बोल के लब आज़ाद हैं तेरे (मनमोहन की चुप्पी पर विशेष)

वो नहीं बोलते हैं तो ख़बर है। बोलते हैं तो ख़बर है। लोकतंत्र में कोई प्रधानमंत्री बोलने जा रहा है, यह भी ख़बर है। ख़बर कम है। लोकतंत्र का अपमान ज़्यादा। क्या आप मान सकते हैं कि प्रधानमंत्री को बोलने नहीं आता है। फिर वो क्लास में अपने छात्रों को कैसे पढ़ाते होंगे। अधिकारियों के साथ मीटिंग करते वक्त तो बोलते ही होंगे। अपनी राय तो रखते ही होंगे। यह कैसे हो सकता है कि दुनिया भर के अनुभवों वाला एक शख्स रबर स्टाम्प ही बना रहे। विश्वास करना मुश्किल होता है। कोई ज़बरदस्ती चुप रह कर यहां तक नहीं पहुंच सकता। कुछ तो उनकी अपनी राय होगी,जिससे उनके धीमे सुर में ही सही बोलते वक्त लगता होगा कि आदमी योग्य है। वर्ना मुंह न खोलने की शर्त पर उनकी योग्य छवि कैसे बनी। मालूम नहीं कि ज़िद में आकर मनमोहन सिंह नहीं बोलते या उन्हें बोलने की इजाज़त नहीं है। दोनों ही स्थिति में मामला ख़तरनाक लगता है।

जिस मनमोहन सिंह की मुख्यधारा की मीडिया ने लगातार तारीफ़ की हो अब उन्हीं की आलोचना हो रही है। यूपीए वन में उनकी चुप्पी को लोग खूबी बताया करते थे। कहा करते थे कि ये प्रधानमंत्री भाषण कम देता है। दिन भर काम करता है। देर रात तक काम करता है। यूपीए वन के वक्त लोकसभा में विश्वासमत जीतने के बाद बाहर आकर विक्ट्री साइन भी बनाता है। जीत के उन लम्हों को याद कीजिए,फिर आपको नहीं लगेगा कि मनमोहन सिंह चुप रहने वाले शख्स होंगे। संपादकों की बेचैनी का कोई मतलब नहीं है। उन्हें बेवजह लगता है कि प्रधानमंत्री उनसे बात नहीं करते। इसलिए कई संपादकों ने लिखा कि वे बात क्यों नहीं कर रहे हैं। सवाल यही महत्वपूर्ण है कि कई मौकों पर प्रधानमंत्री देश से संवाद क्यों नहीं करते? अपना लिखित बयान भी जारी नहीं करते। अगर सवाल-जवाब से दिक्कत है तो लिखित बयान भी नियमित रूप से जारी किये जा सकते थे। जनता स्वीकार कर लेती। कहती कि अच्छा है प्रधानमंत्री कम बोलते हैं मगर बोलते हैं तो काम का बोलते हैं। लिखित बोलते हैं। यह भी नहीं हुआ। जबकि प्रधानमंत्री के पास मीडिया सलाहकार के रूप में एक अलग से दफ्तर है। क्या ये लोग यह सलाह देते हैं कि सर आप मत बोलिये। अगर सर नहीं बोल रहे हैं तो मीडिया सलाहकार तो बोल ही सकते हैं। कोई चुप रहने की सलाह दे रहा है या कोई न बोलने का आदेश,दावे के साथ कहना मुश्किल है मगर समझना मुश्किल नहीं।

