क्या ये जेंडर का प्रॉब्लम है?

मुंबई से मेरे एक मित्र के प्रोफेसर का फोन आया था। वो हिंदी न्यूज़ चैनलों की भाषा पर संवाद करना चाहते थे। बात तो हुई नहीं मगर उनकी बात को लेकर काफी परेशान रहा। वो जानना चाहते थे कि न्यूज़ चैनलों की भाषा उग्र क्यों होती जा रही है। हर लाइन पंच लाइन के नाम पर ऐसे लिखी या बोली जा रही है जैसे पेट में किसी ने चाकू मार दिया हो। आगे बात कहने से पहले ही लिख देना चाहता हूं कि यह दूसरों पर आरोप नहीं है। पूरी गुज़ाइश है कि मैं भी इस बीमारी का शिकार हो सकता हूं। ये इसलिए लिख रहा हूं कि ज़रा सी आलोचना कीजिए तो तीन लोग बंदूक लेकर आ जाते हैं कि आप कौन से दूध के धूले हैं। काम तो करते नहीं,भाषण देते हैं। हमारा समाज चूंकि मूलत एक बेईमान समाज है इसलिए ईमानदारी की एक पंक्ति की भी बात करें या आलोचना का एक सवाल भी उठाया नहीं कि कसौटी लेकर मुंह पर घिसने लगता है कि खुद तो कार पर चलते हैं और पर्यावरण और प्रदूषण पर बोलते हैं। ईमानदार होने की अग्नि परीक्षा हर बार जंगल में जाकर नक्सल होकर नहीं दी जा सकती।

हिंदी उग्र हो गई है। घुस कर मारो पाकिस्तान को। अबकी बार,आर या पार। संभल जाओ पाकिस्तान। ये उदाहरण इसलिए दे रहा हूं कि अभी इस्तमाल हो रहे हैं। इसी तर्ज पर और भी जुमले हम सबने बनाए और सुनाए हैं। बलाघात के नाम पर हम शब्दों पर ऐसा घात कर रहे हैं कि बल से ज़्यादा बलात मतलब निकल रहे हैं।

ख़ैर प्रोफेसर साहब का सवाल था कि ऐसा क्यों हो रहा है? इसका जवाब तो नंबर भी है। जब चीखने से उत्तेजना पैदा हो और उत्तेजित दर्शक टीआरपी दे दे तो क्या हर्ज है। टीआरपी बुरी नहीं है। हम शायद टीआरपी का बुरा इस्तमाल करने लगे हैं। वैसे ही जैसे किसी गुरु ने कह दिया कि झूठ मत बोलो। किसी कीमत पर। जवाब में चेलों ने सच की ऐसी तस्वीर बनाई की गुरु का ही बंटाधार हो गया। हम सब टीआरपी के दायरे में काम करने वाले पत्रकार हैं। इससे बाहर कोई नहीं।

कहीं ऐसा तो नहीं कि ज़्यादातर कापी लिखने वालों में सिर्फ लड़के होने की वजह से भाषा ऐसी हो रही है? मुझे ठीक ठीक ज्ञान नहीं है। पर लगता है कि हर चैनल में कॉपी लिखने की कमान लड़कियों के हाथ में नहीं हैं। होंगी भी तो एक या दो। हिंदी पत्रकारिता आज भी पुरुष प्रधान पत्रकारिता है। मुझे मालूम है कि एंकर में ज़्यादातर महिलाएं हैं। जब आप पुरुष प्रधान पत्रकारिता की बात करें तो तुरंत इसकी मिसाल दी जाने लगती है। लेकिन किसी और संदर्भ में बात करें तो इन्हीं महिला एंकरों और पत्रकारों के बारे में तमाम तरह की अपुष्ट कहानियां बनाईं जाने लगती हैं। ज़्यादातर झूठी होती हैं मगर इसलिए बनाई जाती हैं क्योंकि महिलाओं की हर नई जगह को अपनी(पुरुष) जगह पर अतिक्रमण के रूप में देखा जाता है।

बहरहाल कहना यह चाह रहा हूं कि महिला एंकरों की भाषा भी उनकी नहीं है। कोई लिख देता है और उन्हें बोलना पड़ता होगा। चीख चीख कर। घुस कर मारो पाकिस्तान को,क्या कोई लड़की लिखती? हो सकता है मैं ग़लत हूं। लेकिन हमारी भाषा में उग्रता हम पुरुष प्रधान प्रत्रकारों की वजह से आ रही है। जिस दिन हिंदी पत्रकारिता में लड़कियों की संख्या ज़्यादा हो जाएगी और वो तय करने लगेंगी,उस दिन से भाषा में आ रहे मोहल्लेपन का असर कम हो सकता है। किसी भी चैनल को सुनिये, सुन कर यही लगेगा कि किसी मोहल्ले के छंटे हुए लड़के ने लिखी है। उसका गुस्सा,प्रतिकार हर पंक्ति में निकलता है। इस तरह से हम भी लिखने लगते हैं। पर क्यों लिखते हैं? ये कहां से आ रहा है?

