तो क्या फिर हार गया मुसलमान नेतृत्व

सबसे पहले तो महिला आरक्षण विधेयक के राज्य सभा में पास होने पर बधाई। पहली बार हिन्दुस्तान में जाति आधारित राजनीति की हार हुई है। जाति आधारित राजनीति बेचारी नज़र आई है। आरक्षण का मैं समर्थक रहा हूं। मानता हूं कि दुनिया में इससे बेहतर और कारगर कोई सामाजिक नीति नहीं है। लेकिन इसकी एक सीमा है जो प्राइवेट कंपनियों में आरक्षण की मांग के बहाने झलकती है तो महिला आरक्षण के बहाने खास जाति समुदाय के आरक्षण की मांग के बहाने झलकती है।

लेकिन नीयत पर सवाल की गुज़ाइश अब भी है। 1996 से इस बिल का ड्राफ्ट सबके सामने है। क्या कभी किसी राजनीतिक दल ने अपने पार्टी के स्तर पर महिलाओं की संख्या बढ़ाने की कोशिश की। नहीं की। क्या कांग्रेस ने मुस्लिम महिलाओं को टिकट देने में उदारता दिखाई। मर्द मुस्लिम उम्मीदवार तो छोड़ दीजिए। बीजेपी एक ऐसी पार्टी है जो नाम के लिए एक या दो लोगों को टिकट देती है। देश की एक प्रमुख विपक्षी पार्टी में मुसलमानों का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है। इसकी वजहें भी साफ हैं। अगर मुसलमानों के लिए महिला आरक्षण के भीतर आरक्षण होता तो क्या बीजेपी वहां उम्मीदवार नहीं उतारती? उतारना पड़ता। इस बहाने कानूनी तौर पर हम बीजेपी को मजबूर कर सकते थे कि बीजेपी मुसलमानों को प्रतिनिधित्व देने के लिए बाध्य हो। क्या करती बीजेपी। सहारनपुर की सीट मुस्लिम महिला के लिए रिज़र्व हो जाती तो। कहती कि उम्मीदवार नहीं उतारेंगे या किसी बिजनेसमैन मुसलमान के घर जाती, हाथ पांव जोड़ती और कहती कि प्लीज़ आप अपनी बेग़म को समझाइये कि हमारी पार्टी का उम्मीदवार बन जाएं। इस तरह से महिला आरक्षण के बहाने सेकुलरिज़्म का एजेंडे में सबको समेट लेने का मौका मिल जाता। लेकिन दलीलें इसके ख़िलाफ़ दी जाती रही हैं। इसलिए बीजेपी कांग्रेस के इस प्रस्ताव पर सहमत हो गई। ये एक मौका था, बीजेपी को भी मजबूर करने का कि वो अपने भीतर मुसलमानों का प्रतिनिधित्व बढ़ाये।

मुसलमान का वोट सबको चाहिए लेकिन जब कोई आज़म ख़ान कल्याण सिंह को लेकर मुलायम सिंह यादव के ख़िलाफ़ खड़ा होता है तो सब मिलकर आज़म ख़ान की गत निकाल देते हैं। कोई दल उनका साथ नहीं देता। मायावती की पार्टी में मुसलमान विधायकों की संख्या तो है लेकिन उनका कोई स्वतंत्र वजूद नहीं। फिर भी वहां नसीमुद्दीन सिद्दीकी जैसे नेताओं की अहमियत दिखाई पड़ती है। शायद यही वजह रही होगी कि बीएसपी ने सदन का वॉकआउट किया।

