मन का रेडियो...हिंदी डे पर बजा

आज हिंदी डे है। कई सरकारी दफ्तरों में बाहर भगवती जागरण की बजाय पखवाड़ा वाला बैनर लगा है। पखवाड़ा। फोर्टनाइट का फखवाड़ा। इस फटीचर कांसेप्ट की आलोचना बड़े बड़े ज्ञानीध्यानी बिना बताये कर गए हैं कि पेटीकोट कैसे पुलिंग है और मूंछ कैसे स्त्रीलिंग है। हर भाषा इस तरह की दुविधाओं के साथ बनी होती है। अब हिंदी के साथ डेटिंग किया जाना चाहिए। डेट विद हिंदी।नवरतन तेल,विको वज्रदंती,डॉलर अंडरवियर और बाक्सर बाइक का उपभोग करने वाला हिंदी का बाज़ार। एक अखबार ने विज्ञापन दिया कि इस दीवाली पर हमारे पाठक पांच लाख वाशिंग मशीन खरीदेंगे। आप विज्ञापन देंगे न। हद है। यही ताकत है हिंदी की। और भाषा की ताकत क्यों हो। भाषा को कातर ही होना चाहिए। रघुवीर सहाय ने क्यों लिखा कि ये दुहाजू(स्पेलिंग सही हो तो) की बीबी है। मुझे तो ये दुहाई हुई गाय लगती है। जिसका अब दिवस नहीं मनना चाहिए। जिसके साथ अब डेटिंग करना चाहिए। चैट करनी चाहिए। चैट स्त्रीलिंग है या पुलिंग। किसने बताया कि क्या है।

देवनागरी में लिखे इंग्लिश मीडियम और साठ दिन में अंग्रेजी सीखा देने के बोर्ड। ६० दिन में हिंदी का रोग मिटा देने वाले और अंग्रेज़ी का भूत भगा देने वाले इंग्लिश बाबाओं के ज़ोर और पुण्य प्रताप से अंग्रेज़ी पहले से कहीं बड़ी भाषा है। चेतन भगत से सब अखबार लिखाना चाहते हैं। हमारे हिंदी के साहित्यकारों को गोष्ठियों ने ऐसा खपा लिया है कि कोई पूछता नहीं। लिखते भी हैं तो संस्मरण छाप। सत्तर के दशक में समाजवादी चिंतनों में धंस गए हैं। लोहिया पर विशेषांक निकालते हैं। हाशिया और विडंबना जैसे घिसे पिटे शब्दों के साथ अपनी चिंताओं की चासनी परोसते हैं।

हिंदी के चिंतकों में जीवन के प्रति उल्लास नहीं है। हमेशा दूसरों की गरीबी और दुख से निराश हैं। जैसे मार्क्स ने ये थ्योरी दी है कि अंग्रेजी बोलने वाले समाज में भिखारी नहीं होते। वहां सब शासक होते है। एक बार मेरे चाचा ने पड़ोस के लड़के से पूछ दिया कि भिन्न कितने प्रकार का होता है। लंगड़ा भिन्न जानते हो तो वो भकुआ गया। मैंने कहा कि ये इंग्लिश मीडियम में पढ़ता है। तो चाचा गुस्सा गए। भाषा जानना कोई योग्यता नहीं है। आप हिंदी या बांग्ला संयोग से जानते हैं। पैदा हो गए और सीख गए। अंग्रेजी के लिए अलग से मेहनत करनी होती है। बस इतने का फर्क है। लंगड़ा भिन्न नहीं आया तो बेकार हैं आप।

उसी दिन से ये लैंग्वेज का पोलिटिक्स साफ हो गया। हिंदी व्याकरण की तीन तीन किताबों को ओखली में कूट के फेंक दिया। कर्म को कहा तू कर्ता से पहले लग और करण को कहा तू भांड में जा। तभी एक गाना कानों में ऐसा धंसा कि निकला ही नहीं।
उल्फत के दुश्मनों ने कोशिश हज़ार की...सोलह बरस की बाली उमर को सलाम। लगा कि वाह क्या कारीगरी है भाषा की।