क्या कभी हमने ध्यान दिया है कि उग्र भाषा लिखते वक्त हमारी मनस्थिति कैसी होती है? पाकिस्तान पर स्क्रिप्ट लिखते समय कौन से पूर्वाग्रह सामने आ जाते हैं? नफरत। और नफ़रत की बुनियाद में क्या क्या है? कहीं पाकिस्तान और उसके बहाने मुसलमानों के प्रति हिंसक सोच तो नहीं? मैं कोई निष्कर्ष पर नहीं पहुंच रहा? बस समझने की कोशिश कर रहा हूं। ख़ुद भी कभी कभी बोलने लगता हूं। हो सकता है अपनी तर्कबुद्धि से हम शालीन ही हों लेकिन गहरे अंतर्मन में बैठी हिंसक भावना ऐसी पंक्तियों से निकलने का रास्ता ढूंढ लेती हो।

यह सही है कि हर दौर में भाषा बदलती है। लिखने का अखबारी तरीका टीवी में बिल्कुल नहीं चलेगा। लेकिन क्या हमने सही विकल्प पा लिया है? पता नहीं। मैं यही सोच रहा हूं कि पाकिस्तान या तालिबान पर कोई भी स्क्रिप्ट कोई लड़की लिखती तो कैसे लिखती? क्या ये किसी स्त्री की भाषा हो सकती है? क्या कभी हमने सोचा है कि हमारे बोलने की शैली पर किसका असर ज़्यादा होता है? पिता की शैली का या फिर मां की शैली का?

मैं ख़ुद के बारे में कह सकता हूं। मेरे बोलने के अंदाज़ पर पिता का असर ज्यादा है। मेरी मां के बोलने का असर बिल्कुल नहीं हैं। ऐसा कैसे हो सकता है कि मेरे तमाम भाई बहनों में से किसी के बोलने में मां के बोलने का असर नहीं है। हम सब बाबूजी की तरह बोलते हैं। उसमें उग्रता है। यह भी नहीं कहना चाहता कि पिताओं की बोली अक्सर उग्र ही होती है? मगर उनमें एक किस्म की अथॉरिटी तो होती ही है।

तो मैं प्रोफेसर साहब से यही कहना चाहता था हिंदी पत्रकारिता में जेंडर का प्रॉब्लम है। जितनी तरक्की हम लड़कों की होती है, उतनी लड़कियों की कम देखी है। आईआईएमसी गया था। मैं अपने भावी सहकर्मियों से सवाल पूछ रहा था,हमें अलग से क्यों लगता है कि कोई लड़की ज़्यादा तरक्की कर रही है? जवाब खुद ही देने लगा। दरअसल हम सबने यही देखा है कि मां मिठाई पहले मुझे यानी बेटों को देगी,फिर बेटियों को। हमारी सोशल कंडीशनिंग ऐसी है कि हम मान कर चलते हैं कि लड़कियों को बाद में मिलेगा। वही जब दफ्तर में पहले मिल जाता है तो हम हैरान हो जाते हैं। कहने लगते हैं किसी और वजह(सुंदरता) से आगे गई है। क्योंकि पुरुष अंहकार मान कर चलता है कि आगे जाने का हक उसी का है। इन्हीं सब कहानियों को आधार बनाकर लड़कियों को कम आंका जाता है।

ऐसा भी नहीं कि लड़कियों के लिए काम करने का माहौल नहीं है। कई जगहों पर बेहतर माहौल है। मगर निर्णय लेने और लिखने के अधिकार से वे अभी भी दूर नज़र आती है। हिंदी न्यूज़ फ्लोर पर एक किस्म का सांस्कृतिक सामाजिक टकराव चल रहा है। एक दिन हिंदी न्यूज़ चैनलों में काम कर रहीं लड़कियों को आगे आना ही होगा। दावा करना ही होगा। उन्हें लिखने के लिए कीबोर्ड पर जगह बनानी होगी। इतना आसान नहीं है,लेकिन यही एक रास्ता बचा है। वर्ना टीआरपी के नाम पर पुरुष प्रधान पत्रकारों की मनोग्रंथियों से निकलती भाषा तेजाब की तरह लगती रहेगी। मैं लड़कियों को शालीनता का दर्पण नहीं बनाना चाहता। न मानता हूं। मगर आज जो भाषा है उसमें उनका दखल कम दिखता है।

यह भी हो सकता है कि दो घंटे ट्राफिक जाम में फंसे रहने के बाद,कम सोकर दफ्तर में टाइम बिताने के कारण भी हमारी भाषा उग्र हो जाती हो। पत्रकार तनाव में तो है। तो क्या उसकी वजह से भाषा ऐसी हो रही है या ये जेंडर का प्रॉब्लम है।

30 comments:

विनीत कुमार said...

