किसान किसकाः पवार या प्रेमचंद का

साहित्य और फिल्मों ने किसानों के बारे में कुछ छवियां तय कर दी हैं। बाकी छवि प्रेस ने बनाई है। बारिश का इंतज़ार करते हुए आसमान तकते किसान की तस्वीर। उसके चेहरे की झुर्रियों का वर्णन और क्लोज अप में खाली बर्तन। किसान के बारे में क्या सोचें यह सब तय कर हमें विरासत में दिया गया है जिसे हम ढो रहे हैं।

सहारनपुर के योगेश दहिया, कृषि स्नातक हैं और खेती ही करते हैं। गुस्सा गए कि हम किसान को आदर्श किस आधार पर मानते हैं। वो किस आधार पर लाचार है। उन्होंने कहा कि आप किसान की हालत बतायें मगर एक ही हालत पिछले साठ साल से क्यों बता रहे हैं। जिस खेती पर साठ फीसदी आबादी निर्भर है उसकी समस्याओं की विविधता है। मगर आप पत्रकारों की नजर में किसान की एक ही समस्या है। भूखमरी, गरीबी या आत्महत्या क्या किसान सापेक्ष ही हैं। क्या दसवीं कक्षा के विद्यार्थी आत्महत्या नहीं करते। क्या साफ्टवेयर कंपनी के इंजीनियर आत्महत्या नहीं करते। योगेश ने कहा प्रेमचंद या साहित्य की नज़र से मत देखिये।

हमारा किसान काम नहीं करता। यह गलत धारणा है कि वह हाड़ तोड़ मेहनत करता है। धूप में वही काम नहीं करता। धूप में ड्राइवर भी गाड़ी चलाता है। ठेले वाला सब्जी बेचता है। हमारा किसान वक्त बर्बाद करता है। वह कचहरी जाएगा, दूसरे के खेत में जाकर नुकसान करता है। वह कोई अलग से आदर्श मानवजाति नहीं है। फिर बात आगे बढ़ी। कहा कि किसान को बदलना होगा। वह परंपरा के नाम पर गलत तरीके से खेती कर रहा है। योगेश कहते हैं क्या कोई पत्रकार यह बात कह सकता है कि किसान अपनी खेती बेवकूफी से करता है। जबकि सच्चाई यही है।

बहस लंबी होती जा रही थी। मैंने कहा बुंदेलखंड में स्थिति अलग है। पानी नहीं है। साधन नहीं है। योगेश ने कहा कि वो बुंदेलखंड की स्थिति हो सकती है पूरे किसान की नहीं। जहां कि मिट्टी अच्छी है और बाज़ार के नज़दीक है वहां क्यों नहीं किसान फायदा उठाते। योगेश कहने लगे कम से कम वह पहल तो करे। नए तरीके से सोच समझ कर खेती तो करे। जिनके पास ज़मीन है वो तो नए तरीके से खेती करें। ऐसा कैसे हो सकता है कि पच्चीस बीघे वाला किसान भी परेशान है और दो बीघे वाला भी। इसका मतलब कहीं गड़बड़ है।

इन बातों को लिए मैं बारामती आ गया। सहारनपुर के किसानों की हालत के उलट कृषि मंत्री शरद पवार का बारामती। योगेश का किसान यहां मिल गया। शीतल कंप्यूटर पर कई बाज़ारों में अंगूर की कीमत देख रहे थे। कहा कि अब हर बार पुणे में नहीं बेचता। सौ रुपये का लाभ उठाने के लिए कलकत्ता बेच देता हूं। शीतल कहने लगे हमें लागत कम करना होगा। इसके लिए गोबर से बने वर्मी कंपोस्ट का इस्तमाल करना होगा। ड्रीप इरिगेशन से पानी की लागत और मात्रा में बचत करनी होगी। तभी फायदा अधिक होगा। शरद पवार ने अपने यहां के किसानों में इसी सोच का निर्माण कर दिया है। इसीलिए बारामती एक शानदार कस्बा लगता है। सफाई है। हरियाली है और किसान एक्ज़िक्यूटिव लगता है। बारामती की अनाज मंडी का दफ्तर देखने लायक है। सोच वही कि किसान आए तो उसे लगे कि यह एक पेशेवर काम है सेवा नहीं है।

बारामती, जहां तीस साल पहले सिर्फ ज्वार की खेती होती थी, आज अंगूर, गन्ना, जरवेरा, गेहूं, धान, फूल और केला आदि की खेती करने लगे है। खेती से बाकी बचे ज़मीन पर वहां ईमू पक्षी का पालन होने लगा है। किसान सिर्फ अनाज नहीं उगाता वह दूध से लेकर तमाम तरह के कारोबार करता है। तमाम तरह के कोपरेटिव में वह संगठित है। शरद पवार ने यही सुनिश्चित किया है कि इनमें कोई घोटाला नहीं है। सभी किसानों का जीवन स्तर बेहतर और उम्मीदों भरा लगता है।

