, क्यूंकि इसका सार या रस का मानव सर पर निवास जाना गया,,, और पहुंचे हुए वैज्ञानिक समान, सूर्य को भी ध्यान में रखने के लिए 'अधिक मास' का उपयोग किया गया,,,

जबकि पश्चिम में इस प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए केवल सूर्य (रवि, भौतिक शक्ति का श्रोत, जो चन्द्रमा तक पहुंच वाले कवि से निम्न श्रेणी का जाना गया), यानी भौतिक शक्ति को अधिक महत्व दिया गया क्यूंकि यह हर वर्ष, हर माह, एक विशेष तारों के झुण्ड ('कोंस्टेलेशन') के बीच में ही दीखता है पृथ्वी से...

Nikhil Srivastava said...

कम शब्द ज्यादा बात, क्या बात...
मेरा नंबर है 09453846736

JC said...

पहचान से याद आया कि बचपन में हमारे बड़े अपने- अपने अलग गुट में घूमा करते थे, जबकि हम बच्चे अपने बराबर वालों के साथ खेल में मग्न रहते थे...एक दिन हमारी माँ अपनी साथिनों के साथ बस से किसी स्त्री के घर उसके बच्चे आदि के नामकरण आदि ऐसे किसी संस्कार में गयीं,,,किन्तु आश्चर्य हुआ जब वो जल्दी ही लौट आयीं! कारण? क्योंकि जो नीम का पेड़ उनके घर की पहचान हुआ करता था वो कट गया था और घर का नंबर तो आरंभ में कभी देखा था और वो पेड़ ही पहचान बन गया था :)

हम बच्चे तब उन पर हँसे थे!

किन्तु ऐसा ही हमारे साथ लोधी रोड से लौटते समय पंडारा रोड में भी एक दिन हुआ जब नंबर तो याद नहीं था किन्तु एक बार गए थे किसी रिश्तेदार के घर तो सोचा ढूंढ लेंगे पूछ के पड़ोसियों से,,,किन्तु पता न चल पाया, दो चार घरों की घंटी भी बजायी... और यद्यपि एक पडोसी ने चाय भी पिलाई और उनकी लड़की मेरे साथ एनक्वाइरी तक भी गयी! उन दिनों मोबाइल नहीं होते थे, जिस कारण घर से फ़ोन करने पर पता चला कि हम उस हिसाब से उनके घर के नीचे ही थे :)

dipesh said...

mera ghotala hi meri pahchan hai, man gaye ravish babu, aapki parkhi nazar ko, sab jagha chali jati hai, un jagho ko chhodkar jaha aap nahi dekhna chahte. gujrat me chiti ke marne par bhi aap modi ke khilaf panne bhar dete hain, suna hai desh me 2g spectram ka ghotala hua hai.a raja ko mantri banane ke liye media ke mahan logo ne dalali khai hai, koi burka dutt aur "veer" logo ke naam le raha tha, ummid hai aap jaise barik nazar vale is par bhi "safai" likhenge, nahi likh sakte to bata dijiyega, mai intzar na karu, lekin "mera ghotala hi meri pahchan hai"

Hapi said...

hello... hapi blogging... have a nice day! just visiting here....

my great india said...

नंबर की महानता अपने आप में काफी उत्कृष्ट है, बचपन में क्लास में नंबर लेन का चक्कर, नोकरी में बेतन अच्छे नंबर में पाने का चक्कर, गाड़ी का नंबर , बैंक अकाउंट का नंबर , घर का नंबर , गली का नंबर , TRP का नंबर, कपडे का नंबर, जूते का नंबर, क्रिकेट का नंबर, टीवी और फ़ोन में केवल नंबर ही नंबर , राजनीती में नंबर , कानून का बिभिन्न धराओ का नंबर, समय का नंबर, जनगणना का नंबर ....................मतलब जिन्दगी नुमेरिक(नम्बरी) हो गई है.

Parul said...

jindagi ka ganit ..ufan par hai! :)

vijay_tanoria said...

ravish ji, aapko nahi lagta ab aap bhi masala bechne lage hai ? or subject ki kami ho gai hai

JC said...

कृष्णलीला के अनुसार, कंस को आकाशवाणी हुई कि उसकी बहन देवकी का आठवां लड़का उसकी मौत बनेगा! और इस नंबर ने उसका दिमाग घुमा दिया क्यूंकि काल एक चक्र समान घूमता है, न कि एक रेखा के समान, जिस कारण कोई भी नंबर '८' हो सकता था उसके अनुसार, इस पर निर्भर कर कि पहला किसको कहा जायेगा! सो उसकी सोच ने सारे ७ बच्चों को यूं ही मरवा दिया ('पाप' कमाया?) और फिर भी वो बेवक़ूफ़ बन गया क्योंकि आठवाँ, कृष्ण, फिर भी रातों रात जेल से खिसक गया! और वो नटखट नन्दलाल कहलाया गया!

कृष्ण यूं नटखट समझा गया और 'माया' का कारक भी जिसके कारण बड़े-बड़े 'ज्ञानी' कालांतर में असल में महामूर्ख पाए गये और 'बाहुबली' समझे जाने वाले धूल चाटते नज़र आये,,, जिन्होंने भगवान् पर विश्वास नहीं किया, जैसे आज शायद मीडिया में बैठे 'गुरु लोगों' के कारण एक १६ वर्षीय बालक भी कहता है कि वो भगवान को नहीं मानता!

CSNikhilesh said...

Badhiya post...

Aur comments padhkar to aur bhi maja aaya. Khaskar JC ks :)

नरोत्तम गिरी said...

रविश सर,
मै आपको पढ़ते रहता हूँ लेकिन पहली बार आपको पढ़ कर थोड़ा सोच में पड़ गया हूँ. मै भी इलेक्ट्रोनिक मीडिया का एक विद्यार्थी हूँ और अपनी एक पहचान बनाने के कोशिश में लगा हुआ हूँ. दिक्कत यह है की मै मोबाइल को एक disturbing machine मानता हूँ गैर-जरुरी भी बजता रहता है. कही ऐसा तो नहीं की अपनी एक पहचान बनाने के लिए पहले एक मोबाइल खरीदना पड़ेगा? घर वाला लैंड लाइन काफी नहीं है? समाधान कीजियेगा जरा....

zakhmi dil said...

ravish ji kamal ke ho aap yar, adami ke pahachan ke mayane hi aap ne badal diye.to aaj se koi apne nam se nahi jana jayga.gret idea.