जबसे हमारे बीच बिजली आई है...पढ़िये..बिजली की यात्रा की कहानी


"दरबारी समाज के लोग ख़ुद को बुर्ज़ुआ वर्ग से अलग करने वाले फ़ासले को उजागर करने के लिए रात और दिन, कभी भी देर तक काम करते दिखायी देते थे। अब बुर्ज़ुआ वर्ग भी निम्न पूंजीपति वर्ग और कारीगरी से ख़ुद को अलग दिखाने के लिए ऐसा ही करने लगा। कोई व्यक्ति दिन की शुरूआत जितनी देर से करता उसकी सामाजिक हैसियत उतनी ही ऊंची मानी जाती। नतीजतन हर चीज़ देरतर शुरू होने लगी। पेरिस में लुई पंद्रहवें के समय थिएटर चार से सात बजे के बीच शुरू होते थे। अठारहवीं सदी में उनके खुलने का समय सवा पांच बजे निर्धारित कर दिया गया। रंगशाला में रंगमंचीय प्रदर्शन लगभग रात नौ बजे खत्म होते थे।"

और इस तरह अठारहवीं सदी के आखिर से और उन्नीसवीं सदी की शुरूआत से हमारे जीवन में शाम का मतलब बदल गया।शाम का अन्त सुबह के तीन बजे खत्म होने लगा जब मौज मस्ती कर लौटने वालों का सामना काम पर जाने वालों से होता था। क्योंकि हम नकली रौशनी यानी बिजली को खोज लाये। कभी हमने ध्यान दिया है कि बिजली के आने से हमारा जीवन कैसे बदला है। मुझे याद आता है कि मेरे कई दोस्त रात में जग कर पढ़ते थे। मुझे आज तक समझ में नहीं आया। लेकिन तब यह बात लगती थी कि ये लोग ख़ुद को बाकी लोगों(दिन में पढ़ने वालों) से अलग करने के लिए रतजगा करते थे। जब मैं आठवीं में था और बतौर फेलियर छात्र के रूप में प्रतिष्ठित था तो कई बार मेरे भाई पड़ोस की एक खिड़की की तरफ इशारा कर मिसाल देते थे,जिसकी खिड़की से बत्ती की रोशनी बाहर आती दिखाई देती थी,कि देखो रात भर पढ़ता रहा है। रात में पढ़ना तेज विद्यार्थी होने की निशानी बन गया। तब लगता था कि काश इस बल्ब का वजूद ही मिटा देता। बिजली कभी आती ही नहीं। लेकिन कभी सोचा नहीं कि यह सब बल्ब की वजह से हो रहा है और जो पटना में हो रहा है वो तो कोई डेढ़ सौ साल पहले पेरिस में हो चुका है। हमारे व्यक्तिगत से लगने वाले अनुभव कभी कभी इतने ग्लोबल और ऐतिहासिक लगते हैं कि पढ़-सुन कर हैरानी होती है।

आज भी रात जगने वाले विद्यार्थी एकांत के नाम पर अपनी अलग पहचान बनाते हैं। जुबली हॉल में जा कर पता कर लीजिए। ड्राइंग रूम में जब बातें होती थीं कि बंटी तो रात भर जग कर पढ़ता है तो दिल पर हाथ रख कर बोलिये आपका सीना चौड़ा हुआ था या नहीं। मैं जितने लोगों को जानता हूं,जो रात में पढ़ते थे,उनमें से कोई न्यूटन नहीं बना। सब बिजली के भरोसे इम्तहान पास करने की एक पुरातन टेक्निक पर ही चल रहे थे। उन्हें नहीं पता था कि उनकी यह शान क़ायम ही न होती अगर उनके जीवन में बिजली न होती।