राजनीति वो ज़रिया है जिसके सहारे सभी समाजों को समय के अलग-अलग चक्रों में आगे बढ़ने और अपनी भागीदारी बढ़ाने का मौका मिलता है। मुसलमानों को आज तक नहीं मिला। उनका वोट सबको चाहिए। नेता नहीं चाहिए। इस लिहाज़ से आप देखें तो सिर्फ मुसलमान हैं जो बिना किसी उम्मीद और शर्त के वोट करते हैं। मुस्लिम वोटर अपने चरित्र में ज़्यादा राष्ट्रीय है। यह नहीं कहता है मेरी इतनी संख्या भारी तो दो मुझको भी हिस्सेदारी। न ही जब मुसलमानों की बारी आती है तो पार्टियां ऐसा करती हैं। मुस्लिम मध्यमवर्ग तैयार हो रहा है। राजनीति की मुख्यधारा से सक्रिय रूप से जोड़ने का ये अच्छा मौका था। मान लीजिए मौजूदा मुस्लिम नेतृत्व का कोई स्तर नहीं है। चाहें वो किसी भी पार्टी में हों,उनका कोई वक़ार नहीं है। लिज़लिज़े हैं सब। किसी ने आवाज़ तक नहीं उठाई। ओवैसी जैसे एकाध सांसद चिल्लाते रहे लेकिन मुस्लिम सांसद अपनी मजबूरियों के ख़ौफ से इस ऐतिहासिक बिल को अपनी गली की तरफ मोड़ने में नाकाम रहे। जो मुस्लिम सांसद अपनी सांसदी नहीं छोड़ सकते वो क्या ख़ाक़ अपने क़ौम की बात करेंगे। मेरी यह दलील किसी काम की न होतीं अगर टिकट देने के मामले में बिना धर्म का ख़्याल किये पार्टियों को मुस्लिम नौजवानों में राजनीतिक नेतृत्व का कौशल नज़र आता।

इस आरक्षण विधेयक के कई पहलु हैं। ऐसा तो होगा नहीं कि सभी आरक्षित सीटों पर नेताओं की बीबीयां ही मैदान में उतरेंगी। ऐसा भी नहीं है कि किसी महिला कार्यकर्ता ने जगह नहीं बनाई। सुष्मा स्वराज या मायावती किसकी बीबी हैं। वो तो अपने ही दम पर आगे आईं हैं। मगर ऐसी महिलाओं की संख्या कम है। आरक्षण के बाद से ऐसी महिलाओं की संख्या बढ़ने लगेगी।

अब देश में कामयाब महिलाओं का दो समूह होगा। एक वो जो अपने दम पर अंतरिक्ष की यात्रा कर आती है और एक वो जो आरक्षण के दम पर संसद की यात्रा करेगी। दोनों प्रक्रियाओं से आधी आबादी को दुनिया के मंच पर आने की रफ्तार तेज होगी। हज़ारों सालों से जिन्हें कमरे में बंद कर रखा गया है,उन्हें बाहर निकालने के लिए घर के सारे दरवाज़े खोलने ही होंगे।


तीसरी बात है। क्या आरक्षण अब अपना राजनीतिक महत्व खोने की दिशा में जा रहा है? अति आरक्षण एक मजाक है। ग़रीब सवर्णों के नाम पर आरक्षण की मांग अभी बाकी है। बीएसपी इसकी वकालत करती है। आर्थिक, जाति और जेंडर के आधार पर आरक्षण को लेकर कोई प्रॉब्लम नहीं तो धर्म को लेकर क्यों होता है? इसलिए कि आरक्षण मुसलमानों को मिल जाएगा?

चौथी बात है। जिस मंडल की राजनीति ने मंदिर आंदोलन की हवा निकाल दी,वो महिलाओं के आगे निरस्त हो गया। मंदिर को हराने वाला मंडल,महिलाओं से हार गया है। यादव त्रयी बेचारे नज़र आए। उनकी बातों पर चर्चा किये बिना बाकी दलों ने किनारे ठेल दिया।

ये कुछ सवाल है जो मेरे मन में उभर रहे थे,बिल पास होने की खुशी के उतार-चढ़ाव में।

29 comments:

कृष्ण मुरारी प्रसाद said...

शायद राज्य-सभा में बिल का इंतजार था भागवान को भी और भगवान को भी. महिला शक्ति को बधाई.....महिलाओं को अभी लंबी सामाजिक लड़ाई लड़नी बाकी है.
लड्डू बोलता है ....इंजीनियर के दिल से
.हिम्मत से पतवार सम्हालो......
http://laddoospeaks.blogspot.com

Vijay Chauhan said...
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Vijay Chauhan said...

समाज में महिलाए करीब 50% है, उनको 33% आरक्षण देना अन्याय है उनको 50% मिलना चाहिए... इस देश में सदीयों से धूर्त व जातिवादी मानसिकता से ग्रस्त मुठ्ठीभर लोग भगवान और धर्म के नाम से सादे - सीधे और भले - भोले लोगो को ठग रहे है....1952 कि पहली संसद में सदीयों से खुद को सवर्ण गिनने वालो कि संख्या करीब 50% थी..... 1999 में वह घटकर करीब 20... See more% हो गई है...एकलव्य का अंगूठा जिस तरह लिया था ठिक उसी तरह यह लोग आज महिलाओ के नाम पर अपनी गॆंग का लाभ करने का प्रयास कर रहे है....भारतीय महिलाओ को इन ठग लोगो का और खुद अपना सहि इतिहास जानना चाहिए.... दूध अमृत है, मगर इस में जहर मिलाने से वह भी जहर बन जाता है....

