मीडिया में बिहार की छवि.....

मीडिया ने बिहार की नकारात्मक छवि बनाकर उसका बड़ा भला किया है। आज जिसे हम नकारात्मक कह रहे हैं वो तो सकारात्मक छवि थी। पत्रकारों ने अपनी ईमानदारी से बिहार की सामाजिक पृष्ठभूमि को उजागर किया तो बिहार की भ्रष्ट छवि बन गई। लेकिन समाज तो वैसा ही था। छवि की चिन्ता करना मीडिया का काम नहीं है। पिछले बीस साल में मीडिया क्या छवि बनाता। सड़कें टूटी हैं,कानून है नहीं,आइये और अपहरण करवा लीजिए लेकिन बिहार बेजोड़ है। आप जिसे आज नकारात्मक बता रहे हैं वो अपने समय की सकारात्मक छवि थी। मीडिया में बिहार की बुराइयों को दिखाकर सकारात्मक काम हो रहा था। देखिये ऐसा है बिहार। छवियों का अतिरेक ही था कि जाति में बंटी यहां की जनता को समझ में आया कि खराब कानून व्यवस्था या आर्थिक हालात का नुकसान उसे ही उठाना पड़ रहा था। मीडिया ने बिहार को वैसा ही दिखाया जैसा था।

क्या था हमारे पास जो छवि बनती। कोर्स तीन तीन साल लेट चलते थे। हम सबको घरों से उजड़ कर दूसरे राज्य में जाकर रहना प़ड़ा,परिवार की जमा पूंजी गंवानी पड़ी। तमाम अवसरों को ठुकरा कर बिहार और बिहार के लोग जातियों के अहंकार में जी रहे थे। भोजपुरी में गाने बन रहे थे कि कैसे एमएलए बोलेरे लेकर चलता है,मनोज तिवारी गा रहे थे कि कैसे आईएएस की तैयारी इस उम्मीद से की जाती है कि सफल हुए दहेज की मोटी रकम मिलेगी। पिछले बीस साल में बिहार पतनकाल में जी रहा था। पतनकाल में सकारात्मक छवि न लोगों के मन में बनती है या न मीडिया बना सकता है। ये इसी नकारात्मक छवि का जोर था कि लोगों ने बदलाव का मन बनाया। प्लीज़ आप जिसे नकारात्मक कह रहे हैं उसी की बदौलत आप बिहार की सकारात्मक छवि को रंगने के लिए जमा हुए हैं हम सब।

अब सवाल है कि बिहार को अपनी छवि की चिन्ता क्यों करनी पड़ रही है? क्यों बिहार अपनी मामूली उपलब्धियों को भी छवि के पैमाने पर परखना चाहता है? साफ है बिहार को लगता है कि इन्हीं धारणाओं की वजह से नुकसान हुआ है। पहले बिहार के लोग अपनी छवि को लेकर गंभीर नहीं थे। अब गंभीर हो गए हैं। जो बिहार से बाहर गए,उनके पास तमाम उपलब्धियां तो हैं लेकिन राज्य की पहचान नहीं है। उनकी कामयाबी हर क्षेत्र में है। उन्हें लगता है कि बिहार से होने की वजह से उन्हें कमतर आंका जाता है। यही अहसास अब बिहार में रहने वालों को भी हो रहा है। इसलिए अब बिहार की छवि कई स्तर पर बनाई जा रही है। लोगों के स्तर पर, सरकार के स्तर पर और मीडिया के स्तर पर। आबोहवा बदली है तो सब अपने अपने हिसाब से बिहार को लेकर शाइरी कर रहे हैं। इस एक सवाल पर अब सबकी सहमति है। लेकिन यह सहमति टूटनी भी चाहिए। काम का मौहाल ठीक हुआ है लेकिन उसके आगे क्या, उसके आगे क्यों नहीं...।