लेकिन यह भी समझना चाहिए कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हमारी आपकी तरह किसी कंपनी की नौकरी नहीं कर रहे। देश के सबसे बड़े पद पर आसीन हैं। उसे छोड़ भी देंगे तो करदाताओं के पैसे से सरकार उन्हें ससम्मान रखेगी। वो एक बार पूरे टर्म प्रधानमंत्री रह चुके हैं। उनकी मजबूरियां समझ नहीं आतीं। कोई वजह नहीं है। तो क्या मान लिया जाए कि उन्हें किसी चीज़ से मतलब नहीं हैं। लोकतांत्रिक प्रक्रिया में यकीन नहीं है। जो मन करेगा, करेंगे। जो मन करेगा, नहीं बोलेंगे। हठयोग पर हैं मौनी बाबा। इनके गुरु रहे हैं पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव। वो भी नहीं बोलते थे। कल उनका जन्मदिन था। मनमोहन सिंह आंध्र भवन गए थे जहां नरसिम्हा राव की याद में कुछ कार्यक्रम हुआ था। जिस राव को कांग्रेस में कोई पसंद नहीं करता, उससे रिश्ता निभाने का सार्वजनिक प्रदर्शन करने वाले मनमोहन सिंह के बारे में क्या आप कह सकते हैं कि वे दब्बू हैं। लगता नहीं है। उन्हें लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में विश्वास कम है। शायद इसीलिए वे पिछले साल सितंबर के बाद आज के दिन देश के पांच संपादकों से मिलेंगे। टीवी वालों से नहीं मिला। पिछली बार फरवरी में न्यूज़ चैनलों के संपादकों,संवाददाताओं से मुलाकात की थी। इस बार लंबी चुप्पी के बाद टीवी को पहले चांस नहीं मिला। वो इस डर से भी कि अगर ऐसा हुआ तो टीवी वाले दिन भर बवाल काटेंगे। हर भाव, हर मुद्रा पर चर्चा कर डालेंगे। कुल मिलाकर मनमोहन सिंह की एक कमज़ोर छवि ही निकलेगी। अब अखबार के संपादकों से सवाल तो यही सब पूछे जायेंगे। यही कि क्या मनमोहन सिंह आहत हैं? क्या कहा उन्होंने न बोलने के फैसले पर? क्या वो देश के काम में लगे हैं? अगर दिन रात काम में ही लगे हैं तो देश की हालत ऐसी क्यों हैं? जनता फटीचर हालत में क्यों हैं?

क्या यह शर्मनाक नहीं है कि कांग्रेस की कार्यसमिति में प्रधानमंत्री के सामने उनके सहयोगी राजनेता यह सुझाव दें कि आप बोला कीजिए। आप कम बोलते हैं। या तो आप राष्ट्र के नाम संदेश दे दें या फिर मीडिया से बात कर लें। अभी तक विपक्ष ही बोलता था कि प्रधानमंत्री नहीं बोलते हैं। अब उनकी पार्टी के लोग ही बोलने लगे हैं। हद है ये तो बोलते ही नहीं हैं। तो क्या यह दलील पूरी तरह सही है कि वे पार्टी के दबाव में नहीं बोलते हैं। फिर पार्टी के लोग यह मांग क्यों करते हैं? फिर उनके सहयोगी गृहमंत्री पी चिदंबरम एनडीटीवी की सोनिया वर्मा सिंह के इंटरव्यू में खुलेआम बोलकर जाते हैं कि चुप रहना उनका स्टाइल है मगर मुझे भी लगता है कि प्रधानमंत्री को कुछ ज्यादा संवाद करना चाहिए। थक हार कर जब वे नहीं बोले तो सरकार ने मीडिया से बोलने के लिए पांच मंत्रियों का समूह बना दिया। पिछले रविवार अर्णब गोस्वामी के वर्सेस कार्यक्रम में आउटलुक के संपादक विनोद मेहता ने सलमान खुर्शीद की क्लास ले ली। कह दिया कि इन पांच मंत्रियों ने अन्ना के मामले में जिस तरह से मीडिया को हैंडल किया है वो पब्लिक रिलेशन के कोर्स में डिज़ास्टर के रूप में पढ़ाया जाना चाहिए। ज़ाहिर है प्रधानमंत्री पर दबाव कम है। दबाव की बातों में अतिशयोक्ति है। नहीं बोलने का उनका फैसला अपना है। ज़िद है। वर्ना बोलने को लेकर विवाद इसी महीने से तो नहीं शुरू हुआ न। वो तो कॉमनवेल्थ के समय से ही चल रहा है।