इसी दौर में एक और गाना अच्छा लग रहा था- तू इस तरह से मेरी ज़िंदगी में शामिल है। तभी बाबा नागार्जुन की कविता हाथ लग गई। ईंदु जी क्या हुआ है आपको..भूल गईँ अपने बाप को। हिंदी दमदार है भाई। जहां जहां वो लिंग विशेषज्ञों के कब्ज़े में नहीं हैं वहां वहां वो दमदार है। फिर पढ़ गया मैला आंचल तो लगा कि बाप रे क्या यथार्थ है। उसके बाद पढ़ा राग दरबारी तो पहली बार अपनी हिंदी में मुलाकात हुई ज़िंदगी से। भाषा की लंठई से। अब तो पखवाड़ा लिखा देखता हूं तो पखाना जैसा पढ़ा जाता है।


आज के दिन इन सब कमाल के रचनाकारों को सलाम। आज के दिन पखवाड़ा लिखने वालों को दुत्कार। हिंदी दिवस। क्या किसी भाषा का दिवस होना चाहिए। लिंग विशेषज्ञ और हिज्जे संपादकों की हालत का अंदाजा तभी हो गया जब दिल्ली में कृपया,कृप्या लिखा देखा। किशोर कुमार गा रहा था ज़िंदगी का सफर। हमारे अखबार लिख रहे थे जिंदगी। नुक्ता हटाओ और लगाओ का लफड़ा। जीवन लिखो न। ज़िंदगी काहे लिखते हो। ग़लत और सही हिंदी के द्वंद से परेशान हो गया। र में बड़ी ऊ और छोटी ऊ कब लगायें याद करना मुश्किल हो गया। तय किया कि जो मन कहेगा वही लिखूंगा। मन का रेडिया..बजने दे ज़रा। हिमेश रेशमिया का ये गाना कमाल का है। बैंड जब बजे तेरा तू भी साथ गा। क्या दर्शन है। गाओ न भाई। हिंदी का बैंड बज रहा है तो गाओ न। रोना क्यों रोते हो।

इंसान को किसी भी भाषा के प्रति निष्ठावान नहीं होना चाहिए। उसे भाषा में जीना चाहिए। कुछ जोड़ देना चाहिए और पुराने पड़ चुके शब्दों को घटा देना चाहिए। हमारे एक सहयोगी बार बार कहते हैं कि आक्सफोर्ड कि डिक्शनरी निकलती है तो हर साल दो चार सौ हिंदी के शब्द अंग्रेजी की लाइन में लग जाते हैं। हिंदी की कोई डिक्शनरी ही नहीं निकलती। फालतू शब्दों का भंडार बार बार छप रहा है। गोदाम में पड़े भूत की तरह संस्करणों के बहाने निकलता है।

हिंदी को कुछ नहीं हुआ। मर जाएगी तो मर जाएगी। गरीब का बच्चा भी इंग्लिश सीखना चाहता है। जो सीखने से रह गया है वो साठ घंटे में अंग्रेजी न जानने की एनिमिया से मुक्त हो जाना चाहता है। जब तक ये सांस ले रही है इसकी घड़कनों में समा जाइये। गोष्ठियों-सेमिनारों में जाना बंद कीजिए। तीन नंबर का बिस्कुट और चाय पीने।

बहुत बोर हो जाए तो कजरारे कजरारे सुनिये। किसी कवि को पढ़ते हुए आप पर्सनल से सवाल कीजिए। हिंदी में हर तरह के शब्दों को घुसाइये। हर तरह के शब्दों को अपनी तरह से लिखिये। दुकानदारों की साइन बोर्ड से सीखिये। जूस कार्नर। क्या है ये हिंदी या चोरी के शब्दों से हिंदी कहलाने की ठेठगीरी। हिज्जे की दुकानदारी बंद कीजिए। कीजिए या किजिए लिख दीजिए तो कोई फर्क नहीं पड़ता।

हिंदी पखवाड़े का विरोध कीजिए। बांग्ला डे। उर्दू डे भी मने। अब हिंदी हिंदी नहीं रही। यह न जाने कितनी बोलियों को डकार कर दुहाजू की बीबी बन कर अघा रही है। जिस भाषा में स्टेशन का अपना शब्द न हो। वो कैसे अकेले अपना जन्मदिन मना सकती है। इंटरनेट का जबरन अंतरजाल बनाकर फेंटा कसे जा रहे हैं। हिंदी सभी भाषाओं का प्रतिनिधित्व करती है। अकेले हिंदी में घंटा कुछ नहीं है। अस्तु।

14 comments:

सतीश पंचम said...

