रॉक स्टार- स्टीफेंस का लपाड़ा और हिन्दू की लौंडिया क्यों नहीं?

रॉक स्टार। अस्सी के दशक में जो कोशिश डिस्को डांसर ने की थी, उसके उनतीस साल बाद यही कोशिश रॉक स्टार की है। डिस्को डांसर का अव्वा अव्वा, रॉक स्टार के बेहतरीन निर्देशिक और रचित हव्वा हव्वा के सामने पत्तों की तरह उड़ जाता है। पटना से वास्ता रखने वाले इम्तियाज़ पर डिस्को डांसर का जादू नहीं होगा कहना मुश्किल है। डिस्को डांसर का अनिल भी फुटपाथ से कामयाबी के शिखर पर पहुंचता है मगर रिश्तों की बुनियादी उलझनें उसे यह बता देती हैं कि कामयाबी की कीमत क्या होती है। मैं यहां डिस्को डांसर और रॉक स्टार की तुलना नहीं कर रहा। सिर्फ दोनों का ज़िक्र साथ-साथ कर रहा हूं। उस फिल्म में मिथुन गा रहे थे-कि लोग कहते हैं मैं तब भी गाता था जब मैं बोल पाता नहीं था। रॉक स्टार का जनार्दन गा रहा है- जो भी मैं कहना चाहूं,बर्बाद करे अल्फाज़ मेरे। जनार्दन इस उत्तर आधुनिक दौर में अति संचार और अति संवाद की जड़ताओं से निकल कर अपनी बुनियादी अहसास से संवाद करने की पीड़ा से गुज़र रहा है। कशिश और तपिश की निरंतरता डिस्को डांसर से लेकर रॉक स्टार तक में महसूस की जा सकती है। डिस्को डांसर ने उस वक्त के बारातियों को एक ऐसी चुनौती दी कि पटना के चिड़ैया टांड पुल के नीचे बारात रोक कर पटाखे के साथ डांस की पीड़ा पुल के दोनों तरफ जाम में फंसे लोगों ने ज़रूर महसूस की थी। बैंड मास्टरों का पसंदीदा गाना था आया मैं डिस्को डांसर। ढैन ढैन। रॉक स्टार के गाने बेहतरीन हैं। हव्वा हव्वा सुनते हुए सात ख़ून माफ का गाना डार्लिंग रोको न...भी याद आता है। कितना सुंदर गीत है ये हव्वा हव्वा।...पैरों से रानी फिर नौ दो ग्यारह। एक दिन में जूते बारह...राजा का चढ़ गया पारा...खबरी को पास पुकारा....देखो..वो जाती कहां...खबरी ने पीछा किया...रानी को घर से...जाते देखा...। उत्तर आधुनिक विमर्श में पुरानी आशंकाएं आज़ाद ख़्यालों का पीछा करती हैं।

रॉक स्टार जनार्दन को जॉर्डन बनाकर बताती है कि कामयाबी और कुलीनता का ठेकेदार भले ही मालिश कराने वाला म्यूज़िक कंपनी का पंजाबीबागीय बंदानवाज़ हो मगर शोहरत में देसी टच की जगह नहीं। डिस्को डांसर में भी म्यूज़िक कंपनी वाला है मगर वो बंबइया है। पंजाबीबागीय नहीं। खैर शोहरत में भदेस नहीं चलेगा इसीलिए हिन्दू कालेज का कैंटीन वाला खूब समझाता है दिल का टूटना ज़रूरी है। इश्क़ ज़रूरी है। संगीत वहां से निकलता है। यानी जो रिजेक्टेड है वही रचनाकार है। जो एक्सेप्टेड है,वो बाज़ार है। जनार्दन को मार्केट के हिसाब से यह कहानी शुरू से ही ढालना चाहती है। ज़बरदस्ती ठेलकर। स्टीफेंस कालेज की कुलीनता पर आंच नहीं आने दी है इम्तियाज़ ने। मगर अपने ही कॉलेज हिन्दू कालेज की कुलीनता के साथ खूब छेड़छाड़ किया है। हिन्दू कॉलेज का जनार्दन सिर्फ दिल्ली का जाट नहीं बल्कि मिरांडा और स्टीफेंस की लड़कियों को हसरत से देखनेवाला ‘बिहारी माइग्ररेंट बट आईएस एसपिरेंट’ भी है। मैं इस प्लाट से चट चुका हूं। दिल्ली की सारी प्रेम कथाएं स्टीफेंस के स्वीकृत और हिन्दू के तिरस्कृत भाव से ही जन्म नहीं लेती हैं।

