क्या उनकी जान बच सकती थी?

१३ मार्च २००८। शाम के पांच बज रहे थे। बाबूजी का ऑपरेशन चल रहा था। डॉक्टर ने कहा था कि मामूली है। इसके बाद घर जा सकेंगे। दिल्ली से मेरी दोस्त का एसएमएस आ गया। ऑपरेशन थियेटर के बाहर बैठा मैं जवाब दे रहा था कि इसके बाद ठीक हो जाना चाहिए। रिप्लाई आया कि सब ठीक ही होगा। बीच बीच में मैं बाहर जाकर पानी ला रहा था। कई लीटर पानी का गैलन ले कर आया। आखिरी बार लेकर आ रहा था। निश्चिंत होने लगा था। इस आपरेशन के बाद घर ले जा सकूंगा।

तभी एक बार ध्यान हुआ कि बहुत देर हो गई है। ओटी का दरवाज़ा खुला नहीं है। थोड़ी देर बाद एक डॉक्टर निकला। चुपचाप। किसी पाकेटमार की तरह। जेब काट कर। मैंने पूछा कि क्या हुआ। कोई जवाब नहीं दिया। एक बार और पूछा कि बहुत लंबा चला ऑपरेशन। आपने तो कहा था कि मामूली है। डाक्टर अपनी कमीज़ पहन रहा था। इतना ही बोला कि नहीं सब नार्मल है।

थोड़ी देर बार ओटी का दरवाज़ा खुला। स्ट्रेचर पर बाबूजी। एक स्ट्रेचल को लिफ्ट तक ले जा रहा था। दूसरा पानी का बोतल हाथ में उठाये था। मेरी नज़र भी धोखा खा गई। दोनों ने कहा कि देख लीजिए। थोड़ी देर में होश आ जाएगा। मां ने देखते ही कहा सब खत्म। मैंने रोक दिया। बोला कि सब ठीक है। होश आएगा।

पंद्रह मिनट बाद अटेंडेंट चिल्ला रहा था। रवीश कुमार कौन है। मैं भाग कर पहुंचा। डॉक्टर ने कहा आपके फादर को कार्डियेक अरेस्ट हो गया है। हालत गंभीर हो गई है। बचाना मुश्किल है। मैं भाग कर बड़े भाई की तरफ आया। फिर आवाज़ लगी, रवीश कुमार। मैं फिर भागा। इस बार जवाब मिला,नहीं बचा सकते। जिनको बताना है इंफोर्म कर दीजिए। मैंने कहा क्या खत्म। तब बोला, नहीं। हम कोशिश कर रहे हैं। थोड़ी देर बाद बोला। अब नहीं बचा सकते।

मेरे सामने सबसे पहले उस डॉक्टर की तस्वीर घूम गई। जो चुपचाप निकला था ओटी से। हाथों को पोछते हुए। एक चोर की तरह। फिर बाद में लिफ्ट तक स्ट्रेचर पर लेटे हुए बाबूजी। प्राण तो तभी उड़ गए थे। दांत जकड़ गए थे। आंखें पलट गईं थी। उनकी मौत तो ओटी में ही हो चुकी थी। कई लीटर गैलन पानी का क्या किया होगा उन लोगों ने। मैं किस लिए भाग भाग कर लाता रहा। तब क्यों नहीं बताया कि ऑपरेशन नाकाम रहा। कार्डियेक अरेस्ट का नाटक क्यों। हमें मौत का समय भी गलत बताया गया। शाम छह बजे का। मुझे लगता है जिस वक्त मैं अपनी दोस्त को एसएमएस कर रहा था, उसी वक्त मेरे बाबूजी हमसे बहुत दूर जा चुके थे। कोरी आशाओं और बेकार निराशाओं के झंझटों से निकल कर।

मेरे दिमाग में डॉ हेमन्त की आवाज़ गूंजने लगी। इन्हीं से बाबूजी इलाज करवा रहे थे। किडनी की बीमारी थी। बाबूजी भी लापरवाही बरतते थे। मगध अस्पताल में भर्ती कराया तो डॉ हेमन्त ने जाने से मना कर दिया। कई बार गिड़गिड़ाया कि आप लंदन से आए हैं। आपके लिए इगो प्रॉब्लम क्या। एक बार चल कर देख लीजिए कि इलाज ठीक हो रहा है कि नहीं। उन्होंने मना कर दिया। एक अहसान कर दिया कि अपने किसी जूनियर को फोन कर दिया। डॉ अमित। होंटा सिटी से आने वाला यह डॉक्टर पान पराग चबाता हुआ मेहनती लगता था।

१२ मार्च को मैं अपने बड़े भाई के साथ दस बजे रात को मिलने गया था। डॉ हेमन्त अपनी बात पर अड़े रहे। कहे कि अस्पताल से झगड़ा है। हमें उनसे कोई शिकायत नहीं है। मगर उनकी बात आज तक रातों को जगा रही है। बात बात में उन्होंने पूछा कि ऑपरेशन कौन कर रहा है। हमने नाम बताया तो बोल बैठे कि प्रवीणवा....अरे...उ का करेगा..। मैंने पूछा कि क्या वो ठीक डॉक्टर नहीं हैं। तब तक डॉ हेमन्त ने अपनी बात बदल ली। कहा कि नहीं मेरा मतलब वो नहीं है। पटना में दो ही लोग तो करता ही है।