बेतिलिस्म रातें। इस किताब को पढ़ना ज़रूरी है,यह समझने के लिए कि फ्रांस और पेरिस में बिजली की तलाश से पहले किस तरह गैस औऱ मिट्टी तेल से चलने वाले लालटेन का आगमन हो रहा था। किस तरह से इंसान और अधिक रोशनी की तलाश में प्रयोग कर रहा था। इन प्रयोगों के बेशुमार किस्से हैं इस किताब में। वर्ना आप इस पंक्ति से महरूम हो जायेंगे कि "कृत्रिम प्रकाश के सफ़र में बत्ती की वही क्रांतिकारी हैसियत है जो परिवहन के आविष्कार में पहिए की रही है।" हज़ारों साल पहले जिस लौ का विकास हुआ था,वह अठारहवीं सदी तक कमोबेश अपने उसी रूप में बनी रही। 1688 में अकेले वर्साई पार्क को रोशन करने के लिए 24,000 रौशनियां जलाईं गईं थीं। उजाले के लिए इस्तेमाल होने वाले पदार्थों की कीमत के कारण उनका इस्तेमाल काफी समय तक केवल बुर्जुआ परिवारों तक ही सीमित रहा(पेज-६)। अठारहवीं सदी तक एक कारखाने को रोशन करने के लिए हज़ारों दीयों की ज़रूरत पड़ने लगी थी। इस तरह से बेतिलिस्म रातें रोशनी के सफ़र के इतिहास को दर्ज करते चलती है।

निहायत व्यावहारिक कारणों से तापदीप फेल हो गया। "लेबों ने ऐसा एक लैम्प पेरिस स्थित अपने घर में लगाया और तीन फ्रैंक का टिकट लगा कर उसे सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए खोल दिया।" यह वह दौर था जब लैम्प,बत्तियों,गैसलाइट और तापदीप को लेकर बिजली को धरती पर लाने के भागीरथ प्रयास चल रहे थे। बेतिलिस्म रातें इस प्रक्रिया में रोशनी के तलाश की नाकामी और कामयाबी की कई कहानियों को सामने लाती है। सोचा जा रहा था कि कैसे एक केन्द्रीकृत प्रणाली से तमाम घरों को रोशन कर दिया जाए। "विंसर ने अपने परचे में लिखा था कि जैसे अभी घरों और सड़कों पर पानी सप्लाई किया जाता है उसी तरह प्रकाश और ताप मुहैया कराने के लिए एक राष्ट्रीय गैस व ताप कम्पनी बनाई जानी चाहिए। लंदन में टोंटी के पानी की आपूर्ति अठारहवीं सदी की शुरूआत से ही की जा रही थी।"

इस किताब की हर पंक्ति रोचक जानकारियों से भरी है। हमारे शहरी जीवन के सफ़र में एक बल्ब की खोज की क्या भूमिका रही है,उसका लाइव टेलिकास्ट आप इस किताब में देख सकते हैं। अगर आप अपना वक्त न्यूज चैनल देखकर बर्बाद नहीं करना चाहते हैं तब। संदर्भ तो नहीं है लेकिन बताना ज़रूरी है कि डिस्कवरी के कार्यक्रमों को दर्शक किसी भी हिन्दी न्यूज चैनल के शो से ज्यादा देर तक रूक कर देखता है। कोई तुलना नहीं है। यह भ्रम भी यहीं ध्वस्त हो जाता है कि हिन्दी का दर्शक तुच्ची चीज़ों का आग्रही है। वर्ना बिना किसी प्रचार के डिस्कवरी हिन्दी प्रदेशों का नंबर वन चैनल नहीं होता। टाइम स्पेंट उसका सबसे अधिक नहीं होता। टीआरपी देखने वाले इस रहस्योदघाटन को परख लें।

खैर। अब यह किताब पहुंचती है 1880 और बताती है कि इस वक्त तक एडिसन ने बल्ब को एक रूप दे दिया था लेकिन बिजली की केंद्रीय आपूर्ति व्यवस्था नहीं हो पाई थी। 1882 में लंदन और न्यूयार्क में केंद्रीय बिजली घर चालू हो गए। यह किताब बताती है कि कैसे कोई भी प्रौद्योगिकी खतम नहीं होती। नई प्रौद्योगिकी पुरानी प्रौद्योगिकी से उधार लेती है। पुरानी प्रौद्योगिकी अपने में संशोधन करती हुई किसी न किसी रूप में जीवित रहती है। किताब बहुत सुन्दर तरीके से बताती है कि उस बल्ब की खोज के किस्से किस तरह घट रहे थे।

