लेखक वरिष्ठ पत्रकार है

लेखक ख्यातिलब्ध विद्वान है। दैनिक भाष्कर में एक विशेषज्ञ का परिचय पढ़ा तो लगा कि विद्वान हो कर भी क्या करना अगर ख्यातिलब्ध न हुए।अखबारों में परिचय का आखिरी सिरा भी दिलचस्प होता है।लेख के अंत में यह देख कर महत्वकांक्षा रंग बदल लेती है कि पहले वरिष्ठ होना फिर विद्वान होना फिर ख्यातिलब्ध होना। आगे बढ़ने से पहले बता दूं कि इस तरह का परिचय ज़रूरी होता है लेकिन इस ज़रूरत का अध्ययन कीजिए तो मामला रोचक बन जाएगा।

मुझसे एक हमपेशा सज्जन ने फोन पर पूछा कि लेख के बाद आपका परिचय क्या दें। तो मैं हंसने लगा। फिर कहा कि ये लिखियेगा न कि लेखक कुछ हैं। उनका जवाब था वही पूछने के लिए फोन किया है। बस बात परिचय पर निकल पड़ी। लिखने वाला क्या है। उन्होंने अपने पुराने अखबार का किस्सा सुनाया। जहां परिचय में यह लिखा जाता है कि लेखक अखबार से जुड़े हैं। मैं अखबार का नाम नहीं दे रहा हूं। अगर बुरा लग गया तो मैं वहां नहीं जुड़ पाऊंगा। ख़ैर उन्होंने कहा इस परंपरा में एक समस्या थी। जब अखबार के मालिक लिखते थे तो मन करता था कि यह लिख दें कि लेखक से अखबार जुड़ा है।

इसी प्रसंग में ख्याल आया कि लेखकों के परिचय पर एक संक्षिप्त शोध हो जाए।
लेखक फलनवां चिलनवां हैं। मुझे दिलचस्प लगता है।

आइये गिनते हैं कि कितने तरह के परिचय होते हैं
१. लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं
२. लेखक सुरक्षा सलाहकार हैं
३. लेखक ख्यातिलब्ध विद्वान हैं
४. लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं
६. लेखक राजनीति के जानकार हैं
७. लेखक कार्यकारी संपादक हैं
८. लेखक टीवी आलोचक हैं

आपको लगता है कि सूची में परिचय कम रह गए तो अपने अपने शहरों के अखबारों से परिचय ज़रूर भेज दीजिए। मज़ा आएगा कि इनका विश्लेषण कर। आखिर स्वतंत्र पत्रकार ख्यातिलब्ध विद्वान हुए बिना क्या हुए और विद्वान भी हो गए तो कार्यकारी तो नहीं हुए।

16 comments:

Isht Deo Sankrityaayan said...

बहुत ख़ूब. अखबारों में लेखों के नीचे पुछल्ला अक्सर वैसे ही लगता है जैसे टीवी पर मरते हुए आदमी से रिपोर्टर का यह पूछना कि आपको कैसा लग रहा है. अरे भाई अगर फलाने ख्यातिलब्ध धेकने न होते तो उनको उस विषय पर लिखने की हिम्मत कैसे होती? और मान लीजिए कि वह सब हुए बिना भी अगर उन्होने लिख ही दिया तो बेचारा पाठक क्या कर लेगा?

Debashish said...

ऐल्लो, "लेखक देवनागरी लिपी का पत्रकार है", आपहीये ने लिखा हय :)

ravish said...

सही कहा देबाशीष जी ने। मैंने यह नहीं लिखा कि लेखक देवनागरी का पत्रकार है। मैं देवनागरी का पत्रकार हूं यह लिखा है। बात तो तब होती है जब लेखक जुड़े। वैसे परिचय लिखा जाना चाहिए। आज के दैनिक हिंदुस्तान में मेरा एक लेख है। जिसमें परिचय है। मगर इसका विश्लेषण तो किया ही जा सकता

ALOK PURANIK said...

ठीक कह रहे है सरजी
मैंने अपना परिचय फुल सीरियसता के साथ प्रपोज किया-
लेखक खुद को तो लेखक मानते हैं
लेखक अगड़म बगड़म शैली के मूर्धन्य विचारक हैं
लेखक कभी गरिष्ठ वैसे आम तौर पर वरिष्ठ चिरकुट हैं
किसी ने यह परिचय नहीं छापा, सब कहते हैं, इस परिचय पर आपको कोई सीरियसली नहीं लेगा। जैसे अभी लेते हैं।
भईया रवीशजी जब आप किसी अखबार के एडीटर बनें, या किसी चैनल के चीफ बनें, तो हमारा परिचय अईसा ही करवाईयेगा। यह अनुरोध है। धांसू च फांसू पोस्ट।

आशीष said...

Ravish ji yeh nye nye idea aap late kahan se hain?? kher accha hain..kal aapka 123 par program dekha..suit me acche dikh rahe the..

Arjun said...

..........Lekhak Accidental Patrakar hain.

Durghatnawas is pese main Aa gaye.

MUKHIYA JEE said...
This comment has been removed by the author.
MUKHIYA JEE said...

http://hindustandainik.com/news/2031_2026088,00830001.htm

here is Ravish jee Article on "Chak De Muslim" ! Badhiyaa subject hai !

thanks to write !

Ranjan R Sinh , NOIDA

Cool said...

महाशय ! हाल मे ही 14 अगस्त को Smt Tarkeshwari Sinha jee का देहान्त हो गया ! आज कि युवा पत्रकार ने उनको भुल दिया ! इसे बिहार कि जात पात से प्रभवित पत्रकरिता के रूप मे देखेन या एक भूल !