तेरह मार्च को जब ओटी से निकले तो डॉ प्रवीण सहमे हुए से क्यों थे। क्यों उन पर एक डॉक्टर का विश्वास नहीं झलक रहा था। क्या वो अपनी नाकामी पर लीपापोती करने के लिए मुझसे पानी के गैलन मंगाते रहे। मैं भी मूरख की तरह भाग भाग कर गैलन ला रहा था। बिल्कुल भूल गया कि बाबूजी के आपरेशन में इतनी देरी क्यों हो रही है। आंधा घंटा बोला था, तीन घंटा क्यों लगा। क्या इस बार भी प्रवीणवा ने वही किया जो डॉ हेमन्त कहते कहते रुक गए थे। डॉ हेमन्त ने क्यों नहीं कहा कि कुछ भी हो जाए इस डॉक्टर से ऑपरेशन मत कराना। क्या डॉक्टर के लिए किसी का मरना सिर्फ जैविक प्रक्रिया भर है। क्या उनका अपने मरीज़ों से कोई नाता नहीं बनता। पता नहीं।

मैं नहीं जानता कि मेरे पिताजी बच सकते थे या नहीं। पर पता नहीं क्यों बार बार लगता है बच सकते थे। पटना के इस मगध अस्पताल का अनुभव अच्छा नहीं रहा। बीस रुपये लेकर दरबान आईसीयू में लोगों को जाने देता था। लगता रहा कि कहां फंसा दिए अपने बाबूजी को। मगर बार बार मेरा शक इस विश्वास के आगे हार जाता था कि डॉक्टर तो भगवान ही होता है।

45 comments:

Ratan Ratnesh said...

Can't you sue the bastard? This has to be medical mal practice. Thanks for telling the story my friend.

Hari Joshi said...

रवीश जी,
ये सभी जगह है। ये घटनाएं रोज होती हैं। मृत व्‍यक्ति को वेटीलेटर पर रखकर बिल बढ़ाया जाता है। बिल चुकाने तक शव को बंधक बनाकर रखा जाता है।
चिकित्‍सा भी अब व्‍यवसाय है। सेवा नहीं। हर नर्सिंग होम में डाक्‍टर सेट हैं; दूसरा वहां नहीं जाता। सारा खेल कमीशन से लेकर सामंजस्‍य का है। लेकिन अगर कोई डाक्‍टर किसी नर्सिंग होम में नहीं जाता तो वह बहुत महीन तरह से कैंची चलाता है।
ऐसे केस हम रोज देखते हैं।

creativekona said...

भाई रवीश जी ,
इस समय प्राइवेट अस्पतालों ,नर्सिंग होम्स या फिर सरकारी अस्पताल सभी जगह कमोबेश
हालत एक जैसे ही हैं .बाबूजी के साथ जो हुआ ...उसके लिए हम जिम्मेदार किसे ठहराएँ ?
इस पूरे तंत्र को ?उस डाक्टर को जिसने उनका आपरेशन किया या डा०हेमन्त .....जो शायद देखकर उनकी halat का सही अंदाज लगा सकते थे .
मैंने बचपन में अलाहाबाद में सुना था एक डाक्टर के बारे में जो आपरेशन थियेटर में पेट खोलने के बाद मरीज के घर वालों से कहते थे की पचीस हजार रुपये लाओ तो आपरेशन पूरा होगा .लखनऊ के ek अस्पताल में एक दूसरे अस्पताल के वार्ड ब्वाय को डाक्टर बन कर नौकरी करते देखा है .एक सरकारी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर एक ही सिरींज से कई लोगों को सुई लगते देखा है (विरोध करने पर देख लेने की धमकी ).....इस पूरी व्यवस्था की जड़ें बहुत गहरी हो चुकी हैं .इन जड़ों को साफ करना ...गड़बडियों को रोकना सरकार.. के हाथ में है ...हम सब इसके विरोध में सिर्फ एक कोशिश ही कर सकते हैं . आपके मन में छुपी पीडा को मैं समझ सकता हूँ .बाबूजी की स्मृतियों को संजो कर रखिये .वही आपको बराबर शक्ति देंगी .
हेमंत कुमार

mohit said...

tabhi safdarjang hasptaal me aaye din hadtaal hoti rehti hai..aur naa janey kiney log inki laparwaahi aur laalach ka shikaar hotey rehtey hai..khair ye sab to abb aam baat hai..

रंजना said...

Aur dhandhon ki tarah chikitsa bhi to ek dhandha hi bankar rah gaya hai.Hridayheen kora dhandha....
Kya kaha jaay....

P.N. Subramanian said...

मित्र,
ऑपरेशन करवाने के पहले डॉक्टर के कुंडली को (antecedents) देख लेना चाहिए. जैसा जोशी जी ने कहा, हर जगह यही आलम है. दुःख इसलिए अधिक होता है क्योंकि रिश्तेदारों को धोके में रखा जाता है.और उनकी असफलता के लिए कोई और कहानी गढ़ ली जाती है. आभार.

इरशाद अली said...

मैं इसे पोस्ट नही कहूंगा। ये तो जरा सा गम और जरा सी आपबीती है। मनविंदर जी ने भी चार दिन पहले ही ऐसा निजी वाक्या कहा था। बेहद सवेंदनात्मक।

Arvind Mishra said...

रवीश ,मुझे अपने पिटा जी के देहावसान की याद हो आई है -लगभग ऐसा ही माजरा हुआ -मरे क्लासफेलो डाक्टर उन्हें पेट दर्द की दवा देते रहे और सुबह मैसिव हार्ट अटैक में उनका देहावसान हो गया -अकस्मात ! मेरा मित्र डाक्टर -गधा बोला कि डाकटर से भी मानवीय भूले हो जाती है और उसकी भी कुछ सीमायें होती हैं -पर पिता जी तो जा चुके थे ! उम्,र केवल ६२ वर्ष !
मैंने आज तक उसे माफ़ नही किया !
डाक्टरों पर अब आंख मूद कर भरोसा नहीं किया जा सकता !

Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna said...