रात का मतलब अब बदल रहा था। किस तरह से सार्वजनिक प्रकाश व्यवस्था सोलहवीं सदी से होते हुई उन्नीसवीं सदी में आकर बदल रही थी। सड़कों के किनारे लालटेन लगे होते थे। जिनकी सुरक्षा पुलिस करती थी। प्रदर्शनकारी इन्हें सत्ता का प्रतीक मानकर तोड़ डालते थे। जिस तरह से राजठाकरे या किसी भी दल के लोग प्रदर्शन करते वक्त सरकारी चीज़ों को तोड़ डालते हैं। पेरिस में अठारवहीं सदी में प्रशासन ने आदेश जारी किया था कि सभी लोग अपने घर के बाहर एक बत्ती जलाएंगे ताकि घर की शिनाख़्त हो सके। धीरे धीरे ये लालटेन मकानों से अलग होकर सड़कों पर लटकाये जाने लगे। सार्वजनिक प्रकाश व्यवस्था का जन्म होने लगा। पूरी रात जलने वाली स्ट्रीट लाइटें अभी भी सौ साल से ज़्यादा पुरानी नहीं हैं।

रोशनी की कहानी बताती है कि कैसे बिजली के आने से सार्वजनिक और व्यक्तिगत जीवन का फर्क गहरा हुआ। घर के भीतर कमरों की व्यक्तिगत पहचान हुई। जैसे आज हम एक घर में दो से अधिक टीवी को व्यक्तिगत पहचान के मज़बूत होने की प्रक्रिया समझते हैं,उस दौर में एक घर में तीन बल्ब का लगना घर के भीतर व्यक्तिवादिता के बनने की प्रक्रिया रही होगी।

स्ट्रील लाइट की यात्रा में टावर लाइट के आगमन का बड़ा ही दिलचस्प किस्सा बयान किया गया है। कैसे ऊंचे टावरों के ज़रिये दूर-दूर तक अंधेरे सुनसान सड़कों को रोशन किया जाता था ताकि सब पर निगाह रखी जा सकती। इसी की प्रक्रिया में एक लेखक का ज़िक्र है जो लिखता है कि- अब एक निशाचर,भयानक,ग़ैर दुनियावी,मानवीय आंखों के लिए अप्रीतिकर नए किस्म का शहरी तारा रात भर चमकता है। दुस्वपन के लिए एक लैम्प। इसके जैसी रोशनी सिर्फ क़त्ल और सार्वजनिक अपराधों पर ही पड़नी चाहिए। दहशत को बढ़ाने वाली दहशत के बतौर। अन्त में मानव सभ्यता रात पर विजय प्राप्त कर लेती है। रात का मतलब बदल जाता है। रंगमंच की दुनिया रोशनियों से आबाद हो जाती है। रोशनी को लेकर तमाम प्रयोग होते हैं और ड्राइंग रूम के भीतर क्या बदलाव आता है,इन सब का बारीक अध्ययन किया गया है। किताब के पिछले पन्ने पर ठीक ही लिखा है कि हर अच्छे इतिहास की तरह ये एक साथ आर्थिक, तकनीकी, सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक दास्तान है। बल्ब के बनने और इसके इर्द गिर्द समाज,सत्ता और उद्यम,नगर सबके संबंधों में आए बदलाव की कहानी। पुस्तक को पढ़ते वक्त संगीत निकलता है।

