क्या कबीर बग़ावत के सबसे बड़े ब्रांड हैं?

प्रतिरोध की स्थिति में हम सब कबीर को क्यों याद करते हैं? क्या कबीर आज भी हमारे दैनिक जीवन में सामाजिक आर्थिक राजनीतिक प्रतिरोध के सबसे देसी प्रतीक हैं? जब भी संघर्ष पर उतरता है कबीर की तरह लगने या कहलाने लगता है। ऐसी क्या बात रही है कबीर में कि वे आज के पल-पल बदलते प्रेरणास्त्रोंतों आदर्शों के दौर में भी स्थायी भाव से टिके हुए हैं। युवाओं को भी कबीर वैसे ही आकर्षित करते हैं जैसे उन पर शोध करने वालों को। कई बार लगता है कि कबीर को जितना उन्हें जाननेवाले विद्वान नहीं जीते उससे कहीं ज्यादा कबीर को आमजन जीता है। किसी भी घुटन भरे मकान से निकलने के लिए कबीर खिड़की का काम करते हैं। इसीलिए उनकी पहचान जातिधर्म की नहीं है। आंखें बंद कर कबीर की कल्पना कीजिए तो किसी तस्वीर का अहसास नहीं होता बल्कि उनकी बानी सुनाई देती है।

प्रोफेसर पुरुषोत्तम अग्रवाल की एक किताब आई है। अकथ कहानी प्रेम की। इस किताब को पढ़ते समय आज का समय ज्यादा दिखाई देने लगता है। पुरुषोत्तम के कबीर भले ही देशज आधुनिकता के प्रतीक हैं मगर आमजन के कबीर उदारीकरण से गढ़े गए आज के समय के आधुनिक हैं। कबीर की मौजूदगी उपभोगी समाज की आधुनिकता पर सवाल हैं। जो समझौतावादी समाज की संरचना कर रहा है उसमें कबीर बगावत के प्रतीक बन जाते हैं। कबीर जैसा होना अपनी आधुनिकता का भारतीयकरण करना है। जब भी आप जन्मजात गैरबराबरी को चुनौती देने लगते हैं कबीर की तरह बनने लगते हैं। पुरुषोत्तम अग्रवाल ने अपनी किताब में एक सवाल किया है कि वो कौन सी सामाजिक आर्थिक प्रक्रियाएं थीं जो ब्राह्मणों के तथाकथित शाश्वत वर्चस्व को तोड़ते हुए कबीर को हीरो बनाती थीं। मेरा सवाल है कि वो कौन सी सामाजिक आर्थिक प्रक्रियाएं हैं जो कबीर को शाश्वत बनाती हैं।

जात जुलाहा मति का धीर। वो अपनी सामाजिक हैसियत पर व्यंग्य करते हैं मगर हैसियत पाने की चाहत भी नहीं रखते। एक सामान्य की रचना करते हैं। आज के समय में जब गैरबराबरी के नए-नए ढांचे बन गए हैं कबीर अपने व्यंग्यों के पुराने हथियारों से ही लड़ने में सक्षम बनाते हैं। विद्वान कबीर को जितना ही अजूबा बना लें मगर आम लोगों के बीच कबीर आज भी सहज हैं। इसीलिए हर बागी हर सादा आदमी कबीर-फकीर से तुलना पाता है। कबीर के लिए सब दोस्त हैं। कहत कबीर सुनो भाई साधो। वे सभी जातियों के पाखंड से टकराते हैं। पुरुषोत्तम अग्रवाल कहते हैं कि कबीर ने पंद्रहवी सदी में मानवाधिकार की बात की। इस धारणा को ग़लत साबित किया कि मानवाधिकार का विकास यूरोप से बाहर हुआ ही नहीं।