रविशजी
पटना में डॉक्टरों के ऐसे किस्से यात्रा तत्र सर्वत्र पसरे हुए हैं.
मेरी आँखें नम हो गयी. यातना के जिस दौर से आप गुजरे ,उसके सहने के लिए साहस और संयम की जरूरत पड़ती है.जरूरत इस बात की है की ऐसी घटनायों को रिकॉर्ड कर उजागर किया जाय .वैसे नैतिक पतन पर किसी पेशे का एकाधिकार नहीं है पर बिहार के सन्दर्भ में डॉक्टरों के नैतिक पतन का कोई जोडीदार नहीं है.
सादर

Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna said...

पुनश्चः रविशजी ,मेरा अनुमान है की डॉ हेमंत आप की सख्सियत से वाकिफ होंगें.हो सकता है कोई सामजिक सन्दर्भ और जान पहचान भी रही हो .और तव वह सख्श सही बात कहने से परहेज करे . इसे कहतें हैं असली बेईमानी .दूसरी बात ,जैसा की ऊपर में रतन जी ने कहा की कम से कम कानून सम्मत प्रयास तो किया जा सकता था . असह्य संकट के उस समय आप लोगों की मानसिक स्थिति कैसी रही होगी अंदाज लगाया जा सकता है.

उपाध्यायजी(Upadhyayjee) said...

बहुत दुःख हुआ ये पढ़ कर | डॉक्टरों की मनमानी के आगे एक नहीं चलती | आज तक इस क्षेत्र में पारदर्शिता नहीं आ पायी | मुझे तो लगता है की डॉक्टर हेमंत ज्यादा जिम्मेदार हैं उस पाकिटमार से इस मामले में | इनके खिलाफ कुछ स्टिंग operatioin नहीं हो सकती ? आप तो पत्रकारिता से जुड़े हैं |

Syed said...

रविश जी, कभी ये सुना करते थे की डॉक्टर तो भगवान होता है. पर हमारे साथ पिछले दिनों एक ऐसी घटना हुई की अब इस भगवान वाली बात पर यकीं करना मुश्किल लगता है. मेरी ९ माह की बच्ची को खेलते खेलते चोट लग गयी. हालांकि ज्यादा गहरी नहीं थी पर माँ-पिता का मन नहीं माना और रात के उस वक़्त ही अस्पताल के लिए भागे. यकीं तब टूटा जब पहले, दुसरे और तीसरे अस्पताल में भी डॉक्टर ने अपनी नींद ख़राब करना जरूरी नहीं समझा.

संगीता पुरी said...

बहुत तकलीफ हुई आपकी आपबीती पढकर .... अब डाक्‍टर भगवान का रूप नहीं रह गए हैं ... साल होने को है .... याद आना स्‍वाभाविक है ... बहुत संवेदात्‍मक आलेख ।

manolok said...

मेरी संवेदना, इश्वर आपको शक्ति दे ।

अक्सर नाकामी के बाद डॉक्टर अपनी brand image को बचाने की पुरजोर कोशिश करते हैं। कुछ चिकित्सकों के लिए के लिए रोगी महज निष्प्राण प्रयोगवस्तु या कल्पवृक्ष ही है । हर पेशे में सेवाभाव नगण्य और व्यावसायिकता ज्यादा आ गई है। देखा जाए तो दुनिया की मंडी में हर कोई हर रोज़ ख़ुद को थोडा थोडा कर के बेचता जा रहा है ।

ये सब भ्रष्टतंत्र के साइड एफ्फेक्ट्स हैं , गरीब तो इलाज़ के बारे में सोच ही नही सकते बस मौत के आने का इंतज़ार करते रहते हैं। हमारे इलाके में गवर्नमेंट हॉस्पिटल में आयेदिन लाशें सड़ने की या मरीजों के लिए नकली दवाईओं के खरीद की ख़बर आती रहती हैं ।खैर "जानप्रतिनिधियों" की ठाटबाट में कोई कमी नही इन्हे सर्दी -खासी भी हो तो प्रायः अमेरिका जाते हैं या डॉक्टर ही बुलवा लेते हैं।


जिस देश में उच्चतम न्यायालय सीबीआई ,नेताओं ,नौकरशाहों .... की कार्यसंस्कृति से त्रस्त होकर उन्हें फटकार लगाते लगाते थक जाए,जिस देश में चोर और कोतवाल सब मिले हुए हों, उस देश में कुछ भी ठीक कैसे रहे ?

अपना देश महान नही है रविश जी ,खोखला हो चुका है ,हमलोग अकारण आत्मप्रशंसा के नशे में चूर रहते हैं ।यही हमारी आज़ादी के बाद से आज तक की उपलब्धि है ।गांधी,सुभाष ,पटेल ....के लिए कितना सुंदर तोहफा तैयार किया है हमने फूले ना समा रहे होंगे वो ।

बोधिसत्व said...

मेरा मानना है बच सकते थे पिता जी....आप अगर उस आपरेशन मैं शामिल लोगों से बात करें तो सारी सच्चाई मिल जाएगी....जिस मामले की आपको जानकारी न हो उसी में सामने वाला भगवान बन बैठता है....क्या कर सकते हैं....हर शहर में कई-कई प्रवीनवा हैं...कहाँ जा सकते हैं इनसे बच कर

सत्यप्रकाश आज़ाद said...

galat huaa, lekin virodh jaroori hai,tareeke bahut saare hain. taaki aage se kisi praveenava ki esa karane ki himmat na pade,

Raag said...

I think you must sue the Doctor, that would at least set a precedent that Doctors cannot run away from their responsibilities!

I am really sorry for your loss.

उन्मुक्त said...

हम अक्सर इस तरह के अनुभवों से गुजरते हैं।

मेरी मां को दिल का दौरा पड़ा। मैंने डाक्टर को बुलाया पर उसने आने से मना कर दिया। डाक्टर लोग उस दिन हड़ताल पर थे। चिकत्सा न मिलने के कारण मेरी मां की मृत्यु हो गयी।

आशीष said...

