क्यों कॉमर्स का कट ऑफ ज़्यादा होता है?

क्या यह सही है कि कॉमर्स एक विधा नहीं है? एकेडमिक डिसिप्लिन। सांख्यिकी,अर्थशास्त्र और गणित जैसे कई विषयों को मिला कर वाणिज्य विषय को गढ़ा गया है। इस पर आपके पास जानकारी हो तो ज़रूर शेयर करें लेकिन कुछ लोगों से बात करने पर यही पता चला कि बाहर के मुल्कों में भी ऑनर्स कोर्स में कॉमर्स नाम का विषय नहीं होता है। अगर यह जानकारी ग़लत पाई गई तो मैं अपने लेख में संशोधन कर लूंगा। बहरहाल इस बात पर विचार करना चाहिए कि कॉमर्स के लिए इतनी मारा मारी क्यों हैं?

दिल्ली विश्वविद्लाय में कॉमर्स में दाखिला लेने के लिए कामर्स विषय वालों को प्राथमिकता दी जाती है। उन्हें सीट मिले इसलिए दूसरे विषय यानी साइंस से जब कोई बच्चा कॉमर्स में आता है तो उसे हतोत्साहित करने के लिए अधिक नंबर मांगे जाते हैं ताकि कॉमर्स वालों को पहले एडमिशन मिल जाए। इसी तरह से जब कॉमर्स के बच्चे दूसरे विषयों में दाखिला लेने जाते हैं तो उनके नंबर में दो से तीन परसेंट की कमी कर दी जाती है ताकि उन्हें इतिहास,गणित या अन्य विषयों में आने से रोक सकें। इसके पीछे सोच यही है कि कॉमर्स पढ़ने वालों की ट्रेनिंग अकादमिक नहीं होती। वे इतिहास या राजनीति शास्त्र में आकर अच्छा नहीं कर पाते हैं क्योंकि उन्हें लंबे-लंबे लेख पढ़ने का अभ्यास नहीं होता। दिलचस्पी बनने में काफी वक्त लग जाता है। अपवाद के तौर पर कुछ ही बच्चे कॉमर्स से इतिहास या समाजशास्त्र में आकर बेहतर कर पाते हैं। इसीलिए कॉमर्स कॉलेजों की ज़िम्मेदारी हो जाती है कि वे पहले अपने विषय के बच्चों का दाखिला करें। इसीलिए एसआरसीसी और एलएसआर में कटऑफ ज़्यादा होता है। कॉमर्स के अच्छे कॉलेज कम है और रोज़गारपरक बाज़ारू शिक्षा के नाम पर कम पढ़ने लिखने वाले छात्रों की तादाद ज्यादा। ऐसा विषय हो जो नौकरी भी दे और थोड़ा-थोड़ा सारे विषयों को पढ़ने का अवसर भी दे दे। कॉमर्स से अच्छा कोई विकल्प नहीं है। बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन, मैनेजमेंट और बैंकों की नौकरियों में कामर्स काफी उपयोगी विषय हो गया है।

अब रही बात कि इस साल सौ परसेंट वाला कट ऑफ क्यों गया? वो इसलिए कि सिब्बल साहब और वाइस चांसलर साहब दिल्ली विश्वविद्यालय को कबाड़ करने के अभियान में लगे हुए हैं। सेमेस्टर सिस्टम के अलावा इस बार दाखिले की प्रक्रिया में बदलाव हुआ। पहले क्या होता था? पहले बच्चे फार्म भरते थे। हालांकि इसे लेकर कॉलेज दुकानदारी करने लगे थे। खैर फार्म भरने के बाद अमुक विभाग को अंदाज़ा हो जाता था कि पहले लिस्ट में कितने बच्चों को आने दिया जाए। इस बार यह व्यवस्था खत्म कर दी गई। यह कहा गया कि जो भी कट ऑफ निकलेगा उसमें आने वाले सभी बच्चों को दाखिला देना पड़ेगा। अगर चालीस सीट है और कट ऑफ के बाद सौ बच्चे आ गए तो सौ के सौ को दाखिला देना होगा। अब यहां सुविधाओं और टीचर-छात्र के अनुपात का सवाल गया चूल्हे में। तो किसी भी कॉलेज को इस बार पहले से मालूम नहीं था कि अमुक विषय में कितने कट ऑफ वाले बच्चों ने अप्लाई किया है। इसलिए उन्होंने कट ऑफ को इतना ज्यादा कर दिया कि पहले लिस्ट में उन्हें अंदाज़ा हो सके। सिर्फ इसकी वजह से बच्चों को परेशानियां झेलनी पड़ गईं।

