सुधीश पचौरी न रवीश कुमार

बहुत दिनों से जो बात कहना चाह रहा था उसे किसी युवा पत्रकार ने कह दिया। साफ-साफ कह दिया कि हम किससे प्रेरणा लें। हिंदी में कोई नहीं है। न रवीश कुमार से प्रेरणा ले सकते हैं न सुधीश पचौरी से। मेरी तो अभी सीखने की उम्र भी खतम नहीं हुई है और जो काम किया है वो निहायत ही शुरूआती है तो प्रेरणा क्या दूंगा। खैर ये सफाई नहीं हैं। सहमति है। यही बात जब मैंने एनडीटीवी के मीडिया स्कूल में कही थी तो लगा था कि कुछ ज़्यादा बोल गया। अब कह सकता हूं कि कई लोग ऐसा ही सोचते हैं। एनडीटीवी के मीडिया स्कूल में नए छात्रों से मैं कहने लगा कि हिदी टीवी पत्रकारिता में ऐसा कोई भी नहीं है,जिसकी तरह आप बनें। हम सब औसत लोग हैं। औसत काम करते हुए बीच-बीच में लक बाइ चांस थ्योरी से कभी-कभार अच्छा भी कर जाते हैं। लेकिन हम सब टीवी के लिहाज़ से मुकम्मल पेशेवर नहीं हैं। मैं छात्रों से गुज़ारिश कर रहा था कि मेरी बात याद रखियेगा। किसी से न तो प्रभावित होने की ज़रूरत है न प्रेरित। आप अपना रास्ता खुद तय करें और तराशें। लौट कर आया तो लगा कि कहीं ये संदेश न चला गया हो कि बंदा निराश हताश टाइप का है। लेकिन जब एक लड़के ने खम ठोक कर यह बात कह दी तो लगा कि वाह। मूल बात तो यही है।

दूरदर्शन के कार्यक्रम 'चर्चा में' की रिकार्डिंग चल रही थी। प्रभाष जोशी को याद किया जा रहा था। आईएमसी और अन्य पत्रकारिता संस्थान के छात्र थे। काफी जोश और ज़िम्मेदारी से बोले। उनकी बातों से हमारे पेशे में आए खालीपन को महसूस किया जा सकता था। वो अच्छा पत्रकार बनने के लिए बेचैन नज़र आए लेकिन वो सब वैसा ही क्यों बनना चाहते हैं जो पहले हो चुका है। वो किसी की तरफ देखते ही क्यों हैं। अगर यह नई पीढ़ी अपने जोश को बचा ले गई और मेहनत से काम को तराशती रही तो अच्छा कर जाएगी। दफ्तरी आशा-निराशा के चक्कर में फंस गई,छुट्टी लेने के लिए दादी-नानी को बीमार करती रही,वो नहीं करता तो मैं क्यों करूं टाइप की अकड़ पालती रही तो वही होगा जो हमारी पीढ़ी का हुआ। और ऐसा भी नहीं है कि हमारी पीढ़ी में लोगों ने साहसिक काम नहीं किये। बेहतर टीवी रिपोर्ट नहीं बनाई। बनाई। लेकिन जो हो रहा है उससे सबके किये कराये पर पानी फिर चुका है। बहरहाल नवोदित पत्रकारों की चिंताओं से लगा कि आज भी हिंदी का पत्रकार इसीलिए पत्रकार बनना चाहता है कि वो समाज में बदलाव चाहता है। गरीबों की आवाज़ उठाना चाहता है। कितनी बड़ी बात है। फिर ऐसा क्या हो जाता है कि नौकरी पाने के बाद कोई इस जुनून को साधता हुआ नज़र नहीं आता। यही प्रार्थना है कि इनका जुनून बचा रहे। यह कार्यक्रम शनिवार को आएगा। विद्रोही बुलंद पत्रकार को साधुवाद।

31 comments:

सुशीला पुरी said...

mai dekhungi.....sachmuch aisa karne waale bahut kam log hain.

SACHIN KUMAR said...

SACHIN KUMAR
बात तब कि है जब पत्रकारिता का छात्र था। अक्सर बड़े-बड़े लोग आते थे। कभी आलोचक नामवर सिंह तो कभी सुधांशु रंजन।टीवी और प्रिंट के कई पत्रकार। मुझे याद है जब सुधांशु रंजन पहुंचे तो छात्रों की खुशी का ठिकाना ना था। उनकी वो स्टाइल मैं सुधांशु रंजन...से...के सब कायल थे। खैर लेकिन जब छात्रों ने सवाल शुरू किया तो सुधांशु भी निराश हुए. वहीं लालू,नीतीश पर बहस का दौर। आप उस ख़बर पर ऐसे बोल गए और उस पर ऐसे। आप भी पक्षपात करते है। तब मैंने एक सवाल किया...आज के युवा पत्रकार क्या करे ताकि लंबे समय तक पत्राकारिता में सफल हुआ जाए साथ ही ये भी बताए कि हम किनको पढ़े..किनको FOLLOW करे। तब मंच पर बैठे लोगों ने कहा कि ये पहला बेहतर सवाल आया। सुधांशु ने जवाब दिया कि यहां टिके रहने के लिए हर दिन बेहतर करना पड़ता है। दूसरे सवाल के जवाब में उन्होने कहा कि ये आपकी पसंद पर है,आप किसे पढ़ना चाहते है, किसकी तरह बनना चाहते है. जब क्लास खत्म हो गई बाद में हमे कहा गया कि सुधांशु जी की क्लास पर एक ख़बर लीखिए...मैं भी अपने सवाल का जवाब भूल गया था..और मैंने भी उसी लालू-नीतीश मामले को INTRO बनाया। शिक्षक ने मना कर दिया। फिर एक छात्रा ने मेरे वाले का सवाल का जवाब बताया और उसे पूरे क्लास ने फाइनल किया। ये बेहतर है।
दफ्तरी आशा-निराशा के चक्कर में फंस गई,छुट्टी लेने के लिए दादी-नानी को बीमार करती रही,वो नहीं करता तो मैं क्यों करूं टाइप की अकड़ पालती रही तो वही होगा जो हमारी पीढ़ी का हुआ। उम्मीद करे ऐसा नहीं होगा। निश्चित तौर से इस पीढ़ी से हमे कदम-कदम पर मदद की दरकार होगी। ताकि हिंदी की पत्रकारिता अपने मकसद,मंजिल तक पहुंच सके।

