अख़बारों की युवतियां

हिंदी के अख़बारों का स्वर्ण युग चल रहा है। टीवी को गरियाए जाने के इस काल में अख़बारों को खूब वाक ओवर मिल रहे हैं। मान लिया गया है कि टीवी ख़राब है तो अख़बार ही ठीक है। वैसे मेरी दिलचस्पी मुकाबले में नहीं हैं। सवाल उठाने में हैं।

हिंदी के तमाम अख़बारों का युवती प्रेम समझ नहीं आता। बारिश की फुहारें पड़ रही हों तो भींगती हुई युवती की तस्वीर छपेगी। या भींगने से बचने की कोशिश करती हुई युवतियों की तस्वीर छपेगी। बाकायदा नीचे लिखते भी हैं कि बारिश की पहली फुहार में भींगती युवतियां। जैसे युवकों को फुहारें अच्छी नहीं लगती। आंधी आती हैं तो तस्वीर छपती है। नीचे लिखते हैं- खुद को संभालतीं युवतियां। गर्मी में भी युवतियों की तस्वीरें छपती हैं। कालेज खुलते हैं तो सिर्फ युवतियों की तस्वीरें छपती हैं। सीबीएसई के नतीजे के अगले दिन वाले अख़बार देखिये। तीन चार युवतियों की उछलते हुए तस्वीर होती ही है। जब भी मौसम बदलता है तो युवतियों की तस्वीरें छप जाती हैं। इन तस्वीरों को भी खास नज़र से छापा जाता है। दुपट्टा उड़ता रहे। बारिश से भींगने के बाद बूंदों से लिपटी रहे। कालेज के पहले दिन वैसे कपड़ों वाली युवतियां होती हैं जिनके कपड़े वैसे होते हैं। लेंसमैन को लगता है कि कोई लड़की टॉप में है। जिन्स में है। कहीं से कुछ दिख रहा है तो छाप दो। बस नीचे लिख दो कि तस्वीर में जो मूरत हैं वो युवती है। वो नीता गीता नहीं है।

मैं हर दिन हिंदी अखबारों में युवतियों को देख कर परेशान हो गया हूं। युवकों का भी मन मचलता होगा। युवक भी बारिश में भींगते होंगे। युवक भी कालेज में पहले दिन जाते होंगे। युवक भी सीबीएसई के इम्तहान पास करते होंगे। उनकी तस्वीरें तो छपती ही नहीं। यह मान लेने में हर्ज नहीं कि लड़कियों से सुंदर दुनिया में कुछ नहीं। मगर उस सुंदरता को एक खास नज़र से देखना तो कुंठा ही कहलाती होगी।

मुझे आज तक कोई भी लड़की नहीं मिली जो खुद को युवति कहती हो। मिसाल के तौर पर मैं सपना एक युवती हूं। लड़कियों से लड़की लोग जैसे सामूहिक संबोधन तो सुना है मगर युवती लोग या युवतियां नहीं सुना है। पता नहीं अख़बार में कहां से युवतियां आ जाती हैं। आपको कोई अख़बार का संपादक मिले तो पूछियेगा कि कहीं युवतियों से टीआरपी वाला मकसद तो पूरा नहीं होता। जैसे टीवी में सुंदर चेहरे से कारोबार होता है क्या पता अख़बारों को भी युवतियों के गीले बदन से कुछ मिल जाता होगा। वो बताते ही नहीं। सिर्फ टीवी पर कालम लिख देते हैं।

16 comments:

Prem said...

परन्तु आप की दिलचस्पी भीगते हुए युवकों को देखने में क्यों है? :D

विनीत उत्पल said...

रवीश भाई पता नहीं आप महिला सशक्तिकरण की बात कब समझेंगे। अखाबार में फोटू छपने और टीवी चैनलों पर चेहरा दीखाने को ही इस देश की युवा पत्रकार अपनी सफलता समझ रही है तो हम और आप क्या कर लेंगे। जिस्म को दीखा पुरुषों को रीझाना क्या दुनिया में नई बात है। एक बात और यदि समाचारपत्र में युवती की तस्वीर या चैनल पर चेहरा दिखाने के लिए युवती का चुनाव किया जा रहा है तो इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि लोग कितना भी चें-चों करें लेकिन पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता अभी भी लोगों के मन में है। नहीं तो हर जगह पुरुषों के फोटो छपते और महिलाएं उसे निहारती जैसे कृष्ण को निहारा करती थीं।

Raviratlami said...

एक प्रेस फोटोग्राफर ने ये बात बहुत भावक होते हुए बताई थी कि नए प्रबंध संपादक उन्हें सिर्फ ऐसे ही फोटो खींचने के लिए कहते हैं.

बाजार का मामला है. अखबारों की बिक्री बढ़ानी है. खबरों को कोई नहीं देखता. अखबारों में लोग युवतियाँ देखते हैं.