कबीर कौन है? कबीर एक मानस है। आज के उदारीकरण के दौर में कई बाज़ारू लोग जीवन,आत्मसम्मान और मुक्ति का मार्ग बताने के विशेषज्ञ बने घूमते हैं। उनके पास हर परिस्थितियों के फार्मूले तैयार हैं। वो स्लोगन बेचते हैं। इन्हें मोटिवेशनल स्पीकर कहते हैं। जिन्हें आप हिन्दी में प्रेरक-वाचक कह सकते हैं। जैसे ही आप कबीर को पढ़ना शुरू करते हैं आपको जीवन जीने के मुफ्त में कई फार्मूले मिल जाते हैं। समाज को समझने का नज़रिया तो मिलता ही है,उससे लड़ने का हथियार भी। आज पेशेवर दफ्तरों में एक किस्म का सामंती ढांचा खड़ा किया जा रहा है। जहां आदमी का सबसे ज़्यादा वक्त गुज़रता है। यहां हैसियत के इतने पायदान हैं कि नीचे खड़ा हर व्यक्ति जब तक कबीरबोध का पालन नहीं करता वो अपने आप को संभाल नहीं पाता है। मगर इसे कारोबार में बदलने के लिए प्रेरक-वाचक आपको सकारात्मक सोच के बहाने समझौतावादी बनाने की चतुराई सीखाते हैं। कबीर चतुर नहीं बनाते। बागी बनाते हैं। एक ऐसा बागी जो अपने समय और समाज की बारीक समझ रखता है और विकल्प पेश करता है।

पुरुषोत्तम अग्रवाल कबीर को पश्चिमी आधुनिकता के बरक्स देशज आधुनिकता के सबसे बड़े प्रतीक के रूप में देखते हैं। कहते हैं कि कबीर अपने विचारों में कॉस्मोपोलिटन थे। इस बेहतरीन किताब को पढ़ने से पहले अपने आस पास के समाज को ठीक से देखिये और फिर उनके बीच बनते-बिगड़ते कबीर को खोजने की कोशिश कीजिए। आज हमारे ज्यादातर रिश्ते व्यापारिक आर्थिक गतिविधियों से तय हो रहे हैं। जाति संबंधों में जड़ता है तो दूसरी तरफ बदलाव भी है। व्यापार पर जाति का वर्चस्व टूट रहा है। हम कपड़ों की तरह शहर बदल रहे हैं। हर दिन आधुनिकता बदल रही है। आधुनिकता पहले से कहीं अस्थायी हो गई है। मार्डन होना अब फैशन नहीं रहा। जीवन को समृद्ध करने वाले मुहावरे,तंज और किंवदंतियां खत्म हो रहे हैं। हमारी मानसिकता शहरी या कस्बाई नहीं बल्कि अपार्टमेंटी और दफ्तरी होने लगी है। फ्लैट और दफ्तर के बीच पड़ने वाले शहर को भी ठीक से नहीं जानते। नई पहचान बन रही है तो ऐसे में आधुनिकता को नए सिरे से पहचानने के लिए सबसे बड़ा सहारा कौन हो सकता है? कबीर?

सवाल यह है कि क्या हमें कबीर चाहिए? एक ऐसा कबीर जो शाश्वत कबीर की तरह हिन्दू मुसलमान के खांचे में फिट न किया जा सके। जो माया और जात के खिलाफ खड़ा हो। जो खापों पर तंज करता हो और संसद की सर्वोच्चता के जड़वत सिद्धांत पर सवाल खड़े करता हो। संसद की सर्वोच्चता अगर शिथिलता का रूप ले ले और सिर्फ बहिष्कार और बहिर्गमन का मंच बन कर रह जाए तो समाज के कबीर क्या करें? क्या उस सिविल सोसायटी की तरफ मुड़े जिसका निर्माण कबीर ने अपने समय में किया था। पुरुषोत्तम अग्रवाल जिसे लोकवृत्त कहते हैं। लोकवृत्त और सिविल सोसायटी की तुलना नहीं की जा सकती मगर कबीर के होने और उनकी ज़रूरत पर किसे संदेह हो सकता है। आज की आधुनिकता अब कई मायनों में भ्रामक लगने लगी है। इसकी सही पहचान और छानबीन के लिए कबीर को फिर से खोजना होगा। क्या यह कम बड़ी बात नहीं कि कबीर को लोग उनकी रचनावलियों को याद रखने से नहीं जानते, संकट के समय बग़ावत के मिज़ाज से ज्यादा जानते हैं। कबीर ने देशज आधुनिकता को गढ़ा तो क्या आज की सेंसेक्स आधुनिकता में कबीर के लिए कोई गुज़ाइश बची है? ज़रूर बची है तभी कबीर हर तरफ दिखाई पड़ जाते हैं। शायद इसीलिए भी कि बाज़ारू ज़ुबान में भी निष्पक्ष बगावत का कबीर से बड़ा कोई ब्रांड नहीं है। जिस बाज़ार को कबीर माया महाठगिनी कहते हैं।
(कबीर पर लिखने की हिम्मत कर बैठा। कुछ मूर्खतापूर्ण बातें कह गया तो माफ कीजिएगा। सचमुच कम जानता हूं कबीर के बारे में। यह लेख आज राजस्थान पत्रिका में छपा है)

