आईसीआईसीआई आई है

ब्याज कुछ सस्ता हुआ
कर्ज कुछ बढ़ता गया
ज़िंदगी में रंग लाई है
आईसीआईसीआई आई है

कर्ज़ का मकान है
किश्त पर रोटी है
ब्याज पर दुकान है
भूख से लेकर नींद तक
बैंक का सामान हैं

मूल में सूद मिलाकर
वसूली की योजना लाई है
ले जाने के लिए आई है
आईसीआईसीआई आई है

कर्ज़ का प्रसार है
ब्याज का प्रचार है
सस्ता सस्ता बोलकर
घर में कार आई है
आईसीआईसीआई आई है।

11 comments:

परमजीत बाली said...

बहुत बढिया व्यंग्यात्मक रचना है। आज के रहन सहन पर।

Debashish said...

फ्लोटिंग रेट का कमाल है
ईएमआई का सवाल है
जितने साल का लोन बढ़ा
उतनी सर्विस ना बच पाई है
आईसीआईसीआई आई है। :)

Rajesh Roshan said...

ये टेम्प्लेट मेरी आंखो को जच नही रहा है. मैं आपसे ये नही कह रहा हु की आप इसे बदल दे लेकिन आप इसके बारे में जरुर सोचे. पहले वाला अच्छा था

Sanjeet Tripathi said...

बढ़िया!!

और हां पहले वाला टेम्प्लेट बेहतर था।

Nishikant Tiwari said...

दिल की कलम से
नाम आसमान पर लिख देंगे कसम से
गिराएंगे मिलकर बिजलियाँ
लिख लेख कविता कहानियाँ
हिन्दी छा जाए ऐसे
दुनियावाले दबालें दाँतो तले उगलियाँ ।
NishikantWorld

Mired Mirage said...

बहुत बढ़िया !
घुघूती बासूती

सुरेश कुमार said...

baat aub kavita ke roop me aane lagi hai.lagta hain aap vishesh bhi kavita ke roop main dene ki taiyari kar rahe hain

suresh.

bhupendra, prem said...

bahoot khub ravish ji aise hi likte rahiye. or poll kholte rahiye.

चन्द्रिका said...

kasba me aane se kya milta hai jaise jabaa ke liye mera manana hai ki ndtv aur aaj tak ya india today jaese log likhte hai aur pooch kar use apne jan aakde me fit karte hai kasba se iss bakwas tarah ke kalam ki ummeed nahi karta......

pawan lalchand said...

sharmaji ki nai car dekhkar hai hui..
hai-hai hui to icici..

apne bittoo ko class mein topper dekhkar wah hui..
wah-wah hui to icici..
icici......icici

अविनाश said...

आपकी ये रचना महानगरों में रहने वालों की जिन्दगी का यथार्थ चित्रण करता है ।
सचमुच आज लोगो की जिन्दगी ही किस्तों मेँ चल रही है लोग जीते भी किस्तों में ही और मरते भी किस्तों मे है .