गिरीन्द्र नाथ झा said...

रवीश कुमार,पर्दे का अलग चेहरा,तब भी हम उनसे प्रेरणा लेना नहीं चाहते हैं। यह बात हम भी पढ़ाई के दौरान कहा करते थे, उस समय जब रवीश स्पेशल रिपोर्ट में एक से बढ़कर एक रिर्पोट दिया करते थे। यह नवोदित पत्रकारों की हताशा नहीं है बल्कि उनका नजरिया है। दरअसल हमें कभी कभार ऐसा लगता है कि हम खुद से ही प्रेरणा लें। क्योंकि दिन में एकबार तो ऐसा जरूर करने का मन करता है कि समाज के लिए कुछ करें (जो अक्सर नहीं होता है।) मैं ईमानदारी से स्वीकार करता हूं कि दफ्तरी आशा-निराशा के चक्र में भी गांव के लिए कुछ काम कर रहा हूं। अनुवादी और गूगली (इंटरनेट)पत्रकारिता करते हुए भी जोश को बचाने में जुटा हूं. वैसे यह भी सच है कि नौकरी करते हुए इस जोश को बरकरार रखना कितना कठिन होता है। खैर, सच बोलने में कैसी लाज..

सचिन .......... said...

रवीश भाई बात सो सही है, लेकिन अति भी है। सिर्फ इसलिए कि हमें पहले जैसा नहीं होना है। नई लीक बनानी है, तो पुराने को खारिज कर दो यह एक किस्म का चालूपन है। असल मुद्दा उस तबके की बात करना नहीं है, बल्कि निचले तबके के बीच जाने की है। आज जिन युवाओं में आप संभावनाएं देख रहे हैं, निश्चित रूप से उनमें इस बेचैनी को औजार में बदलने की योग्यता होगी। लेकिन आप पूरा पत्रकारीय सिस्टम देखिए, जिसमें वे पहले ट्रेनी बनेंगे उसके बाद दो तीन संस्थानों में नौकरियां करने के बाद खाने कमाने लायक होंगे। इस बीच जो उनके कन्सर्न है, वे बदल जाएंगे और मध्यवर्गीय चरित्रों के उठाव की तरह अपनी दुनिया और जगह में दिलचस्पी लेंगे।
पिछले दस सालों में आई बेचैन पीढी के लिजलिजा होने की दिलचस्प कथा को आप बेहतर ढंग से जानते ही हैं। लेकिन फिर भी भूत से भविष्य बेहतर होता है इस उम्मीद के साथ
सचिन

ravishndtv said...

सचिन

जो आप कह रहे हैं वो तो होगा। हो रहा है। लेकिन बेचैनी पूरी की पूरी खत्म हो जाएगी मुझे नहीं लगता। तब तो बेचैनी झूठी है। आप अपने लिए पूरी सड़क की मांग क्यों करते हैं। चलने के लिए पगडंडी काफी है। टीवी में कह सकता हूं( अगर दंभी न लगूं तो) कि अस्सी फीसदी नए पुराने पत्रकारों को मालूम ही नहीं है कि एक मिनट की स्टोरी को कैसे प्रभावशाली बना दें। सिर्फ एलान कर देने या कन्सर्न रखने से कुछ नहीं होगा। ज़रूरत नहीं है। उसे व्यक्त करने का अभ्यास और आनंद चाहिए। बाकी व्यवस्था और पतन की प्रक्रिया चलती रहेगी। आज भी हिंदी न्यूज़ चैनलों में कम से कम पचास फीसदी रिपोर्टिंग तो होती है। बहुत कम रिपोर्टर मिलेंगे तो स्टोरी के साथ न्याय कर पाते हैं। टीवी में तस्वीरों से कथा नहीं कह सकते तो आप शायद अखबार के लिए बने हैं। वहां बौद्धिकता का अक्षरीय स्पेस है। यहां बौद्घिकता का दृश्य चाहिए।