टाइम्स ऑफ इंडिया के ऐसे ही अश्लील फोटुओं पर मैंने बहुत पहले एक पोस्ट लिखी थी - अश्लीलता का लाभांश.

pawan lalchand said...

ravishji, darasal bat ye hai ki kuchh na kuchh likhna hai to kyon na gungu gay(cow) tv per hi likh diya jaye..vrna kariib-karib har paper ke mukhprashdh per vishv darshan ya jhalkiyon ke bhane gori chmdivali yuvtiya hi dikhayee jati hai. ab akhbar mein to bakayda tv pr likhne ke liye to colounm bane huye hai. lekin hum tv mein abhi tak is tarah ki vyavstha nahi bana payein hai ki dikha-bta ske ki paper mein kya kachra chhap rha. hai..

काकेश said...

सही मुद्दा उठाया आपने.अभी कुछ दिनों पहले टाइम्स ऑफ इंडिया के मुखपृष्ठ पर अर्धनग्न पूजा चौहान का चित्र बिना किसी सैंसर के दिखाया गया जबकि वही टी वी पर ब्लर करके दिखाया गया था.वैसे टी वी भी कुछ कम नहीं है कई मायनों में...वो कहते हैं ना "चोर चोर मौसेरे भाई".

Sanjeet Tripathi said...

सही!!

सुनील डोगरा ज़ालिम said...

स..श्श्श्श्श पुरूष सशक्तिकरण का मुद्दा उठा रहें हैं

Rajesh Roshan said...

युवतिया शब्द से कोई परेशानी है । मुझे नही दिखती । हां । बार-बार लादियो के चित्र लगाने से होती है तो समझ में आती है । लेकिन वो कहते हैं ना अगर दिखाना है तो कुछ सुन्दर चीज दिखाई जाये और मेरे नजर में लडकी, युवती, महिला कुछ भी कह ले हमेशा सुन्दर ही होती हैं :) असली बात जानने कि कोशिश करनी है तो ऑफिस जाते समय रिसेप्शन में देख लीजियेगा । युवती ही मिलेंगी । ९९.९% अपने याहा HR से पूछियेगा वो कारण बता पाए

अनूप शुक्ला said...

मुद्दे की बात् है!

परमजीत बाली said...

बिल्कुल सही\

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव said...

अच्छा सवाल उठाया है लेकिन अखबार पर उठा है, इसलिए टिप्पणियों से कम से कम तो यही लगता है कि मजाक में ही टाल दिया गया। अखबार करे तो महिला सशक्तिकरण, टेलीविजन करे तो भगटई। अच्छा है

विनीत उत्पल said...

रवीश भाई और सत्येंद्रजी क्यों न इसी बहाने राजधानी दिल्ली से छपने वाले प्रमुख समाचार पत्रों और चैनलों का सवे करा लेते हैं कि मुख्य पृष्ठ पर कैसी-कैसी तस्वीर छप रही है और चैनल कब किस तरह के प्रोग्राम में युवतियों को दीखाने का काम कर रही है। सारी बातें खुलकर सामने आएगी। सभी लोग सच्चाई से इसी बहाने अवगत हो जाएंगे और मीडिया मालिक और संपादकों भी एकबारगी सोचने के लिए विवश होंगे।

ratan said...

Ladake college mein admission se pehle hi upsc ki taiyari shuru kar detein hain.

sanjay said...

PURUSH SASHKTIKARAN KA MUDDA UTHANE KE LIYE DHANYVAAD. PER DUKH HAI KI AAPKI YE AAWAZ PRINT MEDIA KE THATHAKATHIT EDITOR KE PAAS SAYAD NA PAHUCHE. AISE BHI LOGO KO LAGTA HAI KI USKI KAMIJ DUSRO KI KAMIJ SE JAYDA SAAF HAI. AU PRINT MEDIA SAYAD ISI GALTFEHMI KA SIKAR HO GAYA HAI.
SANJAY KUMAR ,DARBHANGA(BIHAR)

Tarique said...

Array bhai sahab yuvtiyon kee hee nahin Kishoriyon kee bhi tasveerein chhapti hain.

मुकुन्द बिहारी said...

रवीश जी आपने सही मुद्दा उठाया है...ये अखबार वाले हर समय आज के टेलीविजन पर दिखाये जाने वाले दृश्य पर प्रश्न उठाते रहते हैं... लेकिन आप अंग्रेजी अखबार के पेज 3 को देखिये... हर दिन आपको ऐसी तस्वीरें देखने को मिलेगी... जिस पर सेंसर होना चाहिए... मुझे तो इसमें भी टेलीविजन की तरह टीआरपी का खेल लगता है...इन अखबारों की पकड़ देखिये... मैं एकबार बिहार जा रहा था...मैं जिस डिब्बे में था वहां दिल्ली में काम करने वाले मजदूर भी जा रहे थे... और उनके हाथ में अंग्रेजी अखबार का पेज 3 था... जिसे देखकर वो आपास में बात कर रहे थे... मेरे कहने का मतलब है जो लोग भाषा को समझ नहीं सकते वो भी देखने के लिए इस अखबार को खरीदते हैं....