रागदरबारी से पहले की प्रस्तावना

दोस्तों, एक मौलिक और महत्वपूर्ण रचना का वाचिक पुनर्पाठ किसी भी कालखंड की सबसे दुखद घटना हो सकती है। पढ़नेवाला किस मनोभाव और हावभाव से पढ़ेगा यह जानने के लिए रचनाकार की गैरमौजूदगी उस घटना की विडंबना को बड़ा बनाती है। कुतिया से लेकर चूतिया तक सभी एक ही सफ में खड़े लाइव कमेंट्री के किरदार की तरह स्तब्ध नज़र आ सकते हैं, जबकि रचनाकार के मूलभाव में सभी ठहरावमान अपितु गतिमान समझे जा सकते हैं। समाज,सिस्टम के खटाल और जांघों के बीच से नुची हुई खाल का टुकड़ा मैं समय हूं के कथन को पठन लायक बनाता है। आंखों देखा हाल। संजय ने महाभारत का प्रस्तुत किया उसके बाद से भारत का आंखों देखा हाल सिर्फ राजपथ पर सजनेवाली गणतंत्र की झांकियों का हुआ,परन्तु शिवपालगंज का आंखों देखा हाल उस भारत का बदहाल भाव है जो महानगर से लेकर गांव कस्बों तक समभाव में मौजूद है। शिवपालगंज की त्रासदी भारत की त्रासदी है और भारत की त्रासदी शिवपालगंज की। वाइसी वर्सा के इस खेल में जो नज़र वर्षा हमारे दिवंगत कलमकार रचनाकार और असली कार विहीन साहित्यकार श्रीमान श्रीलाल शुक्ल ने की है वो किसी ने नहीं की है। यह वो किस्सा है जो कस के नहीं पढ़ा गया तो कसक बाकी हो सकती है। गनीमत है कि भारत की आत्मा गांवों में बसाई गई और वहीं से बाकी जीवों में भिजवाई गई है। उन स्थायी किन्तु स्थानीय स्तर पर भटकती आत्माओं का ऐसा जैविक कर्मकांडीय बखान किसी भागवत कथा में नहीं मिलता है। बाबा शुक्ल जो कह गए हैं उसी के बाद कहा जा रहा है। यथास्थिति की हर परिस्थिति का विहंगम मूल्यांकन कर गुज़रने के बाद जो बचना है वो तो बस पुनर्पाठ की संभावना और आलोचना की रचना है। शिवपालगंज हमारे आपके मोहल्ले दफ्तर,सरकार, रामलीला मैदान, प्रेम प्रसंग कहीं भी हो सकता है। उत्तर आधुनिक काल से पहले के तमाम कालों के चूतड़ उघाड़ कर ऐसी दृष्टि हमें दे गए हैं कि हम कभी हीन नहीं हो सकते। हर तरह के दरबारों का आडंबर यहीं नारियल की तरह फूटता है, जब लेखक कहता है कि ट्रक का जन्म केवल सड़कों के साथ बलात्कार के लिए हुआ है। तो हर उम्र,हर प्रकार के माननीयों तैयार हो जाइये,रुप्पन बाबू,वैधजी,सनिचर,रंगनाथ,खन्ना मास्टर,बद्री पहलवान,बेला आदि अनेकानेक पात्रों से लैस रागदरबारी के चंद अंशों के महादान से बनी महान रचना के पुनर्पाठ के लिए। जो सुनेगा वो मुझे कोसेगा,जो इसे पढ़ेगा वो श्रीलाल शुक्ल जी को याद करेगा। मैं रागदरबारी हूं। मैं संजय धनंजय टाइप के टीवी रिपोर्टर आने से पहले का भारत हूं जिसकी लाइव रिपोर्टिंग तीन सौ उनतीस पन्नों के उपन्यास में ही होती है। जो है उसके होने की चुनौति उसके नहीं होने की तमाम संभावनाओं के साथ प्रस्तुत है।