इम्तियाज़ निहायत ही कुलीन निर्देशक हैं। ज़हनी तौर पर भी। वो आज की पीढ़ी के हैं जिसे पैकेजिंग बहुत अच्छी आती है। मगर कहानी के लिए जनार्दन का पात्र गढ़ता है और दिल्ली की ग़ैर कुलीन बस्तियों को फन यानी मस्ती के लिए खोजता यानी एक्सप्लोर करता है। जंगली जवानी किस वर्ग के ख्वाबों को सहलानेवाली प्रातदर्शनीय फिल्म हैं? हीर और जनार्दन पहली बार जंगली जवानी देखने जाते हैं। सिर्फ एक दिन के लिए। अमर थियेटर को बदनाम जगह के रूप में स्थापित करते हैं। वही जो एक कुलीन सोच होती है। उधर मत जाना। स्टीफेंस और हिन्दू के लौंडे लपाड़े गंदे नहीं होते, मगर एक दिन के लिए गंदे काम कर सकते हैं। ‘जस्ट लाइक अ ट्रिप’। गए और वापस आ गए। अपनी अच्छाई के खोह में। ये जगहें लाखों के जीवन का हिस्सा है मगर इम्तियाज़ जैसे कहानीकारों और हिन्दू स्टीफेंस के छात्रों के लिए फन यानी एकदिवसीय मस्ती का अड्डा। ताकि जब वो जीवन में अपने नेटवर्क की बदौलत कुछ हासिल कर लें तो ‘मेमोआयर्स’ यानी संस्मरण को रोचक बना सकें। पुराना किला के पीछे दारू पीने का प्रसंग वहां बैठे लोगों के स्टीरीयोटाइप को ही कंफर्म यानी पुष्टि करता है। निर्देशक का यही कुलीन पूर्वाग्रह प्राग में भी गंदे पब को ढूंढता है। एक दिन के लिए। जहां लेबर क्लास के लोग जाते हैं। क्या वो जगहें गंदी होती हैं? इम्तियाज़ को क्रांतिकारी तब मानता जब जनार्दन स्टीफंस का लौंडा लपाड़ा होता और हीर हिन्दू की ख़ूबसूरत हसीना। ख़ैर निर्देशक की आज़ादी होती है कैसे भी फिल्म बनाए। समीक्षक की आज़ादी होनी चाहिए कैसे भी फिल्म को देखे। उसका पैसा उसकी राय। हिन्दू के होने का कांप्लेक्स और स्टीफेंस का गर्वलेक्स किसी भी तरह से खंडित नहीं होता है। स्टीफेंस की सर्वोच्चता कायम रहती है। जॉर्डन तुम जाट नहीं हो, तुम बिहारी हो। पूछ लेना इम्तियाज़ से। तुम्हारा सांचा जाट का है मगर सच्चाई हिन्दी मीडियम बिहारी की है। भाभी वाला प्रसंग रेडियो एफएम के सोनिया भाभी और सविता भाभी डाट काम से प्रेरित है और अच्छा है। बेहतरीन। इसीलिए यह फिल्म उत्तर आधुनिक और पुरातन के बीच झूलती रहती है।