उम्मीद है मैं अपनी बात ठीक से कह पा रहा हूं। कोई मालिक आपको प्लेट पर सजा कर नहीं देगा।
आधे से ज़्यादा रिपोर्टर को मालूम नहीं कि ओबी में क्या बोलना है। मालूम नहीं कि मेट्रो की रिपोर्टिंग करने जा रहे हैं तो कैमरा खिड़की से बाहर भी घूमेगा या सिर्फ रिपोर्टर पर रहेगा। जो माध्यम की ज़रूरत है उसी के लायक नहीं बनेंगे तो अपनी बेचैनी को व्यक्त करने के मौके खो देंगे।

इसीलिए कहता हूं टीवी में वो चलेगा जो पढ़ेगा लेकिन उससे भी ज़्यादा देखेगा। हज़ार किताबें पढ़ी हों लेकिन आप किसी स्पॉट को नहीं तुरंत कई तरह से नहीं देख पाते हैं तो कैमरे का इस्तमाल ही नहीं कर पायेंगे। और जब किनारे कर दिये जायेंगे तो रोयेंगे कि पत्रकारों की कद्र नहीं है।

आप जब टीवी में आ रहे हैं तो ये नज़र ले कर आइये। मेहनत से मेरा तात्पर्य ये है। बेचैनी होगी तो वो मेहनत इस दिशा में करेगा। खुद को साधेगा। माध्यम के अनुसार। मुझे पहले ही साफ कर देना चाहिए था कि मैं अक्सर टीवी पत्रकारों के बारे में ही बात करता हूं। एक मिनट की रिपोर्टिंग का स्पेस बहुत है। बाकी चैनल पर क्या होता है भूल जाइये। उस एक मिनट में अगर हर रिपोर्टर बेहतर और प्रभावशाली होने लगे तो माध्यम का चेहरा अपने आप बिना किसी हस्तक्षेप के बदल जाएगा। गप्पबाज़ी और सही चिंताओं के सिर्फ व्यक्त कर देने से नहीं होगा।

JC said...

रवीशजी, में न तो पत्र हूँ न पत्रकार किन्तु क्यूंकि मैं पढता हूँ और देखता हूँ और थोडा दिमाग भी शायद रखता हूँ तो मेरे विचार से प्रश्न होना चाहिए कि कोई क्या और किसके लिए कर रहा है - किसी भी क्षेत्र में?
यह शायद सर्व-विदित सत्य है कि हर कोई बचपन से नक़ल ही करता आया है...और कुछ शिष्य गुरु से आगे निकल जाते हैं/ जा भी सकते हैं, शायद जिसमें हाथ 'लक बाई चांस' का ही अधिक होता है ;)

चन्दन कुमार said...

ये बात सही है कि कुछ लोग सुधीश तो कुछ रवीश भी बनना चाहते हैं, लेकिन एक बड़ा हुजूम ऐसा है जो अपनी पहचान और मुकाम ख़ुद तय तकना चाहता है. वह न तो प्रभाष जी क़दमों पर चलना चाहता है और न ही एस पी सिंह के, हालांकि ये सभी हमारे पुरोधा और अगुवा ज़रूर हैं, जिन्होंने पत्रकारिता को एक नई दशा और दिशा दी है. फिर भी ये कहना होगा कि चंद मीडिया पीड़ित लोग इन बातों को जस्टीफाई करने लगते हैं. ऐसा करना शायद उनकी मजबूरी भी है, वे इसके आगे अपना भविष्य ही नहीं देख पाते.
आज ख़ुदगर्ज कोई भी मौजूदा दौर के किसी पत्रकार जैसा नहीं होना चाहेगा, उनमें मायूसी,हताशा और कुंठा इतनी घर कर गई है कि उनकी कथनी करनी में फ़र्क करना मुश्किल हो जाता है.

अजित वडनेरकर said...
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अजित वडनेरकर said...

उस पत्रकार की बात भी कुछ हज्म नहीं हुई रवीश भाई और उसे इतना तूल देना भी। हालांकि कि जानता हूं, जो कहना चाहते हैं, उसे कहने के लिए आपको यही छोटे-छोटे मौके तलाशने होंगे, वर्ना बात अकादमिक हो जाएगी। सो, अच्छा भी लगा। न तो रवीश पत्रकारिता का एक छोर हैं और न सुधीश दूसरे। मुहावरेनुमा इस वाक्य में इन दोनों मीडियाकर्मियों के नामों का प्रयोग यह साबित करता सा लगा जैसे इनके बीच में पत्रकारिता का ब्रह्मांड बसता हो!!! युवा पत्रकार को अपनी दृष्टि का विस्तार करना होगा। लगातार और निरंतर संवाद रखे, कुछ ज्ञान-चक्षुओं में चेतना जागृत करें तो रवीशकुमार और सुधीश पचौरी दोनों में ऐसा बहुत कुछ है जो युवा पत्रकारों को प्रेरित करता है।

