ब्लॉगर को फुटबॉलर कहें

सारे पत्रकार ब्लॉगर हैं तो क्या सारे ब्लॉगर पत्रकार होने ही चाहिए? ब्लॉगर को क्या कहें? क्यों कहें क्या? ब्लॉगर कहें। पत्रकार को पत्रकार रहने दें। बहस की मूल प्रति मैंने नहीं पढ़ी है। लेकिन मूल भावना समझ रहा हूं। नेमप्लेट के बिना काम नहीं चलता हमारा। हम वो लोग हैं जब टाइप करते हैं। दसों पोरों से टपा टप छाप देते हैं। लिखते होंगे वो जिनकी जेब में अभी भी सरकंडे के गर्भ से पैदा हुई कलम है। अब तो कलम का इस्तमाल चेक बुक साइन करने में हो रहा है। ख्वामखाह लोगों ने कलम ने लेकर चलना छोड़ दिया है। सामने वाली की जेब में बेकार पड़े कलम को एक मिनट के लिए मांग कर हमेशा के लिए गायब कर देते हैं।

बस मेरी राय। अंतिम नहीं है मगर अंतरिम है। लफंगा को अगर लोफर कहें तो अच्छा नहीं लगेगा। लोफर लफंगा कहें तो चलेगा। ब्लॉगर के साथ भी बोगी जोड़ दीजिए। अगर जोड़नी ही है तो। हमने ब्लॉगर को लफंगा नहीं कहा है। इस पर कोई टिप्पणी न करें। बस एक मिसाल दी है। हिंदी के महाविशाल शब्दकोष में पहले से पैदा हो चुके शब्दों को खोज लाने का आइडिया दिया है। नया शब्द नहीं बना सकते क्या? हम पैदा होते हैं। आप पैदा हो सकते हैं। ये शब्द क्या चीज़ हैं जो हमारे पैदा होने के बाद पैदा नहीं होंगे।

तथाअस्तु। वक्त कम है। उंगलियों में दर्द बढ़ रहा है। हम सब भारतीय हैं। हम सब ब्लॉगर हैं। हममें से कुछ पत्रकार हैं। पत्रकार कहानी लिख दे रहा है। कविता से लेकर संस्मरण तक के तमाम प्रकारों में सृजन कर दे रहा है लेकिन कहलाता तो वही है न। पत्रकार। तो काहें ब्लॉगरों के बीच कुछ कहाने के लिए टांग अड़ा रहा है।

इसके बाद ब्लॉगरों का लिंग भेद शुरू हो जाएगा। महिला ब्लॉगर को क्या कहें। लेडीज़ ब्लॉगर। लेडीज़ कूपे बनानी है। ब्लॉगरी कहें। री ब्लॉगरी तुम काहे ब्ला ब्ला टिपयाती हो। इस नाम का कोई महिलाकरण या पुरुष सशक्तिकरण नहीं होना चाहिए। हम सब ब्लॉगर हैं। जेंडर डिवाइड को नहीं मानते हैं। नाम के लिए। इसलिए दोस्तों इस बहस में आग डालो। फूस डालो। मिट्टी को पकाओ। तपाओ। नाम मत रखो। शब्दकोष यूं ही भारी हुआ जा रहा है।

अखबार तो ब्लाग का प्रचार प्रसार कर रहे हैं। उनका तो शुक्रिया अदा करना चाहिए। कोई कंपटीशन है ही नहीं। अख़बार रोज़गार सृजन करता है ब्लॉग गल्प सृजन। दोनों का योगदान अलग अलग है। इसलिए थूकने के पीकदान अलग होने चाहिएं। नाम एक से नहीं होने चाहिएं। आओ ब्लॉगरों,युवा,वृद्ध,महिला.युवती,पुरुष सब मिलकर यही प्रण करें...मरें चाहें जीयें...एक एक्स्ट्रा नाम से पुकारे जायें...ब्लॉगर ही कहलायें। आमीन।

40 comments:

कमलेश मदान said...