बिहार की छवि क्या थी और क्या है इसमें अंतर आ गया है। बिहार की दो छवि है। एक जो दिखाई और बताई जा रही है, दूसरी छवि वो है जो छुपाई जा रही है या उसकी बात नहीं हो रही है। ये दो तरह का बिहार क्यों है? छुपाने वाली बातों पर चर्चा क्यों कम हो रही है? हमें छुपाने वाली छवियों पर सामने लाना चाहिए। डरते हैं कि आलोचना करेंगे तो सरकार के रजिस्टर में नाम खराब हो जाएगा। क्यों हो जाएगा? क्या सरकार को नहीं मालूम कि बिना साख वाली मीडिया से कोई लाभ नहीं होता। यही मीडिया जब लालू राज का आलोचक था तो लालू इसे सवर्ण और इलिट मीडिया कहते थे। यही मीडिया जब नीतीश का राज है तो वाह वाह कर रहा है,तारीफ कर रहा है। ये बात सही है कि नीतीश को मीडिया का समर्थन ज़रूरत से ज़्यादा मिला है। राज्य में एक माहौल बनाने में मीडिया की भी भूमिका है। चाहे वो जिस रूप में हो। या तो आप इस बात पर खुल कर हंस लीजिए या मन ही मन हंस लीजिए। हकीकत तो आप जानते हैं। मैं सिर्फ बाहर से महसूस कर सकता हूं।
देखिये जय बिहार जय बिहार के नाम पर किसी तरह का संकीर्ण क्षेत्रिय एजेंडा नहीं बनना चाहिए। आखिर वो गलत क्यों हैं,उसकी निष्ठा पर शक क्यों है जो सवाल खड़े कर रहा है। विकास की किसी भी स्थिति में आलोचना और सवाल की गुंज़ाइश तारीफ के बराबर ही होती है। मीडिया में आलोचना की गुंजाइश खतम हो गई है।

अब इस छवि बिजनेस में स्टेक होल्डर कौन है। बिहार और बिहार के बाहर जो एक कामयाब मेहनतकश मध्यमवर्ग बना है, जो सरकारी नौकरियों के साथ साथ साफ्टवेयर कंपनियों और बिजनेस में नाम कमा रहा है वो चाहता है कि बिहार के बारे में अब सकारात्मक बातें हों। वो ईमेल करता है। मिशिगन में बिहार को लेकर ईमेल ग्रुप बनाता है। सरकार की आलोचना बर्दाश्त नहीं करता। यह एक अच्छी शुरूआत है लेकिन इसे लेकर संकीर्ण होने का भी खतरा है। सम्मान के लिए ज़रूरी है कि छवि बेहतर हो। सिर्फ इमेज मैनेजमेंट से छवि ठीक करेंगे तो पोल खुल जाएगी। बिहार की छवि मीडिया के चलते ही नहीं बल्कि लोगों के चलते भी बदल रही है। लोग बिहार के बारे में सकारात्मक तरीके से बात कर रहे हैं। उन्हें यह नया वातावरण अच्छा लग रहा है। सिएस्ता टाइम है बिहार में। सब बढ़िया है चलो सो लेते हैं। शाम से काम करेंगे।