पढ़ाई माइग्रेशन का दूसरा बड़ा कारण है। देश भर के कॉलेज कबाड़ हो गए हैं। अगर नहीं भी हैं तो उन्हें अच्छे विद्यार्थी कबाड़ ही समझने लगे हैं। दिल्ली में पढ़ने के साथ प्रतिष्ठा का भी भाव जुड़ा होता है। राज्यों ज़िलों के कॉलेजों में कुछ अच्छे और प्रयत्नशील शिक्षकों को छोड़ दें तो बाकी सब राम भरोसे आते हैं और राम भरोसे चले जाते हैं। हम इस विषय को लेकर परेशान इसलिए नहीं होते कि फायदा नहीं। उससे पहले ट्रेन का टिकट कटा लेते हैं। मैं भी इसी सिस्टम के तहत रातों रात अपने कमरे से उजाड़ कर दिल्ली भेज दिया गया। राज्यों के अच्छे कालेजों के कट ऑफ पता कर रहा था। कहीं भी सत्तर अस्सी फीसदी से ज्यादा नंबर नहीं जाता। उनके ख़राब कालेजों में औसत विद्यार्थियों की भरमार है। ९८ परसेंट वाले इन कॉलेजों को किसी लायक नहीं समझते। यह चिन्ताजनक हालात है। कपिल सिब्बल दिल्ली के दो कालेज के कट ऑफ पर बयान तो दे देते हैं मगर बाकी कालेजों के लिए वक्त नहीं। पता कीजिए देश का मानव संसाधन मंत्री पिछले कुछ सालों में कितने केंद्रीय विश्वविद्यालयों के दौरे पर गया है। उनके कामकाज की समीक्षा की है। वकील हो जाने से हर मुकदमे के जीत लेने की गारंटी नहीं मिल जाती। दलील बर्तन बजाने से नहीं बजती, उसके आधार भी होने चाहिएं।

19 comments:

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

बहुत सही बात कही है सर आपने
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आपकी किसी पोस्ट की हलचल यहाँ भी है-
नयी-पुरानी हलचल

Anupam Singh said...

भारत की अराजकता का सबब ही ये है कि यहाँ उच्च शिक्षा को रेगुलेट करने वाले लोग ही फर्जी दलीलबाज़ी और वकालत छांटने में ज्यादा और तर्कसंगत क्रिया कलापों में कम रहते हैं.
देखें देश कहाँ जाता है इस आधार विहीन उच्च शिक्षा को सर पे ढोते हुए.

विजय प्रकाश सिंह said...

Right, balanced & to the point post. The kind of marks CBSE is giving & %age of Marks increasing , we may reach a time in few years where even all students with an aggregate of 100%may not get admission.

It is high time we look forward to some alternate system for admission.

amitesh said...

सवाल काफ़ी अच्छा उठाया है आपने. लेकिन मुझे लगता है कि अनुशासन बदलने के लिये जो नंबर कम या बढ़़आये जाते हैं उसके पीछे का तर्क यह होगा कि आमतौर पर विग्यान और कामर्स में कला विषयों से अधिक नंबर आते हैं..अतं विग्यान वालो का कामर्स के लिये और इन दोनों का कला के लिये नंबए माडरेट कर दिया जाता है ताकि कला के च\छात्रों को इन दो अनुशासनोम की वज़ह से और कामर्स के छात्रोम को विग्यान की वज़ह से नुकसान ना हो...

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

बहुत सही विश्लेषण .....