अभी दस मिनट पहले ही मेरे एक मीडिया साथी ने सवाल किया कि- ये स्त्री पत्रकार लिखने से इतना घबराती क्यों है, स्क्रीन पर तो खूब बोलती है लेकिन वही जुबान प्रिंट में आकर बंद क्यों हो जाती है। आपने उसका जबाब दे दिया है, वो जुबान उसकी नहीं होती, पुरुषों द्वारा गढ़ी गई भाषा...इस बात से वेफ्रिक की अगर कुछ गड़बड़ हुआ तो बात उस पर नहीं आएगी। कभी-कभी तो लगता है कि पितृसत्तात्मक समाज का फार्मूला चैनलों के भीतर भी चलता है। संभव हो मैं गलत हूं लेकिन लगभग ये तय-सा है कि स्त्री-पत्रकार किस तरह की स्टोरी कवर करेगी,चैनल के भीतर किस डेस्क पर और किस मसले पर स्क्रिप्ट लिखेगी। मेरी बात काटने के लिए अपराध पत्रकारिता पर सम्मानित महिला पत्रकार का नाम बताया जा सकता है। लेकिन सर, ऐसा कहना कि महिलाएं जब लिखने लगेंगी तो वो घुसकर, मारो आदि नहीं लिखेगी...इसकी गारंटी नहीं ली जा सकती। ये सिर्फ जेंड़र का नहीं इन्सटिंट का भी मसला है।
स्त्री समाज ने अपना एक लम्बा समय बेहतर का मतलब पुरुषों जैसा होने, उसके जैसा लिखने, उसकी जुबान में बात करने में लगाया है, इस असर को भी खत्म होने में वक्त लगेगा। इसलिए यह एकहरी प्रक्रिया नहीं है,इस मर्दवादी मुरेठा भाषा के असर कम करने में कई स्तरों पर सोचना होगा

मीनाक्षी said...

रवीशजी, चार महीने से हम भारत में है और हिन्दी चैनलों को सुनते सुनते यही सवाल हमारे मन को परेशान करते रहते थे...आज उन्ही सवालों को उठाकर आपने बात को सवाल के रूप में वही छोड़ दी जहाँ से शुरु की थी...
ट्रैफिक के कारण तनाव... जैंडर की प्रोब्लम... या पुरुषप्रधान समाज की उग्रता एक कारण... या फिर टीआरपी....
मेरी समझ में (शायद गलत हो) आज के समाज में सम्वेदना का अभाव है...
"कहीं पाकिस्तान और उसके बहाने मुसलमानों के प्रति हिंसक सोच तो नहीं?" हिंसक सोच !!!!!
क्यों...??? अंर्तमन से इसी हिंसक सोच को निकालने पर ही उग्र भाषा शांत हो पाएगी...

SHASHI SINGH said...

कहीं ऐसा तो नहीं तो कि पुरुष प्रधान (?) न्यूज़ डेस्क पर बैठा कुंठित पत्रकार इस बात का बदला ले रहा है कि तमाम काबिलियत के बावजुद महिला नहीं होने की सज़ा के तौर पर उसे डेस्क के थैंकलेस जॉब की कोल्हू में जबरिया जोता जा रहा है?

सुजाता said...

विचारोत्तेजक लेख ! स्त्री की भाषा भी उसकी अपनी नही है,यह केवल पत्रकारिता मे नही है,इसलिए सचेत होकर अपनी स्त्री भाषा स्त्री विमर्श की भाषा गढने का वक़्त है।उपमान मैले हो गए हैं।
स्त्री लिखेगी तो भी लिखवाने वाला जब तक पुरुष है या पुरुष की पोज़ीशन /ऑप्रेसर की स्थिति मे बनी स्त्री लिखवा रही है ,तो भी यही लिखा जाएगा।

सुजाता said...

दर असल यह पूरी की पूरी व्यवस्था की संरचना का मामला है जिसमें आधिकारिक तौर पर मस्क्यूलिनिटी को सर्वोच्चता प्राप्त है।आप नए स्त्रक्चर खड़े कीजिए वहाँ भी यह जेंडर प्रॉबलम तुरत से खड़ी हो जाएगी।

Neeraj Rohilla said...

बस, पढकर मुग्ध हो गये।

Gautam Mehta said...