मनमोहन सिंह को लगता ही नहीं कि लोकतंत्र में संवाद ज़रूरी है। इसलिए वो नहीं बोलते हैं। पिछले कुछ महीनों से कई बड़े संपादकों ने शनिचर-एतवार के अपने कॉलमों में इसकी आलोचना की और सुझाव दिये कि कैसी सरकार है। न काम कर पा रही है न बोल पा रही है। सिर्फ चली जा रही है। अटल बिहारी वाजपेयी तो चलते-चलते बात कर लेते थे। अटलजी-अटलजी की आवाज़ आती थी,वो प्रेस की तरफ मुड़ जाते थे। कुछ तंज,कुछ रंज और कुछ व्यंग्य कर के चले जाते थे। वो छोटे-मोटे समारोहों में भी जाते रहते थे। वहां कुछ न कुछ बोल आते थे। हर साल शायद पहली तारीख को उनके विचार आ जाते थे। अटल म्यूज़िंग। कितना बोलें और कब बोलें,यह प्रधानमंत्री का अपना फैसला होना चाहिए। मगर कभी बोलेंगे ही नहीं तो इस पर जनता को फैसला कर लेना चाहिए। पिछले पंद्रह साल के मीडिया कवरेज का इतिहास निकालिये। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के हिस्से में सिर्फ तारीफ ही आई है। पिछले पंद्रह महीनों के मीडिया कवरेज का इतिहास निकाल कर देखिये,मनमोहन सिंह के हिस्से में सिर्फ आलोचना ही आई है। हमारा समाज चुप रहने वालों को धीर गंभीर कहता है मगर यहां तो मनमोहन सिंह इतने चुप हो गए कि अब लोग इस चुप्पी को अड़ना समझने लगे हैं।

मैं तो सोच रहा हूं कि आज रात प्राइम टाइम में इस पर बहस ही कर डालूं।

63 comments:

Rangnath Singh said...

क्या कहें,आपके सुर ही में सुर मिलाते हैं, बोल के लब आजाद हैं तेरे...

Abhay said...
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Abhay said...

Intazaar Kis baat ka hai- AAJ ki raat ye mudaa ho hi jaye...magar khayal rahe...rajnitik log ise "MACHALI BAZAR" na bana de...kyonki jab baat sachaai ke saath bahar aane lagati hai toh neta halaa karne lagte hain...shahyad yahi maan ke aate hain ki "JOR-JOR SE BOLNE PE JHOOTH BHI SACH HO JATA HAI".

Rangnath Singh said...
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Rangnath Singh said...
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Rangnath Singh said...

चलते चलते बुजूर्गों का कहा याद आ गया कि,

अति का भला न बोलना अति की भली न चुप
अति का भला न बरसना अति की भली न धूप

Dr.Vimala said...

Ravishji,
Mauni baba ke maun vrat ka aisa sateek sheershak v itna vishad vishleshan! Aanand aa gaya.Roz ki tarah aaj bhi primetime ka intzaar rahega(baaki ndtv dekhna chhod diya hai.)Jab bhi'RAVISH KI REPORT'phir se shuru karen plz zaroor khabar karne ki meharbaani karen.Haan ek shikaayat hai-aapke Hindi blog me Hindi me comment karne ki suvidha kyon nahi hai? E:ezeeyog@gmail.com

प्रवीण पाण्डेय said...

लोकतन्त्र संवाद का नाम है पर मौन रहना भी ढेरों संवाद कह जाता है।

Anupam Singh said...

यहाँ तो मुझे आपकी बोली ही सब पर भारी होती दिख रही है.

मनमोहन के हिस्से का तो दिग्विजय बोल जाते हैं. कुछ बचता ही नहीं मौनमोहन साब के कोटे में.
वैसे मुझे लगता है कि कांग्रेस शाषन करने से कहीं ज्यादा इसपर नीति बनाती है कि उसके कौन से नेता कितना और किसपर बोलें.

एक तरफ दिग्विजय खुले सांड की तरह घूम रहे हैं तो दूसरी तरफ हमारे प्रधानमंत्री किसी बिल्ली की तरह एक-आध बार निकल के म्यायुं कर देते हैं.

Mahendra Singh said...

Pahla
"Ashar mere yoon to jamane ke liye hai,kuch sher faqat unko(DMMS) sunane ke liye hain".



Doosra
"kuch to majbooriyan rahi hongee, yoon hee koi bewfa nahi hota".

Teesra

"Hum aah bhi lete hain to ho jate hai badnam, Woh qatl bhi kar de to charcha nahi hota"
*DMMS-Dr Man Mohan Singh

Ratan Singh Shekhawat said...

बेचारे जिस कंपनी की नौकरी कर रहे है वहांसे इजाजत मिलेगी तब ना बोलेंगे !!