प्रवीण पाण्डेय said...

बाजार में मांग अधिक होगी तो दाम बढ़ जायेगा।

Ankit mutreja said...

Dear sir,
Muje pata hai shyad apke pass mere iss lambey bhasan ko padhne ka samay na ho par sir yeh sawal janta apke fan sab jan na chatey hai.
ap aawaz hai humari ho sakey toh ek bar woi ravish ki report wali aawaz banke humare swalo ko samadhan karey ?
Main mass comm and journalism ka vidhyarti hu. halaki meri siruvat h abhi iss course ke lie.lekin mere lie media ka asli chera Ravish Kumar hai.!! sir jab mei sangam vihar ki galio se Guzarta hu toh mere zehen mei apki kahi ek line aati hai...shaukey deedar hai agar toh nazar paida kar aur mei karta bi hu.. ek soch mei dub jata hu jiske anek pehlu hai.!!
sir.. lekin jab main aam logo se ek media aadmi ke barey mei baat karta hu toh apke vishey mei wo sab mujse aur mei khud apne aap se ek sawal karta hu..
ki aakhir RAVISH KI REPORT NDTV show mei kuch naya kyu nahi aa raha.?
kya apke jaisi shaksiyat ko bhi sarkari taktey daba deti hai ?
kya ndtv channel jo ki ek private firm se belong karta hai kya wo sarkari takto ke agey kahi na kahi jhuk jata hai ?
Mein sawal apke lie nahi utha raha kyuki ap mere guru hai.. mein sawal iss visey mei utha raha hu ki kya haqiqat mei kahi na kahi jakey sarkari taktey media jaisi takat ko nicha kar deti hai.?
sir jab mei iss vishey mei sochta hu toh ek jagruk nagrik honey ke prati mei kafi chintit honey lagta hu. mei apki wo line ni bhul sakta jisme apne kaha tha kya yehi vikas hai p.m sahab
Sir muje pata hai ap ek kitab ke wo lekh hai jo sadiyo tak kisi shyar,kavi,patrkar ke zehen mei apni pechan chor jaye.!!

Ankit mutreja said...

sir
Aapne blog kasba mei likha hai ke blog ke comentbaaz apke ghar ke sadsye hai toh kya un sadyo ko unke sawal ke jawab jan paney ka haq nahi hai ? ap jaise ideal humari soch mei parivartan la rahe hai parantu kuch duvidao ko door karne mei bi aap aawal darjey se sarthak aur kamiyab rahenge..

अनुपम दीक्षित said...

देखिये साहब कटऔफ़ का खौफ तो उन्हें सताता है जो शहरों में पढ़े हैं या बड़े अङ्ग्रेज़ी स्कूलों में। जिन्हें इस शिक्षा व्यवस्था और सामाजिक मानसिकता ने पहले CUT OFF कर दिया है उनके लिए तो इस देश के नीति निर्माताओं (यहाँ पढ़िये आईएएस बाबू) के पास कोई सोच ही नहीं है। सब सावन के अंधे हैं और केवल डीयू जेएनयू और कुछ और यू के लिए व्यवस्थाएँ कर के इतिश्री हो जाती है इनकी। इनकी सोच तो बहादुर शाह जफर के साम्राज्य से भी छोटी है हमारे विश्वविद्यालय तो हर वर्ष लाखों बेरोजगारों को उगल देते हैं। इनके पास ऐसी फालतू डिग्रियाँ होती हैं जिनका रोजगार के बाज़ार में कोई भाव नहीं होता। बीए, एमए, बी एस सी, एम एस सी, पी एह डी सब बेकार। आईआईटी की दुर्दशा पर शब्द युद्ध करने वाले ज़रा मेरठ,आगरा, बनारस, इलाहाबाद, लखनऊ, झांसी और किसी भी विश्वविद्यालय की दशा पर विचार करने से भी काँपते है। इनके पास तो बस एक ही उपाय है सभी विश्वविद्यालयों को आईआईटी का नाम दे दो बस।