What I think is that we should look at the root cause of this issue. According to me the main issue is the business which in simple terms means to get highest TRP. Whatever the heads want employees have to do it. This is not an issue of gender. Tomorrow suppose if a girl is made to write the script then also she has to write watever is good for the channel. Words are chosen to attract maximum viewers for the show. If tomorrow a girl is not able to write the words that helps the show then definetly her role will change and they prefer anyone who can write better(bad). Girl or a boy. Anyone will do.

Basic motive: Attract maximum viewers...increase TRP... expand business...

Gautam Mehta said...

This is for Ravish. I want to tell you that I like you in your role and appreciate your work. I am a citizen of India who is residing in India. I am not an aspiring journalist or sumthing but it just happened that I started writing as Citizen Journalist for various online websites(m not getting paid for that though):-). Few days back I was watching your show Special Report on media houses stance on Pakistan for TRPs. This is to inform you that I have written an article about that for one of those websites. Here is the link if you want to have a look on it:

http://www.merinews.com/catFull.jsp?articleID=15710464

Thanks & Regards,

Gautam Mehta

उन्मुक्त said...

'मैं ख़ुद के बारे में कह सकता हूं। मेरे बोलने के अंदाज़ पर पिता का असर ज्यादा है।' पर यह बात सबके साथ सच नहीं है। मैं तो अपने मां के ही रंग में रहना चाहता हूं, उसी के रंग में ही अपने को रंगना चाहता हूं। लेकिन यह भी सच है कि हमेशा कर नहीं पाता।

kiran said...

नमस्कार सर,
ये जेंडर प्रॉब्लम है या नहीं..ये नहीं कह सकती...हां इसमें दो राय नहीं कि टीवी में..खासकर हिन्दी मीडिया में गहरी सोच और संवेदनशील महिला पत्रकारों की कमी जरुर है...जो विषयों को समझते हुए..लिख रही हों...या जिन्हें लिखने का मौका दिया जा रहा हो...मैं एक छोटे चैनल में हूं..मगर खुश हूं कि मुझे लिखने का अवसर मिलता है..लेकिन यहां खालीपन बहुत बड़ा है.....

kiran said...

इसके अलावा आज उन लोगों की भरमार है..जिनका लेखन सतही होने के बावजूद...वे सीनियरर्स की प्रशंसा के पात्र बनते हैं...एक हद तक ये भी कह सकते हैं कि आज सतही लेखन की ही मांग है...जो कम से कम..में फटाफट एक पैकेज लिख दें...जिसमें गहराई कम...लफ्फाज़ी ज्यादा हो....वैसे, मुझे खुशी है कि आपकी और हिन्दी टीवी मीडिया के कुछ और गिने चुने पत्रकारों ने हिन्दी की अस्मिता...उसकी गरिमा को कायम रखा है....जो मुझ जैसों के लिए प्रेरणा के स्त्रोत हैं..और हमें आगे बढ़ने का हौसला देते हैं.....आप ऐसे ही लिखते रहें..इन दिनों आपकी विशेष रिपोर्ट..बेमिसाल लग रही है..खासकर मीडिया पर आपका प्रहार बहुत भाया....

latikesh said...

रवीश जी ,
काफी दिनों के बाद आप का पोस्ट पढ़ा ..अच्छा लगा . आप ने मीडिया में प्रयोग की जा रही भाषा के बारे में सवाल किया है ...तो मै आप को बता दू की जब मैंने एक बार कोड ऑफ़ conduct जैसे इंलिश शब्द के लिए चुनाव दिशा निर्देश लिखा तो एक महिला प्रोड्यूसर ने कहा की यह दिशा निर्देश क्या होता है. आजकल मीडिया की भाषा दूषित करने के पीछे वो लोग जिमेदार है ..जो लिखनेवालो को आमलोगों की भाषा में लिखने का तुगलकी फ़रमान देकर भाषा को इतना बाजारू बना देते है ..की लगता है ..एंकर स्क्रिप्ट की भाषा किसी जेबकतरे ने लिखी है .हम पत्रकारों को कभी गुलज़ार साहेब , जावेद अख्तर , अशोक चक्रधर और नामवर सिंह के अलावा भाषा के जानकर लोगो की क्लास में भी जाना चाहिए . ताकि मीडिया की भाषा समृद्ध हो...बेचारी महिला पत्रकारों का दोष नही है...जयादातर महिला पत्रकार को भाषा से ज्यादा अपने मकेउप की चिंता होती है ... वो वही पढ़ती है, जो लिखा रहता है ..भाषा के मतलब से उन्हें क्या मतलब है .
लतिकेश
मुंबई

Arvind Mishra said...