अब जब छवि ठीक हो रही है तो देखना होगा कि बिहार को लाभ क्या मिल रहा है। क्या टाटा बिड़ला और अंबानी अपना उद्योग यहां ला रहे हैं। नीतीश कुमार को सब अच्छा कहते हैं,उनको श्रेय मिलना भी चाहिए। लेकिन क्या सरकारी निर्माण के अलावा प्राइवेट सेक्टर में ऐसी भागीदारी दिख रही है। कैसा विकास हो रहा है और कैसा चाहिए इस पर बहस चली है? मुझे नहीं मालूम,मैं सिर्फ सवाल उठा रहा हूं। बिहार सरकार की वेबसाइट से तो लगता है कि कई हजार करोड़ का निवेश हुआ है। ज्यादातर चीनी मिलें हैं। नई भी हैं और उनका विस्तार भी हो रहा है। उसके बाद पटना में कई सौ करोड़ के अस्पताल बनाने की भी बात है। सारे निजी अस्पताल पटना में बन रहे हैं। कमाई के लिए। पावर जेनरेशन से जुड़ी कई योजनाओं को देख रहा था,सिर्फ कहलगांव में दस हज़ार करोड़ से अधिक के थर्मल और कोल पावर प्लांट लगाने के प्रस्ताव का ज़िक्र है। बांका में ११ हज़ार करोड़ का पावर प्लांट लगाया जाना है। हर बड़ी योजनाओं में से एक बाढ़ में है। मुख्यमंत्री बिहार के साथ साथ बाढ़ और नालंदा पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। अब इनमें से कितने प्रस्ताव ज़मीन पर उतरे हैं या उतरने हैं इसके बारे में मैं दावे के साथ नहीं कह सकता। लेकिन जो वेबसाइट हैं उससे बिहार की कोई बड़ी औद्योगिक तस्वीर नहीं दिखती है। हां पावर जनरेशन को लेकर एक दृष्टि दिखती है जो अगले पांच साल में या पांच साल बाद शायद बिहार की तस्वीर बदलने में सहायक हो। कोई उद्योग क्यों आएगा,जब तक आप बिजली का इंतजाम नहीं करेंगे। लेकिन पटना में माल या वाटर पार्क बने उसका जिक्र सरकारी वेबसाइट पर क्यों हैं। माल या वाटर पार्क भी क्या अब विकास की नीति या तस्वीर में शामिल कर लिया गया है? मुझे नहीं मालूम। पटना में एलटीसी घाट में तेरह सौ करोड़ का वाटर पार्क बन रहा है। जो काम बाज़ार कर रहा है उसे आप सरकार की सूची में क्यों शामिल कर रहे हैं। मॉल को कैसे विकास की सूची में डाल सकते हैं? इसलिए कि मॉल के आगे कुछ सौ करोड़ की रकम जु़ड़ी है। मॉल निवेश नहीं है। वो धंधा है। आप नहीं भी बनायेंगे तो बन जायेगा।

अब मैं बिहार का आर्थिक सर्वेक्षण देख रहा था। पिछले चार साल में जीडीपी ११.३५ फीसदी है। इसमें पैंतीस फीसदी हिस्सा तो निर्माण क्षेत्र का है क्योंकि सड़कें और पुल खूब बने हैं। बाकी हिस्सा संचार और होटल तथा रेस्टोरेंट का है। गाड़ियों का पंजीकरण बढ़ा है तो राजस्व बढ़ा है। इसके क्या कारण है। क्या सड़कें बेहतर हो गईं,कार स्कूटर छिन जाने का खतरा कम हो गया तो लोगों ने खरीदा या फिर राज्य में उद्योग धंधे इतने आ गए कि मैनेजर गाड़ी खरीदने लगे। पता नहीं। लेकिन बिहार एक ग्रामीण राज्य है। यहां शहरीकरण सिर्फ ११ फीसदी है। इससे पता चलता है कि सिर्फ सड़कें बनी हैं। शहरीकरण होना अच्छा है या नहीं ये अलग विषय है। फिर भी एक तस्वीर दिखती है। आधी से अधिक जनता गरीबी रेखा के नीचे हैं तो कैसे मान लें कि बिहार की छवि अच्छी होनी चाहिए। शिक्षा के क्षेत्र में बेहतरीन आंकड़े नज़र आते हैं। लेकिन गरीबी और शहरीकरण के रिकार्ड से लगता है कि बिहार को आत्मालोचना की ज़रूरत है। मैं व्यक्तिगत रूप से खुश हूं कि मेरे गांव में सड़क बन गई है। कानून व्यवस्था इतनी ठीक है कि लड़कियां साइकिल चला कर स्कूल जा रही हैं। पर ये राज्य का काम है। अहसान थोड़े न है। पहले इतना भी नहीं था तो इस बात पर ताली बजा दूंगा लेकिन लंबी ताली नहीं बजाऊंगा।

