कड़ी कार्रवाई

जब कार्रवाई है ही तो कड़ी कार्रवाई क्यों हैं। इस बात को लेकर बहुत दिनों से परेशान हूं। सोच रहा हूं कि ज़रूर कार्रवाई शब्द की प्रासंगिकता खत्म हो गई होगी तभी सत्ताधारी शब्दतंत्र ने कार्रवाई के आगे कड़ी लगाकर इसकी प्रासंगिकता को बनाए रखने की कोशिश की होगी। तभी तो बीजेपी के अध्यक्ष कड़ी कार्रवाई करने की चेतावनी देते हैं। फिर भी वसुंधरा नहीं मानती है तो कड़ी के आगे एक और कड़ी लगा देते हैं। बयान देते हैं कि अनुशासन तोड़ने वाले नेताओं के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जाएगी। कड़ी से कड़ी या सिर्फ कड़ी कार्रवाई शब्द नेता या सत्ताधारी के श्रीमुख से उद्धृत होता है तो उसका चेहरा देखना चाहिए। बिल्कुल अंतिम फ़रमान के माफिक। लेकिन उसे पता नहीं कि कड़ी या कड़ी से कड़ी कार्रवाई का महत्व खत्म हो चुका है। तभी तो कई लोग इसे और प्रासंगिक बनाने की कोशिश करने में लगे रहते हैं। कहते हैं कि अनुशासन तोड़ने में कोई भी शामिल हो,चाहे वो कितना बड़ा नेता क्यों न हो,उसके खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई होगी। सोचता हूं कि ये दो वेराइटी की कड़ी न होती तो कार्रवाई अकेले क्या कर लेती।

यह एक और कोशिश होती है कार्रवाई शब्द के असर को बरकरार रखने की। विश्वास दिलाया जाता है कि कड़ी से कड़ी कार्रवाई वो होती है जो किसी के खिलाफ भी की जा सकती है। तो यह मतलब निकाले कि कार्रवाई वो होती है जो हर किसी के खिलाफ नहीं की जा सकती। लोअर लेवल के खिलाफ कार्रवाई होती है,मिडिल लेवल के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई होती है और अंत जब कुछ नहीं होता तो कड़ी से कड़ी कार्रवाई किसी भी लेवल के खिलाफ यानी अपर लेवल के खिलाफ किये जाने का एलान होता है।

ज़ाहिर है,व्यवस्था तंत्र इस शब्द की महिमा को नहीं बचा सका है। आज ही अखबार में पढ़ा कि गाज़ियाबाद के एसएसपी ने कहा है कि मिलावटी धंधा करने वालों के ख़िलाफ पुलिस अभियान चलाएगी। जो भी पकड़ा जाएगा उसके खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जाएगी। तो क्या कई लोग जो पकड़े जाते हैं उनके ख़िलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई नहीं होती। कड़ी कार्रवाई के तहत क्या पांच साल की सज़ा होती है और कड़ी से कड़ी कार्रवाई तहत उम्र कैद होती है? क्या किसी के ख़िलाफ़ भी कड़ी से कड़ी कार्रवाई करने की बात कर प्रशासन अपना महिमामंडन करने की कोशिश करता है। कार्रवाई आश्वासन है या चेतावनी। टोन से दोनों में फर्क नहीं लगता। कभी कभी तो कड़ी से कड़ी कार्रवाई आश्वासन की तरह प्रयुक्त होता है।

क्या कार्रवाई शब्द एक नाकाम शब्द है। फिर इसे सख्त से सख्त या कड़ी से कड़ी लगाकर बचाने की कोशिश क्यों की जाती है? क्यों न इसे गाड़ दिया जाए? मान लिया जाए कि दरअसल जब कार्रवाई ही नहीं हो सकती तो कड़ी से कड़ी कार्रवाई क्यों हो? क्या स्टेप बाइ स्टेप नहीं हो। पहले कार्रवाई कीजिए। जब वो न कर सकें तो कड़ी कार्रवाई कीजिए और जब यह भी फेल हो जाए तो कड़ी से कड़ी कार्रवाई कीजिए। जब तीनों प्रकार की कार्रवाई मिट्टी में मिल जाए तो तब एलान कीजिए कि किसी के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जाएगी। यानी अब कोई नहीं बचेगा। हार री कार्रवाई। आपने कभी कड़ी से कड़ी कार्रवाई की है। ज़रा अंतर बताइयेगा।

28 comments:

Mahendra Singh said...