Ankit mutreja said...

sir aksar jo dhikta hai wo hota nai hai aur jo hota hai wo dhikta nahi hai.!! Mamla ghambir toh hai lekin jo suljh na sake aisa bi nahi. bs alag alag log apni alag alag pratikriya rakhtey hai.!!
aapne sahi kaha jab aaj Rat prime time mei yeh mudda chera jayega toh kaise na kaise ek Bat tay ho jayegi.!!
Aakhir zuban pe sach aur dil mei india lie rakhtey hai humare Ravish sir.. :)

Ankit mutreja said...

sir.. ek request hai..
kafi acha hoga agar ap ek vishesh lekh kalam ke sipahi jey dey(mid day) ke muurder case ke barey mei bi likhey. kafi romanchik report ban sakti hai. underworld ka khaufnak romantic suspense thrill khatra aur ek taraf ek nidar sipai jo na jane kis wajah se upar wale ko pyara ho gaya.

अशोक सिँह रघुवंशी said...

बहस कीजिये या कुछ भी कीजिये पर, मनमोहन की चुप्पी तुड़वा के ही दम लीजिये......

Ankit mutreja said...

zabardast chal raha hai sir program..
kambhakt waqt hai jo hamesa kam padh jata hai wah wah sir hehe..
ap ki woi bebak sadki :)

दीपक बाबा said...

चव्वनी छापों की औकात.....

chavvni chhap bola nahin karte.

AMRIT RAJ BHARAT said...

RAVEESH JEE AAJ MUJHJHE SATYA KA GYAN HO GAYA AAP PATRAKAR HEE NAHEE EK SAHITYAKAR BHAEE HAIN ISLIYE ITNI SAHEE HUI BHASHA KA PRAYOG KAR LETE HAIN. RAHEE BAT MANMOHAN SINGH JEE KEE WO BOLE YA NA BOLE JANTA TO AB FAISLA KAR HEE LEGEE.

Ankit mutreja said...

:(

Ankit mutreja said...

sir yeh mera wada hai apse ek din zarur milna hoga.. naam aap dhek hi saktey hai. Khanpur sangam vihar ki galio se nikli yeh dhuk ek din apke paas pauchegi zarur. kyuki journalism toh mere khun mei dor rahi hai par ab Ravish sir se milne ka sapna bi isse din par din ek zakham bnakar aur taza karti rehti hai..

Praful Bhat said...

http://bhatpraful.blogspot.com/2011/02/blog-post.html

Praful Bhat said...

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►►♫♫♥¶♂Ş├┤└┘β╠╣Ąм™♂¶♥♫♫◄◄ said...
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►►šнυвнλм™◄◄ said...

लगता है देश के सारे न्यूज़ चैनलों और संपादकों ने प्रण ले लिया है की मनमोहन साहब से बोलवा के ही रहेंगे, जनता के सामने नही तो कम से कम बंद कमरे में ही सही| वैसे शेर-ओ-शायरी के मामले में जवाबी कार्रवाई करने से मनमोहन जी पीछे नही रहते| मेरा मानना है की विपक्षी पार्टियों को अपने खेमे में कुछ ऐसे स्पेशलिस्ट लोगों की नियुक्ति करनी चाहिए जो देश की गंभीर समस्याओं के सवाल शेर-ओ-शायरी के लहज़े में कर सकें तब शायद मनमोहन जी से नियमित संवाद की अपेक्षा की जा सकती है| मीडिया से टक्कर लेना तो सिर्फ़ दिग्विजय सिंह जी के बस की ही बात है, मौनमोहन में इतना माद्दा कहाँ|

तमाम गंभीर मुद्दों पर चिंतन करते-करते शायद हम ये भूल गये कि "कठपुतलियाँ बोला नही करतीं" और ना ही उनकी जवाबदेही तय होती है| जवाब चाहिए तो कठपुतली चलाने वाले से संपर्क करें|
(कठपुतलियों के बारे में अधिक जानकारी के लिए NDTV पर "गुस्ताख़ी माफ़" देखें)

"जय हो मौनमोहन सिंह जी की, जय हो बड़बोली मीडिया की"

JC said...

@ "...पिछले पंद्रह महीनों के मीडिया कवरेज का इतिहास निकाल कर देखिये,मनमोहन सिंह के हिस्से में सिर्फ आलोचना ही आई है।..."

मौनमोहन पर शायद सही लागू होता है, "उनको ये शिकायत है की हम कुछ नहीं कहते/... कुछ कहने पै तूफ़ान उठा देती है दुनिया / दुनिया की इनायत है कि हम कुछ नहीं कहते..."!
और सत्य अथवा निराकार ब्रह्म को जान मुनि भी मौन हो जाते हैं!