इसलिए कि किसान बदल गए हैं। बारामती में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का एक केंद्र है। किसान इस केंद्र का भरपूर इस्तमाल करता है लेकिन कोई सेवा मुफ्त में नहीं है। वह मिट्टी की जांच करता है, पानी की जांच करता है फिर शुल्क देकर एक सर्टिफिकेट लेता है। उसकी सोच किसान जैसी रहमत मिलते रहे वाली नहीं रही। राजनीतिक संरक्षण में भी किसान भ्रष्ट नहीं हुआ है। वह परजीवी नहीं हुआ है। यहां किसानों के लिए कोई भी सेवा फ्री नहीं है। उन्हें स्वावलंबी और चतुर बना दिया गया है। बाज़ार से खेलना जान गया है। बारामती कमाल का लगता है। पूरे इलाके में गुणगान करने वाला शरद पवार का एक भी पोस्टर नज़र नहीं आया। न ही दीवारों पर पुता हुआ उनकी पार्टी का चुनाव चिन्ह।

महाराष्ट्र के किसानों ने प्रगतिशीलता दिखाई है। नया प्रयोग किया है और साझा भी। वहां दैनिक सकाल का एक कृषि अखबार रोज़ निकलता है। अग्रो वन। महाराष्ट्र के एक लाख से अधिक किसान रोज़ इस दो रुपये के कृषि अखबार को खरीदकर पढ़ते हैं। दो साल से यह अखबार बिक रहा है। किसी किसान ने इसकी एक भी प्रति नहीं बेची है। बल्कि अखबार के सहारे वो अपनी खेती बदल रहे हैं।

किसान की समस्या अपनी जगह है। मगर इसकी बात तो करनी पड़ेगी। किसान को प्रेमचंद के बनाए पिंजड़े से निकालना होगा। उड़ना सीखाना होगा। आप कहेंगे कि बारामती की तरह भारत क्यों नहीं। जवाब भी है। भारत बारामती की तरह क्यों नहीं।
इसे मैंने मेरा गांव मेरा बजट में समेटने की कोशिश की है। जो शुक्रवार रात साढ़े दस बजे एनडीटीवी इंडिया पर आएगा। शनिवार को दोपहर साढ़े बारह बजे।

15 comments:

राजीव जैन Rajeev Jain said...

बारामती के किसानों के बारे में
और ऐमू पर एक बार संडे इंडियन एक्‍सप्रेस में स्‍टोरी पढी।
टीवी तो अपन देख नहीं पाते, अगर ऑनलाइन कोई वीडियो हो प्रोग्राम का तो बताइयेगा।
आपके और इन महान किसानों के दर्शन हो जाएंगे

thoughtme said...

tejender khanna did his msc physics frompatna university(sic) sorry TK WHY DID U READ IN THAT BACKWARD STATE BACKWARD UNIVERSITY ...PADH KE WAHA SE IAS BAN GAYE TO BIHAR KHARAB LAGNE LAGA

JC said...

Bura na mano to kahoon...

Ap mein billi ke saman utsukta hai aur soney mein suhaga saman chaha (aur chaya) bhi !

Prasiddha paschimi vaigyanik Newton ne bhi kaha tha ki wo ek nanhe balak saman hai jo sagar-tat per khel raha ho aur usey kuch chamakte patthar aur shankh adi dikh jayein, jabki poora sagar abhi uskey samne jan-ne ko parda hai...

‘Hari ananta, Hari katha ananta’ samajhne wala Hindu nahin tha wo - Christian tha. Is karan usey shaitan ne uksaya – jaise kabhi bhootkal mein adam ko uksaya tha usne – usey varjit phal seb ne, athva lal rang ne jagaya (Maoist?)! ‘Naisadak’ per lagi lal battiyon ke saman, jise hum Uttar Bhatrtiya koodne mein mahir kahe gaye hal hi mein- TK dwara!

Hindu dwara pradarshit Natraj Shiva darshata hai unke pere ke neeche dabey manava ko, jise apsmara purush kaha gaya bharatiya bhasha mein…

Aadmi ko apna chehra nahin dikhta - dikhlana pardta hai. Vertman mein aiina ya darpan mein pratibimba ke madhyam se – kintu wo ulta deekhta hai. Seedhe to apna 'panja' hi deekhta hai – jismein panchon ungliyan barabar nahin hoti!