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

kya aap apni jagah chhhod kar kisi musalmaan ko bitha sakte hain....
dr.ambedkar ka vichar sarvottam tha......
musalmaan ke liye 20 pratishat aarakshan ka sujhav kyon nahi dete har jagah........
aakhir kyo karenge aap aisa, kyonki par updesh kushal bahutere.

Abdullah Khan said...

U really make a very good point. Extension of the reserved space will only reduce seats available 4 election of Muslims, who already face many obstacles. This is truth that Muslim women are not politically advanced 2 get elected 2 the legislatures. Another thing is that the Muslims have been persistently under-represented in the Parliament and the state legislatures. In 2009, only 30 Muslims have been elected to the L.S. which means a deprivation of above 60%. Their deprivation is likely to rise to 75%.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

आप के सवाल वाजिब हैं। आखिर हम जाति, धर्म और लिंग के खानों में कब तक बंटे रहेंगे? इस से बाहर निकलने का कोई रास्ता सूझता है।

sudesh said...

रवीश जी आपने सही कहा है. बिल पास होने के बावज़ूद कुछ प्रश्न बाकी रह जाते हैं. शायद कुछ बाद में दुरुस्त कर लिया जाय. एक चीज़ मह्सूस हुई. यादव त्रयी तथा उनके पक्षधारी आरक्षण के भीतर आरक्षण की मांग को ले कर जिन तर्कों का सहारा ले रहे हैं, लगभग उन्हीं तर्कों को वे पिछड़ों के आरक्षण में क्रीमी लेयर के सिद्धान्त के विरोध मे ख़ारिज़ करते रहे हैं.

Priya said...

Ye post musalman banam aarakshan hai na ki raajniti banam aakashan......Mahila, Mahila hoti hai...fir chahe kisi mein jati, dharm, majhab ya prant ki ho..... Na jane aap patrkaar log sirf muslim community ko kyon har baat mein kheench laate hai....Neta karte hai to samajh mein aata hai....lekin aap log kyon?

kaushal said...

रवीश जी, हम लोग आरक्षण के बजाय शिक्षा पर जोर क्यों नहीं देते। क्या आरक्षण से देश आगे बढ़ेगा। आरक्षण तो तबका विशेष को कमजोर दिखाकर वोट हासिल करने का जरिया मात्र है। आरक्षण के दैत्य को खत्म कर देना चाहिए

मनोज कुमार said...

विचारोत्तेजक!

indscribe said...

Great piece. Whatever. Muslims are even prepared to settle for too less political representation, just that Congress or whichever party is at the helm, should at least do JUSTICE.

Twice they ruled Maharashtra but even Sri Krishna Commission report's basic recommendations aren't followed. All attempts are made to shield the inspector who fired inside Hari Masjid.

Personally I find Sachar, Ranganath Mishra commission reports far-fetched as it is impossible to have them implemented, at least the few basic problems should be solved.

अंकुर गुप्ता said...

महिला आरक्षण के विधेयक का मौजूदा स्वरूप मुझे पसंद नही आया. ये सीधे सीधे लोगों के हाथ से विकल्प छीनने जैसा है.एक आदमी पांच साल तक मेहनत करता है. लोगों के बीच पहचान बनाता है. और चुनाव के समय उसे पता चलता है कि वो उस जगह से चुनाव नही लड़ सकता क्योंकि वह सीट महिलाओं के लिए आरक्षित हो गई है.(मैंने एक बार कहीं पढ़ा था कि ऐसा एक अच्छा काम करने वाले पुरूष सरपंच के साथ हो चुका है) अब यदि लोग उसे अपना नेता बनाना भी चाहें तो नही बना सकते हैं. ये विधेयक जनता की इच्छा को तो एक किनारे रख देता है.होना ये चाहिए कि आरक्षण पार्टियों के भीतर हो. यानि कि टिकट देते समय पार्टियों को अपने आधे टिकट महिलाओं को देने पड़ें. जो पुरुष टिकट नही पा पाएंगे वो भी कम से कम निर्दलीय के रूप में चुनाव तो लड़ पाएंगे.और महिलाओं को भी आरक्षण से पूरा मौका मिलेगा. वो भी बिना किसी का(जनता तथा अन्य उम्मीद्वार का) अधिकार छीने बगैर. महिलाओं को अपना दम दिखाने मौका दीजिए, उन्हे जबरन थोपिए मत. जनता के हाथ से विकल्प छिनना नही चाहिए.
आप लोग मुझसे अधिक अनुभवी हैं. कृपया मेरे विचारों के ऊपर विचार व्यक्त करें.

