बनते शहर के विस्थापित नागरिक

मैं जहां रहता हूं उसके आसपास बहुत सारी इमारतें गाछ की तरह पसर गईं हैं। सोसायटी बोलते हैं हम इनको। इन इमारतों के आने तक सोसायटी का कोई मूर्त या शारीरिक ढांचा नहीं होता था। सोसायटी एक नए किस्म का समाज है। जहां एक निश्चित इदारे के भीतर लोग निहायत ही व्यक्तिवादी ज़िंदगी जीते हुए भी खुद को सोसायटी के तर्ज पर संचालित करते हैं। समूह बनाकर नियम बनाते हैं और तय करते हैं। किसी शोधकर्ता को अध्ययन करना चाहिए कि हरेक हाउसिंग सोसायटी में किस किस तरह के नियम बन रहे हैं। हाउसिंग सोसायटी में विस्थापितों के बीच किस तरह के संबंधों को परिभाषित किया जा रहा है। चाहरदीवारी के भीतर के स्पेस में आपसी सहमति से नागरिक कानून बन रहे हैं। किस तरह के धार्मिक माहौल और प्रतीकों की रचना हो रही है। क्या ये एक नए किस्म के घेटो यानी दड़बे में बदल रही हैं? इनके भीतर की धार्मिक समरसता कैसी है? इसी पर एक सीरीज़ लिखने का मन हुआ है।

अगर आप ध्यान से देखें तो हाउसिंग सोसायटी में रहनेवाले ज्यादातर लोग विस्थापित हैं। वो शहर के अलग-अलग इलाकों में काम करने जाते हैं। अलग-अलग राज्यों से आए हुए लोग होते हैं। इन सोसायटी में रोज़ाना काम करने वाले भी विस्थापित हैं। दूसरे राज्यों से उजड़ कर आए हैं। मगर आर्थिक हैसियत के लिहाज़ से निम्नतम तबके से आते हैं। विस्थापित होने के बाद ये लोग शहर के जिस हिस्से में अपना बसर करते हैं वहां कोई नियम कानून नहीं है। जैसे मैं गाज़ियाबाद के वैशाली इलाके में रहता हूं। यहां और इंदिरापुरम में काम करने वाले ज्यादातर पुरुष और स्त्री खोड़ा और मकनपुर में रहते हैं। जो अतिक्रमण की पैदाइश हैं। इन जगहों में रहने के हालात बहुत ख़राब हैं। यहां से लाखों लोग रोज़ गैर नियमित समाज और बस्ती से निकलकर नियमित बस्ती या सोसायटी में प्रवेश करते हैं। इस संक्रमण को सहजता से जीते हुए वो सोसायटी की बुनियाद बन चुके हैं। पूरी हाउसिंग सोसायटी अनधिकृत तौर से बसी कालोनियों से आने वाले दैनिक कर्मचारियों से संचालित होती है।

मेरी हाउसिंस सोसायटी में हर दिन ऐसे सौ लोग प्रवेश करते हैं। पचास के करीब ड्राईवर और पैंतालीस के करीब कामवालियां। जिन्हें अब सब मेड ही कहते हैं। नौकरानी जैसा सामंती शब्द लुप्त प्राय हो चुका है। आतंकवादी घटनाओं के बाद इन तमाम मेड के सोसायटी के हिसाब से परिचय पत्र बनवाए जा रहे हैं। सबके पास एंट्री कार्ड होता है। ये महिलाएं पांच से छह किमी पैदल चल कर काम की जगह पर पहुंचती हैं। इस कारण ज्यादातर छरहरी दिखती हैं। इनके शरीर में पोषक तत्वों की भी भयंकर कमी होती है। इन सबने लिफ्ट में चलना सीख लिया है। अपने भीतर के भय को जीत लिया है। लिफ्ट के कोने में दुबकी ये महिलाएं किसी तरह से अपनी मंज़िल के आने तक सांस रोके रहती हैं। इन सब महिलाओं का घर में प्रवेश करते ही दो तरह से रिश्ता बदलता है। मेमसाहब और घर में स्थायी रूप से रहनेवाली मेड से। स्थायी रूप से रहने वाली मेड भी इनके साथ मेमसाहब वाला रिश्ता रखती हैं। इस रिश्ते पर भी खास अध्ययन नहीं हुआ है। पहचान पत्र ने उनकी पहचान को बदला तो है मगर नियमित रूप से बसे विस्थापितों का उनके प्रति नज़रियां नहीं बदला। विस्थापन का दर्द साझा नहीं होता। भावनात्मक रिश्ता नहीं बन पाता।

