कानपुर- ब्लू बनाम ब्लैक लेबल

हमारे एक वरिष्ठ सहयोगी बता रहे थे कि ब्लू लेबल शराब ब्लैक लेबल से अच्छी होती है।शराब के बारे में मेरी जानकारी कम है। इसलिए प्रभावित होकर सुन रहा था। लेकिन अनमने ढंग से कि इस जानकारी का क्या करना है। लेकिन सुनी गई बातें कई बार काम आ जाती हैं।

आज कानपुर में भारत पाक मैच हुआ तो काले रंग के कपड़े पर प्रतिबंध लग गया। कैमरे दिखा रहे थे कि दर्शकों के काले जुराब तक उतरवा लिये गए। काले गंजी और काले रुमाल। काले अंडरवियर के बारे में कैमरे ने कुछ नहीं कहा। सो इसे ऑफ द रिकार्ड मान लिया जाए। पुलिस को काले रंग से सुरक्षा को ख़तरा था। इसलिए दर्शकों के ज़र्रे ज़र्रे से काले रंग को निकाला जा रहा था। कैमरा दिखा रहा था कि बगल से अंबेसडर कारों का काफिला आ रहा है। यूपी की मुख्यमंत्री मायावती आ रही हैं। एक जैमर पजेरो भी था। काले रंग था। बाकी सभी कारें सफेद। बेदाग़। नीले रंग की पार्टी की मुखिया को काला रंग सुहाया नहीं।

क्यों? क्योंकि बर्खास्त सिपाही काला झंडा दिखा कर मायावती के खिलाफ नारेबाज़ी कर सकते थे। कानपुर का पुलिस महकमा इसी बात में लगा था कि कोई काला कपड़ा पहनकर आ गया और उतार कर स्टेडियम में लहरा दिया तो नौकरी गई। आदेश ऊपर से आया था। काला उतारो। और कोई भी रंग चलेगा। हमें यह जानकर खुशी हुई कि नेताओं को काले रंग से डर लगता है। वो इसे गंभीरता से लेते हैं। अब आगे हर प्रदर्शन में काला रंग का इस्तमाल होना चाहिए। अगर काला रंग पर प्रतिबंध लगता है तो जल्दी ही पीले रंग को प्रदर्शन और विरोध का रंग बना देना चाहिए। बहुत रंग है। कमी नहीं है। हम आज से विरोध के रूप में बाजू पर पीली पट्टी बांधेंगे। लेकिन प्रदर्शनकारी नया नया आइडिया लाते नहीं इसलिए मायावती के लिए आसान हो गया कि काले रंग पर लगाम लगाओ।

क्या बहन जी। इतना क्या डरना। आपने अच्छा किया है चोर रास्ते से बहाल सिपाहियों को निकाल कर। फिर उनके प्रदर्शन से घबराहट कैसा। ग्रीनपार्क में अगर काला झंडा लहराते भी तो आपकी इज्जत बढ़ जाती कि मायावती ने सही किया है। आखिर किसे इन सिपाहियों से सहानुभूति है। बहन जी का क्रिकेट से कोई लेना देना नहीं। वो कहती रहती हैं बहुजन के काम के लिए वक्त कम पड़ जाता है ऐसे में न बालीवुड की फिल्में देखती हूं न मैच। मैच के बारे में कभी आधिकारिक रूप से नहीं कहा। लेकिन इसी दलील में मान लिया कि क्रिकेट भी बहुजन समाज की लड़ाई के रास्ते में एक गैर ज़रूरी चीज़ है। अब अचानक बहन जी के स्टेडियम पहुंचने की खबर सुनी तो लगा कि शायद संदेश देना चाहती हैं कि अब उन्हें हर चीज़ से नफरत नहीं है। वो शहरी लोगों के शौक को पसंद करती हैं। क्रिकेट देखती हैं। यह छवि उनके काम आती। बड़े शहरों के लोगों पर जादू करने में। पैन इंडियन खेल को अपना कर।

लेकिन उन्होंने काले रंग के कारण मौका गंवा दिया। बेचारे काले जुराब क्या करते। इतने बड़े स्टेडियम में कोई काला जुराब लहरा भी देता तो किसे दिखाई देता अगर कैमरा न दिखाता। कोई फेंक भी देता तो यही समझा जाता कि पाकिस्तान के खिलाड़ियों पर किसी ने फेंका है। तब लोग हैरान हो जाते क्योंकि अब ऐसा नहीं होता है। कोई पाकिस्तान के खिलाड़ियों से ऐसा बर्ताव नहीं करता।