अब यह आपकी विशेषज्ञता का क्षेत्र है -क्या कहना इस पर ? आपकी राय से सहमत ही हुआ जा सकता है -लिखा आपने जोरदार है !

Dipti said...

ये तो नहीं कहा जा सकता है कि महिलाओं की लेखनी उग्र नहीं होती है या नहीं हो सकती है। लेकिन, ये सच है कि महिलाओं को लिखने लायक बहुत कम लोग मानते हैं। मेरी पहली नौकरी में ही मुझे इस बात का सामना करना पड़ था। मुझे न तो राजनीति की ख़बर लिखने दी जाता थी और न ही क्राइम की। हां कही कोई भजन कीर्तन हुआ तो वो मेरी झोली में ज़रूर गिर जाता था।

Saurabh said...

आपके बात से आंशिक रूप से सहमत हूँ, मगर यह बात भी विचार करने योग्य है कि क्या लड़कियों की भाषा लड़कों जैसी उग्र नही होती जा रही है? यहाँ दिल्ली में मैंने लड़कियों के मुख से ऐसे ऐसे शब्द सुने हैं कि कई बार खाना हज़म नही होता है. मेरे स्कूल में यहाँ 'फट के हाथ में आ गई', 'बम्बू हो गया', 'लगी पड़ी है', 'ठुकी पड़ी है' आदि वक्तव्य लड़कियों के मुख से सुन ने को मिलती रहती थी. हाँ, ओवर आल देखें तो जरूर उनकी भाषा मर्दों से शालीन है.

पाकिस्तान के सन्दर्भ में कहूं तो पता नही आपने नोटिस किया या नही, इंडिया टीवी ने एक दिन headline लगायी थी "इस पाकिस्तान को डंडा चाहिए". कैसा लगा?

Rajesh Roshan said...

Jawab thoda itar hai ya ye kahu ki jawab hi nahi hai.... Apne desk ke tamam ladkiyo se likhne ko kahiye bari bari se...aur unhe bina kisi bias ke check kijiye shayaad answer mil jayega

Try

ashok dubey said...

electronic media walo ne hindi ko bazaar me bech dala hai.....
hindi ko hinglish bana dia hai ....

aaplog hindi me haryanvi bhojpuri awdhi rajasthani brij bhasha ka kyon nahi mix karte kya mazaa aa jayega...ye bolian hi jaan hai hindi ki...

मनीषा पांडेय said...

I am 100 % agree Ravish. Striyon ke pas sachmuch apni bhasha nahi hai. Jo thoda bolati hai unki bhasha bhi khud ki nahi hoti. Apni svatv ke sath apni bhasha arzit karne ka sagharsh bhi abhi hona baki hai..

neelima sukhija arora said...

रवीशजी, आपका यह पोस्ट थोड़ा देरी से पढ़ पाई, इसका अफसोस है, लेकिन यह अफसोस इतने सारे कमेंट्स पढ़कर अफसोस नहीं रहा। टीवी की आक्रामक भाषा और चाकू की तरह दिमाग में जख्म करती स्क्रिप्ट्स हम सभी को परेशान करते हैं, आपके एक प्रोफेसर मित्र ने इसका एक अलग सा विश्लेषण भी कर दिया, जो कहीं न कहीं जेंडर बहस भी खड़ी कर रहा था। और आपने उससे भी बेहतर ढंग से समझाया।
एंकर तो आपको बड़ी संख्या में महिलाएं या लड़कियां मिल जाएंगी लेकिन जब बात का‍पी लिखने की आती है या रिपोर्टिंग की आती है तब लड़कियां कहां खो जाती हैं।
बात बहुत सही भी है, ज्यादातर एंकर लड़कियां होंगी, इस बात पर हम सब का बस चलता भी तो कितना है, यह तो मालिक या मैनेजमेंट तय कर देता है कि एंकरों में कितनी स्त्रियां रहेंगी और कितने पुरुष।
रही कापी लिखने की बात,शायद लड़कियां कापी लिखतीं तो वो अलग ही तरह की होती। मेरा ख्याल है कि यह भाषा किसी सभ्य आदमी की हो ही नहीं सकती है कि घर में घुसकर मारो पाकिस्तान को। जब कोई सभ्य लड़का ही ऐसा भाषा को प्रयोग नहीं करता है तो लड़कियां से ऐसी आशा करना ही बेमानी है।
मैं भी प्रिंटर डेस्क पर ही काम करती हूं, वो भी अखबार में । जहां मैं लगभग हर रोज पाकिस्तान, अफगानिस्तान, तालिबान, ओसामा बिन लादेन और अमेरिका पर स्टोरीज लिखती या रीराइट करती हूं। पर मुझे याद नहीं आता कि मैंने या मेरे साथियों ने कभी भी इतनी ओछी भाषा का प्रयोग किया हो। मेरा मानना है टीवी में भी यदि ज्यादातर लड़कियां स्क्रिप्ट्स लिखने लगें तो इतनी हल्की भाषा का प्रयोग तो नहीं ही होगा।
आपके कमेंट्स में भी लोगों ने मजेदार विश्लेषण लिखे हैं- मुंबई से किसी ने लिखा है ज्यादातर महिला पत्रकारों को भाषा से ज्यादा अपने मेकअप की चिंता होती है ... वो वही पढ़ती है, जो लिखा रहता है ..भाषा के मतलब से उन्हें क्या मतलब है .
शायद इन महोदय को यही पता नहीं है कि मेकअपस सिर्फ एंकर के लिए होता है, हर महिला पत्रकार एंकर नहीं होती है। भैया आईआईएमसी में आज भी मैक्सिमम लड़कियां टा‍प करती हैं आपको नहीं पता हो तो मैं बता दूं। जिस साल मैंने भी मा‍स का‍म किया था ज्यादातर लड़कियां टापर थीं। वहां पर स्टूडेंट्स का‍पी लिखने और रिपोर्टिंग करना ही सीखते हैं,अगर ये वहां का सच है तो आय एम सा‍री आप आइने की एक तरफ ही देख रहे हैं दूसरा हिस्सा भी देखिए।