मेरा ध्यान जिस बात ने खींचा वो इस सिस्टम में पारंपरिक जजमानी का बचा रह जाना। जजमानी सिस्टम में मज़दूरी नहीं होती थी। खेत की बंटाई, खेत का कुछ हिस्सा, अनाज और पर्व त्योहारों पर दान स्वरूप उपहार ताकि मज़दूर मालिक से बंधा रहे। जजमानी का यह रूप हाउसिंग सोसायटी में बदल गया है। मेमसाहब अपनी पसंद की मेड को पुराने कपड़े, फल और घर के कुछ सामान.स्वेटर, चप्पल आदि देकर उपकृत करती रहती हैं ताकि रिश्ता स्थायी बनता रहे। इससे हुआ यह कि कामवालियों के पहनावे में बदलाव आने लगा है। झांसी से आई एक महिला काम करने के लिए साड़ी ही पहनना पसंद करती थी, वही उसकी आदत भी थी, लेकिन जिस मेम साहब के यहां काम करती है वो घर में सलवार कमीज़ पहना करती हैं। लिहाज़ा उसने साड़ी पहनना कम कर दिया है और सलवार कमीज़ में आने लगी है। एक घर में मेमसाहब मिडी और जीन्स पहनती हैं तो उनके यहां स्थायी रूप से काम करने वाली झारखंड की आदिवासी महिला के पहनावे ही उनके जैसे हो गए। पुराने कपड़ों से पहनावे में एक किस्म की समानता बनती दिख रही है। यह सब हो रहा है जजमानी के बचे खुचे रूप के कारण। जहां मेमसाहब को इस बात से एतराज़ नहीं कि उनके साथ काम करनेवाली महिला भी स्कर्ट और जीन्स पहनती है। उन्हीं के दिये हुए। पहनावे ने काम करने वाली महिलाओं के व्यक्तित्व में ग़ज़ब का सकारात्मक बदलाव ला दिया है। बातचीत का लहज़ा भी तेज़ी से बदल रहा है। ये सभी महिलाएं साक्षर महिलाओं की तरह पूंजीवादी सिस्टम में एक फिनिश्ड प्रोडक्ट के रूप में परिवर्तित हो रही हैं। खानपान में भी बदलाव आ रहा है जिसकी आंतरिक जानकारी ज़्यादा नहीं है मुझे।

जजमानी सिस्टम से भावनात्मक रिश्ता बन जाता है। जहां मज़दूरी को लेकर होने वाले मोलभाव में एक किस्म का संकोच पैदा हो जाता है। यह संकोच दीवार का काम करता है। इसके बाद भी पुराने घरों को छोड़ नए घरों में जाने वालीं कामवालियों में मेहनताने को लेकर नज़रिया बदल रहा है। वो मोलभाव करने लगी हैं। कह देती हैं कि देख लीजिए मुझे इतने का ऑफर है। इस तरह के बारगेन यानी मोलभाव तो पढ़ी लिखी महिलाएं हमारे पेश में नहीं कर पातीं कि आखिर क्यों किसी टीवी चैनल में महिला संपादक नहीं है। नीचे के स्तर पर महिलाओं का जीवन काफी बदला है। वो पहले से ज्यादा आत्मनिर्भर होने लगी हैं। कई महिलाओं को देख रहा हूं जो गोरखपुर बस्ती और हरदोई से आतीं हैं मगर यहां काम करते हुए बदल रही हैं। साइकिल चलाने लगी हैं। साइकिल से वो दो से तीन सोसायटी में काम पर जाने लगी हैं। वर्ना पैदल चल कर आने की मजबूरी के कारण कोशिश यही रहती थी कि एक ही हाउसिंग कांप्लेक्स में काम मिल जाए। इस मजबूरी के कारण वो मज़दूरी को लेकर भी समझौता करने लगती थीं। अब बदलाव आ रहा है। साइकिल से आनेवाली कामवालियां दो या उससे अधिक सोसायटी में काम करने के लिए जा रही हैं। पढ़ी लिखी न होने के बाद भी वो सोसायटी के कायदों संकेतों को अच्छे समझती हैं। अपनी कमाई के एक हिस्से पर नियंत्रण कायम करने लगी हैं। बचत के तौर पर या मेमसाहब के यहां जमा रखकर।