जिस वक्त हिन्दू के कैंटीन में फिल्म की शूटिंग चल रही थी, मेरी बेटी और मेरे मित्र का बेटा दोनों भाग कर वहां चले गए। शूटिंग के बाद बिखरे डिब्बों से खेलने लगे। उनके लिए यह स्पेस एक सामान्य से ज्यादा कुछ नहीं था। मगर सिनेमा में हम स्पेस को गढ़ते हैं। नार्थ कैंपस से पुरानी दिल्ली तक आना दिल्ली को खोजना नहीं है। दिल्ली के गांवों में आस पास बने मकानों की मिलती बालकनियों से झांकता और कालोनी के गेट से अंदर जाता जनार्दन एक शहर का बोध कराता है मगर दीवार और बैकड्राप से ज्यादा कुछ नहीं है। वो दिल्ली में रीयल होने की कोशिश करता है मगर प्राग जाकर भौंचक्क हो जाता है। यहां इम्तियाज़ खानापूर्ति करने की कोशिश करती हैं। मस्ती को न्यायोचित ठहराने के लिए प्राग में भी लिस्ट बनाते हैं और उत्तर आधुनिक होने का रिसेस यानी ब्रेक टाइम में भरम पाल लेते हैं जो एक रात जार्डन के दीवार लांघने पर सिक्योरिटी अलार्म बजने के साथ ही फुस्स हो जाता है। अंत में हीर का राजा पिस्तौल निकाल लेता है और जार्डन इंडिया आकर अलबला जाता है।

शहर को स्टीरीयोटाइप बनाने के साथ एक और कथा चलती है। निज़ामुद्दीन औलिया और भगवती जागरण की कहानी। पत्रकार जनार्जन के जॉर्डन बनने की कथा को हैरत से खोज रही है। शायद कामयाबी के बाद भी आखिरी बार पुष्टि की कोशिश हो रही है कि कोई गैरकुलीन स्टार कैसे बन जाता है। उसी क्रम में भगवती जागरण और निज़ामुद्दीन के दरबार के प्रसंगों को गढ़ा जाता है। संगीत समाज में बनता है। आसमान में नहीं। कोई महान संगीतकार अपने समाज का हिस्सा बने बिना पैदा ही नहीं हो सकता। इम्तियाज़ ने औलिया के दरबार और दरवाज़े को अलग ही कैमरे से भव्य बनाया है। लेकिन यह मत समझिये कि मैं फिल्म को रिजेक्ट कर रहा हूं। फिल्म के बाद की प्रतिक्रिया के रूप में पढ़िये इसे। फिल्म देखते वक्त कई तरह के शहरों, मोहल्लों और गलियों के बीच आते-जाते रहना और एक खूबसूरत हसीना हीर को देखते रहने की चाहत में डूबे रहना अलग अहसास से भरता है। तभी मैंने फेसबुक पर लिखा था,शहर सांसों सा गुज़रता है,अहसासों में कोई क्यूं रहता है।

जनार्दन से जॉर्डन बनने और बिखर जाने का सफर सुखांत और दुखांत पैटर्न पर चलने का एक संतुलित प्रयास है। कहानी अच्छी बन रही है तो जोखिम क्यूं लिया जाए। निर्देशक जोखिम वहां लेता हैं जब वो कश्मीर में घुसता है। तिब्बत की आज़ादी को नायक की बेचैनियों से जोड़ता है। कश्मीर में हीर जनार्दन को कहती है 'हग' करो मुझे। अद्भुत दृश्य है। हिन्दी गाई(guy) पर हीर थोड़े समय के तरस खा लेती है। उसके इनोसेंस पर। जनार्दन हग कर चला जाता है। हग मतलब अल्पकालिक आलिंगन। प्राग में हीर उसे भूल जाती है। सिर्फ बीमारी से साबित नहीं होता कि वो जनार्दन को मिस कर रही है। खैर दोनों मिलते हैं और दिल्ली की मस्ती प्राग की मस्ती में बदल जाती है। पूरी फिल्म में कुलनीता की निरंतरता कहीं नहीं टूटती है। शादी के भीतर एक अतिरिक्त संबंध को मान्यता दे दी जाती है। दोनों कमज़ोर प्रेमी साबित होते हैं। हीर अपनी कुलीनताओं में जकड़ी नहीं होती और हिन्दी मीडियम टाइप जनार्दन को एक दिन के चुंबन की आज़ादी से ज़्यादा और आगे के लायक सोची होती तो इस कहानी में भूचाल आ जाता। रॉक स्टार एक बेहतरीन फिल्म होने के बाद भी रणबीर को डिस्को डांसर जैसी शोहरत और गहराई नहीं दे पायेगा। इसके बावजूद यह फिल्म रणबीर के स्टारडम की पहली औपचारिक फिल्म मानी जाएगी।