महत्वपूर्ण बात यह कि पत्रकारिता संस्थानों से निकलते छात्र खुद को कितना इसके (प्रिंट या टीवी) अनुकूल बना रहे हैं? टिकर पर चलती खबर को कट-पेस्ट कर देना और ले आऊट सजा देना अथवा उसके आधार पर बाईट ले कर स्टोरी काट देना या पीटीसी की गुंजाइश निकाल लेना ही पत्रकारिता है? चाहे अंग्रेजी का हो, या हिन्दी का, अगर दशहरे की रिपोर्ट में मेघनाद को मेघनाथ लिखे और उच्चारे तब यह मामला भी पत्रकारिता का ही बनता है। इतिहास, भूगोल के प्रति जैसी उदासीनता नज़र आती है, वह सचमुच चिंता जगाती है। पत्रकारिता करने के लिए जो घटित हो रहा है, उसका सिर्फ कवरेज अपने आप महत्वपूर्ण नहीं बन जाता। रवीश जिस एक मिनट की बात कर रहे हैं उसमें ये सब चाहिए। जिस आइसिंग आन द केक डिफरेंट फ्लेवर की बात हमेशा होती है, वह दरअसल खोमचे और रसोई का फर्क ही तो है? फ्लेवर और सजावट के पीछे जो तत्व हैं वे इतिहास और भूगोल से निकल कर भी आते हैं। आज सिर्फ पेजथ्री की शब्दावलियां याद रखी जा रही हैं।

तथ्यों की पड़ताल के लिए आज इंटरनेट जैसा सर्वसुलभ साधन है, पहले नहीं था। इसके बावजूद इसका उपयोग करने की ललक नए पत्रकारों में कम है। आठ-नौ घण्टे न्यूज़ रूम में मशीनी मारामारी का माहौल अगर इनमें यह ग़लतफ़हमी पैदा करता है कि पत्रकारिता हो रही है, तो ग़लती इनकी भी उतनी नहीं है। पर एक जिम्मेदार पेशे में आने से पहले की तैयारी तो कहीं नहीं दिखती। सिर्फ इंजेक्शन लगाते आना अगर इलाज की योग्यता है तो यह काम कम्पाऊंडर से लेकर सर्जन तक कर लेते हैं। न्यूज रूम में सतत संवाद संवाद करने वाला पत्रकार ही चाहिए। अगर वैसा नहीं है तो खुद से संवाद हो। यह तभी होगा जब आप पत्रकारिता के मायने सही समझने लगेंगे। बीट, डेस्क, शिफ्ट, टीवी, प्रिंट के दायरे से बाहर टहलती है पत्रकारिता।

न कहें कि सिस्टम में खामी है। बिना हाहाकारी रिपोर्ट लिखे भी आप पत्रकार बने रह सकते हैं। क्या हमने सोचते हैं कि सर्वप्रथम तो संवाद का माध्यम भाषा ही है। खाने की थाली में कंकर जैसे खटकता है वैसे ही खबरों की थाली में अशुद्धियां भी कंकर हैं। शर्मनाक है कि ये कंकर बीने नहीं जा रहे हैं। रोज ये आंखों और कानों में चुभते हैं। क्या भाषा पत्रकारिता का हिस्सा नहीं है?

बहुत सारे मुद्दे हैं-अभी इतना ही। हमेशा की तरह अच्छी पोस्ट।

शशांक शुक्ला said...

अरे रविश जी जिन बच्चो के आगे आप बोलने गये थे वहां के कॉलेज की फीस इतनी है कि विनोद दुआ भी उनके सामने पढ़ाने आ जाये तो उनसे सीखने को नहीं आयेगा क्योंकि उनके लिये ये सब मायने नहीं रखता, और वहां पढ़ने आने वाले इतने उंचे घराने के होते है कि उन्हे आप लोगों से खास मतलब नहीं होता है। क्या कहूं एनडीटीवी के स्कूल की फीस इतनी ज्यादा है कि आम छात्रों की औकात ही नहीं है आपसे सीखने की क्योंकि फीस जमा नहीं करवा सकते।

Toon India said...

completely agree with you..channels like India Tv have completely degraded hindi journalism.

मधुकर राजपूत said...

विद्रोह क्या करेगा, लात मारकर सड़क पर फेंक दिया जाता है, सारी पत्रकारिता घुसड़ जाती है। बॉस कहता है ज्ञान मत बांटो पैकेज लिखो। अबे ये कोई खबर है। कहां से उठा लाते हो। नहीं मानोगे तो मुंह पर नौकरी खाने की धमकी देते हैं। बॉस, नौकरी खाने की मशीन भर रह गए हैं, मार्गदर्शक नहीं। खुद इतने इनसिक्योर हैं कि किसी मुद्दे पर चर्चा करना ही नहीं चाहते। सब ग्राफिक्स और विंडो पर ज़ोर देते हैं। विज़ुअल नहीं है तो यूट्यूब ज़िंदाबाद। कोई एनालिटिकल पैकेज लिख दो किसी का मर्मांतक अंत कर दो, तो सुनो झिड़की। "ज्ञान मत बांटो" टीवी का मूलमंत्र है। सैम पित्रोदा कहां हो इन्हें फांसी लगवा दो। ये ज्ञान के, संवोदनाओं के दुश्मन हैं।

सचिन .......... said...