इस दुख को या तो आप या फिर बाबू के करीबी ही समझ सकते हैं। दुखद है घटना

रमण कौल said...

एक वर्ष होने को आया और आप आज ऐसे सुना रहे हैं जैसे कल गुज़री हो। निश्चय ही आप को यह विचार हर एक दिन सालते रहे होंगे। मेरी संवेदनाएँ। बाबूजी वापस तो नहीं आएँगे, पर डॉक्टर को सबक सिखाया जाना चाहिए।

रश्मि प्रभा said...

is ghatna par us dr ko gali dekar ab kya karenge hum ! main stabdh hun,maun aapki soch me shareek hun..........

आनंद said...

रोंगटे खड़े कर देने वाली घटना है। अस्‍पतालों को लेकर मैं भी बहुत हताश हूँ। डॉक्‍टर तक़लीफ़ से गुजरते मरीज और उसके असहाय रिश्‍तेदारों का दर्द कैसे अनदेखा कर सकते हैं? मैं भी डॉक्‍टरों के रवैये बहुत क्षुब्‍ध हूँ। न केवल डॉक्‍टर, बल्कि पूरी चिकित्‍सा प्रणाली से। चाहे सरकारी हो या प्राइवेट, अब तो अस्‍पताल जाने के नाम से दहशत होने लगती है। पिछले दो तीन वर्षों से बहुत कड़वे अनुभव हुए हैं।

दिल्‍ली में राम मनोहर लोहिया, या एम्‍स में इतनी भीड़ है, कि बयान करना मुश्किल है। परची बनवाने के लिए घंटों लगते हैं, फिर डॉक्‍टर के आगे अपना नंबर आने में घंटों लगते हैं, एकाध टेस्‍ट लिख कर दे, तो उसके लिए पंद्रह दिन बाद का समय दिया जाता है। तयशुदा दिन में पंद्रह मिनट देर से पहुँचो तो अगली तारीख़ दे दी जाती है। डॉक्‍टर क्‍या, नर्स क्‍या, क्‍लर्क क्‍या, सभी अफसर हैं। कोई सीधे मुँह बात नहीं करता

आपको विश्‍
वास नहीं होगा कि एम्‍स में एक-एक छोटे से कूपे जैसे केबिन में डॉक्‍टर बैठता है। ब्‍लड टेस्‍ट (सामान्‍य जांच) करने के लिए सुबह से लाइन लगती है। खिड़की खुलने के बाद 50 या 75 कूपन दिए जाते हैं, जिनके लिए छीना झपटी होती है। जिनके पास कूपन है, वही उस दिन अपना टेस्‍ट करवा सकते हैं। जिन्‍हें नहीं मिल पाया, उन्‍हें अगले दिन आना पड़ता है।

क्‍या इन्‍हें बेहतर बनाने के लिए कुछ किया नहीं जा सकता?

- आनंद

Priyanka Singh Mann said...

raveesh ji
aap ki peeda samajh sakti hoon aur aap ke dukh ko baantana chati hoon.
kamobesh har jagah ka haal yahi hai..sarkari haspatal jaise ehsaan sa karte hain aur five star hospitals jyada se jyada paisa nikalne ki firaak main.. 2 rupaye jyada banane ke liye purani syringe
prayaog main laane wale doctors nain gujarat main jo kiya hai wo hum sab jaante hain..har mareez bas ek bed number hai..ek case!!

गुस्ताख़ said...

पिता को खोना बेहद दर्दनाक होता है.. बुहत पहले आज से २६ साल पहले ऐसे ही हालातों में पिता को खो चुका हूं। सिर्फ दो साल का था.. मां ने ही पिता बनकर पाला। लेकिन पिता जी उस वक्त महज ४२ साल के थे। डॉक्टर हमेशा भगवान नहीं होते..होते भी होंगे तो फीस या ऐसी ही जु़ड़ी हुई चढावे की रकम पर ज्यादा ध्यान रहता है उनका।

रज़िया "राज़" said...

आपकी पोस्ट पढकर मुज़े अपनी माँ पर बीता हादसा याद आ गया, अपनी मां की बिमारी का टेस्ट करवाने के बहाने एक अस्पताल जो मेडीकल एजुकेशन इंन्स्टीट्युट के नाम से भी जाना जाता है, उसने मेरी माँ पर जेसे क्लास चलाइ। करीबन 7 से 8 मेडीकल स्टुडन्ट्स ने ओपरेटेड पेट पर जोरों से सोनोग्राफ़ी टेस्ट कीये।
सीटी स्केन किया।
मेरी माँ घंटों तक अकेली रही, बाहर आने पर कहा "बेटी ये लडके तो मेरी बिमारी नहीं ढुंढ रहे ये तो कुछ सीख रहे थे, यहाँ मेरा इलाज नहिं होगा"।
उसके बाद हमें कहा गया कि आपकी माँ तो 10 या 12 दिन की महेमान हैं कितना भी पैसा ख़र्चोगे रिज़ल्ट शुन्य है। हम बहोत रोये।माँ के लगातार करीब रहे।
एक सरकारी होस्पीटल के रेडीएशन ओर किमोथेरपी से माँ आज भी हमारे साथ है।
ये तीन साल पहले कि बात है।

जी चाहता है कि उस अस्पताल के रिपोर्ट देनेवाले डोकटर के पास अपनी माँ को ले जाउं ओर उस डोक्टर को ज़ोर से चांटा मारुं।इसलिये नहिं कि माँ आज भी ज़िन्दा है पर इसलिये कि माँ कि मोत की आहट से हमलोग डर डर कर मरते रहे।

कुमार आलोक said...

