हिंदी पत्रकारिता का प्रश्न काल

स्वर्ण न पतन काल। हम हिंदी पत्रकारिता के प्रश्न काल में रह रहे हैं। इससे पहले पत्रकारिता अपनी आलोचनाओं में इतनी अंतर्मुखी नहीं रही होगी। एक ज़माना था जब उदार संपादक स्पेस के नाम पर अनुमति देते थे कि आप आलोचना करें या बहस करें। आज भी संपादक के कमरे में ईमानदारी से इसके लिए स्पेस नहीं मिलती। मिलती है तो अलग से। अनुमति के रूप में। ये किसी एक व्यक्ति विशेष की तरफ इशारा नहीं है। खुद से संवाद है।

मगर अच्छी बात यह है कि पत्रकार बोलने लगे हैं। संपादक को मालूम है कि उसकी समीक्षा हो रही है। वो अपने मातहतों की कसौटी पर कसा जा रहा है। अब तो कारपोरेट जगत में भी यह परिपाटी चली है कि बॉस से मातहत कितने संतुष्ट है? इस सवाल का जवाब व्यक्ति विशेष के बॉस बने रहने की निरंतरता
से जुड़ा होता है। ख़ैर कई बार आप राजनीतिक या निजी गुटबाज़ी के कारण भी हमले करते हैं। न कि पेशेवर कारणों से। सवालों के भी राजनीतिक मायने होते हैं।

मैं भटक रहा हूं। मगर कहना यह चाहता हूं कि ब्लाग से लेकर चौराहों तक पत्रकार अपने पेशे पर सवाल उठा रहे हैं। सवाल इसका नहीं कि हमारा अतीत क्या था और वर्तमान कैसा है? सवाल इसका भी नहीं हमारा मकसद क्या है? सवाल यह है कि हम बेचैन हो रहे हैं या नहीं? तो जवाब है कि हम बेचैन हो रहे हैं। पेशे के अंदर घट रही चीज़ों को लेकर। तभी तो आज हिंदी का पत्रकार खुलकर सवाल उठा रहा है। पत्रकारिता के भीतर यह लोकतंत्र को मज़बूत करने या उसके लिए जगह बनाने जैसा प्रयास है।

बाज़ार हावी रहेगा मगर पत्रकार को भी हावी रहना होगा। भूत प्रेत दिखाने की वजहों पर आ जाना चाहिए। क्या सिर्फ बाज़ार का ही दबाव है या फिर दिखाने वाले की अक्षमता भी। क्यों टीआरपी के दबाव में वह भूतों और सेक्स की कहानियों के अंधेरे में जाता है? क्या उसे अपने समय और समाज की पहचान नहीं रही? ज़ाहिर है भूत प्रेत के बहाने उस पर भी सवाल उठ रहा है। क्या यह कम नहीं कि इन सब उठते सवालों से भूत प्रेत दिखाने वालों की रातों की नींद खराब होती होगी? सम्मान मांगा नहीं जाता कमांड किया जाता है। कहावत अंग्रेजी की है। मगर मतलब सब भाषा के लोग जानते हैं। अच्छी बात यही है कि उनके पद पर रहते यह सब सवाल उठ रहे हैं। दफ्तरों में भी चोरी छुपे लोग बात कर रहे हैं। प्रेस क्लब में भी। ब्लाग पर भी। इसीलिए कहता हूं कि सामंती संपादकों का युग चला गया है। जो संपादक रह कर गए हैं उनमें इसका तत्व रहा है। कुछ नाम क्यों लूं जिनमें नहीं रहा है। कोई मतलब नहीं बनता। आज के संपादक भी बदल रहे होंगे। या इस बदलाव को समझ रहे होंगे। सवाल का उठना बता रहा है कि हिंदी पत्रकारिता का ऐसा प्रश्न काल पहले कभी नहीं रहा। जब पेशे को लेकर इतनी बहसें हो रही हैं। हिंदी के पत्रकारों ने ही बाज़ार बनाया और वही इस पतन का रास्ता ढूंढ लेंगे । देखना होगा कि वही ढूंढेंगे जो भूत प्रेत दिखा रहे हैं या फिर वो ढूंढेंगे जो सवाल उठा रहे हैं? यह देखना वाकई दिलचस्प होगा।

17 comments:

Isht Deo Sankrityaayan said...

बिल्कुल सच्चा और ईमानदार विश्लेषण है. वास्तविक स्थिति यही है. बधाई.

अनूप शुक्ला said...

हिंदी के पत्रकारों ने ही बाज़ार बनाया और वही इस पतन का रास्ता ढूंढ लेंगे । देखना होगा कि वही ढूंढेंगे जो भूत प्रेत दिखा रहे हैं या फिर वो ढूंढेंगे जो सवाल उठा रहे हैं? यह देखना वाकई दिलचस्प होगा।

अनूप शुक्ला said...

सही लिखा है।

नाम में क्या रखा है? said...

पसंद

shailendra said...

Ravish ji ek kahavat hai jo dikhata hai vo bikta hai news nahi rakhi dikhow phir bolo janta yahi chahti hai ye pagalpan ki parakastha hai
i hope for betterment in Hindi Tv News Journalism

Pramod Singh said...

