ज़रा कबाड़ीवाले से कहना कि उठा कर दिखाये गामा सेल



साइंस एडिटर पल्लव बागला के साथ डीआरडीओ के कैम्पस में जाने का मौका मिला। यहां भी गामा सेल है। वही गामा सेल जिसे दिल्ली विश्वविद्यालय ने कबाड़ में बेच दिया। चंद कदम दूर लखनऊ रोड पर स्थित इनमास में गामा सेल १९६७ से काम में लाया जा रहा है। रखरखाव के कारण इसमें कोई खराबी नहीं आई है। १९६७ में भारत में ६ गामा सेल कनाडा से लाये गए थे। इनमास का गामा सेल अकेला है जो काम कर रहा है। अंदर जाते ही लगा कि इसे कबाड़ी में बेचना मुमकिन नहीं। गामा सेल के ऊपर दो जगहों पर चेतावनी लिखी हुई थी। कोई भी देख सकता था कि गंभीर मामला है इससे दूर रहना चाहिए। चेतावनी के साथ सावधानी के नियम भी लिखकर चस्पां किये गए थे। इस पर वजन लिखा था-3883 किग्रा। यानी आठ से दस हाथी के बराबर का यह गामा सेल। आप इसे लापरवाही के तहत न तो उठा सकते हैं और न ही बेच सकते हैं। इसके लिए बड़ी क्रेन और लॉरी की ज़रूरत होती है। तभी यह अपनी जगह से उठ सकता है। इसका मतलब यह हुआ कि कबाड़ी वाला साइकिल पर लाद कर नहीं ले गया। इसी गामा सेल के भीतर कोबाल्ट ६० की पेंसिल रखी जाती है। इसके भीतर चूहा वगैरह डालकर उन पर विकिरण के प्रभावों का अध्ययन किया जाता है। मायापुरी में दस हाथी के वजन के बराबर इस सेल को काटा गया। तब जाकर कोबाल्ट की पेसिंग का खांचा निकला होगा।

दिल्ली विश्वविद्यालय की नैतिक नहीं आपराधिक चूक थी। इतना भारी सामान कबाड़ में बिक ही नहीं सकता था। कोई खिलौना तो नहीं है कि आप कई सामानों के साथ इसे भी कबाड़ी वाले के हवाले कर दें।यहां पर रेडिएशन सेफ्टी आफिसर डॉ अरुणा ने बातचीत में बताया कि यह घटना शर्मनाक है। भारत में पहली बार विकिरण से किसी की मौत हुई है। पूरी दुनिया में इसे पढ़ाया जाएगा कि दिल्ली विश्वविद्यालय ने जिस तरह की बेवकूफी की है वैसी बेवकूफी आप न करें। वैज्ञानिक डॉ द्वारकानाथ ने कहा कि सिद्धांत के अनुसार रेडिएशन का प्रभाव शून्य नहीं होता। दूरी और समय के साथ इसका असर कम तो हो जाता है लेकिन शून्य नहीं रहता। यह भी जानकारी मिली कि कुछ मरीज़ जो काफी नज़दीक से कोबाल्ट ६० के संपर्क में आएंगे उनके भीतर तो बदलाव के लक्षण तुरंत दिख जायेंगे लेकिन कइयों को कुछ महीने और साल के बाद भी दिख सकते हैं। पेट की बीमारी हो सकती है,मोतियाबिन्द या कैंसर के रूप में असर देखने को मिल सकता है।

वैज्ञानिकों ने बताया कि गामा सेल को हटाने के लिए भी कड़े नियम हैं। आप किसी को नहीं बेच सकते। इसके लिए आपको एटोमिक नियामक संस्था से अनुमति लेनी होती है। संस्था ही बताएगी कि आप किस एजेंसी को बेचेंगे। ज़ाहिर है इतनी सख्त प्रक्रिया के होते हुए लापरवाही नहीं हो सकती है। ये और बात है कि भारत के न्यूक्लियर मेडिसिन के वैज्ञानिकों के लिए अध्ययन का पहला मौका है। भारत में पहली बार विकिरण से किसी की मौत हुई है। वो लगातार इसके प्रभावों का अध्ययन कर रहे हैं।

इस सेल को दिखाने का मकसद यही था कि हम यह समझ सकें कि यह जिस ट्रक पर लद कर जाता है उसे अलग से पुलिस के लिए अनुमति पत्र दिया जाता है। किसी खिलौने को लापरवाही से तोड़ सकते हैं लेकिन गामा सेल को नहीं। हर दिन इसे डोज़ी मीटर से चेक किया जाता है कि नज़दीक जाने वाले आदमी ने कितना विकिरण ग्रहण किया। एक आदमी एक साल में निश्चित मात्रा में ही विकिरण ग्रहण कर सकता है। डीआरडीओ के इस संस्थान में आकर यही लगा कि दिल्ली विश्वविद्यालय ने क्या बेवकूफी की है।

करतूत वैज्ञानिकों की थी और बदनाम कबाड़ी वाले कर दिये गए। मायापुरी के कबाड़गंज में एक से एक हुनरमंद लोग हैं। उनके हाथ की कारीगरी की तारीफ की जगह मीडिया ने जंक मार्केट को काले कारनामों का अड्डा बता दिया। कई तरह की छवि बना दी गई। इन्हीं छवियों से टकराने चला गया मायापुरी। इस बार शुक्रवार रात साढ़े नौ बजे आप रवीश की रिपोर्ट मायापुरी की ज़िन्दगी पर ही देखेंगे। दोबारा आप रविवार रात साढ़े दस बजे देख सकते हैं।

13 comments:

Jai Prakash Pathak said...

namaskaar!

khatarnaak haadasaa.
visheshgya kii chook.

chook yaa laalach.

laalach men kuchh bhii karegaa.

namaskaar

honesty project democracy said...