Kadi karwai shabd ka upyog kisi naye prakar ki galat ghatna aage na hone ke liye upyog kiya jata raha hai.Lekin aaj, Aap yeh kah sakte hain ki kadi karwai ek NIKAMMA shabd ho gaya hai. Is sabd do aap Samuchit/Uchit se replace kar sakte hain.Aap kuch bhi acha karna chahte hai to usko chillane kee koi jarrorat nahi hai. Jaise home minister chidambaram sahab vvip security ko chat rahe hai ya bihar main nitish babu ne sare mafiyaon ko politics se lagbhag bahar kar diya hai. Isse alag laloo ji the woh har kam chilla kar karte the. Railway ko fayde main pahuchayaa par us chakkar main rail ki patriyan ab chatak rahi hai.

Aadarsh Rathore said...

कड़ी कार्रवाई और कड़ी निंदा आदि शब्द मीडिया जनित हैं। यानि पहले नेता जो कुछ भी बयान देते थे, मीडिया उसे शॉर्ट में लिखते थे कि उन्होंने कड़ी कार्रवाई करने को कहा है या उन्होंने कड़े शब्दों में निंदा की। लेकिन अब तो नेता खुद ही बिना कुछ कहे इन विशेषणात्मक वाक्यों को इस्तेमाल कर देते हैं।

Aadarsh Rathore said...

कड़ी कार्रवाई और कड़ी निंदा आदि शब्द मीडिया जनित हैं। यानि पहले नेता जो कुछ भी बयान देते थे, मीडिया उसे शॉर्ट में लिखते थे कि उन्होंने कड़ी कार्रवाई करने को कहा है या उन्होंने कड़े शब्दों में निंदा की। लेकिन अब तो नेता खुद ही बिना कुछ कहे इन विशेषणात्मक वाक्यों को इस्तेमाल कर देते हैं।

Aadarsh Rathore said...

यही कारण है कि नेता कार्रवाई तो नहीं करते नहीं लेकिन ढिंढोरा पीटते हुए कहते हैं कि कड़ी कार्रवाई करेंगे।
सही प्रहार किया है आपने

खुशदीप सहगल said...

रवीश भाई, यह कुछ कुछ वैसा ही नहीं जैसा कि हमारी न्यूज़ चैनल्स की दुनिया में एंकर हर ब्रेक से पहले कहते हैं, ब्रेक के बाद भी ख़बरों का सिलसिला आगे जारी रहेगा. ज्यादा उत्साह में यह तक कह जाते हैं कही मत जाइएगा, मिलते हैं ब्रेक के बाद. अब यहाँ सिलसिला, आगे, जारी, भी, मिलते हैं, ये सब एक-दूसरे से अलग कैसे होते हैं, मेरी समझ में नहीं आता. ठीक वैसे ही कड़ी से कड़ी कार्रवाई की बात है..हैं न बे-फालूत. बे भी और फालतू भी...रही बात बीजेपी की, तो जसवंतजी जैसा अनुशासन का डंडा तो किस्मत वालों पर ही चलता है...मैंने अपना ताजा पोस्ट इसी पर लिखा है.

विवेक सिंह said...

कड़ी कार्रवाई का मतलब पिछली कार्रवाइयों की श्रंखला में एक और कड़ी,

वैसे आप समय से पीछे चल रहे हैं जी,

कड़ी कार्रवाई का समय चला गया,

अब कड़ी से कड़ी कार्रवाई का समय है !

बी एस पाबला said...

फिलहाल तो टिप्पणी दिए देते हैं, अगली बार कोई कड़ी टिप्पणी करेंगे :-)

सच में, 'कड़ी से कड़ी कार्रवाई' एक आश्वासन भर दिखता है।

आनंद said...

वाह वाह! मजा बाँध दिया!

- आनंद

चन्दन कुमार said...

कार्रवाई करके थक जाने के बाद भी जब नतीजा सिफ़र ही होता है, लोग कड़ी कार्रवाई की चेतावनी देते हैं जब पानी सर के उपर से गुजर जाता है , संभालने को कुछ भी नहीं रहता मतलब सबकुछ लुटपिट जाने के बाद कड़ी से कड़ी कार्रवाई का फ़ैसला कारगर साबित होता है , हालांकि देखा जाए तो सहा मायनों में अंतर बस काग़ज़ी ही है हक़क़ीत में सब गोलमोल है.