नीतीश कुमार को श्रेय मिलना चाहिए लेकिन नीतीश से सवाल भी होना चाहिए। पांच साल में कितनी गरीबी कम हुई। चौवन फीसदी का आंकड़ा दिया है। यह भी बताइये कि क्या साठ फीसदी से आपने चौवन फीसदी किया है या चवालीस फीसदी से चौवन फीसदी। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि गांवों में काम हो रहा है तो बाहर बिहार के मज़दूरों को मनाया जा रहा है। यह अच्छा संकेत है,लेकिन क्या मजदूरों का पलायन रूक गया। मध्यमवर्ग के मैनेजर लाडलों का क्या होगा,क्या उन्हें बिहार में नौकरी मिलने लगी है।

बीस साल के ग्लोबलाइज़ेशन से बिहार दूर रहा है। क्या हमारी यूनिवर्सिटी ने इतना नाम कमाना शुरू कर दिया है कि छात्रों का पलायन रूकने लगे। हम इसी से राहत महसूस कर रहे हैं कि यूनिवर्सिटी चल पड़ी है। रूकी नहीं है। मगर हालत खराब है। पटना यूनिवर्सिटी के सामने रहने वाला छात्र भी दिल्ली और पुणे जाना चाहता है। कितने उद्योग यहां आप खड़े देख रहे हैं। कितनी चिमनियां नज़र आती हैं। यह सवाल भी देखना होगा कि क्या बिहार को उद्योगों का इंतज़ार करना चाहिए या फिर अपनी खेती और पानी के जरिये सप्लायर स्टेट बन जाना चाहिए। बिहार की वेबसाइट पर कोल्ड स्टोरेज या फूड प्रोसेसिंग प्लांट के लगाये जाने के प्रस्तावों का ज़िक्र तो है लेकिन पर्याप्त मात्रा में नहीं। बिहार को मानवसंसाधन राज्य बनना चाहिए। लगता नहीं कि बिहार की इस संभावना का इस्तमाल करने के लिए क्रांतिकारी प्रयास हो रहे हैं। उसके लिए खेती, पशुपालन और साग सब्जी को औद्योगिक बनाना होगा,कौशल के विकास का काम करना होगा। एक पेशेवर अंदाज़ में। बिहार की जनता अब मांग करें। सरकार से कहे कि भई ये दिल मांगे मोर।

मीडिया से नहीं। मीडिया इस भ्रम में न रहे। इससे तो सरकार का भी नुकसान हो जाएगा। जहां जहां भी सरकार ने मीडिया को कंट्रोल किया है वहां वहां सरकारें अच्छा काम करने के बाद भी हारी हैं। ये बात ध्यान में रखनी चाहिए। मीडिया मैनेजमेंट से एनडीए की सरकार चली गई थी। लोग मीडिया से दोनों तस्वीर की उम्मीद रखते हैं।

लेकिन यह एक शानदार मौका है बिहार को रफ्तार देने का। योगदान नीतीश का ही है लेकिन इच्छा तो लोगों की भी थी। लोगों का साथ मिला और नीतीश का प्रयास रहा तो नतीजा आ रहा है। लोग तैयार न होते तो बीस साल का लालू राबड़ी राज का चक्र नहीं टूटता। रेल मंत्री के रूप में लालू को भी अपनी अलग छवि बनानी पड़ी। उन्हें विकास पुरुष की छवि पर चलना पड़ा। लालू को आईआईएम अहमदाबाद तक जाना पड़ा। हालांकि तब तक देर हो चुकी थी। खैर बिहार के लोग तैयार हैं कि कुछ हो। मगर बात इस पर खतम नहीं होनी चाहिए कि कुछ ही हो और बाकी भूल जाए। अगर सरकार अपनी रफ्तार बढ़ाती है तो लोग अपनी रफ्तार दुगनी कर लेंगे। बिहार के श्रम,कौशल का फायदा इस राज्य को बेहतर बनाने के लिए होना चाहिए।