शहरोज़ said...

--क्या कभी किसी राजनीतिक दल ने अपने पार्टी के स्तर पर महिलाओं की संख्या बढ़ाने की कोशिश की। नहीं की।

--राजनीति वो ज़रिया है जिसके सहारे सभी समाजों को समय के अलग-अलग चक्रों में आगे बढ़ने और अपनी भागीदारी बढ़ाने का मौका मिलता है। मुसलमानों को आज तक नहीं मिला। उनका वोट सबको चाहिए। नेता नहीं चाहिए।

आपकी इन बातों से सहमत!!
लेकिन जिस तरह से सच्चर या रंगनाथ की सिफारिशें है....फिर महिला बिल आखिर आरक्षण का बँटवारा कैसे हो....उधर कोर्ट का फिसला है कि आप इतना या इतना फीसद से ज्यादा कोटा नहीं बढ़ा सकते!
मैं ने एक पोस्ट ही लिखी थी ..
कमीशन दर कमीशन नेताओं का है मिशन!

manishs@ndtvmi said...

गुरुदेव हर सीट पर न सही पर ज़्यादातर सीटों पर तो बीवी बेटियन ही लड़ेंगी
सिर्फ नेताओं की रिश्तेदार महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए है ये बिल
कांग्रेस पार्टी की अच्छी चाल है ये अगले चुनाव में महिलाओं की ज्यादा वोट पाने के लिए

Archana said...

KYA KABHI KISI NE SOCHA KI MAHILAYO KO AARAKSHAN KI JARURAT KYUN PADI...HAR JAGAH ASAMNTA HAI....TO AGAR KUCHH SAHI HO RAHA HAI TO USKA VIRODH KYUN..........
365 DINO MEIN EK DIN WOMENS DAY MANAYA JATA HAI.......KYUN ..BAKI KE 364 DIN???
14 SAAL KE BAAD JO MILA HAI USKI KHUSI TO MANA LENE DO..FIR DEKHA JAYEGA AARKHSHAN KE ANDER AARAKSHAN.
FILHAAL TO SABKO BADHAI.......

JC said...

१९४७ से पहले, एक आम 'गुलाम भारतीय' ने जाना कि कैसे अंग्रेजों ने (केवल द्विभाजित रोमन और कथोलिक ईसाईयों ने ?) अनंत जाति, भाषा, आदि आदि भागों में बंटे 'भारतीयों' के उपर - सूर्य समान शक्ति पूर्वक - लगभग २०० वर्ष राज्य किया अपनी मजबूत कानूनी व्यवस्था से,,,जिस कारण हिन्दुस्तानी वकीलों ने जाना कि केवल एक कानूनी मार्ग ही है जिससे उन्हें हराया और हटाया जा सकता है,,,और वो सब एक हो गए थोड़े समय के लिए ही किन्तु (अपनी प्रकृति जनित स्वाभाव के कारण), और उन्होंने उनके द्वारा बनाये गए कानून के शब्दों के जाल में छिद्र ढूंढ निकाले,,,जिसका नतीजा जग जाहिर है,,,और यह भी सब जानते हैं कि भारतीय आम तौर पर कभी एक मत नहीं हो सकते: ऐसी शायद 'प्रभु की 'माया' अथवा 'लीला' के कारण हो, और यह भी कि शब्द सत्य की अनुभूति के सही वर्णन में असमर्थ हैं :)