आज हिंग्लिश भाषा ने समाचार-पत्रों और टेलीविजनों में स्थान ग्रहण कर लिया है अतएव मेरा सुझाव है कि कम से कम ब्लॉगर का हिन्दी नामकरण तो ढंग से हो जाये बस ये ही दुआ है क्योंकि चिट्ठा और ब्लॉगर ये नाम कुछ जंचते नही हैं.

संजय बेंगाणी said...

व्यक्तिगत विचार: पत्रकार चिट्ठाकर हो सकता है, चिट्ठाकार को पत्रकार नहीं कहा जा सकता. यह एक अलग विद्या है.

अंशुमाली said...

मेरे विचार से ब्लॉगर को ब्लॉगर ही रहने दो कोई नाम न दो।

संगीता पुरी said...

आओ ब्लॉगरों,युवा,वृद्ध,महिला.युवती,पुरुष सब मिलकर यही प्रण करें...मरें चाहें जीयें...एक एक्स्ट्रा नाम से पुकारे जायें...ब्लॉगर ही कहलायें।
ये भी सही ही है।

Pramod Singh said...

कैसे कहां-कहां के ऑरिजनल विचार आते हैं. ओह.

वेद रत्न शुक्ल said...

'अन्तरजाली' चलेगा क्या? 'अन्तर्जाली' नहीं क्योंकि यह जाल से बाहर अखबारों में, टीवी में(अमिताभ का ब्लॉग), चहुंओर पैर पसार रहा है। रही बात पत्रकार की तो पत्रकार अलग प्रकार का प्राणी है।

आदर्श राठौर said...

अरे वाह
क्या बात है। मैंने हमेशा देखा है कि लोग वाकई पैन लेकर नहीं चलते। मैंने पिछले एक 6 महीनों से एक पैन संभाल कर रखा था। उसे मैंने बड़ी मुश्किल से बचाकर रखा था। लेकिन न जाने कैसे परसों ऑफिस में एक साहब जल्दी में मेरे पास आए और कुछ नोट करने का बहाना कर के ले गए। भई बॉस आदमी हैं, अब पैन मांगूं तो कैसे.
खैर यहां मामला पैन का नहीं है।
ब्लॉगिंग के भविष्य पर अच्छा विश्लेषण है।

makrand said...

bahut sahi kaha aapne

Rachna Singh said...

blogger is a neutral gender and it should remain so
i would prefer to be called as BLOGGER ONLY no hindi translation is going to make it any diferent .


why should any one in any case try to give blogger a hindi name . is it neccessary to put a "made in india tag " on every thing which even if it never was originated in india
by changing "blogger " to some other nomenclature we will take away the credit from the person who coined the term blogger

अभिषेक ओझा said...

ब्लॉगर को ब्लॉगर ही रहने दो कोई नाम ना दो !

chandrashekhar hada said...

ब्लोग्गर ही ठीक है .इसमें बेलाग लिखा जा सकता है और दोनों ही शब्द जुड़वा भाई लगते हैं.

Aparna said...

blogger ko blogger rahne do
nirdwandw bhav se kahne do,
wo patrkar ho ya chitrkar
jab likhe too de ushma apar,
namo me kaha kya rakha hai
asli masla to sach ka hai,
blogger ko blogger rahne do.

Aparna Dixit

दीपक कुमार भानरे said...

मुझे लगता है की ब्लॉग और ब्लॉगर इतना प्रचलित और परिचित शब्द हो गया है . की अब इसके लिए और अन्य शब्द की आवश्यकता महसूस ही नही होती है .

Rajesh Roshan said...

ब्‍लॉगर को ढेरो नाम दो लेकिन पत्रकार का नाम ना दो.

दीपक said...

आमीन !! सुम्मा आमीन !!

dr. ashok priyaranjan said...

