फेसबुक का चेहरा

दोस्तों,

अब मैं फेसबुक पर आ गया हूं। वहां कुछ पुराने ही दोस्तों से लिखा पढ़ी के तौर पर बात हो रही है। टाइप करते रहिये और बकते रहिये। कुछ बचपने का भी नमूना है। जैसे आप दोस्तों को बलून या बाल्टी भर पानी भेज सकते हैं। बलून आपके फेसबुक पर ब्लिंक करता रहेगा। कई दोस्त इसी में ही ही करते रहते हैं। बहुत देर तक फेसबुक पर बोर होने के बाद लगा कि सकारात्मक हुआ जाए। इंटरेस्ट पैदा किया जाए। तो कुल मिला कर चार कविताएं निकल आईं। भावनात्मक बयार में निकली इन पंक्तियों को अन्यथा मत लीजिएगा। पढ़ लीजिएगा।

(१)
प्रेम का मुकम्मल महीना कौन सा है
जब अमलतास खिलता है
जब बारिश होती है
जब सर्दी होती है
जब ठंडी हवायें चलती हैं
जब गर्मी की छांव होती है
प्रेम के एक मुकम्मल महीने की तलाश में
प्रेम का हर लम्हा गुज़रता जा रहा है

(२)
बहुत कुछ लिखना बाकी है
जो बाकी है उस पर फिर कभी
जो शुरू किया है उन सबको
अभी ख़त्म करना बाक़ी है
(३)
कहीं हम उस दौर में तो नहीं लौट रहे
जब लिखा करते थे ख़त दोस्तों को
जब लिखी जाती थी कविता प्रेम में
जब गाये जाते थे गीत विरह में
फेसबुक उन्हीं दिनों को वापस ला रहा है
अब लोग लिख रहे हैं
फिर से ख़त, कविता और गीत
(४)


दोस्त कई जगहों पर मिलते हैं

बार बार मिलते हैं

कई दिनों तक नहीं मिलते हैं

फिर मिलते हैं

तो कई जगहों पर मिलते हैं।

मिलते रहने का रोमांच अगर कहीं है

तो दोस्ती में है

दोस्त कहीं हैं तो कहीं नहीं

सिर्फ फेसबुक में हैं

6 comments:

कीर्तिश भट्ट said...

TV par dekhte hue kbhi socha tha ki aap kavita bhi rachte honge.
Badhai.

आशीष said...

chaliye aap ki kuch aur kavitaon se rubaru hone ka awasr mil hi gya

rishikesh said...

kya bat hai sir...qasbe me sangeet sun-ne ka maza hi kuchh aur hai....


Dhanyawad

पुनीत ओमर said...

kya bat hai ji. abhi abhi to samirlal ji ka bhed khul hai aur upar se aap aisi baten kar rahe hain. waise achha ahi fir bhi.. lage rahiye..

Ashish Mishra said...

Ravish Babu,

Mujhe maaloom hai kee mera ye anurodh.. aapke current post ke liye aprasangik hai..
Maafi chahta hun.. isliye kyonki philhaat bharat mein nahi hun.. aur NDTV INDIA nahi dekh paa raha hun.. Lekin.. Hamesha Narendra Modhi kee charcha karane waale mere bhai.. Agar Dum hai to Kuch nandigram pe bhi likha jaaye.. Agar sach mein patrkarita karane kee kasam khaayee hai.. to Buddhadev aur aapke Pranay Rai ke bade bhai Karat ke baare mein bhi kuch likho.. I am not sure wheather you will allow this comment to publish.. But just dig deep into your heart .. explore your Conscience and do your job.

मनीषा पांडेय said...

बढि़या कविता है रवीश जी। कविता पर कुछ और हाथ आजमाइए।