नर्मदा का बेटा- प्रभाष जोशी

उनकी सबसे अच्छी बात यही लगती थी कि वे नर्मदा को प्यार करते थे। नदियों के साथ रोमांस को जीते थे। खूब लिखा नर्मदा के बारे में। क्षिप्रा को मौसी कहा और गंगा से माफी मांग ली कि तुमको देखकर वो भाव आता ही नहीं जो नर्मदा को देख कर आता है। अपनी तो नर्मदा ही मइया है। इसी नदी की धारा के साथ वो अपनी राख को बहते देखना चाहते थे। पंद्रह साल पहले ही कागद कारे में लिख दिया कि मरने के बाद मेरा बेटा नर्मदा के रामघाट पर ही दशा करेगा। वो जहां भी गए उनके भीतर यह नदी बहती रही। उनके भावुक क्षणों में नर्मदा ही छलक कर आंसू बनती थी। लेकिन वो रोये तो गंगा और यमुना के लिए भी। नर्मदा को लेकर मेरे भीतर भी आकर्षण है। अपने कैमरामैन तुलसी के शाट में देखा था पहली बार नर्मदा को। तब से इसके करीब जाने का मन करता है। तुलसी ने नर्मदा का जो ऋंगार किया था अपनी बेहतरीन लाइट सेंस और फोकस से...वो अद्भुत था। जितने लोगों ने देखा सबने कहा कि ये नर्मदा है। इतनी सुंदर। ये वो लोग थे जो नर्मदा को करीब से नहीं देख सके थे। नदियों की दीवानगी उन लोगों में होनी ही चाहिए जो उनके किनारे पले बढ़े। प्रभाष जोशी का यह दीवानापन बहुत स्वाभाविक था।

मैं गंगा को देखकर भावुक हो जाता हूं। खूब देर तक हाथ जोड़ कर प्रणाम करने का मन करता है। गांव जाता हूं तो बूढ़ी गंडक से प्यार हो जाता है। आज भी यू ट्यूब से उन फिल्मों के गाने निकाल कर देखता हूं जिनमें गंगा का ज़िक्र है और गंगा दिखती है। गंगा सूख गई है। पटना में गंगा इतनी बेजान कभी नहीं दिखी। उसका चौड़ा पाट, तेज लहरें। पहलेजा से स्टीमर में सवार होकर पटना आना। तब गंगा पुल नहीं बना था। गंगा से रोमांस बन गया। ट्रको पर लिखा होता था,गंगा तेरा पानी अमृत। अब नहीं दिखता है ये स्लोगन।

खैर लेकिन प्रभाष जोशी ने न जाने कितने रिश्ते बनाए लेकिन नदियों से अपने रिश्ते को कभी नहीं भूले। उनके किनारे उपजे संस्कारों में भी डूबते उतराते रहे। उनके पानी से आचमन करते रहे। प्रकृति से भावुक रिश्ता जितना बेजान होता चला जाएगा, उतना ही हम यमुना सफाई जैसे कागजी अभियानों का आविष्कार करेंगे।

इन्हीं नदियों के नाम पर प्रभाष जी को याद कर रहा हूं। अब कौन भावुक होगा किसी नदी के लिए। नर्मदा ने अपने बेटे को बुला तो लिया लेकिन उसके लिए अब दिल्ली में बैठ कर पूरी दुनिया के सामने कौन रोएगा। नर्मदा को भी कमी खलेगी। कागद कारे में वो पूरी धार के साथ बहा करती थी। लिखने वाला उसकी धार में बह कर लिखता था। अब नर्मदा सिंगल कॉलम के लिए भी तरसेगी। आमीन।

7 comments:

Aadarsh Rathore said...