बेतिलिस्म रातें का अंग्रेजी नाम है- Disenchanted Night-The Industrialisation of light in the nineteenth century। मूल लेखक हैं वुल्फगैंग शिवेलबुश। जर्मन में ये किताब आई है। हिन्दी में अनुवाद योगेंद्र दत्त ने किया है और संपादन का काम किया है रविकांत ने। बढ़िया अनुवाद है और इसे भारतीय परिप्रेक्ष्य में पेश करने के लिए रामवृक्ष बेनिपुरी की कथा का इस्तमाल भूमिका में किया गया है। ताकि हिन्दी के पाठक पहला पन्ना खोलते ही बिजली के इस सफर को अनुभवों से जोड़ने लगें। बेनीपुरी 1949 में लिखते हैं कि मशाल ज्योति का प्रतीक है। वह ज्योति जो हमारी मुट्ठी में है। अकबर इलाहाबादी का एक शेर है-

बर्क़ के लैम्प से आंखों को बचाए अल्लाह।
रोशनी आती है और नूर चला जाता है।।

पढ़ियेगा इस किताब को। वाणी प्रकाशन ने छापा है। ढाई सौ रुपये की है। बढ़िया प्रोडक्शन है।

13 comments:

रंजन said...

आप खुद तो पढते ही हैं ...हमें भी पढवाते हैं :)यह एक बहुत ही अच्छी बात है !

याद है होस्टल में - रात १२ बजे से पढाई शुरू और २ बजे बंद और हल्ला हो गया ..'फलनवा' रात भर पढ़ा है :)

-Ranjan

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

देखते हैं इस किताब को पढ़कर.

हिमाचली said...

उत्सुकता जगी है।

Shishir singh said...

ये वाकई में सच है कि हम उन लोगों को बहुत बड़ा हौव्वा मानते हैं जो रात भर जगकर पढ़ते हैं। दरअसल मुझे लगता है कि हमारे यहां किसी खराब या बुरी आदत को अब इस तरह से वर्णन करने की परंपरा चल निकली है कि ऐसा लगने लगता है कि इन्हें न अपनायेंगे तो लोग हम देहाती कहेंगे (अब यही देख लीजिए कि देहाती भी लोगों को एक गाली लगती है।। आप फेसबुक या ऑरकुट पर युवाओं के स्लोगन देखिये वॉलपेपर देखिये बड़ी शान से लिखा होता है "break the rools bcos its made for break","rools are for fools" ऐसे कई स्लोगनों की भरमार है। मैं अभी विद्यार्थी हूं तो एक अनुभव और बताता हूं कि हम किसी के मुंह से ये सुनकर या लोगों को सुनाकर बड़ा रोमांच अनुभव करते हैं कि हमने सिर्फ कल रात ही पढ़ा और पेपर देने चले आये। कहीं पढ़ा था कि सच लंगड़ा होता है और झूठ एथलीट होता है इसलिए वह सच से आगे निकल जाता है। कुछ यही हाल बुरी आदतों का है।

Shishir singh said...

नया ज्ञानोदय के मीड़िया विशेषांक में छपे मैक्लूहान के सिद्धांतों और थ्योरी में लिखा भी है कि तकनीक हमें सक्षम कम और कमजोर ज्यादा बना रही है। बिजली के आने से हमारे आंखो पर भी असर पड़ा है इसी तरह मोटर साइकिल व कार के आने से हमारे पैरों की शक्ति वह नहीं रही जो हमारे पूर्वजों में पायी जाती थी। इसलिए लोग अब मार्निंग वॉक और अन्य चीजों का सहारा लेते हैं।

विनीत कुमार said...