swapandarshi said...

Interesting. I think in general women are not part of decision making in any field in India, if you leave the exceptions, like Sonia, Maya and Pratibha, but they will come around the corner very soon.

Individual women try very hard to be heard, but the structures of institutions, do every thing to ignore that or do exactly opposite. But so far women are in first phase of their struggle and gaining entry inside the work place should be considered an achievement. The second phase will come slowly and sometimes abruptly.

sanjeev persai said...

रविश जी,
जबसे आपका NDTV पर ये प्रोगाम देखा है तभी से आपको ढूंढ़ रहा था, आज पकड़ा ही गए.
अचानक आपको ये क्या हो गया हैसिर्फ़ यही पूछना चाहता था, पिछले साल यही सवाल मैंने अपने एक मित्र से पुछा था जो की भारत के नंबर 01 न्यूज़ चैनल में काम करते हैं की आप लोग ये किस तरह की भाषा का इस्तेमाल करते हो, मैं तुम्हें जानता हूँ जब तुम प्रिंट में थे तब तुम्हारी भाषा काफ़ी संयत हुआ करती थी, तो उसका कहना है की आज हमें बताया जाता है की हम किस तरह की भाषा का इस्तेमाल करें हमें आती हो तो ठीक नही तो सीखना पड़ेगी, कारण है सर्वे से पता लगा है की जनता इसे ही पसंद करती है.
बात सिर्फ़ इतनी है की आज आपके न्यूज़ चैनलों का प्रबंधन तय कर रहा है की दर्शकों को क्या पसंद है, जिस दिन ये परम्परा आपके यहाँ भी आ गयी आपका चिल्लाना व्यर्थ जायेगा, लेकिन आपके लेख से चर्चा शुरू हो गए है इसके लिए साधुवाद.

SKV said...

प्रिय रवीश जी,
आपने बिल्कुल ठीक लिखा, लेकिन जो वजहें आपने बतायी असल में कारण इससे बिल्कुल अलग हैं, इसके लिए हमें आजादी के साठ सालों में पीछे की तरफ़ झांकना होगा. भारत की आजादी के साठ सालों में अगर हम देखें तो आम आदमी को आख़िर क्या मिला. हमारे नेताओं ने अंग्रेजों की तरह फूट डालो और राज करो की नीति ही अपनाई है. इन साठ बरसों में सिर्फ़ और केवल सिर्फ़ एक प्रधान मंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री ही ऐसे हुए जिन्हें हम भारत का प्रधान मंत्री होने का सम्मान दे सकते हैं. दूसरे नम्बर पर श्रीमती इंदिरा गांधी का नाम लिया जा सकता है क्योंकि अंतर्राष्टीय स्तर पर उन्होंने भारत को सम्मान दिलाया, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर वो भी पूरी तरह विफल रही.
बाकी मुझे कोई और नाम याद नही आता जिसे भारत का प्रधान मंत्री कहा जा सके क्योंकि सारे के सारे सिर्फ़ अपनी पार्टियों के ही प्रधान मंत्री थे जिन्होंने केवल और केवल अपनी पार्टी के हित में ही काम किया और उनमे से कुछ तो फ़िर भी अपनी पार्टी को नही बचा पाये.