कल मैंने तो केवल '१४ वर्ष' ही कई बार - नादब्रह्म समान कोलाहल के बीच - दोहराते हुआ सुना,,,और मेरे मन में १४ वर्ष के केकई द्वारा राम को दिए बनवास का इशारा समझा, और यह कि 'सती सीता' का स्वयं को दिया बनवास तो 'अग्नि परीक्षा' के बावजूद भी चालू रहा एक 'धोबी' के अपनी पत्नी पर अविश्वास या अज्ञान के कारण,,,:)...और उनके दो पुत्र लव-कुश (सती के दो पुत्र कार्तिकेय और गणेश समान) राम के ही पुत्र साबित हो गए: राम के सेनापति हनुमान की रावन आदि राक्षशों से अविजित सेना को हरा कर - (बिना 'डी एनं ए' टेस्ट किये जैसा हमारे मित्र और विज्ञान के पक्षधर शरद कोकास सुझाव देते हैं :) ...किन्तु सती सीता धरती से उत्पन्न हुई थी और अंततोगत्वा पृथ्वी में ही समा गयी,,,और यूं राम को कभी भी पारीवारिक सुख भोगने का सौभाग्य नहीं मिला - भटकना ही लिखा था उनके भाग्य में, और 'संयोगवश' आम आदमी के लिए सूरज का काम तो पूर्व में उदय हो पश्चिम में डूबना ही है...:) जबकि वैज्ञानिक जान पाए हैं कि पृथ्वी पर शक्ति इसवी के कारण उपलब्ध है,,,इस कारण 'धार्मिक कथाएँ' और 'विज्ञान' को अपने मन रुपी तराजू में सही तोलना आवश्यक है (शेष लीला या माया तो प्रभु इच्छा पर निर्भर है :)

मिहिरभोज said...

मुसलमानों के लिए ज्यादा चिंतित होने की जरूरत नहीं ...कुछ ही दिन की बात हैं सन 47 के बाद इनकी आबादी 3 प्रतिशत बढ चुकी है....कुछ दिन बाद आपको ये ही दिखाई देंगे हर पार्टी मैं

पी.सी.गोदियाल said...

वाह, अगर मुसलमानों ने अपने स्वार्थ के लिए अपनी महिलाओं को बुर्के और परदे में बंद रख कर, मानसिक तौर पर विकसित नहीं होने दिया तो उसका ठीकरा भी दूसरे धर्मो के लोगो के सिर पर ही फोड़ोगे ! धन्य है, हिन्दू सेक्युलरिज्म !!

SACHIN KUMAR said...

Muslim netritva ke harne ki baat nahi hai...kaha tha muslim netritva...kya imandari se thi...o vote lene bhar ki kosis thi....LALU,MULAYAM HAVE GOT THE HIGH OF THEIR POLITICS AND ITS HIGH TIME ALL OVER FOR THEM...THIRD YADAV THAT IS SARAD..HE IS MAN ALWYAS PLAYING FROME BEHIND....HE NEVER COME INFRONT AND FINAL DECESION WAS TAKEN BY SOME ONE ELSE NOT THE FIRST TIME....SOME DAY CHHAPRA,MAINPURI AND ITWAH AND MADHEPURA WILL BE RESERVE FOR WOMEN...THEN WHAT THEY WILL DO? NO DOUBT OTHER WILL FACE SUCH PROBLEM BUT FOR CONGRESS AND BJP LIKE NATION PARTY NOT SO MUCH....I THINK HOW LALU AND MULAYAM WILL GO TO WOMEN VOTER FOR ASKING VOTE? HAVE THEY ANY RIGHT AFTER OPPOSING IT....IF YOU WANT TO GIVE SC/ST.OBC AND MUSLIM WHO IS STOPPING IT TO....DO THAT WHY SO MUCH CRY HARD TO UNDERSTAND....SOME SAYS BY THIS REGIONAL PARTY STRENGTH WILL GO DOWN....AND SLOWLY AND SLOWLY THEY WILL END....FOR THIS FIRST STEP WIN NO DOUBT SONIA SHOULD BE GIVEN SOME CREDIT...YOU CAN SAY WHY NOT BJP AND LEFT...THEY DONOT HAVE ANY CHANCE OTHER WAY....LEFT-RIGHT AND CENTER SOME THING HARD TO THINK...AND ALMOST THE SITUATION LIKE INDO-US DEAL...HUGE RISK TAKEN BY SONIA.......

विजय प्रकाश सिंह said...