इसके लिए बिहार को दूसरी सामाजिक जड़ताओं से निकलना होगा। सामाजिक बुराइयां तो वहीं की वहीं हैं सिर्फ राजनीतिक प्रशासनिक माहौल बदला है। उसे तोड़ने का अभियान चले। वर्ना इस अच्छे माहौल का फायदा उठा कर लोग पटना में फ्लैट खरीद कर खुश हो जाएंगे। बिल्डर के फ्लैट बनने से डेवलपमेंट नहीं हो जाता है। एक नया बिहार दिख तो रहा है जिसका आत्मविश्वास जागा है। बिहार भी बदल सकता है इस पर सब हैरान हैं। लेकिन याद रखना चाहिए कि दूसरे राज्य कितना आगे जा चुके हैं। कहीं ऐसा न हो कि बदलाव का ककहरा पढ़ कर ही हम खुश हो जाएं। अभी बहुत कुछ करना बाकी है। डिमांड करते रहिए।

(ऐसा बोलना चाहता था लेकिन पढ़ कर नहीं बोल सका इसलिए यहां दे रहा हूं। अरुण रंजन ने बेहतरीन तरीके से अपनी बात कही। कहा कि माई की छवि कहां गई। महादलित की छवि आ रही है। ये भी चली जाएगी। छविओं को मत बनाइये। जंगल राज और सुशासन की छवि को टकराने दीजिए। इकहरी छवि मत बनाइये। काश उनके भाषण को लिख कर ब्लाग पर डाल देता तो सबको फायदा होता)

24 comments:

कृष्ण मुरारी प्रसाद said...

सही विश्लेषण....
.
अच्छी प्रस्तुति......
http://laddoospeaks.blogspot.com/

sahespuriya said...

GOOD POST

जयराम “विप्लव” { jayram"viplav" } said...

बिहार कितना बदला है और बदला है तो क्यों ? रविश भाई आपने एक सही विश्लेषण और अंत में सही सलाह दी है "कहीं ऐसा न हो कि बदलाव का ककहरा पढ़ कर ही हम खुश हो जाएं। अभी बहुत कुछ करना बाकी है। डिमांड करते रहिए। "

लेकिन एक बात तो साफ़ है कि जितना बदलाव का हौव्वा खड़ा किया जा रहा है उतना कुछ नहीं है . अखबारी विकास के पीछे का सत्य कुछ और ही है जहाँ बिहार आज भी नौकरशाही के भ्रष्ट चंगुल में बुरी तरह जकड़ा हुआ . सूचना धिकार जैसे कानूनों की धज्जियाँ उड़ाई जा रही है ..... और भी बहुत कुछ है .
वैसे अगर कहीं सालों से अँधेरा छाया हो और वहां कोई जीरो वाट का का बल्ब भी जला दे तो लोगों को चारो तरफ सूरज की रौशनी ही मालूम पड़ती है . बिहार के संबंध में मीडिया ऐसी हीं खुशफहमी पैदा कर रही है .

कभी फुर्सत हो तो आप इस पोस्ट को देखिये " http://www.janokti.com/2010/03/17/%E0%A4%85%E0%A4%96%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B8-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%AA%E0%A5%80%E0%A4%9B%E0%A5%87-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%AC%E0%A4%BF/ "

सुशीला पुरी said...

बिहार के बिना व्यवहार कैसा ?

Satish Pancham said...

balanced approach लेकर लिखी गई बढिया पोस्ट।

शहरोज़ said...