रवीश जी
ब्लागर अब प्रचिलत शब्द है । इसिलए यही सवाॆिधक उपयुक्त शब्द है । यह शब्द िलंगभेद से भी मुक्त है । लेिकन अगर िहंदी भाषा के अकादिमक क्ष्ेत्र की बात करें तो वहां िचट्ठाकार शब्द ने पहचान बनाई है । भारत में तो कम से कम इन्ही शब्दों को स्वीकार िकया जाना चािहए । एक अथॆ के िलए िजतने अिधक शब्द प्रचिलत होंगे वहीं भाषा में भ्रम की िस्थित उत्पन्न होेने लगती है ।
बीती ३० नवंबर को चौधरी चरणिसंह िवश्विवद्यालय मेरठ में सािहत्येत्तर िहंदी लेखन िवषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोिजत की गई । इसमें मीिडया पर केंिद्रत सत्र का संचालन करने का अवसर मुझे िमला । इसमें जब मैने ब्लाग के कुछ संदरभों पर प्रकाश डाला तो एक अच्छी खासी बहस िछड़गई । इसमें भी ब्लाग और िचट्ठाकार शब्दों पर िवद्वानों की सहमित सामने आई । यह संदर्भ क्योंिक प्रासांिगक है इसिलए उल्लेख करना ठीक लगा ।

http://www.ashokvichar.blogspot.com

dr. ashok priyaranjan said...

उपरोक्त िटप्पणी में क्रपया ३० नवंबर को ३० अक्तूबर पढें ।

antaryatri said...

bloger ko footbal bana de ya balibal tv enker ki tarah vah patrkar to nahi mana jayega.tv vale apni bodhikta ke liye print se lekar blog ka sahara le rahe hai.isme galat bhi nahi hai per bloger per theekhi tipanni se unhe aahat bhi nahi hona chahiye.yeh post kafi aahat hoker khilli udane ke andaz me likhi gai hai.ravish ji to ndtv ke hai per sushil kumar singh per kuch nahi bolenge.kyoki ek adad kalam ka saval bhi hai.

प्रवीण त्रिवेदी...प्राइमरी का मास्टर said...

पत्रकार चिट्ठाकर हो सकता है, चिट्ठाकार को पत्रकार नहीं कहा जा सकता.@संजय बेंगाणी


ब्लॉगर को ब्लॉगर ही रहने दो कोई नाम न दो.

sahmat!!!!!

www.creativekona.blogspot.com said...

Bhaiya Bahut seedhee see bat ha jab hum Har tarah ke kam karne valon ko kar laga ke bulate han:natakkar,chitrakar,rachnakar,moortikar,Sath hee angrejee men bhee:Joker,actor,writer,painter bol sakte han to fir blog likhne valon ko blogger kahne men kya dikkat ha?
Hemant Kumar

sachinachin said...

RAVISH SIR,
MAINE AAPKA " O JANE WALE HO SAKE TO LAUT KE AANA" ON KUMBLE RETIRMENT PADHA. AB YE TO NAHI KAH SAKTA KI BAHUT AACHA LAGA KYNKI AAPKE LEKHNI PER MAIN KYA KAHOO. SARE LOG KAHTE HAI. AB KUCH "DOOSRA" LIKHTE HAIN. "BLOGER KO FOOTBALLER KAHE". KAHNE KO TO KUCH BHI KAH SAKTE HAIN. WHAT'S IN A NAME?----AUR BATE PHIR KABHI. MERI AANGULI ME TO DARD NAHI HO RAHA HA MATHA THODA DUKH JAROOR RAHA HAI.-------SACHIN.

musafir jat said...

han ji, bilkul thik hai.

अनुपम अग्रवाल said...

बहस की मूल प्रति मैंने नहीं पढ़ी है। लेकिन मूल भावना समझ रहा हूं।

आप ने ना जाने कितने लोगों की blogging में दिलचस्पी पैदा कर दी
अखबारों में लेख लिख लिख कर .
मेरा मानना है कि आप ने यूं ही नहीं लिखा होगा .
परन्तु पूरा सन्दर्भ पता चले तो यह पढने से ज्यादा समझ में आयेगा और charchaa सार्थक होगी .
उचित समझें तो बताने का कस्ट करें

JC said...