रंजना said...

बहुत सही कहा आपने....

कड़ी से कड़ी का तात्पर्य संभवतः श्रृंखलाबद्ध कार्यवाहियों से है,परन्तु इसका व्यावहारिक उपयोग कोरे आश्वासन दे, कोई भी कार्यवाई नहीं करने से है..

कुलवंत हैप्पी said...

खूब पकड़ा आपने...और आपकी कार्रवाई भी मस्त थी..लेकिन कड़ी है या कड़ी से कड़ी...रहस्य बरकरार

pragya said...

Hi Ravishji,

'Karwai" can be very mild sometime.I remember once when a channel did a sting operation on bootleggers and police,their then chief of police said 'karwai' will be done,when asked of what nature,she said they may leave people with warning.So this is 'karwai'.

Now 'kadi se kadi karwai",i don't think he literally means some very strict action,he tries to intimidate people with this threat so that people 'mend' their ways.Actually he may do nothing:)

Regards,
Pragya

नवीन कुमार 'रणवीर' said...

कार्रवाई औऱ कड़ी कार्रवाई, कार्रवाई ऑटोवालों रिक्शा वालों या यूं कहें की गरीब-गुर्बा, मज़दूर वर्ग लिए इस्तेमाल में लाया जानें वाला शब्द होता है। लेकिन ये "कार्रवाई" हो जाती है, तो पता नहीं चलता की ये शब्द कब आया और कब चला गया, दूसरी बात "कड़ी कार्रवाई", ये उन लोगों को चेतानें के संदर्भ में इस्तेमाल में लाया जाता है जो कि 9 से 5(काम) के समय वाले होते है। यानि मिडिल क्लास या लोअर मिडिल क्लास के होते है या उनसे संबंधित किसी घटना के लिए जारी निर्णय-फरमा या आदेश में निहित होता है। तीसरी बात "कड़ी से कड़ी कार्रवाई" ये शब्द बड़े लोगों से संबंधित निर्णयो, आदेशों, नियमों, से संबधिंत छलावे के लिए इस्तेमाल में लाया जाता है ताकि उपर्युक्त वर्गों(गरीब-गुर्बा, लोअर-मीडिल, या क्लास)के लोगों पर "कार्रवाई" की प्रासंगिकता बनीं रहे।

मधुकर राजपूत said...

कड़ा-कड़ा लिखो कड़ी से कड़ी प्रतिक्रिया लो।

pragya said...

कार्यवाई फिर कड़ी कार्यवाई फिर कड़ी से कडी कार्यवाई यानी शब्द निरर्थक हो गए हैं कोई मायने ही नहीं है

Vivek Rastogi said...

इससे लगता है कि हाँ फ़लाना डिपार्टमेंट बहुत गंभीर है, यह बताने के लिये कड़ी कार्रवाई शब्द का उपयोग किया जाता है, परंतु आज के मायने हैं कि केवल जनता को बताना कि हम गंभीर हैं पर जनता को पता है कि ये लोग इनसे अब कड़े रुप से धन से अपनी जेब भर लेंगे और जनता को कड़ा आश्वासन देंगे।

timeforchange said...

अरे रवीश जी इस देश मैं भाजपा और साम्प्रदायिकता के आलावा कई और भी समस्यायें हैं , अगर आप थोड़ा और जड़ों मैं जाएं तो पता चलेगा की अशिक्षा , गरीबी इन चीजों की मूलभूत कारन है , भारत ही नही दुनिया मैं कहीं भी अगर सबसे बड़ी बीमारी है तो ये है न की भाजपा , वैसे अगर आप भी कांग्रेस और वामपंथियों तरह लोगों को गुमराह करने की कोशिस कर रहे है तो कोई बात नही , अब हम जैसे युवा तैयार हैं , अगर मीडिया और आप को ध्यान देना ही है तो गरीबी और अशिक्षा पर ध्यान दें ।
धन्यवाद

अर्शिया said...

Ham is post ki kadee prasansa karte hain.
Aapko koi dikkat?
( Treasurer-S. T. )

Sher Afghan Khan said...

You have driven the people to think beyond the 'Kari Karwai' .it's enough to criticise any issue. Good i think excellent job done by you to intimate people as well as our govt.