रवीश जी आप वही बात कह रहे हैं दूसरे सिरे पर खडे होकर। जो पढेगा देखेगा और फिर समझेगा वह बेहतर कर पायेगा। बेहतर रच पाएगा। इसमें किसी को आपत्ति नहीं। मेरा कहना महज इतना है कि न्यूज रूम के पिछले दो दशकों के वातावरण ने अधिक देखने पढने की जगह खत्म की है। जाहिर है इसके राजनीतिक निहितार्थ हैं। आप देख ही रहे होंगे कि प्रिंट और टीवी दोनों ही न्यूज रूम में पढने लिखने की आदतों वाले लोग कम होते जा रहे हैं।
सही है कि महज चिंताओं के साथ कुछ नहीं होने वाला। लेकिन इसके लिए चिंताएं भी न करने का तर्क मुझे कमजोर ही नहीं बेवकूफाना भी लगता है।
जहां तक कम में बेहतर, यानी खूबसूरत रचने की बात है तो उसके लिए प्रिंट में भी कोई पेज स्वाहा नहीं हो रहे। विज्ञापन और यशोगान से भरे अखबारों में एक एक कॉलम की खबरों के लिए झगडना आम बात है।
प्रिंट और टीवी को मैं अलग अलग नहीं देख पाता, क्योंकि मैं पत्रकारिता को देखता हूं। कथ्य के तरीके तो अलग होंगे ही। फिर लिखे हुए भी ब्लॉग और अखबार को बांटा जा सकता है। इस किस्म के बंटवारे में मेरी रुचि नहीं।

विनीत कुमार said...

iimc से निकलेवाली पत्रिका के लिए आनंद प्रधान ने मुझ कहा कि कुछ लिखिए। इसके पहले भी मैंने एफ.एम चैनलों की हिन्दी पर एक लंबा लेख लिखा जो कि मेरे एम.फिल् के काम का ही एक हिस्सा है। अबकी बार मैंने सोचा कि क्यों न अपनी जबरदस्ती की बौद्धिकता झाड़ने के बजाय कुछ ऐसा लिखा जाए कि लगे कि सचमुच अपने मन की बात लिखी गयी हो। मैंने लिखा- पाठ्यक्रम और चैनलों के बीच झूलते नए मीडियाकर्मी। उसमें मैंने उसी जज्बे को समझा है औऱ अपनी बात कहने की कोशिश की है कि हर नया मीडियाकर्मी समाज को बदलना चाहता है,कुछ बेहतर करना चाहता है लेकिन चैनलों में घुसते ही उसके सोचने का क्रम बदल जाता है। क्या ये सिर्फ संस्थानों की दिक्कतें हैं या फिर पाठ्यक्रम में पत्रकारिता को अतिशय सामाजिकता में लपेटकर पढ़ाए जाने की कोशिशें। निजी संस्थानों से 2-4 लाख की फीस देकर निकलनेवाले मीडियाकर्मियों का सरोकार वही होगा जो कि iimc या फिर दूसरे संस्थानों से निकलनेवाले लोगों का है या होता है। इसका एक पक्ष ये भी है कि पाठ्यक्रम के मुताबिक जमीन खोजने और तैयार करने की गुंजाइश कहां तक है? पूरे लेख में मैंने कहीं भी निष्कर्ष तौर पर कुछ भी कहने से अपने को रोका है लेकिन मुझे लगता है कि इस मसले पर आगे भी बात होनी चाहिए। अब देखिए कि वो लेख किस रुप में आता है?

JC said...

मैं एक आम आदमी हूँ जो टीवी देखता है कई वर्षों से और कुछ उपेक्षा करता है टीवी चैनलों से...किन्तु जो भी चैनल हमें उपलब्ध कराये जाते हैं, (० से ९९ तक - जिसमें कुछ डुप्लीकेट भी होते हैं), वे हमारी आवश्कता पूर्ती में असफल दीखते हैं, यद्यपि जब दो से १०० चैनल दिखाई जाने की खबर मिली थी तो आशा बढ़ी थी...जैसे २४ x ७ की मजबूरी के कारण सारा दिन एक ही समाचार १०० बारी देखने को मिलता है, और वो भी हर चैनल में, एक्सक्लूसिव! शास्त्रीय संगीत, जो मुझे पसंद है, वो तो एक दम कब्र में दफना दिया गया लगता है! ...ऐसे कई उदाहरण आपको मिलेंगे, जो मनोरंजन/ ज्ञान-वर्धन के स्थान पर निराशाजनक वातावरण बनाने में सहायक प्रतीत होते हैं...थोडी बहुत कमी किन्तु विदेशी चैनल पूरी कर देते हैं जिसमें 'भारत' असफल रहा है और सदैव बाहर की ओर देखता प्रतीत होता है, भले ही वो भाषा ही क्यूँ न हो :)

SACHIN KUMAR said...