रांची के निवारणपुर में मैं जिस घर में रहता था उसके ठीक सामने एक अपार्टमेंट था। मैं भी रात में पढ़ता। फिर देका कि मेरे कमरे की रोशनी बुझने के बाद सामने की फ्लाईट की रोशनी बंद हो जाती है। मैंने ध्यान देना शुरु किया कि जब मैं एक बजे बंद करता हूं तो वहां भी एक बजे,मैं दो बजे बंद करता हूं तो वहां भी दो बजे। बाद में पता चला कि इस कमरे में एक लड़की रहती है जो कि मेडिकल की तैयारी करती है। मुझे क्या बदमाशी सूझी,मैं रातभर लाइट जलाकर छोड़ देता। कुछ गार्जियननुमा दोस्तों से पता चला कि उसका सचमुच मेडिकल में सेलेक्शन हो गया और हम कहां हैं और क्या कर रहे हैं देख ही रहे हैं।..
पिछले दस दिनों से रात में जागना बंद कर दिया हूं। आठ साल की रुटीन और आदत से तौबा-तौबा करने की कोशिश। इस डर से कि आंखों के नीचे रिंक्लस आने लगे हैं औऱ रात में भूख लगती है तो पढ़ाई न होकर मन भटकता है। अब सुबह उठना अच्छा लगता है। कोई कहे तो कहे कि सबेरे सो जाता है,एकदम से नहीं पड़ता,क्या फर्क पड़ता है। एक थीसिस ही तो जमा करनी है,कौन सी यूपीएससी करनी है..या इम्प्रेशन झाड़ना है।..

इस किताब का परिचय जब रविकांत सराय के दस साल होने के मौके पर दे रहे थे तो मैं भी वहां मौजूद था। मुझे ये किताब साहित्य और इतिहास के बीच की आवाजाही करती हुई लगी।

रविकान्त said...

शुक्रिया रवीश,

इस किताब का समाद और लोगों तक पहुँचाने के लिए. उम्मीद है लोग इसे पढ़ेंगे, और भविष्य में इससे बेहतर इतिहास लिखेंगे.

बहरहाल, रात में पढ़ने की बात हो रही है, मैं भी बहती गंगा में हाथ धो लूँ. जब भी ज़्यादा पढ़ता हूँ, या लिखता हूँ तो रात में ही. ये आदत स्कूल के आख़िरी दिनों में पड़ी, जो अब थोड़ी छूट-सी रही है, क्योंकि सुबह उठने का दबाव बढ़ गया है.

मुझे अपना पहला पढ़ाकू रतजगा याद है. दसवीं बोर्ड के दिन थे, सोचा आज ऑल-नाइटर मारते हैं. किताब चुनी साहित्य-सरिता, क्योंकि कुछ और पढ़ता तो शायद सो ही जाता. सारी कहानियाँ, सारे लेख, सारी कविताएँ पढ़ते-पढ़ते वाक़ई सुबह हो गई. ख़ुद पर थोड़ा फ़ख़्र भी हुआ कि मैं भी मेहनत कर सकता हूँ! वरना विद्यार्थी मैं ऐसा होता था जिसकी तैयारी ख़त्म होने से पहले ही अक्सर इम्तेहान आ जाते थे! वैसे मैँ ऐसे लोगों को भी जानता हूँ, जिनका (उपन्यास) पढ़ना लुक-छिपकर ग़ुसलख़ानों में होता था. जब हम गाँव पर होते थे, जहाँ बिजली अभी ही आई है - तो लालटेन जलाना लगभग उतना ही दिलचस्प काम होता था जितना किसी ख़ास मौक़े पर किसी दक्ष इंसान को पेट्रोमैक्स जलाते हैरत से देखना. पेट्रोमैक्स जिसे रेणु पंचलैट कहते हैं, और जिसे हमारे यहाँ डिलैट कहा जाता था! याद है जब पहली बार बिजली आई थी तो कैसा उत्साहातिरेक था हमारे गाँव में: ठंढा तार, गरम तार, अर्थिंग, करेन्ट, चालीस वॉट, सौ वॉट, 'ट्रान्सफर्मा', लैन जैसे कितने अल्फ़ाज़ बजबजा उठे थे. फिर तो भाई लोगों ने अँकुसी(टोकस) फँसा के लाइन लेनी शुरू कर दी और बिजली रूठ कर चली गई. गाँव वापिस अँधेरे के रूटीनी तिलिस्म में खो गया था. कालंतर में खंभों और तारों का इस्तेमाल यार लोगों ने पुल बनाने में कर लिया. अब फिर आई है, उम्मीद है रहेगी, वैसे सौर-ऊर्जा ने दबे पाँव दस्तक दे दी थी, और अब भी जहँ-तहँ प्रकाश कर रही है.