सतीश पंचम said...

अच्छी पोस्ट।

डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल said...

रवीश जी, मुझे लगता है कि इस तरह की अभिव्यक्तियां हमारी मानसिकता को प्रतिबिंबित करती हैं. 'आप समय पर आएं' अगर बेअसर होता लगता है तो कहते हैं, 'आप ठीक समय पर आएं'. दुकानदार शाकाहारी कह कर संतुष्ट नहीं होता तो शुद्ध शाकाहारी कहता है. दीवार पर थूकना मना है कह कर मज़ा नहीं आता तो थूकने को सख्त मना किया जाता है. इसी तरह कार्रवाई बेअसर लगती है तो उसे कड़ा कर दिया जाता है. असल में हमें किसी भी निर्देश को मानने की आदत ही नहीं है. तभी तो पार्टी की वफादार सिपाही वसुंधरा राजे पार्टी आलाकमान के इस्तीफा देने के निर्देश को अनसुना करती हुई शक्ति प्रदर्शन करती है और बेचारी पार्टी उन्हें कड़ा, और कड़ा निर्देश देने की सोचती है.

वेद रत्न शुक्ल said...

मामला ठंडे बस््ते में डालने के लिए कड़ी से कड़ी कार््रवाई की बात की जाती है। यह प्रशासन की धोखेबाजी है।
अखबारों ने लिखना शुरू किया कि फलां ने मामले की कड़े शब््दों में निन््दा की है या कड़ी निन््दा की है। मूर््ख नेताओं ने इसे पढ़कर कहना शुरू कर दिया मैं घटना की कड़े शब््दों में निन््दा करता हूं। वे कड़े शब््द क््या हैं, वे नहीं बताते और न जानते।

manoranjan shrivastav said...

kadi karwai. kadi karwai kah ke neta huye ya poloce ke afsaran, ye chetane ki koshish karte hain ki we ise bahut hi gambhir tarike se le ke ess masale ko suljhane ke liye kadi mehnat karenge ya kar rahe hain. sath hi ye bhi darsane ko koshish karte hain ki we ise jaldi se jaldi niptana chahte hain.

Sawal ye nahi hai ki karwai shabd ke aage kadi shabd laga ke , karwai shabd ki prasangikta ko ,ahatva diya ja raha hai. ye thik waise hi hai jaise kisi ke naam ke aage Shri ya Shimati lagane jaisa hai. is tarah ke kuchh aur bhi shabd hain jaise kadi mehanat ya jaldi se jaldi.

koi mehnat karta hai ya kadi mehnat karta hai, kya fark fadata hai mehanat karne wale ko, per sunane wala to kadi mehnat karne wale ka hi gun gayega na ki kewal mehanat karne wale ka.

kam ko jaldi karna ya jaldi se jaldi karna. karne me me jitna time lgana hai wo to lagega per sunane me jaldi se jaldi kaam karna achha lagata hai aur pasand bhi kia jata hai.

aur waise bhi VISHESHAN, hi kriya ki visheshata batata hai.

IEDig said...

Join IEDig.com Make Friends, Share your Post With Friends, Vote for Best Post, Read Best Article, Show Your Best Article. And Many More…..

http://iedig.com

IEDig said...

Join IEDig.com Make Friends, Share your Post With Friends, Vote for Best Post, Read Best Article, Show Your Best Article. And Many More…..

http://iedig.com

Next Generation said...

प्रिय रवीश जी, जिन्ना के नाटक ने बी. जे. पी. क़ी पोल खोल दी है. विचार और किताबों से डरती है बी. जे. पी. आपका व्यन्ग सार्थक और सजिंदा है. हमारे वेब पोर्टल पर भी अपनी इनायत फर्माइये. चन्द्रपाल्
chandrapal@aakhar.org

शरद कोकास said...

गनीमत यह विशेषण बढिया के साथ लगाये जाने वाले " बहुत" से तो ठीक है दरसल लोगों को अन्देशा रहता है कार्र्वाई कड़ी होगी या नरम

विजय प्रकाश सिंह said...

आदरणीय रवीश जी,

कड़ी शब्द के उपयोग या कहें दुरुपयोग पर अच्छा लिखा है । असल में हमारा समाज आजकल ज्यादातर शब्दजाल से ही काम चलाने लगा है । इस विसंगति को आपने सही उभारा है ।

http://mireechika.blogspot.com