जानलेवा सड़कें- बेदिल शहर

सड़क दुर्घटनाओं को लेकर हम कब गंभीर होंगे। हर दिन सवा तीन सौ लोगों की मौत हो जाती है। एक मौत होती है तो बीस घायल होते हैं। इंस्टीट्यूट ऑफ रोड एंड ट्रैफिक एजुकेशन के इस आंकड़े पर कई बार रिपोर्टिंग हो चुकी है। मैंने भी कई बार की है। लेकिन इन आंकड़ों की प्रसारण बारंबरता बढ़ाने के बाद भी फर्क नहीं पड़ता। आज सुबह फिर खबई आई कि नोएडा में नौवीं क्लास के बच्चे को बस ने कुचल दिया। भारत के अराजक समाज को कहां कहां से संवेदनशील किया जाए। शहर अभी भी हमारी मानसिकता में एक बिगड़ा हुआ जगह है। शुरू के पचास साठ साल तक भारत में गांवों को लेकर जो धमाल पैदा किया गया उससे शहरों के प्रति नकारात्मक सोच पैदा हुई। हमारे गांव में लोग ऐसे बात करते थे जैसे हर शुद्ध चीज़ यहीं पैदा होती थी। होती थी लेकिन यह एक छद्म गर्व भाव था। शहर से आने वाले लड़के लड़कियों का मज़ाक उड़ाया जाता था। शहर हमारी सोच में बैरी संस्कृति की तरह रहा है। इसलिए हमारी कोई नागरिक मानसिकता नहीं बन पाई। हम शहर से बगावत करते रहते हैं। शहर से नफरत करते हैं।

लेकिन शहर फैल रहे हैं। शहरी आबादी बढ़ रही है। शहर अब वाकई अराजक होते जा रहे हैं। सुविधाओं के लिहाज़ से और यहां बसने वाले लोगों की सोच में शहरों के प्रति धंसी अराजक मानसिकता से। दोनों मिलकर शहर को दुर्घटना स्थल बना रहे हैं। एक गंदी जगह लगती है। बीस साल लोग सड़क दुर्घटनाओं से अपंग हो चुके हैं। सवा लाख लोग हर साल मारे जाते हैं। पंद्रह लाख लोगों के खिलाफ चालान कटता है। ज़ाहिर है हम सड़क के साथ उदंडता का बर्ताव करते हैं।

हर सुबह पढ़े लिखे मां बाप सोसायटियों के गेट पर बच्चों के साथ खड़े रहते हैं। बेतरतीब। एक साथ कई स्कूल की बस आ जाती है। उनके बीच से निकलते-भागते रहते हैं। सड़क पर गाड़ियां रफ्तार से दौड़ रही होती हैं। सरकारी स्कूल के बच्चों का तो और बुरा हाल है। सरकारी स्कूलों के गेट के बाहर भगदड़ मची रहती है। बेनियंत्रित ट्रैफिक के हम सब शिकार हैं। ट्रैफिक को बेलगाम बनाने में हमारा ही योगदान है। मगर सोचिये कि हम सब जान लेने की हद तक चले जाते हैं। पी के कार चलाने से लेकर एफएम सुनते हुए बेहोश होकर कार चलाने तक। शहरी संस्कार गढ़ने की ज़रूरत है। शहर को अपनाने की ज़रूरत है। कस्बे का रोमांस अच्छा है लेकिन यहां दिल लग जाए तो क्या बुरा है। वर्ना कब तक कविताओं और शायरी में शहरों को बेदिल बताते रहेंगे। रहते या रहना चाहते तो यहीं हैं न।

13 comments:

JC said...

सत्य वचन!

कहते हैं कि हर शहर कि अपनी अपनी निराली आत्मा होती है...दिल्ली, यानि इन्द्रप्रस्थ, प्रसिद्ध है अनेक सभ्यताओं के पनपने में सहायक होने के, और फिर एक समय, अंततोगत्वा, ध्वंस में...जैसा कहा जाता है कौरव-पांडवों के काल में भी हुआ और जिसका (अप)श्रेय 'माखनचोर कृष्ण' को, विष्णु के आठवें अवतार को, जाता है...जो वैज्ञानिक दृष्टि से और अपने योगियों कि दृष्टि से भी कहें तो हमारी गैलेक्सी के मध्य में विराजमान हैं (जो सुदर्शन चक्र समान अपने केंद्र के चारों ओर घूमती प्रतीत होती है) और आज भी 'Milky Way Galaxy' कहलाती है...और पृथ्वी को वैसे भी मृत्युलोक कहा जाता है, और सब जानते हैं कि हर जीव अंततोगत्वा इसमें मिटटी या राख बन मिल जाता है यही उसकी नियति है, भले ही वो गाँधी हो या नेहरु, या हिटलर आदि आदि ...और किसी की मृत्यु कैसे आयेगी वो 'राम' ही जानें - यद्यपि ज्योतिषी भी अटकलें लगाते दीखते हैं भले ही काल की चाल को सही तरह समझते हों या नहीं :)

विनीत कुमार said...