( महमूद फ़ारूक़ी के घर में श्रीलाल शुक्ल को याद किया गया। बकरीद की पूर्व संध्या पर। वहीं पर राग दरबारी का पाठ करने से पहले यह प्रस्तावना मेरे द्वारा रचित और पठित की गई। विनीत का कहना था कि इसे पोस्ट कर दिया जाए। हालांकि मैं कहीं से भी श्रीलाल शुक्ल पर बोलने के लिए अधिकारी नियुक्त नहीं हुआ हूं पर चूंकि अन्ना आंदोलन के बाद कोई भी संविधान पर भाषण दे सकता है तो मैं भी साहित्य बांच सकता हूं। उपरोक्त लिखित पंक्तियों को मैंने ज़ोर ज़ोर से पढ़ा था। आपसे भी अनुरोध है कि आप इसे देख-देख कर न पढ़ें बल्कि बोल-बोल कर पढ़ें। जे बा से की)

27 comments:

सतीश पंचम said...

आज यदि श्रीलाल शुक्ल जी फिर से रागदरबारी लिखते तो संभवत: ट्रक की जगह फरारी लिखते हुए कहते -

फरारी का जन्म ही सड़कों से बलात्कार करने के लिये हुआ है, किंतु ऐसी सड़कें बनती ही इस तरह हैं कि बलत्कृत हो सकें।
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विनीत जी की बात मानकर इस रूचिकर पाठ्य को पोस्ट कर दिये यह बहुत अच्छा किया।

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

कल 08/11/2011को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

अनूप शुक्ल said...

प्रस्तावना त चकाचक है।

रागदरबारी के पाठ का टेप अगर उपलब्ध हो सके तो वो भी पोस्ट करिये। :)

सञ्जय झा said...

bahut badhiya bhaijee

pranam.

प्रवीण पाण्डेय said...

भारत की दुर्दशा पर सबका बराबर से बोलने का हक है, जब रागदरबारी को आधार बना समझाया जा रहा हो, तब और भी।

Amrita Tanmay said...

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का भरपूर उपयोग होना ही चाहिए.

Reena Maurya said...

bahut hi acchi post hai

डॉ0 मानवी मौर्य said...

मेरे विचार से राग दरबारी इतनी प्रसिद्ध रचना है, कि हर कोई इसके बारे में कुछ न कुछ बोल सकता है। इससे स्‍वयं इस उपन्‍यास की साहित्यिक कोटि का पता चलता है।

G.N.SHAW said...

सच्चाई झपट कर आ गयी

दीपक बाबा said...

@उत्तर आधुनिक काल से पहले के तमाम कालों के चूतड़ उघाड़ कर ऐसी दृष्टि हमें दे गए हैं कि हम कभी हीन नहीं हो सकते।

तभी सरकार ने राजधानी में ऊँची ऊँची इमारतें और माल बनवा कर अपने पौरुष (वही समझा जाए) का लौहा मनवाने की जिद्द पर अडिग है.

Satish Chandra Satyarthi said...

मस्त है.. जे बा से कि..

miHir pandya said...

कर्फ़ोन है सर्फ़ाला !!!

Ankit mutreja said...

anand aa gaya sir.. kam se kam aaj ki bhuli bisri yuva phidhi ghajini ko chor aapki iss pehle kosis se shrilal ji ki rachna unki majbuti ko toh samjegi.. dhyanyvad :-)..
kirpiye karke aise hi sneh bnaye rakhiye apne parivar ke sadsyo se.. <3

गुस्ताख़ मंजीत said...

रवीश जी, आपने कहीं लिखा है-शायद अपने बारे में अपने ही ब्लॉग में-कि आपकी कोई रचना कलाजयी न मानी जाए। लेकिन आपने जिस कालजयी रचना- राग दरबारी के बारे में राग दरबारीनुमा अंदाज में लिखा है। बेसाख्ता कहने का मन होता है कि आपकी इस प्रस्तावना को कालजयी होने से कोई रोक नहीं सकता।

मेरा मानना है कि आपकी यह प्रस्तावना राग दरबारी के संविधान की प्रस्तावना सरीखी है। आप साधुवाद के पात्र हैं।

मन के - मनके said...

सच्चाई उघडती है तो निवस्त्र ही होती है.आज की ज़रूरत.

Mahendra Singh said...

Rag darbari ke Prastavana isse behtar nahi ho sakti, Anupam Post.
(Rag Darbari ko Hindustani Sangeet ke kathintam/jatil ragon main shumar kiya jata hai. 1951 main aayee Film Baiju Bawra main isee rag par Naushad sahib ne Rafi sahaib se ek geet gavaya tha: O Duniya ke Rakhwale , Gane ke ant main alap hai jiske dauran Rafi sahib ke moohn se khoon aa gaya tha.)