सोचता हूं कैमरे की इतनी अच्छी समझ रखनेवाला इम्तियाज़ डिस्को डांसर से आगे क्यों नहीं जा पाया? निश्चित रूप से उसने अच्छी फिल्म बनाई है। मगर उसे अपनी कहानी को स्टीफेंस और हिन्दू के बीच की ग्रंथियों से आज़ाद कर देना होगा। वो फालतू की और पचीस लोगों की हीन और गर्व गंथ्रियां हैं। हिन्दू कालेज का कैंटीनवाला दरअसल इम्तियाज़ से कह रहा है कि कहानी यहां नहीं हैं।। पूरे मन से देखा इस फिल्म को और मन भर देखा। रावन अगर पिट पिटा के नहीं गई होती तो रॉक स्टार को चुनौतियों का सामना करना पड़ता। रावन से घायल दर्शकों के लिए रॉक स्टार मरहम की तरह है। पूरा पैसा वसूल है। भावुकता के कई खूबसूरत लम्हें रचती है यह फिल्म। एक पलायनवादी तड़प कि नौकरी के बंधनों से मुक्त किसी को पाने के लिए सबकुछ गंवा देना ही चरम आध्यात्म है। जबकि ऐसा नहीं है। इम्तियाज़ अली एक अच्छे निर्देशक हैं। मगर अभी तक उन्होंने निर्देशन की ऐसी किसी ऊंचाई को स्पर्श नहीं किया जिससे उन्हें बेहद सृजनशील निर्देशक कहा जाए। कहानी के मामले में भी वो अभी तक कोई नई ज़मीन नहीं गढ़ पाए हैं। बहुत उम्मीद है इस निर्देशक से बस कोई इसे आजाद कर दे। कोई नई उड़ान का रास्ता दिखा दे।लेकिन जो भी इस फिल्म को देखकर लौटेगा, खुश होकर लौटेगा। रहमान के लिए इस नाचीज़ की नसीहत है, अल्फाज़ बर्बाद नहीं करते हमेशा, यादगार भी बनाते हैं। अपने संगीत को इतना हावी न होने दें कि बेहतरीन अल्फाज़ गा़यब हो जाए। न सुनाई दें न समझ आए। साफ साफ गाना होना चाहिए। कि लोग कहते हैं मैं तब भी गाता था जब बोल पाता नहीं था...तरा तरा..ढैन ढैन...याया...याइये....याया....। चलेगा मगर खो जाएगा। थोड़े समय के बाद।फिल्म बेहतरीन है। यह समीक्षा देखने के बाद की है। जब देख रहा था तब बहुत ही मज़ा आया। डूबा रहा।

30 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

दिल्ली की हसरतें और हवा में तैरती प्रेमकथा़ें।

adguru.blogspot.com said...

bahut accha vishleshan hai. samiksha ki nai paribhasha gadthi hui alochna hai raveesh.

Sanjay Singh Baghel, Oman

रोहित बिष्ट said...

बेहतरीन समीक्षा,भाषाई प्रवाह मिथुन दा के डांस की तरह लाजवाब,रहमान को दी गई नाचीज की नसीहत से'खाकसार'भी इत्तफाक रखता है।

महेन्द्र श्रीवास्तव said...

अच्छा समीक्षा
बहुत सुंदर

Vivek Rastogi said...

जमाना कोई सा भी हो डांस की कहानी समझने के लिये तरंगों की जरूरत होती है, इसलिये दिल्ली के लिहाज से शायद यह कहानी नई ही होगी।

Pramod Singh said...