Mayajaal 'ashtbhujadhari' Ma Durga dwara manav ko uljhaye rakhne ke liye banaya gaya - kah gaye gyani! Unhone makri ko aath pere se jaal bunte dekh ishare ko samjha aur manav ko asht ungliyon se likhte athva type karte bhi paya!

Blog kaho kya kuch aur matlab to dimag mein uthte vicharon ko shabd dene ka prayas hi hai - sabko uljhane ke liye, shayad!

anil yadav said...

शेक्सपीयर ने कहा है कि ..नाम में क्या रखा है....वैसे जो भी कह ले क्या फर्क पड़ता है

jamos jhalla said...

Ravishji agar main galat nahin hoon to aapke jab kaale baal the tabhi se aap electronic patrkaritaa jagat main hain .ab kuch safedi aane lagi hai to blogging ke field main bhi aa gaye hain .jhallevichaaraanusaar aajadhikansh journos yaa bloggers khabron ,vichaaron ke sath football hi khelte nazar aate hain .fir bhi andhe ko andhaa kehnaa uncivilized hotaa hai. isiliye prabhu ek khoobsoorat saa turn dekar chornaa hi achha hai .fasaane keliye jab naamaankaran kaa mahoorat nikle to jhalle ko bhi jaroor batta kar kartaarth kijiyegaa.

प्रदीप मानोरिया said...

चिट्ठाकार को चिटठा कार ही रहने दो महाशय जी ,, आपने न्मेरे ब्लॉग को हिंदुस्तान के ब्लोग्वार्ता मैं शामिल किया बहुत बहुत धनयवाद

बहुत लंबे अरसे तक ब्लॉग जगत से गायब रहने के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ अब पुन: अपनी कलम के साथ हाज़िर हूँ |

राजीव करूणानिधि said...

Bahut hi fisaddi lekh hai..kuch achcha likha karen..hamesha ki tarah

अपने से बाहर... said...
This comment has been removed by the author.
अपने से बाहर... said...

दादा, पिछली टिप्पणी व्यक्तिगत थी, अनुरोध के साथ कि - प्रकाशित ना करें, अपने-आप प्रकाशित हो गई क्या?

ajay kumar jha said...

raveesh jee,
bahut badhiyaa, lagtaa hai ki isee tarah bahas kar kar ke ham blogger, footballer, aur pata nahin kaun kaun se er ban jaayenge, main to chupchaap padh aur dekh raha hoon, jab faislaa ho jaayegaa, tab ek taraf ho loonga.

BrijmohanShrivastava said...

आपको मैंने हिन्दुस्तान समाचार पत्र में पढ़ा /उसमें आपका आर्टिकल जो ओबामा पर था पढ़ा /आपकी यह लाइन कि ""ओबामा हिन्दी ब्लॉग पर आयेंगे तो लगेगा उनका कब का स्वागत हो चुका है ""यह व्यंग था या महाराजाधिराज श्री श्री १००८ श्रीमंत ओबामा हुज़ूर की तारीफ के पुल बाँधते,महिमामंडित करते ब्लोगर पर कटाक्ष था क्योंकि आगे आपने दाल गलने की बात भी कही है /अखवार में लिखने के महत्त्व से तो इनकार नहीं किया जा सकता /आप पेपर में ब्लोगर के वारे में लिख देते है =ब्लोगर की यही बड़ी उपलब्धि है -जहाँ तक मेरा व्यक्तिगत विचार है ब्लॉग लिखना बहुत सरल है और पेपर में छपना बहुत कठिन है /कुछ भी कहो साहब महत्त्व तो पेपर का ही है /ब्लॉग में १५-२० पढने आते है ज्यादा भी आजाते है टिप्पणी से लेखन को खुशी भी होती है -लेकिन क्या करूं पचासों पाठकों की टिप्पणी से भी उतनी खुशी नहीं मिलती जितनी एक पत्र सम्पादक के नाम छप जाने पर होती है -क्या आप मेरी इस मनोब्रत्ति में कुछ सुधार कर सकते हैं /पहले कभी कभी लिख देता था ,सम्पादक कांट छांट कर धोती का रुमाल बना देता था =ब्लॉग में मना मर्जी का कुछ भी लिख देता हूँ =मगर जो कट पिट कर छपता था टीबी ज़्यादा अच्छा लगता था

ravish ranjan said...

wahhha..ravish ji dunai ke bloger ek ho..ka nara jo diya wo sayad sakar nahi ho paye..blogers ke beech bahas hai..naam ...kaam aur pahchan ko leker...lakin naam ke mamle me aaj bhi apni pahchan ke liye jadojahad jaari hai..jab tak aadmi hai jaari rahegi....