उपयोगी जानकारी बाँटने के लिए आपका धन्यवाद / उम्दा ,ब्लॉग की सार्थकता को बढाता हुआ पोस्ट /

Rangnath Singh said...

कमाल है कर दिया इन लोगों तो....धन्यवाद की आपने मामले को इतना साफ कर दिया कि.....

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

वैज्ञानिकों के पदों पर सिफारिशी भर्ती है।

नीरज जाट जी said...

ऐसा होता है गामा सेल? आज ही पता चला।

Nesar said...

ravish ji badhiya post hai.. lekin aapko jadugoda (jharkhand) ka mudda bhi uthana chahiye..

wahan uranium mining ke karan kitne bache viklang paida ho rahe hhain aur kitne logon ko tarh tarah ki bimariyan ho rahi hain. aur yah sab ho raha hai parmanu bomb aur parmanu urja ke liye.. jiski upyogita ka pata kisi ko nahin hai..

Abhishek Kumar Srivastava said...

नमस्कार रविश जी !
बहुत जानकारी वाला लेख है आपका ! इस मामले पर जाँच कर दोषी लोगों को कड़ी सजा दिलवानी चाहिए ये सचमुच एक बहुत बड़ी अपराधिक भूल ही है! इससे हुई मौत के लिए जिम्मेवार कौन लोग हैं !

हमें डर है की देश के कुछ अन्य मामलों की तरह ये मामला भी कुछ दिनों में लोगों द्वारा भुला दिया जायेगा और इस घटना के लिए जिम्मेवार किसी दूसरी बड़ी घटना होने पर ही याद आएंगे !
धन्यवाद् !

anoop joshi said...

धन्यवाद सर बिरले ही पतरकार होंगे जो खबर, ख़तम होने के बाद उसकी छानबिन करेंगे. जबकि उन्हें पता है की अब लोग और दूसरी खबर को तरजीह देंगे. सर तारीफ तो आप की सब करते होंगे पर मै इजत करता हूँ. सर कभी टाइम मिले तो plz अपने कुछ एक कमेन्ट मै भी टिपिनी कर दिया करें जिससे हम अस्वस्त हो जाये की हमारा लिखना बेकार नहीं गया आप पढ़ते है...........

मसिजीवी said...

चार साल पहले रिटायर होने से पहले पिताजी ने लगभग चालीस साल इनमास में नौकरी की... मैं पिछले कम से कम दस साल से दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में हूँ... दोनों जगह की कार्यसंस्‍कृति के अंतर को महसूस किया है। वरीयताओं का प्रश्‍न है... मेरे विश्‍वविद्यालय का तंत्र फिलहाल देशी विदेशी आकाओं की इच्‍छापूर्ति में इतना मग्‍न है कि वह इस तरह के कृत्‍य कर रहा है कुछ गामा सेल जैसे साफ दिखने वाले होते हैं तो सामने आ जाते हैं बाकी को केवल विश्‍वविद्यालय व छात्र भोगते हैं।

विश्‍वविद्यालय बिरादरी सहमत है कि ये चूक अपराधिक है तथा इसकी जबाबदेही तय होनी चाहिए।

इस पोस्‍ट के लिए शुक्रिया

अन्तर सोहिल said...

इस जनोपयोगी जानकारी के लिए आभार
मेरे जैसे बहुत से लोगों को शायद गामा सेल की कोई जानकारी नही है।

प्रणाम

अन्तर सोहिल said...

"इस पर वजन लिखा था-3883 किग्रा। यानी आठ से दस हाथी के बराबर का यह गामा सेल"

आदरणीय रवीश जी
इस पंक्ति में कुछ गलत लग रहा है जी।
क्या हाथी का वजन सिर्फ 400 से 500 किग्रा ही होता है।
मेरे विचार से ये एक भैंस का वजन है। क्षमाप्रार्थी हूं।

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

आभार।
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पड़ोसी की गई क्या?
गूगल आपका एकाउंट डिसेबल कर दे तो आप क्या करोगे?

JC said...

रविशजी, आजकल मीडिया डराने का काम अधिक कर रहा है जब कोई गल्ती बाद में नज़र आ जाती है या कोई हादसा हो जाता है, जैसा मायापुरी कबाड़खाने में हुआ, या २६/११ को हो गया, और न जाने क्या क्या, आई पी एल में भी जैसे!

अंततोगत्वा किसी को मालूम नहीं चलता है कि आम आदमी करे तो क्या करे बचाव के लिए या इलाज के लिए...अन्धकार में ही सब हाथ पैर मारते दिखाई पड़ते हैं,,,किसी के पास सब्जी के दाम भी रोकने की ताकत भी नज़र नहीं आती...शायद हमारे पूर्वज सही में दोष 'कृष्ण' को दे गए जो नटखट है और आपको और हमको कहता है कि सब कुछ छोड़ मेरी शरण मैं आजाओ!
जय हिंद! जय भारत माता!