'' नीतीश कुमार को श्रेय मिलना चाहिए लेकिन नीतीश से सवाल भी होना चाहिए। पांच साल में कितनी गरीबी कम हुई। चौवन फीसदी का आंकड़ा दिया है। यह भी बताइये कि क्या साठ फीसदी से आपने चौवन फीसदी किया है या चवालीस फीसदी से चौवन फीसदी। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि गांवों में काम हो रहा है तो बाहर बिहार के मज़दूरों को मनाया जा रहा है। यह अच्छा संकेत है,लेकिन क्या मजदूरों का पलायन रूक गया। मध्यमवर्ग के मैनेजर लाडलों का क्या होगा,क्या उन्हें बिहार में नौकरी मिलने लगी है।''

विनीत कुमार said...

ऐसे मौके पर आप एक रिकार्डर रखा कीजिए। सिगरेट की साइज का सोनी वायो। कुछ नहीं ऑडियो अपलोड़ कर दीजिए यहां। मेरे ऐसा करने से कुछ वक्ताओं को सीधा फायदा पहुंचा है,पत्रिकाओं ने इसका रुपांतरण कर लेख की शक्ल में छाप दिया और यहां हमने भी सुन लिया।..

JC said...

"...बिहार की दो छवि है। एक जो दिखाई और बताई जा रही है, दूसरी छवि वो है जो छुपाई जा रही है या उसकी बात नहीं हो रही है। "

रविश जी, क्या आपके अपने ही उपरोक्त कथन से यह एहसास नहीं हो रहा कि आपने जो कहा उसी को 'प्राचीन ज्ञानी' 'द्वैतवाद' से उत्पन्न कह गए - शक्तिशाली आत्मा (परम सत्य) और कमज़ोर भौतिक शरीर (बाहरी सत्य) के मिश्रण यानि 'योग' के कारण???

उन्होंने आदमी को उल्टा पेड़ यानि दरख़्त कहा,,,और शायद यह सभी को पता होगा कि वृक्ष की अधिकतर जडें जमीन के भीतर छुपी रहती हैं और उसका शेष उपरी भाग ही हमको साधारणतया दिखाई पड़ता है (बरगद उसका अपवाद है, और बुद्ध भी, जिसे गया ने जिन्दा रखा है) ,,,और उसमें भी हमें केवल चाह रहती है उसमें लगे मीठे फल की ही, यद्यपि एक कहावत है, "बोया पेड़ बबूल का तो फूल कहाँ से होए?" हाँ दंतमंजन के काम में वो लाया जा सकता है (गाँव में ही भले), इसी लिए जीवन का सार यह भी किसी (अंग्रेज़ ने) जाना, "जो केवल खड़ा खड़ा घूर रहा है (मीडिया के समान?) वो भी लाभदायक काम कर रहा है"...:)

prabhat gopal said...

बढ़िया और सटीक विश्लेषण..

CSNikhilesh said...

Achha analysis kiya hai Ravishji. Us baar ummed jaroor jagi hai. Agar Patna aur doosre Shahron men achhe educational institutions khul jayen to Bihar ka bahut sara dhan bahar jane se bach jayega.

Aur agar unhen wahin employment bhi milni suru ho jaye to baat hin kya.

Doosra pahlu gramin ilakon ka hai. aapne sahi likha hai, kyonki jyadatar log abhi bhi kheti par nirbhar hain food processing aur commercial agriculture ko badhwa dena bahut jaroori hai.

In dono points ke liye bahut kaam karna hoga.

Lekin, ummeed hai...

अनकही.... said...

बिहार के हालात के लिए तो निसंदेह भ्रष्टाचार जिम्मेदार है लेकिन छवि बिगाड़ने में बहुत बड़ा योगदान खुद वहां के ही निवासियों का है, लोग उन रेलगाडि़यों से भी जाना पसंद नहीं करते जो बिहार होकर जाती हैं.......क्यों, क्योंकि उसमें स्लीपर किसी जनरल से कम नहीं लगता, वाशरुम्स में आप कदम नही रख सकते और कोई भरोसा नहीं कि बिना स्टोपेज ट्रेन कहां रोक ली जाए....