आम आदमी के अन्दर सरकार और प्रशासन के खिलाफ इतनी बेचैनी और गुस्सा है की अब उससे रहा नही जाता, शालीनता की भाषा तभी समझ में आती है जब इंसान का दिमाग शांत होता है. रवीश जी आप तो एनडी टीवी में एक अच्छी तनख्वाह पा रहे हैं, शायद आपको आम आदमी की रोज़मर्रा की जिंदगी की तकलीफों से वास्ता ना पड़ता हो हाँ एक बात जरूर कहना चाहूंगा कि तकलीफों को देख पाना भी एक बड़ी बात है जो कि आप महसूस करते हैं लेकिन उन तकलीफों से रोज़-रोज़ गुजरना और दिन रात गुजरना बिल्कुल अलग बात है ऐसे में इंसान की मानसिक हालत को वही समझ सकता है जो उन हालत से रोजाना रु-ब-रू होता है.

अब रही बात हिन्दी समाचार चैनलों की भाषा की तो जो भाषा हमारे अधिकतर चैनल बोलते हैं वो कहीं न कहीं उन हिन्दुस्तानियों की ही भाषा बोल रहे होते हैं. इसीलिये लोगों को ऐसी भाषा शायद कुछ सुकून दे जाती होगी. तभी तो लोग इन चैनलों को ज्यादा देखते हैं और इसी लिए इन चैनलों की टी. आर. पी. बढ़ जाती है.

रही बात महिलाओं की या जैसा कि आपने लिखा है जेंडर प्रॉब्लम की तो महिलायें भी वही लिखेंगी जो उन्हें लिखने को कहा जायेगा, लिखेंगी तो ठीक नही तो किसी और से ये काम करवा लिया जायेगा. और आप दूर क्यों जाते हैं आपके चैनल एन डी टी वी पर भी पिछले कुछ दिनों से ऐसे ही कुछ उत्तेजक वाक्य टी वी स्क्रीन पर लिखे हुए दिखाए जाने लगे हैं, हाँ ! गनीमत यही है कि अभी उन वाक्यों को उत्तेजक आवाज़ में बोला नही जा रहा है ये भी शायद कुछ समय बाद होने लगे.

तो प्रिय रवीश जी इसके पीछे जेंडर प्रॉब्लम बिल्कुल नही है इसके पीछे सिर्फ़ और सिर्फ़ हमारे प्रधान मंत्रियों की नेक नीयती की कमी है क्योंकि वो देश के लिए कुछ करना नही चाहते या फिर कुछ कर ही नही पाते, वज़ह जो भी हो मतलब तो एक ही है.

आपका
श्रीकृष्ण वर्मा
देहरादून
20/2/2009
team-skv.blogspot.com

sanjaygrover said...

********ज़रा सी आलोचना कीजिए तो तीन लोग बंदूक लेकर आ जाते हैं कि आप कौन से दूध के धूले हैं। काम तो करते नहीं,भाषण देते हैं। हमारा समाज चूंकि मूलत एक बेईमान समाज है इसलिए ईमानदारी की एक पंक्ति की भी बात करें या आलोचना का एक सवाल भी उठाया नहीं कि कसौटी लेकर मुंह पर घिसने लगता है कि खुद तो कार पर चलते हैं और पर्यावरण और प्रदूषण पर बोलते हैं। ईमानदार होने की अग्नि परीक्षा हर बार जंगल में जाकर नक्सल होकर नहीं दी जा सकती।******
aur is baat ko maiN fir se rekhaNkit karna chahuNga :--
******हमारा समाज चूंकि मूलत एक बेईमान समाज है इसलिए******

sanjaygrover said...

एक पहलू और भी है । क्या यह उग्रता वास्तविक है या बनावटी है ? क्या दर्शको को खुश करने हेतु एक अभिनय मात्र है ! और अगर वास्तविक है और संदर्भ पाकिस्तान, मुसलमान या दलित-पिछड़े वर्ग हैं तो स्त्रियो से भी बहत ज़्यादा उम्मीद नही रखी जानी चाहिए। धर्म, परम्परा, मर्यादा, ईश्वर वगैरह में स्त्रियो का विश्वास कही ज्यादा है। ऊँच-नीच मे भी। ईश्वर और धर्म के रहते वर्ण-जाति से मुक्ति असंभव सी ही लगती है। मंैने टीवी पर, एम्स के सामने, उन्ही पढ़ी-लिखी लड़कियो को दलित-पिछड़ों को दिए जाने वाले आरक्षण का वीभत्स विरोध करते देखा है जो महिला-आरक्षण उछल-उछलकर माँगती हं।ै आभिजात्य और कथित सवर्णता को लेकर कथित उच्च वर्ग की स्त्रियों के इतने भयानक दुराग्रह को देखकर ये लगने लगता है कि शरद यादव या मुलायमसिह अगर (स्त्री)आरक्षण मे आरक्षण की मांग उठाते हैं तो गलत क्या करते हैं !
इस अर्थ मे स्त्री टीवीकर्मियों के लहजे़ की उग्रता तो कम हो सकती है भाषा की सम्भव नही लगती।
-संजय ग्रोवर

अंशुमाली रस्तोगी said...