Paresh Kumar Singh said...

Today, I saw your programmer on NDTV about the removal of AFSPA from J&K. I am very much frustrate from you views. I saw that you was not neutral during the debate I also noticed that you was in favour of removal of AFSPA. And I think it may not be coincidence terrorist and Pakistan also in favour of removal of AFSPA because they after removal of this law terrorist attack will increase and motivation of security forces will be on lower level so I think somehow you are in the support of Anti-Indian organizations. So really today I am fade up with you. We all are facing terrorism only dye to peoples like you because according you Terrorists have human right but victims and our brave soldiers don't have any human right. Mr.Ravish Kumar, pl don't do this again. We should support Lt.Col. Mr. Bakshi because he has faced the terrorism while peoples like you do useless discussions in studios to reduce the confidence of security forces. SHAME Mr Ravish that you a supporter of Terrorism in India. We should expand the power army in disturb area especially in J&K from where Hindus have been tortured by terrorists.

Paresh Kumar Singh said...

Today, I saw your programme on NDTV about the removal of AFSPA from J&K. I am very much fade up from you and you views. I noticed that you was not neutral during the debate. I also noticed that you was in favour of removal of AFSPA. And I think it may not be coincidence that terrorists and Pakistan also in the favor of removal of AFSPA, because they after removal of this law terrorist attack will increase and motivation of security forces will be on lower level so It is clear that somehow you are in the support of Anti-Indian organizations. So really today I am fade up with you. We all are facing terrorism only due to, peoples like you, because according to you Terrorists have human right but victims and our brave soldiers don't have any human right. Mr.Ravish Kumar, pl don't do this again. We should support Lt.Col. Mr. Bakshi because he has faced the terrorism while peoples like you do useless discussions in studios to reduce the confidence of security forces. SHAME Mr Ravish that you are a supporter of Terrorism in India. We should expand the power of army in disturb area especially in J&K from where Hindus have been tortured by terrorists.

Pawan07 said...

Nai sadak ka rasta nhi malum tha issliye let se pahucha... Sab kuch ummid ke mutabik barhiya hai, Lekin last ke para me aapne kuch 'Wafadar' Jounos ki tarah Jabardasti Anna movement ko ghasita hai. Gulami ka asar hai ki log Samvaidhanik kya kisi v adhikar ko nhi pahchan pate.

anil yadav said...

अन्ना आंदोलन के बाद हर कोई संविधान पर बोल सकता है.....बहुत जबरदस्त.....


शुक्ल जी अगर आज राग दरबारी लिखते तो ये उदाहरण जरूर लिखते....

Rahul Gaur said...

रवीश जी
उत्तम!
मेरे विचार में तो राग-दरबारी हमारे असल भारत का वह प्राइमर है, जो हमारी जड़-विहीन पीढ़ी के लिये अनिवार्य पाठन होना चाहिये.
self-advertisement का यह सुनहरा मौका ना चूकते हुये आपका ध्यान मेरे ब्लॉग के इस लिंक पर चाहूंगा जहां मैंने इस शानदार उपन्यास के संबंध में लिखा है - http://majhdhaar.blogspot.com/2011/11/raag-darbari-shreelal-shukla.html.

Amitabha said...

Dear Ravish,

Thank you for this post on Shrilal Shukla. I differ from you in the sense that I feel that Shukla's despairing work, Raag Darbari, is not necessarily his strongest, although its popularity makes it his most impactful work.

I'd like you to take a look at my tribute to him and his work published in Open magazine. Linked here.

Best,
Amitabha

सागर said...

जे बा से की matlab ?

shashi sagar verma said...

sagar ji
लगता है आप कभी बिहार से नहीं गुजरे हैं..... जे है से की

shashi sagar verma said...

बुझाता है आप कभी बिहार से नहीं गुजरे हैं..... जे है से की

सागर said...

yahan "जे बा से की" hai dost !

shashi sagar verma said...

मेरे लिय दोनों का मतलब एक ही है मित्र.......मैं तो मजाक कर रहा था......जे है से की ( जे बा से की )