SACHIN KUMAR

एक अच्छी बहस चल रही है। हालाकि कुछ लोगों की तर्कों से मैं सहमत नहीं हूं। मेरी नज़र में आज क्या पत्रकार कुछ ऐसे है। वो कोई भी ख़बर पहले ब्रेक करना चाहते है। और VISUAL सबसे पहले PLAY करना चाहते है...EXCLUSIVE TAG के साथ...वो ख़बरों से खेलना चाहते है। LIVE,PHONE,BREAKING,EXCLUSIVE. वो किसी चैनल पर ख़बर आने के बाद ब्रेक करने पर बहुल गुस्साते है। चीखते है, चिल्लाते है। हमें कोई नहीं पहले पता चला। कभी कभार इस जल्दबाजी में CONFIRM करने की भी जरूरत नहीं महसूस करते। JUST GO FOR THAT. बड़ी ख़बर के दूसरे चैनल पर आने के तुरंत बाद वो इसकी जानकारी FIELD से मांगते है। कभी मिलने पर और कभी उससे पहले ही शुरू हो जाते है। वो तुरंत प्रसिद्ध होना चाहते है। EXCLUSIVE ख़बरों के पीछे रहते है। भले ही इससे किसी का फायदा हो रहा हो या नहीं। हाल ही में SWINE FLUE का कहर देश ने झेला। इसी वक्त जामताड़ा,झारखंड में मौजूद एक पत्रकार से मेरी बात हुई। मैंने पूछा क्या कर रहे है आजकल। उन्होने कहा बस ऐसे ही है। छोटी जगहों से बड़ी ख़बर कहां से निकालू। फिर मैंने स्वाइन के बारे में बताया और पूछा कि वहां कोई मरीज मिला है क्या। उन्होने कहा अरे भाई क्या बात कर रहे हो। फिर मैंने पूछा भाई ऐसा क्यों कह रहे हो। कुछ महीने बाद उन्होने बताया कि उन्होने जामताड़ा में SWINE FLUE पर रिपोर्टिंग की और उनके चैनल में खूब चली। दरअसल उन्होने कुछ स्वास्थ्य अधिकारियों से बात कि जिन्हे ये पता नहीं था कि स्वाइन क्या बला है। वो बहुत खुश थे वो रिपोर्ट कर,कई बार फोनो चला था, जामताड़ा के दूसरे रिपोर्टर उनसे नाराज हो गए थे...बिना बताए स्टोरी कर डाली। इन्हे कोई चीज बेहतर चलाने से ज्यादा चिंता ख़बर को पहले चलाने से है। वो बड़ी ख़बर देखने को लालायित होते है...बिना देर किए तुरंत उस पर आगे बढ़ जाना चाहते है। ये हडबड़ी कभी-कभी खतरनाक होती है। हेडली-राहुल प्रकरण पर ही सोचिए। राहुल भट्ट का नाम आता है। क्या बिना राहुल के STAND जाने हमें ये ख़बर चलानी चाहिए? मैं चाहूंगा कि वरिष्ठ लोगों आज के इन युवा पत्रकारों की हडबड़ी पर कुछ बताएं।

Aadarsh Rathore said...

Jab media ki padhai shuru ki thi to josh kuch alag tha, dheere-dheere kalai khuli to dang reh gaye. Lekin ab aadat ho gayi hai aur jo bhi use bura nahi kaha ja sakta.main samjhta hoon ki theek hai, patrakarita mission nahi hai, lekin ye aisa profession zaroor hai jo kahin na kahin kisi mission ko poora karne mein saksham hai.chaahe wo pratyaksh ho ya phir apratyaksh.

ravishndtv said...

आदर्श

मिशन ही लेकिन प्रोफेशन भी है। वकालत ही नहीं आएगी तो मुकदमा कैसे जीतेंगे। सिर्फ डिग्री से कोई वकील नहीं बन जाता। सुधीश पचौरी ने जिस तरह माध्यम को समझने की कोशिश की है,उसे भी पढ़ा जाना चाहिए। वो पेशेवर पत्रकार नहीं हैं। पत्रकारिता में जो हो रहा है उसे समझने और व्यक्त करने की कोशिश करते हैं। फिर भी वो अकेले ऐसे समीझक हैं जिनके पास टीवी को समझने और व्यक्त करने की भाषा है। अपनी पीढ़ी के तो चंद लोगों में से हैं हीं। अब तो कई लोग कर रहे होंगे। प्रो जगदीश चतुर्वेदी का ब्लाग नया ज़माना यही कर रहा है।

लेकिन टीवी पत्रकारिता स्टोरी टेलिंग की कला है। ये नहीं आएगी तो आप मुद्दों को कैसे पहुंचायेंगे। जब तक आप प्रोफेशन में दक्ष नहीं होंगे आप मिशन का भी भला नहीं करेंगे। मैं यही कहना चाहता हूं। टीवी में काम कर रहे लोगों को स्टोरी टेलिंग आनी चाहिए।
माध्यम को उसका खुराक तो चाहिए। मैं कहीं से नहीं कह रहा है कि आप भांय भांय कीजिए। आपका अच्छा होना काफी नहीं है। टीवी के लिए हैं या नहीं ये देखना चाहिए। इसकी साधना करते हैं या नहीं ये होना चाहिए।

Parul said...

ravish ji bahut sahi keha hai aapne.....
hindi patrkarita ek aisa madhyam hai jiske jariye hum jan manas ko jivant kar sakte hai..unko sachet kar sakte ..aur is jijivisha ke liye jaruri hai dedication...kuch kar gujrne ki chah...purani bandishon se ubarne ki chah aur man ko nayi abhilashaon se bharne ki chah!!

Parul said...

is qasbe mein pahli baar aayi hoon...
aakar bahut kuch sochne par maboor hoon...kehne ka man to sab ka karta hai...par baat dil se nikalkar dil tak pahunch jaye...ye prayas sarthak hona jaruri hai..aur aapka ye prayas srahaniy hai

Aadarsh Rathore said...

सही बात कह रहे हैं रवीश जी, ये एक आर्ट भी है जिसे सीखा जाना ज़रूरी है। ऐसा नहीं है गंभीर मुद्दे टीआरपी नहीं बटोर सकते, बस उन्हें पेश करने के अंदाज़ की बात है।

अबयज़ ख़ान said...