Sanjay Sharma said...

बेहद संतुलित लेख बिहार पर बिहारी पत्रकार द्वारा !
आभार ! जब कभी मार खाता इंसान कोने
पकड़ता है .तब अपनी सारी ताकत बटोरकर
भीड़ जाता है .येही हाल बिहार का रहा . हॉल के बीचोबीच
इतनी कुटाई हुई बिहार की सो जंगल राज को लतियाने
में लडखडाते पाँव जितनी ताकत से लतिया सकता था
लतियाया अब एकलती -दुलती बोलने की जरूरत है.

Sanjay Sharma said...
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abhishek pandey said...

सर पहाडगंज , लापता गंज की स्टोरी कल भी देखी और आज भी देखी , जबरदस्त थी . सर आप जबरदस्त फीचर एडिटर हैं.
आप के वोइस ओवर का प्रसंशक .

शहरोज़ said...

आप बेहतर लिख रहे/रहीं हैं .आपकी हर पोस्ट यह निशानदेही करती है कि आप एक जागरूक और प्रतिबद्ध रचनाकार हैं जिसे रोज़ रोज़ क्षरित होती इंसानियत उद्वेलित कर देती है.वरना ब्लॉग-जगत में आज हर कहीं फ़ासीवाद परवरिश पाता दिखाई देता है.
हम साथी दिनों से ऐसे अग्रीग्रटर की तलाश में थे.जहां सिर्फ हमख्याल और हमज़बाँ लोग शामिल हों.तो आज यह मंच बन गया.इसका पता है http://hamzabaan.feedcluster.com/

Mereywords said...

Hi, i often read your blog and I am from Bihar working as an enginner in Bangalore.You know i was working under Nitish Government for an year when recession was there and my joining got delayed in a company called BeST(Bihar e-governance services and technologies) so i know a bit what governement is doing. I can only say that things are changing but that change is very slow. Most of the vision is on the paper well scripted but when it comes to reality things differ.A very strong monitoring cell is required for all the projects to run efficiently which is missing. Accountability has improved but needs to be improved on a wide scale. You know my enducation till graduation happened in Patna and most of the Girls from my batch are settled across the country doing amazingly well..so progress needs to be appreciated yet it must be MONITORED!so correct evaluation comes across

Dinbandhu Vats said...

रविश सर,
बिहार पर चर्चाएँ अब प्रारंभ हो जाएगी. चुनाव जो होने वाले है.पर आपने बहुत संतुलित वर्णन किया है.वस्तुतः हम विकास को वृद्धि के आंकड़ो के साथ जोड़ देते है.सिर्फ रोड बनने और मॉल खुलने से विकास नहीं होता.आम नागरिकों के जीवनस्तर में कोई खाश फर्क तो हुआ नहीं.इमेज मनेमेंट का ब्रांड एम्बेसडर तो आम बिहारी है.जब तक उसका इमेज नहीं सुधरेगा बिहार का भी इमेज सुधरने वाला नहीं है .नितीश जी लोगो और मीडिया को फिलगुड करवा रहे है.वैसे उसका नमूना वाजपेयी जी भी देख चुके है.बिहारी मजदूर ,छात्र आम लोग सब के सब बाहर में अभी भी बिहारी होने पर झेलते है.वे तो अपनी प्रतिभा के बदौलत आगे है.सरकार का इमेज मनेजमेंट सतही है.सही में अगर सुधारना है तो बिहार को भी शिक्षा,चिकित्सा,कृषि,और उद्योग में रेडिकल चेंज लाना होगा .
सादरप्रणाम

अनकही.... said...