JC said...

Sochne wali baat yeh hai: Kya manav ko uske do (2), hans ke saman deekhne wale ank jaise, aath (sankhya 8, manav ka sir aur pet jaise bodh karati) ungliyon aur do (2) angoothon ke bina (shakti ka bodh karate) socha nahin ja sakta hai - hathkadi pehne, tehkhane yani shunya mein parde kaidi saman, ya gufa mein Yogi saman bhi, aur phir bhi mun se chaand per pahunchne ki kshamta rakhte(!)?

paharedar said...

मायूसी छोड़ो

मेरे प्यारे देशभक्तों,
आज तक की अपनी जीवन यात्रा में मुझे अनुभव से ये सार मिला कि देश का हर आदमी डर यानि दहशत के साये में साँस ले रहा है! देश व समाज को तबाही से बचाने के लिए मायूस होकर सभी एक दूसरे को झूठी तसल्ली दिए जा रहे हैं. खौफनाक बन चुकी आज की राजनीति को कोई भी चुनौती देने की हिम्मत नही जुटा पा रहा. सभी कुदरत के किसी करिश्मे के इंतजार में बैठे हैं. रिस्क कोई लेना नहीं चाहता. इसी कारण मैं अपने देश के सभी जागरूक, सच्चे, ईमानदार नौजवानों को हौसला देने के लिए पूरे यकीन के साथ यह दावा कर रहा हूँ कि वर्तमान समय में देश में हर क्षेत्र की बिगड़ी हुई हर तस्वीर को एक ही झटके में बदलने का कारगर फोर्मूला अथवा माकूल रास्ता इस वक्त सिर्फ़ मेरे पास ही है. मैंने अपनी 46 साल की उमर में आज तक कभी वादा नहीं किया है मैं सिर्फ़ दावा करता हूँ, जो विश्वास से पैदा होता है. इस विश्वास को हासिल करने के लिए मुझे 30 साल की बेहद दुःख भरी कठिन और बेहद खतरनाक यात्राओं से गुजरना पड़ा है. इस यात्रा में मुझे हर पल किसी अंजान देवीय शक्ति, जिसे लोग रूहानी ताकत भी कहते हैं, की भरपूर मदद मिलती रही है. इसी कारण मैंने इस अनुभव को भी प्राप्त कर लिया कि मैं सब कुछ बदल देने का दावा कर सकूँ. चूँकि ऐसे दावे करना किसी भी इन्सान के लिए असम्भव होता है, लेकिन ये भी कुदरत का सच्चा और पक्का सिधांत है की सच्चाई और मानवता के लिए अपनी जिंदगी दांव पर लगाकर जो भी भगवान का सच्चा सहारा पकड़ लेता है वो कुछ भी और कैसा भी, असंभव भी सम्भव कर सकता है. ऐसी घटनाओं को ही लोग चमत्कार का नाम दे देते हैं. इस मुकाम तक पहुँचने के लिए, पहली और आखिरी एक ही शर्त होती है वो है 100% सच्चाई, 100% इंसानियत, 100% देशप्रेम व 100% बहादुरी यानि मौत का डर ख़त्म होना. यह सब भी बहुत आसान है . सिर्फ़ अपनी सोच से स्वार्थ को हटाकर परोपकार को बिठाना. बस इतने भर से ही कोई भी इन्सान जो चाहे कर सकता है. रोज नए चमत्कार भी गढ़ सकता है क्योंकि इंसान फ़िर केवल माध्यम ही रह जाता है, और करने वाला तो सिर्फ़ परमात्मा ही होता है. भगवान की कृपा से अब तक के प्राप्त अनुभव के बलबूते पर एक ऐसा अद्भुत प्रयोग जल्दी ही करने जा रहा हूँ, जो इतिहास के किसी पन्ने पर आज तक दर्ज नहीं हो पाया है. ऐसे ऐतिहासिक दावे पहले भी सिर्फ़ बेहतरीन लोगों द्वारा ही किए जाते रहे हैं. मैं भी बेहतरीन हूँ इसीलिए इतना बड़ा दावा करने की हिम्मत रखता हूँ.
प्रभु कृपा से मैंने समाज के किसी भी क्षेत्र की हर बर्बाद व जर्जर तस्वीर को भलीभांति व्यवहारिक अनुभव द्वारा जान लिया है. व साथ- साथ उसमें नया रंग-रूप भरने का तरीका भी खोज लिया है. मैंने राजनीति के उस अध्याय को भी खोज लिया है जिस तक ख़ुद को राजनीति का भीष्म पितामह समझने वाले परिपक्व बहुत बड़े तजुर्बेकार नेताओं में पहुँचने की औकात तक नहीं है.