रवीश सर, मेरा तजुर्बा आपके सामने मामूली सा है.. कई चीज़ें बॉस लोगों को पता भी नहीं चल पातीं... लेकिन फ्लोर पर काम करने वाले सारी हकीकत से रूबरू होते हैं... मैंने कानों से सुना और आंखो से देखा है.. कि कैसे यंग जनरेशन मीडिया का कोर्स करती है और सबकी ख्वाहिश टीवी पर चेहरा दिखाने की होती है... इथिक्स और जज़्बात तो वो पहली नौकरी मिलते ही छोड़ देते हैं.. अभी जो आपक आदर्शों पर चलने की बात करते हैं.. नौकरी मिलते ही उनके आदर्श में भी ब्रांड और पैसा शामिल हो जाता है...

अबयज़ ख़ान said...

रवीश सर, मेरा तजुर्बा आपके सामने मामूली सा है.. कई चीज़ें बॉस लोगों को पता भी नहीं चल पातीं... लेकिन फ्लोर पर काम करने वाले सारी हकीकत से रूबरू होते हैं... मैंने कानों से सुना और आंखो से देखा है.. कि कैसे यंग जनरेशन मीडिया का कोर्स करती है और सबकी ख्वाहिश टीवी पर चेहरा दिखाने की होती है... इथिक्स और जज़्बात तो वो पहली नौकरी मिलते ही छोड़ देते हैं.. अभी जो आपक आदर्शों पर चलने की बात करते हैं.. नौकरी मिलते ही उनके आदर्श में भी ब्रांड और पैसा शामिल हो जाता है...

pratibha said...

मुद्दा बहुत मौजूं है रवीश जी. कोई चाहे तो कहीं से भी सीख सकता है, और चाहे तो किसी को भी खारिज कर सकता है. क्या सचमुच रवीश जी या सुधीश जी से कुछ नहीं सीखा जा सकता है? मैं यकीन से कह सकती हूं कि उस छात्र ने वरिष्ठ जनों को जिस भी खांचे में रखा हो लेकिन रवीश जी ने उससे काफी कुछ ग्रहण किया है.
युवाओं में भी कम हड़बड़ी नहीं है. उनमें भी वो पैशन, वो जुनून नहीं दिखता. वे पहले ही कदम पर कम्प्रोमाइज को तैयार रहते हैं. पैकेज की बात सबसे पहले पूछते हैं. कैसे अच्छा लिखा जाए, खबर को कैसे पकड़ा जाए. खबर की संवेदना को कैसे जिंदा रखा जाए वो सब बाद में पहले उन्हें यह बताइये कि कैसे बढिय़ा पैकेज मिलेगा. कई तो इतने स्पष्ट होते हैं कि लिखना-विखना तो आ ही जाता है. बाजार के दबावों के चलते हुए भी अच्छा काम हो सकता है, और सीखने को भी बहुत कुछ है बस न$जरिये की बात है. जहां तक लात पडऩे की बात है... तो यह संघर्ष कब नहीं रहे. कभी ज्यादा...कभी कम.... ऑथेंटिक कवरेज (संभवत: गुजरात दंगों को लेकर) के लिए द हिंदू के सिद्धार्थ वरदराजन ने नौकरी छोड़ दी थी. है माद्दा किसी में? खबर के लिए झगडऩे की ताकत है किसी में, प्रमोशन का लालच पीछे छोड़कर. आरोप लगाना आसान है. इसी हड़बड़ी का नतीजा है कि पढऩे वाले नहीं पेज और खबर के पैकेज गढऩे वालों की भीड़ बढ़ रही है.

subodh said...

suraj ka purab se ugna agar sach hai to utna hi sach yeh bhi hai ki patarkarita ek mission hi hai,jitni chahe buraiya aa jaye lekin patarkaritr ko paribhashit karne ke mankikaran vahi rahege,,sach ka satat pragtikaran patarkarita hai,...ab is ke liye koi sudhishvad apnaye ya ravishism,...ye apni pasand aur parchalan ka mudda hai,...is mission ki rah mein jo acha lage use apna lo jo na lage use jane do,or jb mission maan lenge to hum sab ke bhitar baitha sidharth varadrajan ,,trp or package-boss ko goodbye kehne mein der nahi karega,...lekin ravish ji ki ek baat likh lene jaisi hai ki MISSION KO BHI EK BEHTAR SKILL KI JARURAT HOTI HAI,,TO HAR MUKAM PAR EK PATARKARTHI BANE RAHE

JC said...

सूर्योदय का पृथ्वी पर पूर्व दिशा में होना सत्य माना जाता है, किन्तु यह भी वैज्ञानिक जानते हैं कि शुक्र ग्रह में यह पश्चिम में ही होता है. और पृथ्वी के ध्रुव भी बदल सकते हैं और तब सूर्योदय पश्चिम से होगा!

वैसे ही मानव के वचन भी, किसी एक व्यक्ति विशेष में भी, अनुभव के आधार पर समय समय पर बदलते रहते हैं - विज्ञानं के क्षेत्र में भी प्रकृति के कई किसी समय पर, बहुत समय तक माने गए सत्य, कोई नया वैज्ञानिक झूठा साबित कर देता है!