शिवेलबुश अच्छे लेखक हैं, वे, जैसा कि विनीत ने कहा, साहित्यिक शैली में इतिहास लिखते हैं, औपचारिक अकादमिक माहौल से बाहर रहकर उन्होंने तकनीकी इतिहास पर कई अच्छी किताबें लिखी हैं. उनकी रेलवे जर्नी भी काफ़ी दिलचस्प है, और योगेन्द्र दत्त का किया अनुवाद संजय शर्मा और हमारे संपादन में सराय और वाणी प्रकाशन से जल्द ही छपेगा, तब तक हम लोगों को यह किताब ख़त्म करके उस पर संवाद का मौक़ा देते हैं.

रविकान्त

JC said...

आपने सार लिख ही दिया,""...और जो पटना में हो रहा है वो तो कोई डेढ़ सौ साल पहले पेरिस में हो चुका है।..."

उपरोक्त शायद 'प्रकृति' की कार्य प्रणाली, यानि तथाकथित 'काल-चक्र', को दर्शाता है,,,अथवा इस निरंतर परिवर्तनशील जगत में "घूरे के भी दिन फिरते (दीखते) हैं", जैसा प्राचीन ज्ञानी ने गहराई में जा समझा, नक़ल चल रही है: पहले पूर्व की पश्चिम द्वारा, और फिर दुबारा वो ही अज्ञानतावश पश्चिम की पूर्व द्वारा (सौ डेढ़ सौ वर्ष बाद) उसीको दोहराना किन्तु सही नक़ल न होने के कारण 'कुछ नया'!!! ...१९६१ (?) में जो बुराइयां अमेरिकेन एम्बेसी के तत्कालीन मुख्य सांस्कृतिक अफसर के मुंह से वहां के मूल निवासियों के बारे में सुनी वो अब यहाँ भी अपनाए जाते देखने को मिल रही हैं - शायद कलियुग के प्रभाव से :)

राकेश पाठक said...
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विनीत कुमार said...

राकेशजी,कभी-कभी चक्रधर की चकल्लस पर भी कमेंट मार आइए,वहां बहुत अच्छा प्रोत्साहन मिलेगा और अगर सानिध्य मिल जाए तब तो बेड़ा पार। सुना है उस मंडली का रेट बहुत हाय होता है और इक्वल-इक्वल भी बंटता है।..

राकेश पाठक said...

विनीत जी, घायल हो गए लगता है। पर भाई निमंत्रण पत्र पर नाम रविश जी का था आप खामखां दिल पर ले बैठे। वैसे लिखते अच्छा है लिखते रहिए। आपको जानने के चक्कर में आपका ब्लॉग घूम आया अच्छा लिखते हैं। बुरा लगा कुछ तो माफ करिएगा। बाकि फोटो में खुद को मत दिखाइए, लोगों को भी देखिए। कैमरे को फेस करते तो अकड़ू नज़र नही आते आपको मेरी शुभकामनाएं।

Sarvesh said...

Mere gaon me ek ladka tha wo raat me laalten ka kirosene tel gira deta tha :-). Ghar waale samajhte the ki raat bhar padhai kiya hai pura Tel khatam kar diya. Hum logo ko daat padati thi ki dekho ek wo hai kitni padhai karta hai. Ek din ooski Chori pakadi gai.

विनीत कुमार said...

हा हा,राकेशजी। ये तस्वीर करीब पच्चीस लोगों के बीच ली गयी है। सब लाइन से ब्लॉगर मीट में बैठे हुए थे।..इसलिए अकड़ू लगने लगा। बाकी बातों के लिए शुक्रिया,हमने बात दिल पर नहीं लिया,हमें तो आपकी तुकबंदी ये कमेंट करा गया।..