रवीश जी, आप ने दैनिक हिंदुस्तान की ब्लॉग समीक्षा मे मेरे ब्लॉग "मरीचिका" से "हुसैन के बहाने" लेख को शामिल किया इसके लिए धन्यवाद ।

अब जहां तक महिला आरक्षण पर आपके इस लेख का सवाल है , मेरे ख्याल से महिला आरक्षण पर राज्य सभा मे हुई वोटिंग एक लम्बी प्रक्रिया मे केवल अभी एक पड़ाव भर है , मंजिल तक की यात्रा लम्बी है । कांग्रेस का यह तुरत फ़ुरत का दांव पेचीदा सा है। इसके ताने बाने पर जल्दबाजी मे टिप्पडी सही नहीं होगी ।


मेरे मन मे एक ही प्रश्न है कि क्या कांग्रेस के विचार मे यह नया वोट बैंक ओबीसी और माइनॉरिटी वोट बैंक की मौजूदा धार को कुंद करके कांग्रेस की सीटें बढ़ाने मे सहायक होगा ।

कुमार विनोद said...

रवीश जी, यहां आपसे थोड़ी असहमति है,जो अक्सर आपसे नहीं होती.

बेशक आरक्षण सबसे बेहतर सामाजिक नीति है, लेकिन आरक्षण के नाम पर नौटंकी क्यों? इसे जातिगत क्यों करार दिया जा रहा है, इसे वर्ग आधारित क्यों नहीं करार दिया जा रहा?. कुछ यादव और मुसलमान साथ खड़े हो गए इसलिए? आपने कई महिला किरदारों को अपने आर्टिकल्स और स्पेशल रिपोर्ट्स में उठाया है, आप सोचिए, क्या आरक्षण उनकी बुनियादी जरूरत है?

औऱ अगर है, तो कोई पार्टी उन्हें सीट न दे, इसकी कोई कानूनी बाध्यता है क्या? अगर नीयत ठीक नहीं, तो आरक्षण क्या कर लेगा? सीटें वैसी ही मिलेंगी, जहां से हारना तय हो? ऐसे में आरक्षण का आचार डालेगी 'कलावती'?

मुझे यकीन है, आप सिक्के के इस पहलू से वाकिफ होंगे...उस 'पहलू' की पीड़ा यहां भी है...
http://kyascenehai.blogspot.com/2010/03/blog-post_10.html

Parul said...

is jeet ki khushi hai,baaki sabhi apni baat acche se rakh rahe hai :)

JC said...

एक ज़माना था जब 'भारत' में 'जोगी लोग' शहर के कोलाहल से दूर, 'सत्य की तालाश' में, हिमालय के पहाड़ों में दूर चले जाते थे जिससे 'पापी लोगों' की छाया से भी दूर रह सकें और 'संन्यास धर्म' को भली भांति निभा सकें - क्यूंकि 'राजनीति' से सदैव जुडा रहना कमल के फूल के कीचड में ही सदा दबे रहने समान माना गया,,,और यूं योगेश्वर विष्णु की नाभि से उगे कमल के फूल को चार सर, अथवा हिन्दू, मुस्लिम, सिख, इसाई, वाले ब्रह्मा की कुर्सी समान सांकेतिक भाषा में योगी, अथवा ज्ञानी लोग, पहले ही कह गए,,,और बाहरी अस्थायी शरीर को झूठा कह उन्होंने 'सत्य' केवल 'परमात्मा' के अंश 'आत्मा', यानी शरीर के साथ जुडी शक्ति को बताया...

इससे वैज्ञानिक जान सकते हैं कि वे इशारे से सूर्य को, अथवा सौर मंडल के सभी सदस्यों को, हमारे तारा मंडल के केंद्र में स्तिथ 'ब्लैक होल' से - यानी 'कृष्ण' से - बहुत पहले जान पाए थे...और इसलिए इसमें आश्चर्य नहीं कि एक भारी और बूढ़े तारे से उसके अंत काल में 'कृष्ण' की उत्पत्ति के विषय में अमेरिका में अनुसन्धान करने वाले का नाम एस चंद्रशेखर था,,,और 'त्रिनेत्र धारी' शिव के हजारों नामों में से एक 'चंद्रशेखर' भी हैं (जिसके माथे को ठंडा ('सीता') करने का काम 'सोमरस' भी प्रदान करने वाली चन्द्रमा, और उससे उत्पन्न गंगा मैय्या को अनंत काल से सौंपा हुआ जाना गया :)

मानव शरीर में किन्तु तीसरी आँख (छटी इन्द्री) बंद है, और उस पर भौतिक इन्द्रियाँ भी काल के प्रभाव से कमजोर पड़ गयी हैं, जिसके कारण हम यह भी नहीं जान पाते कि अभी नारी यानी अर्धनारीश्वर कि अर्धांगिनी सति यानी शक्ति ही इस योगमाया का स्रोत हैं और मूर्खता पूर्वक हम उसे घटा का एक तिहाई करने कि सोचते प्रतीत होते हैं - इस नाटक में जिसमें बिल 'राज्यसभा' में 'सोमवार' को ही पहली बार क्यूँ रखा गया? :)

ravishndtv said...