अल्प काल में इसी प्रकार विभिन्न 'सच'/ 'झूट' इस पृथ्वी पर अलग अलग स्थान पर दिखाई देना ही 'सत्य' है...नेहरु के अंतिम काल में मीडिया ने ऐसा शोर मचाया कि जैसे उनके जाते ही भारत डूब जायेगा - किन्तु शास्त्री के आने के बाद सब 'नेहरु के बाद क्या होगा' भूल गए!

२६ जुलाई २००५ के बाद 'मुंबई' में रहने वाला खास तौर पर सागर-जल के स्तर को चाँद के कारण पूर्णमासी में अधिक घटते/ बढ़ते देख सकता है, यद्यपि सूर्य के कारण भी अन्य दिन उपर/ नीचे होता रहता है...अब वर्षा होती है तो वहां के निवासी डरते हैं कि २६/७ फिर से न हो जाए!

प्राचीन हिन्दू भी कह गए कि चाँद का सम्बन्ध जल से तो है ही किन्तु मानव के मस्तिष्क पर भी इसका उसी प्रकार प्रभाव है, जिसके कारण विचार भी उपर/ नीचे होते रहते हैं...आज पश्चिम ही नहीं, किन्तु हमारा अपन मीडिया भी एक ओर उन्ही को मूर्ख साबित करने में लगा हुआ है तो दूसरी ओर एक प्राचीन पश्चिमी सभ्यता के दर्शाए २१/१२/२०१२ से डरा रहा है (२६/७ सामान!)...

प्रेम said...

सही कहा रवीश जी आपने। ऐसा क्यों होता है। मैं आपकी तरह ही सोचता हूं। मेरा भी मानना है कि हमें दूसरे से प्रभावित होने की नहीं, बल्कि उनको राह दिखाने की जरूरत है।

VARUN GAGNEJA said...

MAIN AB KYA KAHUN. NA TO MAIN PATRAKAR HUN NA KABHI PATRKARITA KA STUDENT THA. PAR EK BAAT TO HAI KI PATRAKARITA AB NA TO INVESTIGATIVE HAI AUR NA HI RESPONSIBLE. MISSION TO BAHUT DOOR KI BAAT REH GAYI HAI. EK AAM AADMI KE NAZARIAE SE DEKHUN TO LAGTA HAI SAB EK JAISE HAIN. KOI KISI BAAT KO TAVAJJO NAHI DETA. SAB TRP KINRACE MEIN HAIN. MUJHE YE TO PATA CHALE KE TRP KI RACE MEIN AGAR SHAAM BHUKHA SOYA TO USKA KYA STHAN HAI. AGAR MERE SHEHAR KI MUNICIPALITY ROADS BANAANE KE NAAM PAR PAISE KHA RAHI HAI TO WOH TRP KAISE BDHAYEGI. ISKA JWAB NA TO PACHORI JI KE PAS HAI NA RAVISH KUMAR KE PAAS. CHHOTE SHERON MEIN AGAR 100 NAHI TO 90% PATRAKAR PATRKAR NAHI BLACKMAILER KAHEIN JAATE HAIN. AGAR MEIN TAX DE KAR BHI SAAF SADKON PARNAHI CHALTA YA MERE DWARA KISI KI SHIKYAT KARNE PAE ULTA MUJH PAR PULSIA DABAV BANAYA JAAYE TO KIS TRP WALE KO PAKDUN

kranti ki patrkarita said...

karni aur kathni mein bahut antar hota hai. patrakar koi bhagwan nhi hote hai. system mein rahkar sabko kaam karna padta hai.

Bhagat singh aaj tum kaya na lena bharatwashi ki,
kyoki aaj bhi desh bhakti ki saza hai yaha fashi ki.

Dankiya said...

Raveesh ji,

sankat prerna ka kam..imandar koshishon ka zyada hai..prerna andar ki bhi ho sakti hai..bahur ki bhi.par kuchh karne ki imandar koshish bahut zaruri lagti hai..!!

AMIT SINGH '' ChotaRavan'' said...

sir apke uper comment kerna "chota muh badi baat hogi" lekin log chahe kuch bhi sonche lekin mudda apka jabardast hai isme koi do rai nahi . mai bhi aapki baat se 101% sahmat hoon, lekin sir her aadmi naam kamana chahta hai , isme uski koi galti nahi hai yah manushya ki vikrati he aisi hai ki "karo jyda ka irada" mai bhi abhi patrakarita seekh raha hoon aur free lanc journalist bhi hoon . accha aur sacha kaam kerna chahta hoon to seniour mana kerte hai .kisi galat ka virodh karo to news dustbin me chali jati hai , jhooti aur makhann wali news he news rah gayi hai ab usi ko chanal malik aur paper malik jagah dete hai ??
aur rahi kisi ko aadarsh maanne ki baat to sir yaad kerye hamne jo bhi seekha hai sab kuch dekh ker he seekha hai "AAG" se leker "kheti"sabhi kuch to admi dekh ker he sheekta hai ,
sayad mera matlab spast ho gaya hoga ki jab bade log choto ko naya sochne ka mouka nahi denge to naya hoga hi nahi .
filhaal aapka " vinod dua live" ak without fear without faver wala karyakram hai ,
Thanx & regards
Amit kumar singh "chotaravan"