पूरा वाक्या बिहार के जीर्ण शीर्ण हो गयी व्यवस्था की कहानी कहता है । कभी पीएमसीएच देश का प्रतिष्ठित अस्पताल था ..लोग दूर दूर से इलाज को यहां आते थे । लेकिन अफसरशाही और भ्रष्ट राजनीतिक व्यवस्था ने इस संस्थान का कबाडा निकाल दिया । जीवन और मौत पर किसी का वश नही ये ठिक है लेकिन आप के जैसा बुद्धीजीवी मगध या राजेश्वर नर्सिंग अस्पताल की ओर रुख करें मुझे समझ में नही आया । आप ने बहुत बडा रिस्क लिया जिसकी बडी कीमत आपको चुकानी पडी । आप चले जाएं एम्स में वहां ७० फीसदी रोगी बिहार से है ..चादर कंबल लेकर असपताल परिसर में दिन काट रहे लोगों को इस अस्पताल पर अटूट विश्वास है । यह साबित करता है कि बिहार में शिक्शा और स्वास्थ्य सुविधाओं का आज से नही बल्कि वर्षों से जनाजा निकला हुआ है । मेरे पिताजी हद्य रोग से ग्रसीत है एम्स के डाक्टरों ने बाइपास बोल रखा है । तारिखों का चक्कर है कब मिलेगा पता नही लेकिन मुझे भी अन्य लोगों की तरह एम्स पर पूरा भरोसा है । बहुत कारुणिक वर्ण किया है आप ने इसलिये मुझे छोडा गुस्सा आ गया माफ करेंगे ।

SKV said...

भाई रवीश जी
जो आपके साथ हुआ वह बहुत ही दुर्भाग्य पूर्ण है लेकिन यही तो हमारे देश की सच्चाई है. आपको शायद याद होगा कि मैंने आपकी जेंडर वाली पोस्ट में भी लिखा था कि इन सब हालातों के लिए सिर्फ और सिर्फ भारत के प्रधान मंत्री ही जिम्मेदार हैं. हो सकता है कि मेरे इस विचार से बहुत से लोग सहमत न हों लेकिन यही सच्चाई है.
भारत को आजाद हुए साठ बरस से ज्यादा हो चुके हैं और इन साठ बरसों में जब जब देश में कुछ अच्छा हुआ तो वो केवल तब जब उसमें प्रधान मंत्री स्तर पर पहल हुई अन्यथा बाकी तो इस देश में जनता को नेताओं ने सिर्फ गुमराह ही किया है. और आप देखियेगा कि भविष्य में भी जब कभी कुछ सुधार होगा तो वो देश के प्रधान मंत्री के द्वारा ही होगा. ऐसा मैं इसलिये कह रहा हूँ क्योंकि ये प्रकृति का नियम है और प्रकृति के नियम शास्वत होते हैं.. अब देखिये ना नदी अपने स्त्रोत से निकलती है यदि स्त्रोत के बाद कहीं पर नदी में अशुद्धि मिलती है तो उसे उस अशुद्ध स्त्रोत को रोक कर अथवा बंद करके ठीक किया जा सकता है किन्तु यदि स्त्रोत ही प्रदूषित हो जाए तो क्या नदी को प्रदूषण मुक्त किया जा सकता है, कदापि नहीं. असल में हम जीवन में प्रकृति प्रदत्त नियमों को भुलाए बैठे हैं. इसीलिये चारो तरफ अव्यवस्था, महंगाई, भ्रष्टाचार का बोलबाला है.
अब महंगाई को ही ले लीजिये, आज सोने का दाम 16000/- के आस पास है क्यों ? क्या आज अचानक शादियाँ ज्यादा होने लगी हैं या फिर लोग कपडों की जगह सिर्फ सोना पहनने लगे हैं. नहीं, सोने के दाम सटोरियों ने बढा रखे हैं. और वो इस खेल में मोटा मुनाफा कमा कर पतली गली से निकल जायेंगे और मारा जायेगा आम आदमी ही. तो इस सबके लिए कौन जिम्मेदार है ? प्रधान मंत्री और उनकी चांडाल चौकडी ही न ! आज भारत को सिर्फ इमानदार ही नहीं बल्कि एक इमानदार और देश हित में काम करने वाले कर्मठ प्रधान मंत्री की सख्त जरूरत है.
एस. के. वर्मा
28/2/2009

निखिल आनन्द गिरि said...

मुझको तो हर एक क़दम पर डर लगता है,
कहाँ-कहाँ तक तुमको मैं बतलाऊं पापा....

चार दवाओं की पुर्जी भर लिख देने के,
डॉक्टर पूरे दिन की कमाई ले लेता है,
धरती के भगवान अगर ऐसे होते हैं,
वो भगवान नहीं दिखता है, मुझे सुकूं है....
http://kavita.hindyugm.com/2008/11/blog-post_09.html

bole-bindas said...

RAAVEESH JI,
AAJ KE POONJIVADI YUG ME HAR OR PAISE KA HI BOLBALA HAI........AAJ KA DOCTOR BHI PAISE PAR HI CHALTA HAI.SAB PAISE KI BHASA SAMJHTE HAI.............

Brijesh Dwivedi said...

bhaiyaji behad marmik ghatana hai....
esa aur asptalo me bhi hota hai..

दर्पण साह 'दर्शन' said...

Who should be blamed for ?
Hemant !! Pickpockter Doctor !!! Circumstances ?
And even finding the culprit could not bring back the life of your father.

It's all sad for that moment,but more specifically, frustating and demotivating for rest of the life (demotivating w.r.t the infrastructure, facilities and future of india).

It is to be said that in this materealstic world 'loss of one is profite of other' be it 'your (sad) case' be it 'slumdog millionare' be it'sensex' or be it any ting for that matter ....

No body can help it ! Nobody !!
and even if can , may not !!!

now a days there is so much f@#@ing difference between 'can' and 'may' !!!