मैं दावा करता हूँ की सिर्फ़ एक बहस से सब कुछ बदल दूंगा. मेरा प्रश्न भी सब कुछ बदलने की क्षमता रखता है. और रही बात अन्य तरीकों की तो मेरा विचार जनता में वो तूफान पैदा कर सकता है जिसे रोकने का अब तक किसी विज्ञान ने भी कोई फार्मूला नही तलाश पाया है.
सन 1945 से आज तक किसी ने भी मेरे जैसे विचार को समाज में पेश करने की कोशिश तक नहीं की. इसकी वजह केवल एक ही खोज पाया हूँ
कि मौजूदा सत्ता तंत्र बहुत खौफनाक, अत्याचारी , अन्यायी और सभी प्रकार की ताकतों से लैस है. इतनी बड़ी ताकत को खदेड़ने के लिए मेरा विशेष खोजी फार्मूला ही कारगर होगा. क्योंकि परमात्मा की ऐसी ही मर्जी है. प्रभु कृपा से मेरे पास हर सवाल का माकूल जबाब तो है ही बल्कि उसे लागू कराने की क्षमता भी है.
{ सच्चे साधू, संत, पीर, फ़कीर, गुरु, जो कि देवता और फ़रिश्ते जैसे होते हैं को छोड़ कर}
देश व समाज, इंसानियत, धर्मं व इन्साफ से जुड़े किसी भी मुद्दे पर, किसी से भी, कहीं भी हल निकलने की हद तक निर्विवाद सभी उसूल और सिधांत व नीतियों के साथ कारगर बहस के लिए पूरी तरह तैयार हूँ. खास तौर पर उन लोगों के साथ जो पूरे समाज में बहरूपिये बनकर धर्म के बड़े-बड़े शोरूम चला रहे हैं.
अंत में अफ़सोस और दुःख के साथ ऐसे अति प्रतिष्ठित ख्याति प्राप्त विशेष हैसियत रखने वाले समाज के विभिन्न क्षेत्र के महान लोगों से व्यक्तिगत भेंट के बाद यह सिद्ध हुआ कि जो चेहरे अखबार, मैगजीन, टीवी, बड़ी-बड़ी सेमिनार और बड़े-बड़े जन समुदाय को मंचों से भाषण व नसीहत देते हुए नजर आ रहे हैं व धर्म की दुकानों से समाज सुधार व देश सेवा के लिए बड़ी-बड़ी कुर्बानियों की बात करने वाले धर्म के ठेकेदार, जो शेरों की तरह दहाड़ते हैं, लगभग 99% लोगों ने बात पूरी होने से पहले ही ख़ुद को चूहों की कौम में परिवर्तित कर लिया. समस्या के समाधान तक पहुँचने से पहले ही इन लोगों ने मज़बूरी में, स्वार्थ में या कायरपन से अथवा मूर्खतावश डर के कारण स्पष्ट समाधान सुझाने के बाद भी राजनैतिक दहशत के कारण पूरी तरह समर्पण कर दिया. यानि हाथी के खाने और दिखने वाले दांत की तरह.
मैं हिंदुस्तान की 125 करोड़ भीड़ में एक साधारण हैसियत का आम आदमी हूँ, जिसकी किसी भी क्षेत्र में कहीं भी आज तक कोई पहचान नहीं है, और आज तक मेरी यही कोशिश रही है की कोई मुझे न पहचाने. जैसा कि अक्सर होता है.
मैं आज भी शायद आपसे रूबरू नहीं होता, लेकिन कुदरत की मर्जी से ऐसा भी हुआ है. चूँकि मैं नीति व सिधांत के तहत अपने विचारों के पिटारे के साथ एक ही दिन में एक ही बार में 125 करोड़ लोगों से ख़ुद को बहुत जल्द परिचित कराऊँगा.
उसी दिन से इस देश का सब कुछ बदल जाएगा यानि सब कुछ ठीक हो जाएगा. चूँकि बात ज्यादा आगे बढ़ रही है इसलिए मैं अपना केवल इतना ही परिचय दे सकता हूँ
कि मेरा अन्तिम लक्ष्य देश के लिए ही जीना और मरना है.
फ़िर भी कोई भी , लेकिन सच्चा व्यक्ति मुझसे व्यक्तिगत मिलना चाहे तो मुझे खुशी ही होगी.. आपना फ़ोन नम्बर और अपना विचार व उद्देश्य mail पर जरुर बताये, मिलने से पहले ये जरुर सोच लें कि मेरे आदर्श , मार्गदर्शक अमर सपूत भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, राजगुरु, सुखदेव, लाला लाजपत राए सरीखे सच्चे देश भक्त हैं. गाँधी दर्शन में मेरा 0% भी यकीन नहीं हैं.
एक बार फ़िर सभी को यकीन दिला रहा हूँ की हर ताले की मास्टर चाबी मेरे पास है, बस थोड़ा सा इंतजार और करें व भगवान पर विश्वास रखें. बहुत जल्द सब कुछ ठीक कर दूंगा. अगर हो सके तो आप मेरी केवल इतनी मदद करें कि परमात्मा से दुआ करें कि शैतानों की नजर से मेरे बच्चे महफूज रहें.
मुझे अपने अनुभवों पर फक्र है, मैं सब कुछ बदल दूंगा.