वैसे ये बात तो सच है कि हाशिये, चिंतन, संगोष्ठी जैसे शब्द सुनते ही जहन में बूढे पोपले चेहरे, श्वेत बालों वाले लोगों की तस्वीर उभरती है।

एक गीत सुना था जिसमें 'दिल' शब्द की जगह 'हृदय' शब्द का इस्तेमाल हुआ था - वह गाना था... कोई जब तुम्हारा 'हृदय' तोड दे....।खोज बीन करने पर एक औऱ गीत का पता चला - अनामिका फिल्म का जिसमें पूरा तो याद नहीं पर कहीं अंतरे में शब्द है कि ...तुझे 'हृदय' से लगाया...जले मन तेरा भी...तू भी तडपे.....

इन दो गीतों के बाद मैंने थोडा सोचना शुरू किया कि आखिर क्यों फिल्म लाईन में 'दिल' शब्द को 'हृदय' शब्द के मुकाबले तरजीह दी जाती है।

जो जबान पर चढे है....वही भाषा बढे है...कम से कम फिल्म लाईन में तो यही चलन है।

उम्दा पोस्ट।

Aadarsh Rathore said...

oलेकिन भाषा की आत्मा इसके मौलिक शब्दों में ही बसती है। जो आकर्षण उसी में 'जटिल' कहे जाने वाले शब्दों में है उतना 'अट्रेक्शन' 'टफ' 'वर्ड्स' में नहीं है।

जब कोई भूले-बिसरे शब्दों को इस्तेमाल करता है तो मन खुश हो जाता है। हां, दूसरी भाषाओं से अच्छे शब्दों को ग्रहण करने में कोई बुराई नहीं है।

संजय तिवारी ’संजू’ said...

आपकी लेखनी को मेरा नमन स्वीकार करें.

डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल said...

बहुत सही बात उतने ही प्रभावशाली लहज़े में कह दी है आपने.

निखिल आनन्द गिरि said...

हिंदी के मुहावरों का कोई मुकाबला है क्या...अंग्रेज़ी के दस मुहावरे बोलिए और हिंदी का एक...देखिए कौन भारी पड़ता है....पखवाड़ा मनाना एक सरकारी प्रक्रिया है.....जो मनाते हैं, उनके पास मनाने का पैसा आता है....बैनर छपकर मिलता है....माइक लगा हुआ मिलता है....
जमशेदपुर में एक बार ऐसे ही पखवाड़े में गया था सुनने-देखने कि हिंदी को क्या हो गया कि पखवाड़ा मन रहा है......शायद बैंक ऑफ बड़ौदा का था...एक दीया जलाया गया था...फिर दो-चार कर्मचारियों ने टो-टो कर एकाध कविता पढ़ी थी...बस, बच गई थी हिंदी.....
दरअसल, ये पितृपक्ष जैसा है....हम हिंदी को याद करते हैं....कितना भयानक है ऐसा सोचना भी..हिंदी को क्या याद करना है भाई, वो तो हमारे अंदर-बाहर हर जगह दिखती है, दिखेगी...हिंदी दिवस मनाना है तो टेक्सास या लास वेगास वाले मनाएं, हम पता नहीं क्यों मनाते हैं...
लेकिन, रवीश जी, हिंदी में अंग्रेज़ी के इस्तेमाल को स्वीकारना ठीक बात है मगर ऐसा नहीं करने वालों को दुत्कारना गलत....प्रभु जोशी जी का एक लेख है...आपने ज़रूर पढ़ा होगा...देखिए कैसे एक पूरे साइंटिफिक तरीके से हिंदी के अखबार भाषा के साथ मज़ाक कर रहे हैं....इसीलिए क्योंकि वो हिंदी की सही दो लाइनें लिखना-बोलना जानते ही नहीं....जानना तो ज़रूरी है ना, फिर चाहे जितने प्रयोग कीजिए, जितने नए शब्द मिला दीजिए....
हैप्पी हिंदी डे....

ARUNESH KUMAR said...