So very sad !!! Really!!!

p.s. : I read most of your post but didn't comment more that once prior to this (just for the sake of marketing) but this was really shaking story(or rather incident).

--------------R.I.P Your Father----------

Shiva abhimanyu singh said...

maine kuch samay tak medical field me kaam kiya jaha rozana garibo ka ek ek paisa ilaaj ke naam par rakhwa liya jata tha unse wo test bhi karwaye jate the jinki koi bhi zarurat nahi hoti thi kulmila kaar aaj ki date me ye ek dhandhe se jyada kuch nahi rah gaya hai aaj ke samay me kisi doctor se samwedansheel hone ki aasha bemani hai.

manolok said...

डॉक्टरों को लेकर मेरा भी कुछ अनुभव है ,बात २००५ की है मै अपने पिताजी के हेर्निया (आंत उतरना ) के ओपरेशन के लिए एक क्षेत्रीय अस्पताल में गया सर्जन ने हामी भर दी पर बेहोशी के डॉक्टर ने अनियमित हृदय्स्पंदन (arrythmia) के कारण मना कर दिया ,यही बात वहीँ के अन्य तीन अस्पतालों में सुनने को मिली . बल्कि अंतिम अस्पताल के cardiologist (ह्रदय रोग विशेषग्य ) ने syncope (बेहोशी) आने पर मंहगे pacemaker (कृत्रिम विद्युत हृदयगति उत्तेजक ) लगा डालने तक की सलाह दे डाली . २००८ में मै मद्रास से अपने पिता का शल्यक्रिया करवा कर लौट आ चुका हूँ वहाँ मेरे पिता को किसी डॉक्टर या cardiologist ने कभी गंभीर ह्रदय दोष नहीं बताया या महँगी मशीन लगवाने की ही सलाह दी .
चिकित्सा क्षेत्र में कभी कभी ऐसे विरोधाभाष के उदाहरण मिल जाते हैं . शायद मेरे क्षेत्र के चारों अस्पताल के चिकित्सकों के सलाह ,२००५ के मेरे पिता शारीरिक जांच और दशा के अनुसार सही थे . शारीर निरंतर परिवर्तनशील है और हो सकता है मेरे पिता के शारीरिक दोष प्राकृतिक रूप से स्वतः (या हो सकता है योग से ) 2 सालों के अंतराल के दौरान ठीक हो गए हों ,तभी तो मद्रास के डॉक्टरों ने ह्रदय से निरोग घोषित किया .वैसे भी मनुष्य चाहे कितना भी विकसित हो चुका हो प्रकृति के हर रहस्य को मुट्ठी और दिमाग में करने से वह अनगिनत कोष दूर है .वाकई रोज़ बदलती मोटी मोटी पुस्तकों के साथ कदम ताल बैठाना चिकित्सकों के लिए काफी कठिन है ,पर जो कुछ भी हो अनुभवहीन और योग्यताहीन चिकित्सक मरीजों के जान के साथ भरसक खिलवाड़ ना करें क्यूंकि एक मरीज़ के साथ परिवार के कई सदस्यों का उम्र भर का मोह जुड़ा रहता है . इसके अतिरिक्त किसी मरीज के रोग के निदान के लिए चिकित्सा के विभिन्न विभागों के बीच आवश्यकतानुसारसामंजस्य होना चाहिए .
मद्रास में जांच के दौरान कई प्रशिक्षु चिकित्सा छात्र मेरे पिता के शारीर को टो टो कर रोग को जानने -सीखने में परेशान थे और यह सब देखकर मुझे थोडी हसी आ रही थी .खैर अब बिना प्रशिक्षण के तो कोई डॉक्टर बन ही नहीं सकता न और हम ये भी नहीं कह सकते की प्रशिक्षण के लिए खाली लाचार गरीबों का ही देह होता है . हाँ शारीर के साथ छेड़छाड़ और मज़ाक न हो और इलाज़ की निर्णायक प्रक्रिया योग्य और अनुभवी वरिष्ट चिकित्सकों के द्बारा या उनकी निगरानी में ही हो.
इसी बीच सफ़र के दौरान ट्रेन में मेरी मुलाक़ात अक्सर घमंडी और नवाबी छांटते नौसिख्वे इन्जिनेअरों से इतर एक इन्टर्न डॉक्टर से हुई उसने अपने कुछ दुखद अनुभवों को मेरे साथ बांटा , उसने कहा की अस्पतालों में मरीजों के भीड़ को देखते देखते खाने पीने की भी सुध नहीं रहती ,ऊपर से वार्ड में परिजन अपने-अपने मरीजों पर ज्यादा ध्यान डलवाने के लिए दबाव डालते रहते हैं ,कभी कभी तो वे बिना मजबूरी समझे अभद्र व्यवहार और हाथ उठाने से भी नहीं चूकते . उनके अनुसार दिन भर के काम के बाद थके-चिडचिडे मिजाज को शांत करने के लिए सोने और मच्छरदानी लगाने का भी वक़्त कम ही मिलता है .कभी कभी कुछ लोगों के द्वारा मरीजों को अस्पताल में भरती कर खिसक जाने के कारण उनके लिए अतिरिक्त देखरेख और आवश्यकता पड़ने पर अपना रक्तदान भी करना पड़ता है . सचमुच उस सादाजीव चिकित्सक का सबके साथ विनम्र और परोपकारी व्यवहार के कई उदाहरण सफ़र के दौरान देखने को मिले यहाँ तक की उसने हमारे झोले- बोरे को भी स्टेशन पर टांग कर उतारने में सहायता की क्या कहूं .
वहीँ मेरे भाई के एक ब्रह्मचारी चिकित्सक दोस्त का भी स्वभाव कुछ ऐसा ही है उसका सोना,उठना ,बैठना, और खाना-पीना सारा महाराष्ट्र के के. इ.म अस्पताल में मरीजों के देख-रेख करते ही होता है .
इस दुनिया में शैतान और भगवान् दोनों हैं रविश जी पर शैतान बहुशंख्य होते जा रहे हैं जिनके खिलाफ हमे आवाज़ उठाना है .पैसों के बल पर बने कुछ चिकित्सकों का नीव ही झूट-फरेब की ईंटो से तैयार होता है ,मैने वैसे चिकित्सकों को भी देखा है जो मरीजों को इसीलिए भगा देते हैं क्योकि उनके पास पैसे नहीं होते हैं तो कुछ मरीजों को बिल ना चुका पाने पर बंधक बना धमकाने लगते हैं वहीँ कुछ अपने खर्च पर इलाज़ कर देते हैं . कुछ किडनी चुराते हैं तो कुछ नकली दवाओं और सिरिंजों के धंधे में संलिप्त रहते हैं . कुछ फिजूल के जांच और फीस मरीज़ के माथे मढ़ते हैं .कुछ तो अपने व्यवहार से डॉक्टर लगते ही नहीं .कुछ वेतनभोगी चिकित्सक सरकारी नौकरी से भागभाग कर प्राइवेट क्लीनिकों में किसी के मजबूरी से चूसे गए पैसों के तालाबों में नंगे हो नहाते रहते हैं .कम से कम चिकित्सा की पढाई को सस्ता करना चाहिए ताकि वसूली कम हो .