मानव जीवन की तुलना सदियों से ज्ञानियों ने अपने स्रोत से शिशु समान प्रतीत होते, भारत में नदियों के विशाल तंत्र से किसी एक नदी के, कलकल करते निकल अपने मूल स्रोत (सागर) की ओर बहाव से की है (प्रधान मंत्री गंगा समान, गोमुख से? और उसके सहायक मंत्री मंडल के सदस्य भी अन्य मैली यमुना अथवा शक्तिशाली ब्रह्मपुत्र के उसी स्रोत मानसरोवर से?) ...
जो भारत की विशाल धरा पर स्वतंत्र व्यक्ति समान इधर उधर बहते हुए, और 'मैल' ढोते हुए, अंत में विभिन्न छोटी-बड़ी सहायक नदियों आदि से ग्रहण किये जल को अपार सागर जल से मिलाने से पहले गंभीर हो जाती है...

और एक दम निकट पहुँच सागर जल ही उससे मिलने के लिए बेचैन रिश्तेदार समान उसकी ओर बढ़ आता है (बैकवाटर के रूप में), और यूं नदी का स्वतंत्र अस्तित्व सागर जल से मिलने से पहले ही लगभग समाप्त हो जाता है...

और 'हिंदू' मान्यतानुसार, अपने अपने ढोल-नगाड़े और विभिन्न यंत्र बजाते प्रतीत होती, अनंत सृष्टि की रचना शून्यकाल ('जीरो आवर' उसका प्रतिबिम्ब ?) में ब्रह्मनाद, बीज मन्त्र ॐ से हुई, किन्तु उसके पहले ब्रह्मा जी मुनी समान मौन थे/ और सदैव मौन ही हैं :)

lokendra singh rajput said...

प्रधानमंत्री की चुप्पी वाकई कई सवाल खड़े करती है... बोलना भी उनका माशाल्लाह लाजवाब है... उनके कमेन्ट जनता को चुभते हैं ..

Ankit mutreja said...

sir abi apne prime time mei kaha ki kuch shikayat ho toh muje zarur bataye.. sir mei bas yeh kehna chahta hu sikhayat toh apse ho hi nahi sakti kyuki bhagwan se toh sirf Guzarish ho sakti hai..
sir.. Mein dobara apni bat dorahana chaunga ke iss blog ke commentbaaz apke ghar ke sadsye hai aur unhe haq hai ki ek aad jawab unhe apse miley ?
sir plish ho sakey toh mere uss sawal ka jawab ankit.mutreja90@gmail.com par karey..mei apke facebook page mei bi add hu ankit mutreja naam se hi.
Mere pass kafi ahem aur bi mudey hai sir maza aa jayega jab wo prime time mei chere jayenge..
bas ek bar muje viswas ho jaye ke ha aap hi apne blog ko handle kar rahe hai..
plish sir ek bar mere uss sawal ka jawab dey..

SMRITI said...

jo badal garjte hain woh barste hain nhi ye lekh se kafi prabhavit hun delhi se door banaras mein hun warna jarror bolta chup hokaar kafi bol gaye manmohan---

ajit gupta said...

चुपचाप रहकर रबर स्‍टम्‍प बने रहने के लिए ही उनका चयन हुआ है। इस बात को वे अच्‍छी प्रकार से जानते हैं। जिस दिन उन्‍होंने बोलना शुरू किया, उनका कार्यकाल पूरा हो जाएगा। अब वे बोल गए हैं कि मैं तो चाहता हूऊ कि प्रधानमंत्री भी लोकपाल के दायरे में आए। इसका अर्थ यह हुआ कि सोनियाजी नही चाहती। क्‍यों नही चाहती? क्‍योंकि वे राहुल को प्रधानमंत्री बनाना चाहती हैं और उन पर किसी भी प्रकार का नियन्‍त्रण, ऐसा ही है जैसे किसी भगवान पर भी शक कर लिया जाए। इसलिए मनमोहन सिंह जी चुप हैं।

NEELMANI said...

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Jai Prakash Pathak said...

नमस्कार!

आपने रिपोर्ट छोड़ दी और प्राइम टाइम पर आ गए.
तीन सौ करोड़ की सफलता के बाद ही रवीश की रिपोर्ट बंद हो जाय यह ठीक नहीं लगता.