21 comments:

बाबुषा said...

कबीरा खड़ा बाज़ार में लिए लुकाठी हाथ
जो घर बारे आपणा, वो चले हमारे साथ !

इसके बाद बचता ही क्या है बोलने के लिए...हाँ ये बगावती आदमी अभी कई सदियों तक सर चढ़ के बोलेगा.

Anupam Singh said...

Aaj ke saare Prerak-Vaachak bhi kahin na kahin Kabir se prerit rahe hain.

अनुपम दीक्षित said...

दरअसल कबीर यही विशेषता उन्हें सर्वमान्य और कलजयी बनती है की वे हैसियत पर व्यंग्य करते हैं पर हैसियत पाने की आकांक्षा नहीं रखते। उनकी निष्काम आलोचना ही उनकी विश्वसनीयता का कारण है। आज के बाबाओं को और सत्याग्रहियों को उनसे स्जिक्षा लेनी चाहिए। यही बात मायावती और कांशीराम को बस एक राजनीतिज्ञ ही बनती है बहुजन का हीरो नहीं की वे हैसियत पर वार भी करते है और हैसियत पाना भी चाहते हैं

Rangnath Singh said...

मैं तो यह ही नहीं समझ पाया कि आपके लेख का 'आम आदमी' कौन है ?

Rahul Singh said...

पुरषोत्‍तम जी ने पिछले महीनों में रायपुर के दो व्‍याख्‍यानों में, जिसमें एक अकथ कहानी... पर ही था, इसे अच्‍छी तरह उकेरा था.

प्रवीण पाण्डेय said...

सबको ढंग से रगड़ा है कबिरा ने, मीडिया और साहित्य के लिये कुछ सीखने योग्य।

सतीश पंचम said...

कबीर की एक साखी तो रवीश कुमार के लिये भी है :)


ये रहा लिंक

एनडीटीवी के रवीश कुमार की रिपोर्टिंग v / s मदिर-मीडिया फैसले

http://safedghar.blogspot.com/2011/06/v-s_12.html

लीना मल्होत्रा said...

kabir jan jan me samaye hain. kabir sangharshon aur tanavo ko door bhagane ki ramban aushdhi hain. unhe sadhna dhyan ko sadhna hai.

विजय प्रकाश सिंह said...

रवीश जी, पहले तो आपको बधाई , आप को चैनल ने प्राइम टाइम स्लोट में समाचार का पढने और एंकरिंग का मौक़ा दिया है , पहले अभिज्ञान प्रकाश के साथ और अब अकेले , आशा है कि इस नए रूप में आप अपनी फैन संख्या खूब बढ़ा पायेगे | वैसे मुझे पता है कि आप को पावडर स्नो लगाना नहीं भा रहा , पर बधाई स्वीकार कीजिए ( देरी के लिए क्षमा सहित )|

कबीर पर डॉ बच्चन की एक बात जो कहीं पढ़ा था जरूर कहना चाहूँगा , उन्होंने कहा था कि मै अपने को तभी सफल मानूंगा जब मेरा गीत कोई फ़कीर गाता हुआ गलियों में घूमता होगा जैसे कबीर का | यही कबीर की खासियत है , आज भी पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के गावों में जोगी अपनी सारंगी बजाता कबीर को गाता घूमता है और भिक्षाटन करता है | बहुत सारे गीत हमने बचपन में तभी सुने थे |

कबीर , रहीम, सूर और तुलसी हिन्दी भाषी क्षेत्र के आम जन की आत्मा का प्रतिनिधित्व करते हैं इसी लिए कालजयी हैं |

JC said...