रहमान के लिए इस नाचीज़ की नसीहत है, अल्फाज़ बर्बाद नहीं करते हमेशा, यादगार भी बनाते हैं। अपने संगीत को इतना हावी न होने दें कि बेहतरीन अल्फाज़ गा़यब हो जाए। न सुनाई दें न समझ आए। साफ साफ गाना होना चाहिए। कि लोग कहते हैं मैं तब भी गाता था जब बोल पाता नहीं था...तरा तरा.. ढैन...याया...याइये....याया....। चलेगा मगर खो जाएगा। थोड़े समय के बाद।..

यादें....ashok saluja . said...

सटीक समीक्षा !
आप की लेखनी और विषय के उपर बोलने के तो कायल हैं हम सब .
शुभकामनाएँ!

Tarun Kumar said...

Bahut Achha Comment Hai. Padhane ka baad aur achha laga. Lage Rahiye.

prashant said...

aapki lekhni ka koi jwbab nahi

sarosh said...

Ravish bhai, yeh story Muazzam beg ki hai aur 2002 se 2004 tak wo mera room partner tha delhi zakir nagar okhla main, Imtiyaz ali ne original kahani se kafi chhed chhad ki hai issliye film 2nd half main bhatak jati hai. mujhe muazzam ne asli kahni sunaii thii 2005 main jab iss movie ko John Abrahm kar raha tha.ager muazzam khud yeh movie direct karta to appka review khuchh aur hota. lekin mujhe apka yeh review bhi bahot pasand aaya.Muazzam ke direction main pehli movie (Sadda Adda) 13 jan 2012 ko release hogi ummed hai app uska bhi review likhenge.

श्रीकांत सौरभ said...

समीक्षा के लिए प्रयुक्त भाषाई फ्लेवर वेहद मजेदार है.हिन्दी व उर्दू शब्दों के बेहतरीन सामंजस्य के सहारे छंदात्मक तेवर में लेखन क फ्लो दिल को छू जाता है . श्रीकांत सौरभ,पूर्वी चम्पारण,9473361087

M.A.Sharma "सेहर" said...

Esa dissection aap hee kar sakte they Sirji ....:)

pic ko Interwell ke baad pakadne thoda mushkil ho rahee thee....ab samajh aa gayee....kab ke bichde huve kee tarj par ..:)

keshav suman singh said...

aap aakhir itna badhiya likh aur such kaise pate hain...?? vision ki koi dukan batiye... vinod dua jab laziz kane ka sawd lele hai to kahten..'behad umda'.. is samiksa mai v vahi umda swad hai...

varsha said...

इम्तियाज़ को क्रांतिकारी तब मानता जब जनार्दन स्टीफंस का लौंडा लपाड़ा होता और हीर हिन्दू की ख़ूबसूरत हसीना।
kayee jagah drishyon ke liye sweekary ka bhavv panapta hai to kayee drishya nakare jane ka man karta hai...abhi haa aur naa ke beech hi jhoolte hain imtiyaaz
rahman sahab sun le to meri bhi yahi raay hai.

Aanchal said...

Good Review Sir..Liked it :)

निखिल आनन्द गिरि said...

''स्टीफेंस और हिन्दू के लौंडे लपाड़े गंदे नहीं होते, मगर एक दिन के लिए गंदे काम कर सकते हैं। ‘जस्ट लाइक अ ट्रिप’। गए और वापस आ गए। अपनी अच्छाई के खोह में। ये जगहें लाखों के जीवन का हिस्सा है मगर इम्तियाज़ जैसे कहानीकारों और हिन्दू स्टीफेंस के छात्रों के लिए फन यानी एकदिवसीय मस्ती का अड्डा। ताकि जब वो जीवन में अपने नेटवर्क की बदौलत कुछ हासिल कर लें तो ‘मेमोआयर्स’ यानी संस्मरण को रोचक बना सकें। ''

Typical Ravish Style...समीक्षा फिल्म के बाद की ही होनी चाहिए....वो भी अपने POV के साथ...