sachinachin said...

SACHIN KUMAR
..............
I WAS IN CLASS 10.I LIVE WITH MY GRANDPARENTS FROM 2 YRS.I CONSIDER MY GRANDMOTHE AS MY MOTHER BECAUSE ALMOST SINCE BIRTH I WAS LIVING WITH HER.SHE WAS AN ASTHAMA PATIENT. ONE DAY SHE WAS ILL. WE COULDNOT GO TO HOSPITAL SINCE IT WAS NIGHT AND WE WERE 50 KM AWAY FROM THE TOWN. SO A VILLAGE DOCTOR CAN BE SAID A JHOLA CHHAP WAS CALLED FOR. HE CAME AND WHAT MEDICINE HE GAVE WHICH SHOULDNOT BE GIVEN TO ASTHAMA PATIENT. I KNOW IT THEN BUT WHEN HE WAS DOING THAT I COULDNOT TELL ANYTHING ELSE. BECAUSE I THOUGHT MAY BE MY KNOWLEDGE IS LESS AND DOCTOR KNOWS BETTER. BUT JUST AFTER HIS TREATMENT MY GRANDMOTHER TAKES HER LAST BREATH.AFTER FOR MANY DAYS I WAS ANGRY WITH THE DOCTOR AND SO WITH MYSELF. WHY I HAD NOT STOPPED HIM? AGAIN I HAVE TO GIVE MY 10TH EXAM JUST A WEEK AFTER THIS IN 1996. YOU CAN UNDERSTAND SINCE SHE IS LIKE MY MOTHER HOW I HAVE TO DO IT. BUT THIS IS THE TRUTH THAT SHE IS NO MORE. I ALWAYS THINK IS IT MY FAILURE OR DOCTOR ONE.KASH, MUJHE SECOND CHANCE MILA HOTA....

गजेन्द्र सिंह भाटी (बीकानेर) said...

Raveesh ji.

I couldn't beleive for a while that I was reading a real happening.

Ashok Pande said...

त्रासद. दुःख में शरीक जानें रवीश भाई!

आदर्श राठौर said...

दुख तो तब होता है जब कई चिकित्सक परिजनों को कहते हैं कि मरीज़ को वापस ले जाईए... कोई फायदा नहीं.. अब तो उम्र हो गई है।

Harsh pandey said...

raveeshji , yah aaj ki schchayi hai aaj har jagah yahi haal hai aap aur hum isko nahi nakaar sakte. aise ghatanaye aaye din hamare samaaj me ghat rahi hai

neha said...

बाबूजी बच सकते थे,लेकिन झोला छाप डाक्टरों की कहे उन्हें जिंदगी नहीं सिर्फ पैसा नाचता हुआ दिखता है. इस तरह के वाकिये को देखकर लगता है लोगो के भाव मर चुके है. ऊँचा ओहदा पाने का कीडा दिमाग में घर करता जा रहा है, नेक साधन की तो बात ही छोड़ दीजिये.....

ravishndtv said...

दोस्तों

आप सब की प्रतिक्रिया और आपबीती सुनकर अपना गम भूल गया। हमें इन ड़ाक्टरों के किस्से सरेआम करने चाहिए। आप सबने डाक्टरी को लेकर जो अनुभव बांटे हैं उससे तो यही लगता है कि सिर्फ विश्वसनीयता की दुकान के भरोसे डाक्टरों को नहीं छोड़ा जा सकता। हम सब इस तरह के अनुभवों से गुज़र रहे हैं।
एक अलग से ब्लॉग बनाया जा सकता है अस्पताल घपला डॉट कॉम। इस पर हम सब और अपने मित्रों के इस तरह के अनुभवों का डाक्युमेंट तैयार कर सकते

hamarijamin said...