कबीर मानव जीवन के नाटक के एक ऐसे पात्र थे (निर्गुण ब्रह्म के प्रतिरूप अथवा प्रतिबिम्ब) जो अधिकतर व्यक्तियों के सर और पूँछ, यानी सिक्के के दो ही चेहरे (बुरा-भला) देखने के आदि हो जाते हैं..."चलती चक्की देख के दिया कबीरा रोय / दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय" कह उनकी आँख खोलने के लिए कि सर और पूँछ के बीच में धड भी होता है, (जिसे गौतम बुद्ध ने 'मध्य मार्ग' कहा ?)...

Vijai Mathur said...

आपका लेख बिलकुल सही विचार प्रस्तुत कर रहा है.कुछ लोग अतीत में संत कबीर की खूब खिल्ली उदा चुके हैं.दरअसल कबीर ने जनता को जाग्रत करने का काम किया था और आज भी जनता को जाग्रत करने की जरूरत है क्योंकि तमाम प्रगतिशीश्लता के जनता उनके समय से ज्यादा दकियानूसी बातो में ढोंगियों द्वारा उलझा दी गयी है.

ana said...

vicharniya prastuti

डॉ. अमिता नीरव said...

रवीश जी, मेरी नजर में कबीर को जानने की नहीं, जीने की जरूरत है... :)

आलोक said...

'अकथ कहानी प्रेम की' पुस्तक सचमुच कबीर के माध्यम से आधुनिकता के भारतीय स्वरुप पर पुनर्विचार का आह्वान करती है | रवीश जी कबीर दलित पीड़ित लोक के पक्ष में, उनके प्रतिनिधि के रूप में खड़े हुए थे | अन्याय का प्रतिरोध जब भी होगा कबीर की मशाल भभक उठेगी .....कल भी ...आज भी...और कल भी..

Mahendra Singh said...

Dr Amita kee baat se 100% sahmat hoon.

MANISH UNIYAL said...
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MANISH UNIYAL said...

mere khyaal me logon ko babaon ke paas jane ke bajay kabir ke dohe padhne chahiye aur use jeeven me utarna hoga....lekin kisi baba ka bhakt kahlana status symbol jaisa ho gaya hai....

kamlakar mishra smriti sansthan india said...

"pothi padh kar jag muwa pandit bhaya na koi dhai akhar prem ka padhe se pandit hoy" yah baat 15vi shatabdi mein kahna kitna kathin hoga kabir se shekha jay jaroot hai aaj ki.............dhanyabad apko kabir ko yaad dilane ke liy......maan ko shanti milte hai......kabir ko padh kar sun kar yaad kar....aur sambah ho to appna kar

kam1 said...

Main Anumpam Dixit se kahin had tak sahmat hoon parantu, hume yeh bhi yaad rakhna chahiye ki rajneetic samasya ka samadhan bagawati tareeke se nahi kiya ja sakta. Mujhe lagta hai ki Kanshi Raam aur Mayawati ka rajenaitic tareek ak bahut has tak thik hai. Iske alawa unke paas vikalp hi kya hai. Haisiyat nahi ho to control kaise karenge. Kyuon ki jinka ve saamna kar rahe hain voh hasiyat waale hain.

saurabh kanaujia said...

KABIR NE SAMAJIK JEEVAN KO JEETE BHOGTE HUE JIS AKKHARPAN K SAATH APNI BAAT KO SAMAJ K SAMNE RAKKHA WAHI KABIR KI KHASIYAT HAI..../

Bani Pandey said...

Kuch hi shabdon main Kabir bahut kuch keh jaate the!