कश्मीर में हीर जनार्दन को कहती है 'हग' करो मुझे। अद्भुत दृश्य है। हिन्दी गाई(guy) पर हीर थोड़े समय के तरस खा लेती है। उसके इनोसेंस पर। जनार्दन हग कर चला जाता है। हग मतलब अल्पकालिक आलिंगन।

किसे समझाने बैठे हैं आप..अब 'हग' का यही मतलब सबको आता है...मोतिहारी से मुंबई तक...समझाने की ज़रूरत नहीं..

बहुत दिन बाद आपके ब्लॉग पर पुराने तेवर मिले आपके...वो दिन जब आप एंकर नहीं थे, तब भी बोल पाते थे....

namita singh said...

oh godd! killer hindi !

namita singh said...

oh goddd!! killer hindi ! thnx for d review!

Unknown said...

Apke is review ne dil khush kr diya.apki awaz ki tarah apke lekhni me jaadoo h

Unknown said...

Apki lekhni me jadoo hai

ajit gupta said...

आपने कई प्रश्‍न खड़े किये हैं इसलिए दिलचस्‍पी जगी है। देखें कदम कब ले जाएं, सिनेमा की ओर। एक दिन में यह दूसरी समीक्षा है, एक विदेश से आयी है और एक ठेठ देस से।

Sachin Agarwal said...

सटीक समीक्षा !

Sachin Agarwal said...

मैं शायद यह फिल्म नहीं देखता पर इस समीक्षा के बाद उतसुकता जागी है । देखने का प्रयास करूँगा ।

prakashmehta said...

sir ji apka jawab nahi , being a bihari i can say it ,

MUKESH said...

aapne surendra mohan pathak bahut padha hai ravish ji

Anil negi said...

U r great sir!!

Sadab said...

शायद इम्तियाज़ के मिज़ाज पे जिम मोरेसन ज़्यादा हावी थे/
कुछ तार उनसे छूट गये/
समीक्षक और दर्शक दोनो का एक समागम /
सीखने के लियर बेहतर

rohit khandelwal said...

Sir ji lajawab aaj pehli baar kisi film ka itna shandaar especially alag tarah ka review padha hai maine

behad umda

नवीन रांगियाल said...

film ka to nahi pata lekin aap kamaal ho ... !!!

Akhilesh Jain said...

आप बहुत दिनों से कुछ लिख नहीं रहे..इसलिए मैंने आपके पुराने ब्लॉग को एक्सप्लोर किया..मजा आया...मैंने भी इस फिल्म को देख कर अपनी भावनाएं व्यक्त की थी:-शनिवार को कई महीने बाद सिनेमा हाल में कदम रखा और सोचा की रणवीर कपूर की इम्तियाज़ अली निर्देशित "Rockstar" देखूं..बहुत निराशा हुई..निराशा इसलिए क्यूंकि इस फिल्म को मैं पिछले २ महीने से प्रिंट मीडिया के माध्यम से follow कर रहा था...इम्तियाज़ की "सोचा ना था" और "जब वी मेट" काबिले तारीफ थी..पर क्या सफलता से आदमी विचलित हो जाता है..पूरी फिल्म को देखकर इए लगा की निर्देशक निर्णय ही नहीं ले पाया की नायक को नायिका से किस तरह कनेक्शन जोड़ना चहिये..विदेशी नायिका की कोई जरुरत नहीं थी..भाषा का ज्ञान आवश्यक है और कई जगह सुन्दरता प्रभाव नहीं डालती जितना मुंह से निकला शब्द..रणवीर की अदाकारी इससे बेहतर "सेल्स मेन" और "सिद" में देखी और सराही जा चुकी है..कुल मिलाकर फिल्म जोड़ के हे नहीं रख पायी..फिल्म का एक संवाद निर्देशक पर बिलकुल सही बैठता है "कुछ लोग होते हैं जिनका दिमाग कही और होता है"..संगीत ठीक है घर में सुनिए..