इनकी आत्मनिर्भरता बदल रही है। बढ़ रही है। सोसायटी के स्पेस में मर्दों का जाल बिछा रहता है। गेटकीपर से लेकर स्टिल्ट में बैठे ड्राईवरों की नज़रों से होकर गुज़रना पड़ता है। उनकी चुटकियों और तानों से बचकर निकलने के अभ्यास ने ज़्यादातर कामवालियों को सीधी रेखा में देखने लिए अभ्यस्त कर दिया है। ये सभी कामवालियां सिर्फ सीधा देखती हैं। सीधा देखते हुए लिफ्ट में जाती हैं, लिफ्ट से निकलती हैं और सीधा देखते हुए घर के भीतर। घर के भीतर भी इधर-उधर नहीं देखतीं। बाल्टी कपड़ा उठाया और पोछा चालू कर दिया। दायें बायें ऊपर नीचे देखा तक नहीं। यह उनका आउटलुक है। इस हाव भाव में एक किस्म के सम्मान की चाह दिखती है। जो गांव और घर में रहने की प्रताड़ना की भरपाई कर सके। एक अनजान स्पेस में खुद को ढालने के इन अनुभवों का सामाजिक अध्ययन होना चाहिए।

विस्थापन ने उनके हाव-भाव में कितना बदलाव किया है। यह मौका विस्थापन से मिला है। एक नई जगह पर नए सिरे से सामाजिक संबंधों को विकसित करने का मौका मिला। गांवों में उपार्जन के अवसर मिल तो जाते मगर सामाजिक संबंधों में बदलाव कम होने के कारण उनके व्यक्तित्व का विकास उस तेज़ी से नहीं हो पाता। लोक लाज के रूप में सामंती बंदिशें उन्हें कई तरह से रोकतीं। यहां उनके व्यक्तित्व का विकास हो रहा है। वो खुद को वर्क फोर्स समझ रही है। मर्द की जगह कमाने वाला समझ रही हैं। वो जानती हैं कि शहर में उनकी कमाई पूरक नहीं है बल्कि घर के लिए बहुत ज़रूरी है। सोसायटी में घुसने के लिए बना कार्ड या मेमसाहब के साथ होंडा सिटी में मॉल जाने का अनुभव यह सब उनके निजी व्यक्तित्व का हिस्सा बन रहे हैं। इन अनुभवों के बनते वक्त उनके मर्दों का साया नहीं होता। वो चुपचाप दुनिया को देख रही हैं। कुछ सोच रही हैं। अपने पसीने को छुपाते हुए साफ सुथरी दिखते हुए।
((कृपया इस लेख को उठाकर अपने ब्लाग पर न डालें। सख्त मनाही है। आप लोगों से शेयर कर सकते हैं।)

29 comments:

Ankit mutreja said...

Wah sir har bar kaha zayda adhyan nahi kiya,zyda jankari ni hai muje uske baad bhi gajab ka likha hai sir. yeh ek sachai hai kamvaliya/ jo ab maid ka naam aur rup leti ja rahi hai unme badlav toh aa hi raha hai uche dum wali nakhrey wali apki kamwali ab tarah tarah ke visthapit hue logo se mail jol rakh kr unni mei dhalti ja rahi hai. aur logo ko bi aitraz nahi hai kyuki ajkal mohallo mei kamvaliyo ko lekar bi debate hone lage h ki meri kamvali zyda achi h ya teri..

Kumar Rajan said...

h

Raaj Choudhary said...

Aaka likha,,, hamesha hi Lazawaab hota hai,,,, Ravish ki Report se,, Prime time tak sabhee Behtreen aur ye Blog to wo bhi kehta hai jo aap wahan nahee keh paate

Chef Rajan said...

Raveesh ji , Bahut bariya likha hai aapne ek cheez jo mujhe bahut bariya lagi woh aapka lekhan aur sateek sabdon ka istemaal hai .main jab facebook per bhi aapki tippni parta hoon toh dimaag un lafzon ka anuwaaad bhi khaas aapki bolne ki shelly aur aapki awaaz main hi karta hai

Subh kamnaye

Chef Rajan

Rahul Singh said...

कितनी जल्‍दी अभ्‍सस्‍त होती है नजरें कि यह सब नजरअंदाज होने लगता है.