भाई रविश, यह कोई जेंडर परेशानी नहीं बल्कि पत्रकारिता की भाषाई परेशानी है जो हमारी जुबान में उद्दंड हो जाती है। वैसे विनोद दुआ भी पाकिस्तान पर बोलते वक्त भाषाई उद्दंड हो जाते हैं।

विजयराज चौहान "गजब" said...

(Ravish ji aapke vichar theek hae lekin ye lekh bhi vichar karne ke liye majboor kar detaa hae )
एनडीटीवी इंडिया को अपनी ही बनाई हुई अपनी अच्छी छवि
(इमेज) हजम नहीं हो रही है। इसीलिए एनडीटीवी अपनी इमेज तेजी से बदल रहा
है। एनडीटीवी ने अपना चोला उतारना शुरु कर दिया है। कल तक जो एनडीटीवी
भूत-प्रेत और मनोहर कहानियाँ छाप खबरों पर अन्य खबरिया चैनलों की खबर
लेता था, अब वही एनडीटीवी उन्हीं की तर्ज पर खबरें परोसने लगा है।
http://www.hindimedia.in/index.php?option=com_content&task=view&id=5140&Itemid=43

अजित वडनेरकर said...

रवीश जी,
इस लेख पर अब नजर पड़ी। क्षमा करेंगे। करीब पांच साल मैने जम कर टीवी पत्रकारिता की है। खूब स्क्रिप्ट लिखी हैं। रिपोर्टिंग भी। साक्षात्कार भी लिए हैं। मामला न सिर्फ भाषा के अज्ञान का है बल्कि आपराधिक उदासीनता का भी है। आज पत्रकारिता में ग़लत तथ्य के लिए तो क्षमा याचना का एहसान जताने की मुद्रा में ही सही, फिर भी माफी मांगने का शिष्टाचार बचा है मगर भाषा की गलती पर कोई माफी नहीं मांगता। मांगे किससे ? दर्शक तो गधा है...उससे क्यों मांगें। बाकी प्रोड्यूसर के ऊपर और नीचे तक जितने भी लोग हैं, नब्बे फीसदी हवाहवाई लोग हैं।
क्षमा करें, इस माध्यम के मौजूदा दौर को लेकर मन में बहुत कड़ुवाहट है...बहुत कुछ लिखना चाहता था,पर अधूरा छोड़ रहा हू...
सब चेहरे याद आ रहे है...आंखों के आगे तिर रहे हैं...लानत है उन पर ...
आपने लिखा अच्छा, पर बात वो नहीं है...

Abhishek said...

Gender problem to lag rahi hai, magar TRP ki muhim mahila patrakaron ki bhi bhasha na badal de aisa nahin lagta. Sanvedanshilta kam hona bhi shayad ek pramukh vajah ho magar vah bhi bhautik dabav mein.

Murali Swaminathan said...

मेरे ख्याल से यह सिर्फ जेंडर प्रॉब्लम की समस्या नहीं है. पूरे देश में आज का माहोल इतना बिगडा चला है की लोगों में दूसरों की लिए न तो सहानुभूति है और न ही चिंता. लोग इतने स्वार्थी हो चले हैं की सिर्फ अपनी सोच का ही महत्व ज्यादा है. पूरे विश्व का माहोल दिन प्रतिदिन उग्र होता जा रहा है जिसका प्रभाव साधारण बोल चाल की ढंग में भी दिखाई जा रही है. एही कारण है की हमारी टीवी और अन्य मीडिया मे भी यह उग्रता उभर आई है. यह सिर्फ हिंदी मीडिया का प्रॉब्लम नहीं बल्कि दूसरे क्षेत्रीय भाषा की चैनलों में भी दिखने लगे हैं.

Sumit Bhatia said...

NDTV dekhnai mai maja aata hai.. saaf suthra channel.... खबर दिखाने का अंदाज आलग है.. ओरो से आलग....

NDTV par चैन से सोना हो तो जाग जाओ नहीं आता.... इस पर डरावने बाबा भविष्य नहीं बताते इसलिए कुछ आलग है ओरो से....

जनाब जरा यह बताओ यह की न्यूज़ एंकर रोज न्यूज़ चैनल क्यूँ बदल रहे है.....इसके पीछे क्या कारण है ?