लेकिन सत्ता है। विपक्ष में रहते हुए नीले रंग की बीएसपी ने कई बारे काले रंग के झंडे दिखाये होंगे। लेकिन सत्ता में आते ही उसे काले रंग से घबराहट होने लगती है। कहीं वह जनता से डरने तो नहीं लगीं या कहीं मायावती अब विरोध प्रदर्शन को सहन नहीं कर पातीं। माजरा क्या है...वही जाने। लेकिन नीले रंग को जब काला पसंद नहीं आया तो वरिष्ठ पत्रकार की बात याद आ गई। ब्लू लेबल का क्लास अलग है।महंगा है। ब्लैक लेबक थोड़ा कम है। कहीं ऐसा तो नहीं है। इसलिए ब्लू दल को ब्लैक झंडा बर्दाश् नहीं हुआ।

राजनीति में इस तरह के अजब गजब होते हैं । खासकर सत्ता में आने के बाद ऐसे आइडियाज़ आने लगते हैं। इसीलिए कहता हूं प्रदर्शन में हर रंग का इस्तमाल करो। ये हमारी भी नाकामी है। सिर्फ ब्लैक लेबल को ही उठाये फिरते हैं। तभी तो बहन जी को लगा कि एक ही रंग की बात है...बैन कर दे। उतरवा दे जुराब। निकलवा ले गंजी। और भेज दे घर। जा कुछ और कलर पहन कर आ। पता नहीं हमारे राजनेता कब क्या कर बैठते हैं। ये फिल्म वाले जैसे हो गए हैं। हर समय नया आइडिया ढूंढते रहते हैं। इन्हें बर्दाश्त करना आना चाहिए। काले रंग को भी। भले ही यूपी में इस वक्त ब्लू लेबल टॉप पर चल रहा है।

7 comments:

Sanjay said...

एक मोहल्‍ला देखा, अब कस्‍बा देख रहे हैं. क्‍या बात है जनाब, टीवी पर रिपोर्टिंग से मन नहीं भरता क्‍या? मजाक कर रहा था. मोहल्‍ले की फ़ि‍जा रास नहीं आई, पर लगता है कस्‍बा टिकने देगा. मौत ने घर देख लिया है, आना जाना लगा रहेगा. आपके चिट्ठे पर आकर अच्‍छा लगा रवीश भाई.

ravish said...

आते रहिये। लिखते रहिए। हम सब कस्बे को एक दिन दिल्ली के एनसीआर बना देंगे। जो एक दिन बड़ा होते होते महानगर में मिल जाएगा और कस्बा खत्म हो

Sanjeet Tripathi said...

रविश जी, कागज़ों और यथार्थ से भले ही मोहल्ले और कस्बे महानगर में मिलकर खत्म हो जाएंगे पर दिलोदिमाग में तो ज़िंदा ही रहेंगे न!!

Srijan Shilpi said...

'ऊपर' के आदेश का आंख मूंद कर पालन करने/कराने वाले पुलिस अधिकारियों/कर्मियों की समझ और कार्यशैली पर क्षोभ होता है।

आम लोग और आम दर्शकटिकट खरीदकर भी पुलिस के डंडों से पिटते रहें, कपड़े उतरवाकर, बेइज्जत होकर स्टेडियम से बाहर रहे और वीआईपी पास वाले मजे से मुफ्त में मैच का मजा लेते रहें...... तो बहन जी जैसी नेताओं का कुछ हो या न हो, देश में क्रिकेट का कल्याण तो हो ही जाएगा।

आपने बढ़िया लिखा, हमेशा की तरह।

Pankaj Dixit said...

Ravish ji, Agar aap comment read karte hai to mujhe apna contact no aur Email Address de den. Mujhe app se bahut jaroori kaam hai.
Pankaj Dixit
Zee News
akanksha47@gmail.com
9415333325

पुनीत ओमर said...

कानपुर के तो हम भी हैं. पर शहर से दूर रहने की वजह से इत्ता कुछ मालूम नहीं चल पाटा. आपने बताया तो अच्छा लगा. आपका अंदाज भी कमाल है.

आशीष said...

रवीश जी अब थोड़ा हमारे जैसे नए पत्रकारों के लिए भी कुछ लिख दो...यही मान कर लिख दीजिये कि आप किसी यूनिवर्सिटी में पत्रकारिता के छात्रों को पढ़ा रहे हो....


http://bolhalla.blogspot.com