अब कहां वो शाम होती है

निठल्ला सूरज डूब गया है
चांदनी में रात होती है
बीच का वक्त खो गया है
अब कहां वो शाम होती है

कितने अरमान खिलते थे
शाम की पनाह में
सूरज डूबने से पहले
लाल रंग के आकाश में
चार यारों की बात होती है
अब कहां वो शाम होती है

दिन सुहाने नहीं रहे अब
नींद उड़ गई जाने कब
दोपहर की बात होती है
अब कहां वो शाम होती है

घर लौटने का वक्त बदल गया है
बीबी ने दरवाज़ा खुला छोड़ा है
दरवाज़ें पर दस्तक कहां होती है
अब कहां वो शाम होती है











2 comments:

pawan lalchand said...

ravishji,
shaam mere qasba ki khas thi..
lekin mujhe kisi ki talash thi..
meri nazar mein mahanagar tha..
qasba ki shaam kahan udas thi.
meri murad gaganchumbi imaratein..
qasba ki sham liye sitaroin ki aas thi..
hum peechhe chhod aayein vo shamein kai..
jinhe aaj bhi humari talash hai...

apke shri charnon mein bal praya hai..

Ambrish Shukla said...

Thursday, 23 January 2014

"अब वो शाम नहीं आती"


एक दिन ऑफिस से लौटते वक़्त मैं सोच रहा था कि दिन शुरू उजेले से और ख़त्म अँधेरा हो कर क्यों हो जाता है। अब वो वाली शाम क्यों नहीं होती है। वो वाली शाम जो दोपहर की कड़क धुप के बाद आती थी।वो वाली शाम जिसके होते ही माँ बाहर खेलने की इजाज़त दे देती थीं।वो वाली शाम जब पूरा घर साथ बैठ कर चाय पीता था। वो वाली शाम जिसके होते ही पापा के लौटने का वक़्त हो जाता था। वो वाली शाम जब पड़ोसी बच्चो की क्रिकेट बॉल हमारे आँगन में बार बार आती थी।वो वाली शाम जब सब दोस्त पुलिया में बैठ कर बतियाते थे।शाम को दादी गार्डन में पानी डालतीं थीं।दादाजी चिवड़ा खा कर घुमने जाया करते थे।शाम को मोहल्ले में ड्रम बजाता गोलगप्पे वाला भी आता था।
शाम को सूरज हनुमान मंदिर वाले पीपल पेड़ के पीछे से झांकता था और मंदिर की तरह आसमान भी नारंगी हो जाता था।हर मौसम में शाम के अलग ही रंग होते थे। ये सारे नज़ारे हमारे संग होते थे।

अब लगता है शाम हमारे पहरों में नहीं आती।सीधे अँधेरा हो जाता है।दिन की शुरुआत और अंत का पता उजेले और अँधेरे से ही होता है।
शाम 7 बजे हमारे घर में साईं मंदिर से आरती की आवाज आती थी तो इसी बहाने साईं को याद कर लेते थे।अब तो शाम नहीं होती इसीलिए साईं की आवाज़ नहीं आती।इसी बात पर कबीर का एक दोहा याद आता है।-
" पांच पहर धंधे गया, तीन पहर गया सोय।
एक पहर हरि नाम बिन, मुक्ति कैसे होय।।"