यह बहस बहुत सीमित व संक्षिप्‍त है. फिर हिंदी का पत्रकार अभी ताज़ा-ताज़ा पैसों की दुनिया में अपग्रेड हुआ है. पैसों की कीमत समझता व दांत से थामे रखे है. बीच-बीच की बेचैनी में बहस-सहस अपनी जगह है, मगर पैसा या सत्‍ता से अलग हटकर वह किसी नयी ज़मीन की रचना में खुद को होम करने नहीं जा रहा है. संपादक डांटेगा तो अभी जाकर लाइन में सिर झुकाये जाके खड़ा हो जाएगा. स्थिति का मेरे ख़्याल से आप ज़रा भावुकता भरा चित्र बना रहे हैं..

Sanjeet Tripathi said...

सही, सही!
रविश जी, आप विश्लेषण भी बड़ा अच्छा करते हैं!

Anil Arya said...

सटीक है...

rajeev jain said...

बहुत अच्‍छा विश्‍लेषण किया है
लेकिन अभी तो कहानी शुरू हुई थी
पार्ट टू लिखकर इसे विस्‍तार दीजिए
अच्‍छा रहेगा इस बहाने हम नए नवेले लोगों
को भी कुछ सीखने को मिलेगा

अंकित माथुर said...
This comment has been removed by the author.
अंकित माथुर said...

आपने वास्तविकता का काफ़ी यथार्थवादी चित्रण प्रस्तुत किया है. लेकिन कहीं ना कही यह परस्पर विरोधाभासी भी है, आज पत्रकार चाहे संपादक महोदय के ऊपर कितना भी हावी हो जाये,लेकिन अख़बार या चैनल के मालिक के हित से परे वो कुछ नही कर पायेगा। अगर गलती से (संपादक की) कुछ छ्प भी जायेगा तो समझ लीजिये कि उसकी गाज बेचारे पत्रकार पर पड़नी निश्चित है।
स्वतंत्र पत्रकारिता के दिन लद चुके हैं।
आप ही के मुताबिक बाज़ार आज इस कदर हावी
हो चला है कि
टी आर पी के इस खेल में
जो दिखता है, वो बिकता है..

संजय बेंगाणी said...

सही है.

सम्पादक की मजबुरीयों पर भी रोशनी डालें.

MUKHIYA JEE said...

शायद आप अपने सम्पादक महोदय सतिश कुमर सिन्ह से नराज़ चल रहे है या गुत्बजि से ! सब अच्च हो जयेग !

Manuski: Humanism for all said...

Ravishji,

Shubhkamnayen RNG media puruskar milne per. Maine apko suna aur bahut achcha laga jab apne bhoot preton ke point per rajdeep sardesai ke bolti band kardee.. woh
idhar udhar jhankne lage aur trp ke drama karne lege.

Yeh ek hakikat hai ndtv india abhee bhee relatively ( aur main yeh he term use karoonga) ke better channel hai.. doosari aur dekhta hoon to disappointment hoti hai.. hum market ke duhai dete hain lekin agar aap newyork times, ya Guardian, Financial Times or BBC ko dekhen to wahan credibility bhee hai aur detailed analysis ke reports bhee hain aur woh bikte bhee hain. Jab se times of India ka punjabkesrikaran hua her ek channel ka wohi haal hai.. sex, murder, bhhot pret, jyotish sara kachara bik raha hai..Lekin main apke bold stand ke liye dhanyawad karoonga.

Main kahna chahta hoon hamare jaise log jo secular freethinkers hain dharm ko challenge karke, superstition ke khilaf South main to mahol khada kar sakte hain per north main to uskee sambhavana bahut kam hai.. akhir aap bhee to bhagwan ke bhajan kam nahee gate.. sawan aa raha hai aur aap sabhee log, kanwariyon ke mahanata gayenge per unke karan se jo traffic hazard delhi to Hardwar hai aur jis tarike se har saal woh ek social nuisance ban rahe hain us per aap log chup kyon rahte hain.. ek dharmik byakti ko aap hamesha saf suthra kyon batane pe tule hain yeh jante hue bhee ke aag to unhone hee lagaai hai..

Aap ke chintan ka shukriya..ummeed hai apkee breed age badhe.. ham wastav main SP Singh ko dhundhte hain jinme himmat thee ke jab sara desh ganesh ko doodh pila raha tha tab unhone ek scientist ko bulakar uska pardafash karaya.. kash aap log bhee amarnath ke matmya ko demystify karte...

Bahut Shukriya..

Vidya Bhushan Rawat

vv_singh said...

Sampadak ka vishleshan unke sath kaam karne wale patrakaro dwara kiya ja raha hai, isliye sayad aaj kal yah chalan joro par hai ki koi bhi boss bante hi apne aas paas unhi logo ko rakhna chahta hai jo ki sirf uski sune, bina koi sawal uthaye....aur rahi baat hindi patrakarita ke prashan kal ki to, Jiske naam par aaj kahbro ko bech kar paisa batora ja raha hai, kal ko wo hi iska nayi disha bhi tay kar denge.....
News ko entertaiment ke nazar se dhekhane ka nazariya sayad jald hi badlega

manoj said...

भाहूत अच्छा लिखा आप
आप ए सब लिखने के लिए कोंसी सॉफ्टवेर उपयोग किया
मुजको ए www.quillpad.in/hindi भाहूत आसान लगा है
आप भी एक बार try करले

avinash said...

aapki website me advertisement nahi hai.kam se kam aapne apni site ko bazar se dur rakhkar rahat di hai...
patrakar aaj shak ke ghere me hai.is avishvash ko dur kar ke dikhana hamari jimmedari hai....Avinash Prasad..Jagdalpur