हम सभी को अपनी जन्मभूमि रह-रहकर पुकारती है रवीश जी, लेकिन न जाने किन बेड़ियों ने हमें जकड़ रखा है। बार-बार मन में लहर उठती है कि सब छोड़ छाड़कर घर चला जाऊं और वहीं रहूं। पिछले एक साल में ऐसा दो बार कर भी चुका हूं। अपने पहाड़ों की इतनी याद आई कि घर चला गया, लेकिन फिर न जाने क्या चीज़ थी जो वापस दिल्ली ले आई। अब सोचता हूं कि अंतत: वहीं जा बसना है जहां मेरी आत्मा बसती है। बस एक बार खुद को साबित करना है ताकि दिल में कोई मलाल न रहे। धन लोभी लगातार पहाड़ों के मस्तक पर बुल्डोज़र चला रहे हैं, ये सब रोकना है।

प्रभाष जी जैसे शख्स के बारे में मैं उतना ही जानता हूं जितना एक जनसत्ता का पाठक और पत्रकारिता का छात्र...। उन्होंने हमेशा प्रेरणा दी है, प्रसन्नता की बात है कि उन्होंने खुद से बढ़कर पत्रकार हमें दिए हैं जिनसे हमें मार्गदर्शन मिलता रहेगा।

JC said...

रविशजी, इसे शायद संयोग ही कहेगा कोई की में नदियों के बारे में कविता के ब्लॉग में लिख कर आपके ब्लॉग में आया तो यहाँ भी नर्मदा आदि नदियों का जिक्र पाया!

कॉपी प्रस्तुत है.
"Now, some mythological facts, as 'food for thought' for those who follow 'Hindu Mythology': Shiva the androgynous god, or Ardhanarishwar, had His original abode at Kashi on the banks of River Ganga, in the present day Varanasi and as 'we' know located at 82.5 degree east longitude. That is, 82.5 degrees is indicated as the zero for 'India that originally was Jambudweep', or the entire globe at the beginning, with the background knowledge that our universe is ever expanding along with its contents also similarly expanding, like a balloon, having started from a point as per Hindu belief.

And it is also indicated that at a certain stage, before the emergence of Himalatyas from underneath the sea-bed in the North, the Vindhyas were the highest mountain range in Jambudweep. And, Narmada River, which has its origin at Amarkantak, that is located close to the same '0' longitude, was formed from 'Shiva's sweat'!

And, Krishna, believably the 8th avatara of Vishnu was born at Mathura on the banks of River Yamuna that, like Ganga and Brahmaputra, also originates from Kailash-Mansarovar, which also has the same longitude passing through it!

And, Krishna (who claims to reside within all humans!) believably studied at Sage Sandipani's Ashram in the Narmada Valley. And, Mahakal's Temple, associated with Bhootnath Shiva as the Controller of Time, also is located at Ujjain on River Shipra, a tributary of Narmada River, in that region itself!

As there are no reactions, 'I' don't come to know if one sees what 'I' see!!!

10:43 AM"

dragon said...

क्या महाराज एनडीटीवी का पैकेज ही उठा कर ठेल दिए हो...ये रीठेलिंग नहीं चलेगी मौलिक लिखिए...मौलिक...हमने तो टॉप बैंड पढ़ा था नर्मदा का बेटा प्रभाष जोशी...

Nikhil Srivastava said...

गुस्ताखी माफ़, पर क्या पूछ सकता हूँ कि 'आमीन' के साथ कलम क्यूँ रोकी ?
निखिल

kabad khana said...

ab narmada single coloum ko tarsegi ke aage aapne aamin kyon likh diya shayad galat likh diya .kyonti aamin yane aisa hi ho.kya sahi he bataiyega

pragya said...

I don't look at Ganga as river.She looks like mother and feels like mother...

नवीन कुमार 'रणवीर' said...

नदी हो या वन, भाव जिंदगी में अपनेपन का है। किसी को अपनें जंगलों से प्यार होता है, तो किसी को अपने पास बहनें वाली नदी से, कोई अपनें लोक गीत-संगीत का रहनुमा पूरी जिंदगी बना रहता है, तो कोई मृत्यु शैय्या पर भी अपनें शहर-कस्बों के गलियारों में खोया रहता रहता है। प्रेम और अपनेपन का भाव ही हर किसी का अपनें अपनों से आजीवन जोड़े रखता है।
सवाल है कि, हम किसे अपना समझते हैं।
दोस्तों हम प्रभाष जी के नर्मदा प्रेम को अदिवासियों के अपनें वनों के प्रति प्रेम से भी देख सकते हैं।