Abhishek said...

iss visthapan ne (khanabadosh jeevan) ne sabhi ka ye haal kiya hai in kaam wali baiyon ki dincharya me mere sare dost nazar aate hain, khud ko bhi dekhta hoon ki mera bhi kal yahi tha...........
dhanywaad iss khanabadoshi ehsaas ko yaad dilane k liye......

Amit said...

इस लेख मैं ऐसा कुछ भी नहीं है की लोग इसकी कोपी करें.. या साझा करें.. लेखक के विद्वता के दंभ के सिवाय... no offense intended to anyone.

प्रवीण पाण्डेय said...

विस्थापन का अपना अलग व्यवसाय है।

काजल कुमार Kajal Kumar said...

शहर होते ही विस्थापितों के/ के लिए हैं. सोसायटी या कालोनियां तो उसके विभिन्न रूप हैं. मूलनिवासी तो इनके बीच-बीच पड़ने वाले गावों में सिमट जाते हैं... बहुत पहले ही दुनिया भर के समाजशास्त्रियों ने dwellings पर अध्ययन किया है, उसी का नतीज़ा है कि City Planners द्वारा जनता, LIG, MIG, HIG, Villa व निजी मकानों को मिला जुला कर बनाने की शिफ़ारिश की जाती है ताकि समाज की समग्रता बनी रहे पर हमारे यहां प्राइवेट बिल्डरों के आने से समाजशास्त्रियों की कोई नहीं सुनता. यही कारण है कि आज समाजिक विसंगतियां पहले से कहीं अधिक उग्र दिखाई देती हैं. अपराधों का भी इस प्रकार की growth से सीधा संबंध है. Mandelbaum, Srivnivas, Bottomore, Haralombos, Beteille इत्यादि ने इस प्रकार के विषयों पर ढेरों लिखा है.

Rishi said...
This comment has been removed by the author.
दीपक बाबा said...

अपनी अपनी जिंदगी के अभ्यस्त सभी हो गए हैं. विस्थापित ही सही... गाँव से यहाँ शहर तक... जिसकी जितनी झोली थी उसको उतनी सौगात मिली...

गुस्ताख़ मंजीत said...

रवीश जी, आपकी चपल-चमकदार भाषा को क्या हो गया। वैसे आप कॉपी न किए जाने के लिए कोई सॉफ्टवेयर होता है, वो लगा लें। कॉपीराईट का अर्थ तो आज के युग में राइट टू कॉपी होता है। बाकी आप तो स्वयं विद्वान् हैं।

ajit gupta said...

इन कामकाजी महिलाओं पर दो-एक पोस्‍ट मैंने भी लिखी थी। सोसायटीज में बहुत अलग मानसिकता रहती है इन लोगों की। कहीं कहीं तो दादागिरी जेसा भी रुख रहता है। ये काम करती हैं केवल यंत्रवत, एक घर से दूसरे घर तक। जबकि गांवों में या छोटे शहरों में पारिवारिक स्‍पर्श है।

Ashish said...

Apka ye blog kafi UMDA hsi..(Vinod Dua style..)

Mahendra Singh said...

Bahoot Khoob

RAJESH KUMAR said...

SIR,
APKE BLOG "BANATE SHAHAR KE VISHTHAPIT NAGRIK" KO MAI APKE "KASBA" SE VISTHAPIT NAHI KARUNGA.
LEKIN MERE JEHAN ME EK SABAL PAIDA HO RAHA HAI KI APNE RAHANE KE LIYE GAZIABAD KA "VAISHALI" HI KYU CHUNA??????????????????
KHAIR,
APKA YE BLOG WAKAI VISTHAPITO KE SOCIO ECONOMIC PAHALU PAR PRAKASH DALTA HAI.YE HOUSING SOCIETY GHAR KAM AUR GHOSLA JYADA HAI JAHA PARINDA RUPI VISHTHAPIT RAAT KO APANE GHOSALA RUPI HOUSING SOCIETIES ME RAHANE ATA HAI AUR SAVERA HOTA HI GHOSALA CHHORKAR NIKAL JATA HAI
JAI HO..

Rishi said...

I can help you in making your blog copy protected.

IN PURSUIT OF HAPPINESS said...

Mai ye blog ko lekar asmanjas me hu.samaj ni aa rha h ki

IN PURSUIT OF HAPPINESS said...