Ravish! Aapke is post ne 'lagbhag'bhul chuke(janbujhakar) wakye ko (kyoki weh aaj bhi kachotati hain)phir se ubhar diya hai.aapke Babuji ki tarah mera bhatija mahaj 8 sal ka raju bhi shyad bach sakta tha!or aaj weh 'jawan'hota.Purvanchal(purvi uttar pradesh)ke AIMS BHU KE SIRSUNDERLAL HOSPITAL ke bal chikitsalay mein 14 yrs. pahale mere Raju ko twarit chikitsa na milna uski maut ka karan bana. Use mere babuji gaon se rat das baje BHU Mein behosi ki halat mein laye the.wah bukhar(dimagi)se grast tha. usi university ka student main junior doctors dwara babuji ko jhadapate dekh raha tha---unka apradh tha unse Raju ko jaldi dekhane ke liye bechain hona!'hum doctor hai ki tum'...use bukhar hi to hai.aadhi ghante tak weh upar ke ward room ke gate par pada raha. das dinoan tak maut se ladate hua wah chal basa. Ravish! baba ke samane nati ka maut! yeh thik hai marana --jina sab uparwale ke hath--par kahi na kahi se lagata hai ki Raju bach sakta tha! bidambana aise ki ek-do sal bad MAON(MOTHER)ke sath bhi aisa hi hua.unki maut mein bhi uparwale ke sath-sath 'dusare bhagawanoan'(second GODS) KA APAR Sahayog raha.

ajay kumar jha said...

afsos afsos aur afsos iske siwa kuchh nahin, mujhe to lagtaa hai ki yahee samaaj ke patan kaa sabse bada aur bhaddaa parinaam aa raha hai jise ham aap jhelne ko majboor hain.

Vijay said...

doctors ke liye sayad yah aam baat hoti hai, unka dil logo ki chid-phad karte huye itna kathos ho jata hai ki is tarah ke maut ki jankari ko der se batakar apni galtiyo ko chupane aur logo ko yah dinkhane ke liye ki unhone ji jaan se mehnat ki unke liye aam baat hai. is tarah ke badmash doctro ko unke kiyi ki saja kabhi na kabhi mil hi jaye gi.....Mumbai ke ek ilake me ek aurat ke bachche dani ke operation ke waqt waqt use jo behosh kiya gaya to wah hosh me nahi aayi. Doctoro ne kuchh ghante baad uske pati ko jabaran paper par sign karvakar us mahila ko ventiletor par rakhkar dusre bade asptal me shift kiya gaya, jaha use dusre din mrityu ghosit kar diya gaya....Garib pati ko kuchh pata bhi nahi ki kya chal raha tha , aur saale doctro ne apni galti chupane ke liye ek jabah se dusare jagah use shift kiya..dono aspatl ke doctor ek dusre ke acche dost the.....PM karne wale logo ne bataya ki mahina ki maut operation ke kuchh ganto baad hi ho chuki thi....Mahila ke pati ne police me shikayat to kar di hai...lekin sayad in MBBS kiye in khas badmaso ko saja dilana utna assan nahi...
Aap ki baat sun kar dukh hua...maut ki ghabar kuchh minute deri se dena unke liye chhoti baat hoto hogi, lekin aam insan to un ek minute me us waqti ke saath bitaye apne jeevan bhar ke palo ko utne samay me dubara se ji leta hai....

Sushant Singhal said...

आपके द्वारा दिये गये विवरण को पढ़ कर कंपकपी हो आई। यह बिल्कुल सही है कि डॉक्टर भगवान नहीं होते, पर वह इंसान तो हो ही सकते हैं। यदि वह पूरी व्यावसायिक ईमानदारी के साथ अपनी ड्यूटी करें व उसके बाद भी मरीज़ के प्राणों की रक्षा न हो सके, तो इंसान अपने भाग्य को दोष देकर / ’प्रभु की ऐसी ही इच्छा थी’ मान कर संतोष कर लेता है। पर अगर दिख रहा हो कि डॉक्टर झूठ बोल रहे हैं, अपनी असफलता को छिपाने का प्रयास कर रहे हैं तो ऐसे में शक होना स्वाभाविक ही है कि मामला कहीं आपराधिक लापरवाही का तो नहीं है।

मेरे एक जीजाजी का अपेंडिसाइटिस के ’मामूली’ से ऑपरेशन के बाद अत्यधिक रक्तस्राव होने से देहांत हो गया था। हम लोगों ने तेरह वर्ष तक न्याय पाने के लिये अदालती कार्यवाही की और अन्ततः जीते। कोई भी चिकित्सक अपने भाई-बंधु के खिलाफ गवाही देने के लिये तैयार नहीं होता था। लापरवाही को सिद्ध करने के लिये मेरे चाचाजी को ही इतना अध्ययन करना पड़ा था कि वह अदालत में आरोपी डॉक्टर की बखिया उधेड़ सकें और उसकी आपराधिक लापरवाही को अदालत के सम्मुख सिद्ध कर सकें।

मेरी हार्दिक संवेदनायें आपके परिवार के साथ हैं। भगवान दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें व परिवार को इस महती दुःख को वहन करने योग्य धैर्य व आत्मिक बल प्रदान करें।

सुशान्त सिंहल

सहर् said...

Dear Ravish Jee,

Yah dil dahla dene wali ghatna jo apne sunai, isme kuch bhi naya nahi hai. Is desh esa majboor aur lachar logon ka koi bhi nahin hai.
Hum bhale hi paisa kharch kar bade-bade aspatalon men apne sambandhiyon ko bharti kara den par unke liye yah paisa kamane ka dhandha bhar hai.
desh ke bade-bade aspatalon men jo ho raha hai woh sabke samne hai.
AIIMS men aur dusri jagahon par main bhi yah sab bhugat chuka hun. aur mere apke jaise karodon log joj hi yah pida bhugatate hain.
manmohan singh ka ilaj bhale hi khabar ban jaye, par aam logon ke sath jo ho raha hai uspar hum media wale bhi chup rahna hi pasand karte hain.
AIIMS men anti reservation stand par khub kavrej dene wale log yah bhul jate hain ki yah wohi aspatal hai jahan hazaron ki sankhya men garib mahino tak ilaj ke liye dhakka khate hain.
waise bhi Aam Admii ke nam par bani aur chali is sarkar men Aam Admi ka aaj bhi wohi hasr hai jo salon se thi.
Mrityunjay Prabhakar