सड़को की बात तो है ही। कल राजीव चौक पर देखा,ट्रेन से उतरते हुए उस लड़की की आंखओं से आंसू छलछला गए। बैग बुरी तरह फट गया,जैकेट का एक हिस्सा किसी से फंस गया और अंदर हो हो करके लोग चढ़ते जा रहे थे। क्या ये सिर्फ भीड़ होने भर की समस्या है। बहुत डर लगता है और यही हाल रहा था प्लेटफार्म पर मरने की घटनाएं बढ़ती जाएगी।.

JC said...

रवीश जी/ विनीत जी, यह कहना भूल गया कि 'दुर्घटनाओं और चीड-फाड़' के लिए दोष दिया जाता है राहु को, जिस राक्षश ने धोखे से अमृतपान कर तो लिया किन्तु उसके गले के नीचे उतरने से पहले ही विष्णु ने अपने चक्र से उसका गला काट दिया जिस कारण उसका धड, केतु, और सर, राहु, अलग-अलग, अनंत काल से भटक रहे हैं :) और उसकी शिकायत विष्णु से करने वाले दोनों 'सूर्य' और 'चाँद' देवता थे :)

उपरोक्त से शायद आज भी थोडा बहुत अंदाज लगाया जा सके कि हमारे पूर्वजों ने खगोलशास्त्र को सांकेतिक भाषा में लिखा, जैसी उस काल में परंपरा रही होगी...

अंशुमाली रस्तोगी said...

शहरों के अराजक लगने के बावजूद भी हम क्यों नहीं उन्हें छोड़ पाने की हिम्मत नहीं कर पाते, रवीश भाई। शहर हमारी आदत बन चुके हैं। खत्म होते गांव शहरों के विस्तार को जगह दे रहे हैं। दुर्घटनाएं बेतरतीब बढ़ रही हैं। कब किसके साथ क्या हो जाए कोई नहीं जानता। फिर भी शहरों को नहीं छोड़ पाते। इसका उत्तर कोई नहीं देना चाहता।
शायद इसलिए की मन में शहर को छोड़ने का भय बना रहता है।

अर्शिया said...

बडे बडे शहरों में ऐसा होता रहता है।
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11वाँ राष्ट्रीय विज्ञान कथा सम्मेलन।
गूगल की बेवफाई की कोई तो वजह होगी?

creativekona said...

रवीश जी,
जब तक शहर की जनता में ट्रैफ़िक सेंस नहीं डेवलप होगा--लोग ऐसे ही दुर्घटनाओं में जाते रहेंगे।दिल्ली तो भारत की राजधानी है।मैं यू पी की राजधानी की बात कर रहा हूं--रोज अखबार में सड़क दुर्घटना में दो चार मौतों की खबर रहती है।---इसकी जिम्मेदारी ट्रैफ़िक पुलिस,सरकार के साथ ही हम लोगों की भी बनती है।
लखनऊ में तो यू टर्न का कान्सेप्ट छोड़िये बहुत से लिग जानते ही नहीं होंगे कि यू टर्न क्या बला है। वो बायें से निकलेंगे कार से सामने वाली लेन में जाना है तो अगले चौराहे तक जाकर यू तर्न नहीं लेंगे---गलत दिशा से ही (शार्ट कट के चक्कर में )भागेंगे।भले ही सामने वाले रिक्शे को उन्हें थोकर मारनी पड़े।
मां बाप लड़कों को दर्जा आठ पास करते ही बाइक दिला देंगे----ये नहीं बतायेंगे कि--बेटा बांये से चलना,रांग ओवर्टेकिंग मत करना,तीन दोस्तों को बाइक पर बैठा कर सत्तर अस्सी की स्पीड में मत चलाना,लखनऊ की सड़कें तीस चालीस की स्पीड के लिये बनी हैं नकि 80 की स्पीद के लिये,
वो ये मान कर चलते हैं कि ये सब बच्चा खुद समझ जायेगा । या पुलीस उनके घर आकर ट्रैफ़ि रूल्स की क्लास लगायेगी।
मेरा अनुभव तीस साल की ड्राइविंग का यही है कि
शहरों में ज्यादातर एक्सीडेण्ट्स ट्रैफ़िक सेंस की कमी ,जल्दबाजी और शाम होते ही बोतलें खोल देने के नये फ़ैशन के कारण होती हैं।
अब इसमें सुधार कौन लायेगा? ----भगवान जाने।
हेमन्त कुमार

डॉ टी एस दराल said...