चुप्पी पर बहस अच्छी लगी.

एक मीडिया वाले कह रहे थे मीडिया मैनेज नहीं होती.कारपोरेट क्या यह मानता है?

मुझे लगता है कि उस दिन केवल प्रधान मंत्री को ही बोलना चाहिए था.

क्या ऐसा हो सकता है कि प्रधामंत्री जी प्रश्न पूछे और संपादक जबाब दें?

नमस्कार.

Shambhu kumar said...

रबीश साहब, सिर्फ मीडिया में ही नहीं हर प्राइवेट लिमिटेड कपंनी में बोलने की सजा छु्ट्टी होती है. जिसके बाद बोलना तो दूर आप सोचने के काबिल भी नहीं रह जाते, शायद आप भी अपने जूनियरों की बोली बर्दाश्त नहीं कर पाते होंगे, चाहे आपकी अंतरआत्मा उसे सही मान रही हो, यहां तो मीडिया की लतखोर नौकरी से भी बढ़कर पीएम की नौकरी है, मनमोहन सिंह क्यों मौन तोड़ेंगे? आप लोग अपनी सिट्टी पिट्टी गुम होने जैसे ही दूसरों की हालत क्यों नहीं समझते, इसलिए तो कहता हूं, सच का ढोल बजाने वाले मीडिया के लोगों की कथनी और करनी में प्रकाश वर्ष की दूरी है, वैसे आपकी टूटी फूटी हिम्मत का कदरदान हूं, जो गोबर की ढेर में गर्दन बचाए हुए है

idanamum said...

रविश जी, मनमोहन जी ने सारी उम्र केवल नौकरी कि है कभी यूनिवरसिटि की, कभी आरबीआई की, तो कभी वर्ल्ड बैंक की। और आज भी वह प्रधानमंत्री का दायित्व केवल एक सरकारी नौकर की तरह निभा रहे है। उनके अंदर लीडरशिप क्वालिटी की उम्मीद करना बेमानी है। सोनिया की दया से उन्हे यह पद मिला है अब उसका कर्ज़ चुका रहे है। कृपया निम्न लिंक पर भी कभी जा कर देखना।

http://www.youtube.com/watch?v=RlhbL0Bq5v4

अनुपम दीक्षित said...

जो व्यक्ति दोहरा रबर स्टांप हो (यूएसए और सोनियाँ मैडम) उससे बोलने की आशा करना व्यर्थ है। रही बात लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में विश्वास की तो यह तो सभी को पता है की संसद में उनकी एंट्री पीछे के दरवाजे से है। यूपीए - 1 और यूपीए -2 सब एक जैसे हैं। यूपीए 2 में नेताओं को लगा की अब यूपीए-3 तो होगा नहीं इसलिए खुल्लम खुल्ला लूटो, जनता तो है ही अपनी बेशरम और अव्वल दर्जे की तमाशबीन बोलेंगे भी तो क्या?

RAJESH KUMAR said...

MANMOHAN SINGH JAB FINANCE MINISTER THE TO WO DHANJOHAN SINGH THE.
LEKIN JAB PRIME MINISTER BANE TO MAUNMOHAN SINGH BAN GAYE AUR DHRITRASTRA KI TARAH BAN GAYE''''''''''''''''

bolo bindasssssss......... said...

ye post sabse zyada pasand ayi sir aur title 'bol ke lab azad hain tere' lazawab hai.

घनश्याम मौर्य said...

मनमोहन सिंह भले ही कुछ न बोल रहे हों लेकिन उनका मौन उनकी वाणी से भी अधिक मुखर है और उनकी हालत को बयां करता है।

JC said...

मान्यता है की सृष्टि आरम्भ हुई ब्रह्मनाद (ॐ) से... और सृष्टि के पहले क्या था ? मौनी बाबा !!!

और हिन्दू मान्यता के नुसार काल चक्र उल्टा चल रहा है अर्थात उत्पत्ति तो धरा से शिखर (सतयुग की चरम सीमा) पर, उसके प्रतिबिम्ब समान, 'सागर-माथा' शिखर यानि ऐवेरेस्ट पर झंडा गाढ़ने समान थी,,, किन्तु हम पृथ्वी पर आधारित प्राणियों को जो दीखता प्रतीत होता है वो शिखर से धरातल पर उतरने समान है, यानि उच्चतम से निम्नतम स्तर पर पहुँचने का (जवाहर लाल से मौन्मोहन तक :)

Sam said...

i am very impressed with ur blog. please kindly add my one of my newly created blogs as below:

http://np-girl.blogspot.com/
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KK Yadav said...