क्योंकि मैं बेहतरीन हूँ.
आपका सच्चा हमदर्द
(बेनाम हिन्दुस्तानी)
e-mail- ajadhind.11@gmail.com

डा. फीरोज़ अहमद said...

आदाब, 19 नव.2008 का हिन्दुस्तान पेपर देखा .बड़ी खुशी हुई आपने मेरे ब्लाग के बारे में आपने विस्तार से लिखा है . इसके लिए शुक्रिया.
आप अपना पता दे जिससे राही मासूम रज़ा अंक भेजा जा सके http://rahimasoomraza.blogspot.com

आदर्श राठौर said...

आपने अपनी पोस्ट्स क्यूं हटा दी?

अशोक मधुप said...

चाहे बलागर हो या पत्रकार ,कवि हो या कथाकार पर मेरी राय में सब लिखने वाले हैं अत: उन्हें कुछ न कह कह लिखाडी कहों न। हम सब लिखने वाले लिखाड़ी है

shabd nirantar said...

maine bhi kuchh likhne ka prayas kiya hai .roz likhta hoon.aur hindustan men aapka lekh niymit padhta hoon banaye rakhiye blogger ki lau jalaye rakhiye

Shakun said...

main shkuntala mishra aapka blog aaj padha .paper mai aapko hamesha padha maine bhi bhaagwat ke kuch ansh likhe hain ,main chahtii hoon aap mere blog ka prchar karen is logon ko padhane ke liye kahe aapki aabhari hoongi