रवीश जी, जब तक आठवीं फेल ड्राइवर कमर्शियल गाड़ियाँ चलते रहेंगे और आज के युवक मोटरसाइकिल को हवाई ज़हाज़ बना कर चलते रहेंगे , ये हादसे होते रहेंगे। कुछ समय पहले कनाडा जाने का अवसर मिला। वहां का ट्रैफिक और ट्रैफिक सेन्स देखकर दिल खुश हो गया।

सच --हम कब सुधरेंगे।

शशांक शुक्ला said...

शहर में आराजकता का सारा श्रेय यहां पर आने वाले उन गांववालों की आंखे है जो यहां आकर चकाचौध हो जाती है। औऱ तेजी से आगे बढ़ने के लिये वो सबकुछ भूल जाते है। दिल्ली में तो हालत ये है कि यहां के आसपास के रहने वाले गांववाले अपनी ताकत का दिखावा करने में ज्यादा विश्वास करते हैं। और यहां के आसपास के लोगों के पास आया वो पैसा जिसको उन्होने सिर्फ अपनी ज़मीन बेचकर कमाया है उसने उनका दिमाग खराब कर दिया है। इसलिये शहरों की हालत बद से बदतर होती जा रही है

Aadarsh Rathore said...

इन दिनों हम ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कार्यक्रम चला रहे हैं। पिछले हफ्ते ओवरलोडिंग को फोकस में रखा था तो इस बार हेल्मेट और बेल्ट आदि न पहनने और लाल बत्ती तोड़ने की प्रवृति के खिलाफ कार्यक्रम चला रहे हैं। जगह-जगह से ऐसे दृश्य आए कि पूछिए मत... बड़ेृ-बड़े पदाधिकारी, सुशिक्षित लोग तो ज्यादा ही कानून तोड़ते नज़र आए...। साउंडबाइट्स तो इतनी मज़ेदार थी कि हंसते-2 पेट में बल पड़ गए...। लोग कैमरे के सामने बेझिझक कानून तोड़ते गए... और तो और पुलिस भी मूकदर्शक बनी रही...। कई पुलिसवाले भी ऐसा ही करते दिखे...।
न तो लोगों में जिम्मेदारी का भाव है और न ही प्रशासनिक खेमे में कर्तव्यनिष्ठा.... ऐसे बेदिल लोग जब शहरों में बसेंगे तो सड़कें जानलेवा ही बनी रहेंगी...

rajiv said...

ritika jhanji ka kafi arsa pehle prg dekha tha. uss prg. me wo apka interview li thee. apna kaha thaa shoke didar ho to nazar paida kar.
sahi baat hai, aap patrakarita ke raju srivastava hain. barik nazar rakhte hain.
rajiv mandal

Dheeraj Upadhyay said...

acchi report,
Problem yeh ki logo me "Civic Sense" naam ki koi cheej nahi bachi hai.Log apne hisab se raasta bana lete hain. Mobile suchna kranti ke saath saath road accident me bhi krantikari saabit ho raha hai.

Dheeraj Upadhyay
Lucknow

सतीश पंचम said...

@ शहर से आने वाले लड़के लड़कियों का मज़ाक उड़ाया जाता था।

यही हाल शहरों में भी होता है रवीश जी, गाँवों से आये लोगों का भी शहर वाले जमकर मजाक उडाते हैं। शहर वाले सिर्फ मजाक ही नही उडाते, कभी कभी बस वगैरह में कोई देहाती बगल की सीट पर बैठ जाये, तो थोडा सरक कर भी बैटते हैं।

जहां तक बात है कि शहरी सेंस ऑफ लिविंग की, तो वह तो है ही, लोगो को सीखना पडेगा कि शहरों को कैसे जिया जाये।

JC said...

शायद पचास के दशक में गाया मुहम्मद रफ़ी का गाना, "ऐ दिल है मुश्किल जीना यहाँ/ ये है बॉम्बे ये है बॉम्बे ये है बॉम्बे मेरी जान," बेहद प्रचलित हुआ था...किन्तु उस दौरान बॉम्बे से आये विद्यार्थी, जो यूथ फेस्टिवल में भाग लेने दिल्ली आये थे, इसी गाने को गाते सुनाई दिए - किन्तु (बॉम्बे) मुंबई की जगह "दिल्ली" लगा के :) (और मुंबई के हालात तो किसी से छिपे नहीं हैं आज :)

एक शादी में उसी दौरान लखनऊ से आये कुछ रिश्तेदार जल्दी से वापिस जाने का इंतज़ार कर रहे थे - यहाँ की सडकों में गाड़ियों से घबडा जाने के कारण उन्हें अपनी हजरतगंज की शाम याद आ रही थी जहां वे निर्भय घूमा करते थे (हम लोगों को स्कूल में एक निबंध लिखने को कहा गया था कि यदि भागवान पुनर्जन्म ले तो देश के आज के हालात देख उसकी क्या प्रतिक्रिया होगी? :)