Sir mai ye blog ko lekar asmanjas me hu.samaj ni aa rha h ki isme naya kya h?sehar toh visthapito se hi bante h.dono k jivan badlav aana swabhavik h,hamesha aisa hi hota h.aur ye har warg k liye lagu h,maids ho ya studnts,ya phr labourer....aur rhi baat kamvaliyo ka maid ban na,wo toh proportnl social grwth h w.r.t their employrs..

Vineet Kumar Singh said...

मुझे आपका यह पोस्ट काफी अच्छा लगा। अच्छा नहीं लगता तो शुरु से अंत तक पढ़ता ही नहीं। विस्थापन जीवन की सच्चाई है और तरक्की की तरफ पहला कदम भी। जड़ों से जुड़े रहना सेहत के लिए अच्छा होता है न कि खुद जड़ हो जाना। मैंने आपके बहुत सारे लेख पढ़े हैं। कोई भी लेख मुझे बेमतलब का नहीं लगा। कोई अच्छा है तो कोई बहुत ही अच्छा। ऐसे ही लिखते रहिए....और हाँ, मैं आपके लेखों का मुल्यांकन नहीं कर रहा, ये मेरे बस की बात नहीं। बस अपना अनुभव बता रहा हूँ।
-धन्यवाद

Vineet Kumar Singh said...
This comment has been removed by the author.
anil yadav said...

बॉलिवुड वालों की तरह आप भी पाइरेसी से डरने लगे हैं.....वैसे दीपक की बात से पूरी तरह सहमत हूं.....

बशीर बद्र का एक शेर और बात खत्म
ए खुदा किसी को ऐसी खुदाई न दे ....कि अपने सिवा कुछ दिखाई न दे....

अनुपम दीक्षित said...

अगर यही लेख किसी अखबार में छापा होता तो शायद कॉपी ना होता लेकिन इन्टरनेट पर है तो मानसिकता है कि यह सबकी संपत्ति है। वैसे लेखक के भी कुछ अधिकार होते है। कॉपी ना करने का आग्रह ठीक ही है।

लेख अच्छा है।

Ankit mutreja said...

sir waise mei bi yaha par maujud sabhi sajno ki bat se sehmati rakhta hu.muje college mei kaha gaya ta blog bnane ko muje th koi janta ni meine th fir bi copy ke dar se bnaya ni lekin apka th blogging ki duniya mei apna ek mahal hai tajmahal jaisa jiska naam qasba h.fir bi kuch upaye nikaliye.waise mei zyda ni janta lekin bahut acha hoga sir agar ap apna har lekh kisi akbhar mei prakashit krne ke baad blog par daley.
Ya kitab ke baad blog par. !

RAJESH KUMAR said...

RAVISH JEE,
AAPNE APANE BLOG KE CONTENTS KO COPY NA KARNE KI BAAT KAHNE SE COPY AUR PIRACY BAHAS KA MUDDA HO GAYA,AUR MAIN CONTENTS PICHE CHHUT GAYA..........

iqbal abhimanyu said...

भाईजी. 'डर्टी पिक्चर' का रिव्यू करें समय निकलकर... बहुत अच्छा लगेगा.

ashutosh said...

Aapki nazar ki daad dena hogi. Mujhe khushi hai ki aap media ki chakachaundh me nahi kho gaye.Dhnayavaad ravishji, dimmag to taravat dene ke liye

Dr.Vimala said...

Ravish,
Itni paini nazar aur itna samvedan sheel nazariya! Subbhaanallah...isi liye to aap har dil azeez hain.'ravish ki report'ke muntzir ki aatma ko kam se kam aapke blogs me thodi shaanti mil jaati hai.Societies ne jo aam aadmi se doori badha di hai is par aur in kamvaaliyon ke bhavnaatmak pahlu par shodh karne ka mera bhi man karta hai

Dr.Vimala said...

इतनी पैनी नज़र और ऐसी संवेदनशीलता ! तभी तो आप हरदिल अज़ीज़ हैं... इन कामवालियों के मेमसाहबों से सम्बन्ध व इनके व्यक्तित्व-विकास पर शोध करने का मेरा भी मन है .इधर एक नयी मुसीबत से भी इनका जीना दुश्वार होता दिखाई दे रहा है ...surrogacy की दलाल अजनबी औरतें जहाँ- तहाँ इन्हें घेर कर जाल में फँसाने की कोशिश करती हैं . surrogacy के इस स्याह पहलू पर कोई कुछ नहीं लिख रहा क्योंकि वो जज़्बा ही नहीं है , please आप ज़रूर लिखिएगा .