संस्कृत भाषा देव भाषा है, हिन्दी राज भाषा है, लेकिन दोनो भाषाओं की दशा और दिशा कुछ ठीक नहीं है, आज भी संसद से लेकर सड़क तक, नेताओं से लेकर अभिनेताओं तक अंग्रेजी को ही प्रमुखता देते हैं..आखिर भविष्य भी अंग्रजी का उज्जवल है, ऐसा मानने वाले मध्यवर्ग के अभिभावक भी अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में प्रवेश दिलाना चाहते हैं..अंग्रेजी का ज्ञान होना अच्छी बात है, लेकिन हिंदी का तिरस्कार करना बहुत गलत बात है. मात्र 14 सिंतबर को ही हिंदी दिवस मना लेने से हिंदी की दशा और दिशा नहीं सुधरेगी..इसके लिए आमजन से खासजन को हिंदी में कार्य करने के लिए एकजुट होना होगा

M.A.Sharma "सेहर" said...

धो दिया आपने तो बढ़िया वाले साबुन से .. :)) झकझोरता हुआ लेख !!!

साथ ही इस बार अच्छा वाला हिंदी दिवस मना लेते हैं ....शुद्ध ,साहित्यिक हिंदी में

सादर !!

pragya said...

Ravishji,

I agree with you ,there is no need to celebrate Hindi day as Hindi is soul of India.Days are celebrated for dead or forgotten things .I don't think Hindi language is dead or forgotten.

Regards,
Pragya

Satyajeetprakash said...

रवीशजी कम से आप हिंदी दिवस का विरोध न ही करिए तो अच्छा. कम से कम ये एक ऐसा दिवस है जिसके लिए हम हिंदी विकिपीडिया में लेखों की संख्या बढ़ाकर पचास हजार करना चाहते हैं. शायद 14 सितंबर की रात बारह बजे तक पूरा हो जाए. वादा तो नहीं करना चाहता हूं मगर, अगले 14 सितंबर तक हिंदी विकिपीडिया में यह संख्या बढ़कर एक लाख से ज्यादा हो जाएगी. बस, इतना कहना चाहूंगा कि जाकि रही भावना जैसी, प्रभू मूरत देखी तिन्ह तैसी की तर्ज पर हिंदी दिवस को लोग देखते हैं.

विजय प्रकाश सिंह said...

आदरणीय रवीश जी,

मेरे विचार में भाषा को एक दायरे में बांधना ठीक नही है । यह बंधती भी नही गतिमान रहती है । भाषा मे जरूरत के हिसाब से नये शब्द जुडते जाते हैं जैसे सामाज में परम्परायें। कुछ लोग इसे कहेगें कि भाषा समृद्ध हुई कुछ लोग इसे कहेगें कि भाषा अशुद्ध हो रही है । परंतु यह रुकने वाला नहीं है ।

आयोजन करने वाले, धंधा करने वाले और पोस्टर वाले तो होगें ही । लेकिन जो आम जनता की भाषा है वही सही है, सुखदाई और मन को शांति देने वाली है ।

Abhishek Kumar Srivastava said...

Bhasha ki koi jati nahi hoti hai !
Bhasha ka avishkar kewal bhavnao ke aadan pradaan ke liye hua tha mayne ye nahi hai ki aap kaun si bhasha ka istemaal bolne me yaa likhne me karte hain, balki bhasha ke mayne ye hain ki aap kitne behtar tareeke se apni baat auron tak pahuncha sakte hain bhale uske liye aap koi bhi bhasha ka pryog kijiye !
Lekin is andhi daud me ham apni pahchaan bana kar rakhe to behtar hoga warna hamari aane wali peedhiyan to bas kitabon me padengi ki hindi bhi koi bhasha hoti hi nahi !
Hindi me ye gun hai ki wo kisi bhi bhasha ko aatmsaat kar leti hai, lekin itna kuchh aatmsaat karlene ke baad aaj khud hindi ka astitva khatre me pad gaya hai.


Raveesh Ji Bhale ham saara andhkar mita sakne ki kshmata na rakhte hon, par kam se kam apne hisse ka andhkar mita kar kuchh to roshni kar hi sakte hain.

Harsh said...

raveesh ji ki lekhni ki jai ho....

राजेश उत्‍साही said...

मन का रेडिया खूब बजाया रवीश जी आपने। सही बात है हिंदी अगर हमारी भाषा है तो दिवस तो हमें रोज मनाना चाहिए। एक दिन ही क्‍यों।

Dipti said...

दिवस तो उन सबके मनाए जाते है जोकि कमज़ोर हो। जैसे कि महिला दिवस...