प्रणाम सर,
मै अक्सर सोचती हूं कि बाकी पत्रकारो और रवीश जी मे अलग क्या है..और जो समझ मे आता है वो ये कि सबके पास आइडिया तो है लेकिन उसे इंम्प्लीमेंट करने के लिए शब्द नहीं...आपके पास वो शब्द हैं जो वास्तव में पत्थर में भी धड़कन पैदा कर दें....

JC said...

रविशजी, मुझे लगा की आप बोध गया को तो भूल ही गए थे सो लिखा...इस सन्दर्भ में याद आता है कि जब हम क्लास ९ में पहुंचे तो (दिल्ली के एक स्कूल में) अंग्रेजी के टीचर इलाहाबाद के मूल निवासी थे...वो छमाही परीक्षा में हिंदी से अंग्रेजी में रूपांतर के लिए बहुत कठिन वाक्य देते थे, और फिर जो हम में से किसी ने मजेदार लिखा होता था तो उसको सब को सुना सुना के आनंद लेते थे...
उनमें से एक था 'गया गया गया, गया!'

और भी होते थे, जैसे 'हमारी सेना ने दुश्मनों की सेना के दांत खट्टे कर दिए. और दुश्मन दुम दबा के भाग खड़ा हुआ'!

और 'मेरी माँ ने मेरी शादी करानी चाही, किन्तु मेरे पिताजी ने मना कर दिया.'

Jai Prakash Pathak said...

namaskaar!

ek pichhaDe hue desh kaa prant bihaar usake paas u.p. kaapurvaanchal lagabhag ek hii pavdaan par hai. vaise up vaale bhii vaise hii garv karate hain.

ham apanii shikshaa vyavasthaa ko sarvochch praathmikataa na dekar bideshon se vishvavidyaalaya mangaayenge to pichhaDe hii rahenge.

namaskaar.

KESHVENDRA said...

रवीश जी, बहुत ही सुंदर, संतुलित और निष्पक्ष विश्लेषण किया है आपने बिहार की दशा का. वाकई, बीच में यह अवस्था हो गयी थी की 'बिहारी' समूहवाचक संज्ञा से एक अवांछनीय विशेषण में तब्दील हो गया था. पर, इधर के वर्षों में छवि में सुधर जारी है. बिहार अपनी कुम्भकर्णी निंद्रा से तो जाग चूका है पर बाकी के राज्यों की प्रगति को देखते हुए इसे अपनी विकास की रफ़्तार को बढ़ाना होगा. सामाजिक क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार को सबसे ज्यादा प्रमुखता दिए जाने की जरुरत है. और भ्रष्टाचार को पूरी तरह मिटाए बिना इस लक्ष्य को हासिल नही किया जा सकता.
अगर हम अपनी साक्षरता को आगे के 5-10 सालों में 90% से ऊपर ला सके तो बाकी के मानसिकता परिवर्तन का काम अपने आप होता जायेगा.

Dhananjay Kumar said...

You tried well to hit the nail on the head...

Pradeep Lal said...

Dear Sir,

The problem is not government, the real problem is its undeducated people, let me educated, phir chahe
koi bhi government bane development hoga :)

You said good, Nitish se sawal bhi hone chahiye but kabhi aapne Laluji se sawal pucha kya ???
The graph of progress start from 0 and it takes time to reach 100, Yess NitishJI did the first task that
was on priority, curb on CRIME.

We should ask question to Nitishji after completion of his next term.

Regards,
Pradeep Lal

Rishi Raj said...

Dear Ravish Ji

I am amassed to see your analysis about the present condition of Bihar. I am 100% agree about your point that on the website of Bihar there are plenty of investment proposals mentioned, but you wont find a column where they have mentioned the current status of the projects.

As far as the nitish kumar blog is concern i have posted an number of comments but it was never posted on the blog because if you will write some thing which they found against them the moderator will not upload the comment on the blog.


Thanks

Rishi Raj Rishabh