Monika said...

ravish g
namaskaar

bahut dino baad aapki sadak par aai. mood bahut achcha nahi tha, lekin aapki rachna ne sirf muskuraahat hi nahi, balki hansi laa di. aapka shukriya

aap vaakai kamaal hain.
aur haan, apke 123 programme ne niraash kiya. bahut ummeed thi ki kuch jaankaari badegi, khair, kai bar varishtho aur garishtho se bhi galtiyan ho jaati hain aur vaise bhi prg to PR ka hi tha na, isiliye shaayad apne bahut sereiously nahi liya

सुबोध राय,लखनऊ उत्तर प्रदेश said...

मेरे ख्याल से रवीश जी...लेखक ने ये विचार खुद के कद को भूल कर एक आम आदमी तरह दिये हैं..कुछ ज्यादा करीब लगता है...महसूस होता है कि अपने बीच का कोई बोल या लिख रहा है..फिलहाल ये शैली है आपमें

ravish said...

मोनिका
परमाणु की पाठशाला पर मेरी एक सफाई है। यह कार्यक्रम पक्ष विपक्ष के लिए नहीं था. बल्कि एक परिचय भर था कि यूरेनियम, रिएक्टर क्या होता है। पता नहीं क्यों ये लगा कि सरकारी कार्यक्रम है। इसमें हमने राजनीति की चर्चा न के बराबर की। सिर्फ दिखाने भर के लिए। मकसद सिर्फ इतना था कि लोगों को थोड़े बहुत में पता चल जाए कि यूरेनियम का काम क्या है। अब मैंने फिजिक्स की तरह भी नहीं बनाया। लेकिन आम बोल चाल की भाषा में कोशिश की गई कि लोग यह तो देखे कि मसला क्या है। नजरिया क्या है वो हर दिन अखबारों और हमारी न्यूज स्टोरी में होती है।

Anil Pandey said...

Sir,
ek baat apse janna thi ki akhir blog par likhne se kya fayda milta hai. mai bhi devnagri lipi ke ek akhbar mein copy editor hoon. par mujhe aisa lagta hai ki gambheerta kewal blog tak hi hai. asal jeevan mein sab dhuan-dhuan hai.

ravish said...

अनिल
ठीक कहा आपने कि गंभीरता सिर्फ लेखन तक ही है। बाकी सब धुआं धुआं है। अगर आप यह कह रहे हैं कि लिखने से हुआ क्या तो क्या कहा जा सकता है। लिखने से कम से कम मैं बेहतर और जिम्मेदार हुआ। बाकी का नहीं जानता। मैं बदल जाऊं यही काफी है। मैं दुनिया को नहीं बदल सकता। इस पैमाने पर किसी लेखन को मत देखिये। लेकिन हां लेखन को हल्का भी न लें। यह आपकी आज़ादी है कि पढ़े न पढ़े। अगर आप यह कह रहे हैं कि दुनिया में अब तक जितना भी लिखा गया उसका फायदा नहीं हुआ तो यह आपका शोध हो सकता है। मैं नहीं मानता। ठीक है हमारे आस पास की जगह पर निराशा होती है। क्या कर सकते हैं। लिखना छोड़ दें। बोलना छोड़ दें। आप यह कहेंगे कि सबके खिलाफ बगावत ही कर दें तो इसका हिमायती मैं नहीं हूं। आप लेखक को कसौटी पर न डालें।
एक बात और मैं यह मानकर लिख रहा हूं कि आपकी प्रतिक्रिया का यही मकसद होगा। हम जितना कर सकते हैं उतने के आसपास करते हैं। गलत को गलत कहते हैं। गलत को गलत होने से रोकना हमारे बस में नहीं। जितना होता है रोक भी देते हैं। लेकिन मैं कोई क्रांतिकारी नहीं हूं। हम सब लिख कर एक जनमानस बनाते हैं। आपके हमारे विचार एक दूसरे के पूरक हैं। इसलिए दूसरे का लिखा पढ़ते हैं। शायद। हां निराश मत होइये। दुनिया को बदलने का जुनून छोड़ दीजिए। अपने आस पास जितना बदल सकते हैं उसके भागीदार बन जाइये। उम्मीद रखनी चाहिए। हर कोई खराब नहीं है। हर कोई बदमाश नहीं है। नौकरी के स्तर पर अच्छे आदमी से भी ऊंच नीच हो जाती है। इसलिए तय करते समय संतुलित रहें तो बेहतर है। नौकरी करने की जगह को आदर्श जगह बनाने का ख्वाब ही विचित्र है। जहां दूसरे की शर्त होगी वहां आपकी मर्जी कितनी चलेगी आप जानते हैं। और हरेक के हिसाब से दुनिया बदले तो गिनते रहिए एक दिन में दुनिया कितनी बार बदलेगी। लेकिन कोशिश छोड़ देंगे तो आपका जीवन कितना बोरिंग हो

Monika said...

anil gi,

blog par likhne se ek fayedaa to jaroor hai,

mere jaise bahut se log honge, jo achch padhna chahte hai, lekin kitaben itni mahangi ho gai hain ki unhe kharidna hamaare boote ki baat nahi rahi.

to blog par padh kar tripti ho jaati hai, basharte vo poori gambheerta aur jimmedaari ke saath likkha gaya ho, jaise ravish ji ki sadak par.

is taareef ko anayathaa mat ligiyega ravish g, mai kuch blogs par ghoom kar aayi hoon, lekin kahin bhi acchcha nahi laga.jab se aap ke blog par aayi hoon, kahi aur jaane ki na jaroorat rahi, na hi ichcha.

apka bahut-bahut shukriya

prabhat said...

lekhak is lekh ke lekhak hain, agar yeh parichay diya jai to kaisa rahega.