कई बार मौन रहना ज्यादा असरकारी रहता है. ...

RAJESH KUMAR said...

purva pradhanmantri p v narsimha rao ke jamane me unake bare me prachalit tha ki unka kisi mudde me koi decesion na lena hi sabse bada decesion tha.ab unake chele pm ke bare me ye baat shayad lagu hota ho ki kuch na bolana bhi bahut kuch bayan kar jata hai.
RAO Sahab se unake GERMANY yatra ke darmyan waha ke patrakaro ne pucha ki indian officials files ke niptara me bahut samay lagate hai yani bharat me laalfitashahi hai.isake jabab me RAO SAHAB ne kaha tha "INDIAN BUREOCRATS ARE PET DOGS". Kahi bureocrat se pm bane sri manmohan singh ke bari me bhi to rao sahab ka baat laagu nahi hotaaaaaaaaaaaaaaaa????????

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Zakir Ali 'Rajnish') said...

काश, राजनेताओं के पास शर्म जैसी भी चीज होती।

------
TOP HINDI BLOGS !

Ankit mutreja said...

Sir.. Namaskar..
sir muje apko batate hue kafi sharm mehsus ho rahi hai ke jo fan apse kuch dino pehle journalism karne ki bat kar raha tha .. ab shyad (ek persoanl problem ki wajah se) wo apna sapna sirf sapna rehte dhek payega..
:( kash kuch cheezein bina paise ke hoti..

Ankit mutreja said...

Sir please yeh mat sochie ga ke mei apse madad ki koi bheek mang raha hu mei bas apko ek aur mudda bata raha hu jo shyad kafi comon hai aur ispe debate bhi kiya ja sakta hai prime time pe.. !!..
jab paisa se hi sabkuch hota hai toh saas lene ke liye bi sarkar tax ley ?
dhakila ab sirf dhakila nahi hai .. ""dhakila number 420 hai"

प्रतीक माहेश्वरी said...

अब तो ऐसा लग रहा है कि जिस तरह ना के बराबर बोल रहे हैं. उसी तरह उनकी सरकार ना के बराबर काम कर रही है.. नहीं बोलने वाले भी मार खाते हैं.. ये भी खाएंगे..

परवरिश पर आपके विचारों का इंतज़ार है..
आभार

prabhaker said...

aur wo bolte bhi hai to 5 chote chote akhbar ke sampadko ke sath

Ankit mutreja said...

Sir mubarak ho muje admission mil gaya lekin mission abhi udhura hai..!!.. sirf admission mila hai ghar walo ki punji lagi hai safalta nahi mili.. !!..
khair ek din apse milna zarur hoga sir.. main apni bat dohraunga bar bar jabtak apse milna nahi hota.!!..

Ravish Kumar said...

Ravish Bhai........Namskar.......
Manmohan ji ki awaz kaise gul ho gayi..............

Ankit mutreja said...

Sir second part on prime time kuch intresting lag raha hai..!!.. Acha rahega mudda mayawati sarkar aur builder'o ki aap gulak jama neeti ke barey Mein..!!
aur sir meri apse ek request hai ki agar wo panel jo t.v pe alag alag boxes mei dhikaya jata hai wo aamne/samne dhikyai dey matlab sab ek sath dhikayi dey in studio aur one by one sawal jawab chale toh hadh se zyda maza aa sakta hai..!!
(ho sake toh kiran bedi ji ko bi bulaye as an guest}wo program mei jaan dal deti hai..!!