विनोद जी

वर्ग आधारित आरक्षण तो हो ही रहा है महिला आरक्षण के साथ। भारत में वर्ग आधारित आरक्षण की पहले व्यवस्था नहीं थी। जाति को ही सामाजिक पिछड़ेपन का आधार माना गया है।

लेकिन समय के साथ सोच बदल रही है। आरक्षण अब आर्थिक आधार पर भी दिया जा रहा है। ओबीसी आरक्षण से क्रीमी लेयर को हटाना इसका प्रमाण है।

विजय प्रकाश सिंह जी,

कांग्रेस की अध्यक्षा महिला है। वो बताती क्यों नहीं कि अभी तक महिलाओं को पर्याप्त संख्या में टिकट क्यों नहीं दिया। पिछड़ी राजनीति को किनारे करने के लिए कांग्रेस ये सब कर रही है। इस पार्टी ने महिला अध्यक्ष और प्रधानमंत्री बनाने(दोनों परिवार के आधार पर) के अलावा महिलाओं के लिए क्या किया है? नीतिगत तौर पर।

abhishek annapurna pandey said...

रवीश जी, आरक्षण पर आरक्षण की मांग करने वाले लालू यादव , शरद यादव , मायावती और मुलायम सिंह यादव इन तीनो की पार्टी में सबसे ज्यादा सांसद ओ. बी.सी. के होते हैं. लोग क्यों धर्मनिरपेक्ष बनने के लिए मुस्लिम को बेचारा बताने लगते हैं. अगर सलमान खुर्शीद , नसीमुद्दीन सिद्दीकी और शाहनवाज हुसैन मुसलमानों के नेता नहीं है तो अटल बिहारी भी को तो हिन्दुओं का नेता नहीं कहा जा सकता क्योंकि उनने तो राम मंदिर नहीं बनवाया जिसके कथित आधार पर वो प्रधान मंत्री बने थे.

खैर घबराइए नहीं क्यों की पूर्वांचल में एक मुस्लिम पार्टी का अस्तित्व आ रहा है जिसका नाम है पीस पार्टी ऑफ़ इंडिया .जिसके प्रसिडेंट आयूब खान है.

आप भोपाल आये थे मैं आप से मिलना चाह रहा था . लेकिन उस वक़्त मैं अपने घर चला गया था. खैर
विनोद दुआ जी का विनोद दुआ लाइव अब आ नहीं रहा . ऐसा क्यों है. कृपया बताएगा
बहुत जबरदस्त कार्यक्रम करते हैं विनोद जी . मेरा पास विनोद दुआ लाइव का कम से कम १००० ऑडियो क्लिप है .और मेरे लैपटॉप के डेस्कटॉप पर दुआ जी का फोटो है.जब प्रियदर्शन जी भोपाल आये थे तब मैंने उन्हें वो ऑडियो क्लिप सुनाई थी प्लीज विनोद दुआ लाइव बंद मत करियेगा ......


आपके वोइस ओवर का और विनोद दुआ लाइव का प्रसंशक

nithaall chintan said...

"इस लिहाज़ से आप देखें तो सिर्फ मुसलमान हैं जो बिना किसी उम्मीद और शर्त के वोट करते हैं। मुस्लिम वोटर अपने चरित्र में ज़्यादा राष्ट्रीय है। यह नहीं कहता है मेरी इतनी संख्या भारी तो दो मुझको भी हिस्सेदारी।" लेख की ये बात कुछ समघ में नहीं आई हमने तो सुना था की मुस्लमान अल्प्संखयक है और सरे प्रगतिशील लोग उन्हे अल्पसंख्यक बताते है अभी भी कृपया ये बात स्पष्ट करियेगा

ashutosh chaturvedi said...