Socho kyoon! Kya isey kisi ka gala ghotne ke liye hi banaya gaya hai? Athva ismein kisi adrishya jiva ka haath to nahin?

Krishna ko ‘natkhat Nandlal’ kyoon kaha gaya? Devki putra nahin? Ityadi, ityadi, shastra prashna hein Krishna ki akshohini sena ke her sipahi ke samne!

Yeh ‘goontha’ (angootha) hi kyoon hamesha dabata hai?...

Ek filmi gana prasiddha hua tha kabhi, “O Mr Banjo, ishara to samjho kya kahta hai badal? Kyoon mausam hai pagal?!…”
Aur ‘Pagal’ ko ‘Lunatic’ kyoon kaha gaya? Divana aur Deevana mein kya antar hai?...Bhasha gyani hein hum sab Bharatiya - Krishna ke rang se aur Mayavi Gouri Radha ke rang se range!!! Aisa itihas darshata hai, kintu Gandhari hamari purvaja bhi kahlai jati hain!

nadeem said...

रवीशजी आपका लेख पढा पढ़कर अच्छा लगा की आप मेरे ननिहाल गए और वहाँ के कुछ किसानों के बारे में आपने लिखा. पर थोडा अधूरा लगा क्यूंकि आप सहारनपुर तो गए मगर आपको इसे पूरा देखने को नहीं मिला. क्यूंकि यदि ऐसा होता तो आप ये भी देख पाते की यहाँ भी भ्रष्टाचार ने अपने पैर पसारे हुए हैं अजी सरकारी बाबुओं को तो छोड़ ही दो यहाँ मुझे कहते हुए अफ़सोस भी होता है की यहाँ का किसान भी भ्रष्ट हो चूका है.यहाँ तो लोग नदी की ज़मीन भी बीच देते हैं.उसे उपजों और अपनी बता कर. हाँ हालत अच्छी ज़रूर है लेकिन केवल उन किसानों की जो अपने यहाँ के समाजवादी और बहुजन समाजवादी नेताओं के साथ जुडे हुए हैं.और जो किसान भ्रष्ट नहीं हैं उनकी हालत आज भी प्रेमचंद के किसान की ही तरह है. कुछ नहीं बदला.

JC said...

Is duniya mein her samay her sthan mein 'bhale' aur 'buray' dono tarah ke log mil jayenge. Gyani log kah gaye ki Kaliyuga mein 'buray' adhik aur 'achche' kum milenge. Aur, yehi sabhi shayad dekh bhi rahe hain ki kis tarah 'buron' ka number bardha hi ja raha hai in 60 salon mein - jiski raftar bahut bardh gayi lagti hai sabhiko...
Sab ukta gaye hain per nadi mein bahte huway latthon ki tarah nadi ke saath samudra mein milne ko atur se dikhte hein!

Raag said...

बढ़िया दृष्टिकोण।

gautam yadav said...

kisan ka to malum nahi par pawar to cricket ke hai.

JC said...

Kisan anant-kal se ananta Parvati-Shiva ka hai!

Mukund Kumar said...

Ravish Ji ko sadhuwad...Budget ke bahane hi sahi aap gaye to Kisan ke pass..Wo kisan jarror hi bhagyasali hai jiske darwaje per Media wale ne dastak di...aapke
lekhni ka kayal hun..kabhi pehle TV main dekhta ta aapko..phir ek din railway station per aapke apne bachhe ko god main uthaye dekha tha...apke blog per naye lekh ka intzar karte rahta hun..kuchh salon se roji roti ke liye desh se bahar hun...is lekh per comment likhne wale thoda kanjusi kar gaye...kisano ke nam per to kanjusi hamare desh main nayee bat nahi hai..aap thode hi theka liye hai sab ko sudharne ka

JC said...

Ajke sandarbha mein jwalant prashna hai: Mumbai ka raja kaun?

Uttar hai: Ne mayavi ‘Bhiku Mhatre’, ne koi Thackeray!

Mumbai ki Rani hai MUMBA DEVI!
Uttar disha mein sthit, Kailash-Mansrovar vasi, Mata PARVATI ka hi ek swaroop, arthat pratibimb!

Unhi ke ashirwad se dharti ka raja hai ‘Lambodar’, ‘Ganpati Bappa’!

Vishakt vatavaran ke liye uttardayi kaun hai phir?

Shaktishali Kartikeya! Usay apni haar hajam nahin hui! Usay laga uske sath beimani hui…wo ghoomte hi rah gaya!

Kintu is mein bhi haath Mayavi Neelamber Krishna arthat Natkhat Nandlal ka hi hai – kah gaye gyani! Wo Peetamber roop mein moorkha bana gaye ‘shaktishali’ Rajaon ko!