Pramod BHRASHTA said...

khair apki koshish kabile taareef hai aur shuruvat lajvab lekin unki halat aisee hi hai jaise KOI BHOLI BHALI RAZIA gundo me baitha di jaye. vo darasal lachari ki vajah se raazneeti me hai ab tak to unhe sanyas mil jata samay ho gaya tha lekin sampadako ne unki chuppi ko itna tool de diya hai ki ab yadi YUVRAJSHRI ke liye gaddi chhodenge to adhogaman ki taraf ja rahi party ko aur ek tamga mil jayega isliye bechare kisi tarah dabao me desh ko khiska rahe hai kis disha me ve to accha hi hoga bhai vo arthashashtri jo thahre aur dabao unke upar itna hai jitna Mumbai ki local traino me to unki majboori samajhiye aur unke jagah pe bolne ke liye MAHAMAHIM SHREE DIGVIJAY SINGH ji hai hi
To chai pijiye aur mauni baba ko shant rahne dijiye bechare ankho me samandar liye baithe hain.... JAI HIND....

rahul said...

our prime minister is very nice as a person but not so good as prime minister .
Its look like that he say all that only which Mrs Gandhi say to speak.
And he remain so silent during need and problem in country that frustrate us.
Rahul
Gurgaon, Haryana

Dr. Surabhi Pant said...

Manmohan Singh ji ki saaf suthri chavi se kabhi inkaar nahin raha...

Par jab commonwealth games ke liye 10 saal ka samay milne ke baavjood bhi, aahkri samay par tayariyon ka haal dekha to Bhartiya hone ke naate badi sharmindagi mahsoos hui...

Ye maanna mushkil hai ki Suresh Kalmadi kaise kaam kar rahe hain isse PM anjaan the...

Unki neeyat par to abhi bhi sandeh nahi hota...par ek kushal prashasak hone par bada sa ? lag chuka hai

SUDS said...

gur ganne se banta he,
shahad makhhi se banta he,
manmohan desh ke santa he,
aur manmohan hi desh ke Banta he

Unknown said...

.

MY THOUGHT ON LIFE said...

your programme was an excellent one but for full comment read on my blog www.vipindaytoday.blogspot.com & also read on "hamaara samaj-ye neta aur anna"

madhu saraf said...

Aajkal ek SMS chal raha hai.
A Notice Board out side the Conference Hall---:
Please keep your Mobile on
"MANMOHAN SINGH MODE".

रोहित बिष्ट said...

रवीश जी प्रणाम,आपके ब्लॉग पर पहली बार आना हुआ,अच्छा लगा।आपकी पेशेवर दक्षता और निष्पक्षता का कायल हूँ मैं,शुभकामनाएँ।

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Zakir Ali 'Rajnish') said...

आइडिया बुरा नहीं है।

------
कम्‍प्‍यूटर से तेज़!
इस दर्द की दवा क्‍या है....

हिन्दुस्तानी said...

बोलने से व्यक्ति की अकलमंदी झलक जाती है !!

वैसे भी आजतक क्या बोल फूटे हैं, यही ना
मेरे पास जादू की छड़ी नहीं है
मैं कोई जादूगर नहीं हूँ ..

रज़िया "राज़" said...

आपकी हर बहस एक मुद्दा बन जाती है कर ही डालो एक बहस ये भी ज़रुरी है।

Vijai Mathur said...

जनता के आदमी होते तो जनता से संवाद करते। वह तो वर्ल्ड बैंक और I M F के आदमी थे और हैं तो उन्हीं से संवाद करते हैं।

Poonam Misra said...

क्या यह फर्क एक निर्वचित प्रधानमंत्री और एक थोपे हुए मुखिया का है?. जनता से चुने हुए नेता को जनता से संवाद का महत्व पता होता है.

Anand said...

बहुत ही उम्दा ब्लॉग है आपका रविश जी. अब हम इसे हमेशा पढ़ा करेंगे. आप जैसे NDTV के जवान ही NDTV की मर्यादा को बचाए रक्खे हैं वरना बहुत सरे लोगों का विश्वाश NDTV के इंग्लिश चैंनल से तो कब का उठ चूका है. आप ही हैं जो prime टाइम पर जम कर बोलते भी हैं और बुलवाते भी हैं. यही एक वजह है की अमेरिका से भी मैं रोज आपका PRIME TIME प्रोग्राम देखता हूँ.

धन्यवाद.

vikash yadav said...

ravish ji namaskar, aapki hindi ko mera salam....aur aapki patrakarita ko bhi.ek na ekk din aapse mulakat to hogi..?
aapke blog par padha manmohan singh ke bare me ye sahi hai ki wo bahut kam bolte hai ,par mera vyaktigat taur par manna hai ki wo sahi karte hai kam bol ke.
"kyonki wo unme se hain jo credit lene me vishwas nhi rakhte...apne kam ka bhi"