जनाब आप तो भारत के चार स्तंभों में से एक खम्भे है | नेहरु की मुसलमानों को बैशाखी प्रदान नीतियों का आप समर्थन करते है जानकर बहुत दुःख हुआ | महिला आरक्षण बिल का जोरदार विरोध करने वाले सपा , बसपा , राजद , का आप का समर्थन मीडिया का माध्यम से मिल रहा है |सरकार अब आप लोगो को बताना और समझाना पड़ेगा कि आज़ादी के ६३ सालो के बाद भी आप उसी निति के पक्षधर है जिसमे मुस्लिमो को भारत देश कि मुख्य धारा से नहीं जोड़ने कि कसम खा रखे है |राजनेता तो अपनी राजनितिक रोटी सकने के लिए इस तरह का हो हल्ला मचाते रहते है लेकिन आप का उद्देश्य क्या है ? यह तो आप ही जाने |बहारहाल स्वर्गिय प्रभाष जोशी जी का वह कथन आज पूरी तरह आज पत्रकारिता को performer कर रहे है |जब बी.जे .पी और शिवसेना कोई भी मुद्दा उठाते है , तो आप उनको शब्दों से जमकर लतियाते है लेकिन हिन्दू देवी देवताओं कि नग्न तस्वीर बनाने वाले ऍम. ऍफ़ .हुसैन के मसले पर आप चुप्पी साधे है |यह किस तरह कि धर्मनिरपेक्षता है |

कुलदीप मिश्र said...

असहमति यहाँ भी है सर....क्या इस देश की महिलाएं केवल इस लिए दबाई जाती रहीं क्योंकि देश की संसद में उनका पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं था?? बिलकुल नहीं...उनकी ज़्यादातर समस्याएं पुरुष समाज के रवैये और अशिक्षा के चलते हैं...इस बिल को महिला सशक्तिकरण की संज्ञा कैसे दी जा सकती है...ज़रुरत तो ऐसे प्रयासों की है कि आरक्षण की सीढ़ी चढ़े बिना ही महिलाएं सक्रिय राजनीति में दिलचस्पी दिखाएं... भूलना नहीं चाहिए कि यह तरीका समाज में आदर्श स्थापित कतई नहीं करेगा....सोचिये यदि किरण बेदी किसी आरक्षण के तहत आईपीएस अफसर बनी होतीं तो देश उन पर आज इतना गर्व नहीं कर रहा होता...वैसे भी देश की सर्वोच्च संस्था की बौद्धिक गुणवत्ता से साथ किसी कीमत पर समझौता नहीं किया जा सकता...मै यह नहीं कहता कि देश की महिलाएं बौद्धिक दृष्टि से पिछड़ी हुई है, हाँ लेकिन आंकड़े उनके शैक्षिक रूप से पीछे होने का प्रमाण हैं...फिर दलित और मुस्लिम महिलाएं तो शिक्षा की दृष्टि से बहुत पीछे हैं...ऐसे में कोटे के अन्दर कोटे की मांग संसद भवन को अनपढ़ों की चारागाह बना सकती है...उस दृश्य की कल्पना कीजिये जब लोकसभा में कई 'गोलमा देवी' अपने पति के इशारे पर किसी कानून विषय के पक्ष या विरोध में मतदान कर रही होंगीं...मै आपको थोडा कठोर लग सकता हूँ लेकिन माफ़ कीजेगा, सच यही है....ग्राम सभाओ में महिला आरक्षण का आइडिया किस तरह फ्लॉप रहा है, आप जानते होंगे...महिलाओं की हिस्सेदारी ज़रूर बढ़ रही है लेकिन भागीदारी न के बराबर ही है...इसलिए आरक्षण से पहले ज़रुरत संरक्षण की है...

ANIS KHAN SHAHAN said...

1947 ke pahle ya phir chand ek saal bad tak Hindustani Musalman aabadi ke hesab se har field (government job, business, self-employment, art & culture) nazar aata tha, lekin government ne aahista aahista musalmano ko kabhi mitha zaher (please & promise) to kabhi tikha zaher (riots, massacres) de ke marna shuroo kiya… aur aaj ye hal hai ke Musalman dalitoon, aur kabhi jungle mein basney waley junglion se bhi badtar position mein aagaya hai. Afsos ke kahien se koi ummid ki keran nazar nahi aati, har koi lootney aur barbad karney pe tula hai,..
Agar jald hi Musalmano (and other discriminated societies) ke saath insaf nahi kiya gaya to shayad MARTA KEYA NAHI KARTA wali missal kahi haqiqat na ban jaye…aur sulagata hua Hindustan kahien rakh naa ban jaye…

PLEASE SAVE INDIA: FIGHT AGAINST INJUSTICE & DISCRIMINATION.