Kisan Gangadhar evam Trimurty Bholenath Ardhanarishwar Shiva ka hai!
Kyoonki Parvati swayam ‘Sati’ ka mayavi roop hai - Vedanti aisa kah gaye!

ajeet yadav said...

aapka programme t.v. par dekha aur uske bare me blog par bhi padha. khushi huee ki chalo professional chunaution ke beech kisanon ki bhi sudh li ja rahi hai. lekin ek baat ki kami khali vah thi chote kisano ki hakikat ke bare me jankari. akhirkar 70 bigha aur bahusankhyak 8-10 bigha vale kisanon ke beech antar bhi to hai. badhiya laga yogesh dahiya ke aashvadi veecharon aur unke kisan hone ki garvokti ke bare me jaankar. lekin meri khusi kaee guna aur badh jati jab doordaraj aur apni category ka bahusankhyak kisan bhi yogesh ki hi bhasa bolta hua dikhayi deta. mujhe bhi krishi pradhan bharat desh ka nivasi hone par garv mahsoos hota jab sudoor kisi gaon ka vah kisan yogesh ki hi tarah apni uplabdhiyon ko shan se ginati. jise na to kisan credit card ke bare me pata hai na sharad pawar ke bare me aur na hi unki yojnayon ke bare me. aur jinke liye unnat kheti ka mayna sahi samay par khad aur beej ki prapti va karj ke niptare ke ird-gird hi simta najar aata hai. pawar ji ke gaon wali nahar ke sundrikaran ko dekhkar un adhisankhya nahron ki tasveer aakhon me ubhrne lagi jinki silt tak saaf nahi ho pati. silt ki safaee to shramdan se bhi ho jaati lekin pani kaha se aaye. kisan unnat kendron ko dekhkar un kendron ki bhi yaad aane lagi jahan ek shudha bhavan bhi nahin hai. aur kisanon ki unnati karne ke liye adhikariyon ki jagah chaprasi taiyar baithe rahte hain. khair, mujhe us din ka bhi intajar hai jab adhiktar kisanon ko apne kisan hone par garv mahsoos hoga. aur har gaon apne aapko sharad pawar ke paitrik gaon ke barabar na sahi aaspas to jaroor dekhta hua paayega. afsos kambakhat FDI kalona me bhi udne nahi deti.

amitkumart said...

aapka yah vichar ko padha achha

amitkumart said...

aapka yeh vichar achha laga ki hamare kishan ko ab badalna hoga ....

JC said...

Kaun nahin janta ki Munshi Pemchand ek prasiddha lekhak the.

Kisi shayar ne yeh bhi kaha tha ki ‘her sataya hua shayar hota hai’, aur vartman sandharbha mein ek ‘garibi ki rekaha ke neeche’ paya jaane wala kisan bhi apne ko sataya hua pata hai…Shayad unhi ko dekh kisi shayar ne kaha “Pehle aati thi her baat per hansi/ Ab kisi baat per nahin aati.” [Ab tau khdkushi hi aati hai :-( ]

‘Dada’, Manna Dey, ka ek gaana suna tha - purane samay ke premi ke santosh ko darshate, “Kaun aya mere mun ke dware payal ki jhankar liye”. Kintu aj-ka premi ko tau ‘Payal ki Zen car’ ki hi khoj hai!

Smriti Dubey said...

रवीश इसमें कोई शक नहीं कि किसानों को अब प्रेमचंद के उपन्यासों से बाहर निकलकर अब अपनी निरीह पहचान को बदलना होगा लेकिन आप भी इस बात से बखूबी वाकिफ हैं कि बारामती एक उदाहरण तो हो सकता है लेकिन पूरा देश बारामती यकीनन नहीं हो सकता। योगोश जैसे कृषि स्नातक भी कम ही हैं। ऐसे में जागरुकता का सही तरीका एक पत्रकार से अपेक्षित है।
मैंनें ये पोस्ट न चाहते हुए भी एक पत्रकार की हैसियत से पत्रकार रवीश को लिखी है।
अपने पहले पोस्ट में मैंनें ये पूरा प्रयास किया था कि रवीश और एक पत्रकार के व्यक्तित्व को इस ब्लॉग में मिलने न दूँ जैसा कि रवीश ख़ुद चाहते थे लेकिन चाहने और होने में अंतर है ये उन्होनें अपने लेख के अखिर में एनडीटीवी का विज्ञापन देकर साबित कर दिया।
गुज़ारिश यही है कि इस ब्लॉग में उसे हावी न होने दें वरना आपके लेख पर पोस्ट देने वालों को भी दोबारा सोचना पड़ेगा।
स्मृति