भारत के किसी विश्वविद्यालय में ईटा डैम नहीं है आज की वह कोई रिसर्च करने का दावा करे। रिसर्च के लिए जो मौलिक सोच चाहिए वह हमारे विद्यार्थियों में है ही नहीं। यहाँ तो शुरू से ही बच्चे को महा रट्टू बनाने पर पूरा ज़ोर दिया जाता है। में छोटे बच्चों के साथ ही काम करता हूँ और यह देख कर कोफ्त होती है की स्कूल में उन्हें एक लकीर पर ही चलना सिखाया जाता है। हर बात से पहले वे दस बार पूछते हैं सर आसमान में कौनसा कलर करें? हद है - एक 9 साल के बच्चे को अगर आसमान का रंग भी पूछ कर भरना हो तो वह देश कैसे हिम्मत करेगा नयी रिसर्च की। और रही बाटा एलएसआर और एसआरसीसी के कटौफ की तो यहाँ मारा मारी इसलिए है की ये नौकरी की गारंटी हैं और नंबरों पर आधारित व्यवस्था आपके रटने की क्षमता, आदेशों का पालन करने की (शब्दशः) आदत, मेहनत कर पाने की क्षमता का आकलन करती है। 98% का मतलब है आप इन सब में अच्छे है और कंपनी या सरकार जहां भी जाएंगे वहाँ अपनी मौलिक सोच से उन्हें परेशानी में नहीं डालेंगे और चुपचाप गार्डन डाले मोटी तनख्वाह लेते रहेंगे। अजी क्या रखा है रिसर्चमें । इन्हीं कटोफ वालों की फार्म भरने में मदद करने को हेल्प डेस्क खोली जाती हैं - क्यूंकी यह 99% रटने वाले कुछ भी करने से पहले टीचर से पूछने में भलाई समझते हैं।

घनश्याम मौर्य said...

सिब्‍बल साहब शिक्षा के क्षेत्र में नये नये प्रयोग कर रहे हैं। पहले बी0एड0 डिग्री धारकों के लिए टीईटी का प्राविधान और अब यह कट ऑफ वाला नया बखेड़ा। न जाने कौन सी शिक्षा प्रणाली लागू करना चाहते हैं।

JC said...

"प्रकृति परिवर्तनशील है".. 'भारत कृषि प्रधान देश है', पढने लिखने में भारतीयों को आवश्यकता ही नहीं थी पढ़े-लिखों की... अंग्रेजी सरकार को अपना काम निकालने के लिए 'बाबू' चाहिए थे, सो उन्होंने जवान लोगों को पढ़ा-लिखा बनाने हेतु स्कूल चलाये, और हमारे बाबूजी जैसे लोग मैट्रिक पास कर एक स्कूल लीविंग सर्टिफिकेट ले सरकारी बाबू बन गए और धीरे धीरे सीढ़ी चढ़ते चले गए... इसे शायद काल का प्रभाव ही कहेंगे की उस ज़माने में एक आम परिवार में ५-६ या उससे अधिक बच्चे होते हुए भी बच्चे अच्छा पढ़ लिख गए... किन्तु इस परिवर्तनशील प्रकृति में मानव व्यवस्था वर्तमान में हमारे देश की आवश्यकता से अधिक फलती फूलती जन-संख्या का ध्यान रखने में असमर्थ प्रतीत होने लगी है... जिसके मूल में कारण है पैसा, यानी उसके लिए चूहा दौड़ - एक ज़माना था जब हर कोई इन्जीनियर, डोक्टर, वकील बनना चाहता था, किन्तु वे तालाब पूरे भर गए... अब वाणिज्य ही अच्छे पैसे दिला सकता है... किन्तु समय निकट ही प्रतीत होता है जब यह तालाब भी पूरा भर जाएगा और तब शायद प्रलय छा जायेगा जैसा प्रकृति भी संकेत देना आरंभ कर दी है ?

Ankit mutreja said...

:(

ashish chouksey said...

mujhe pata hai yeh sahi thread nahi hai is baat ke liye, per main janna chahunga ki Ravish ki Report ko kyun band kiya gaya, agar ye temporarily hai to theek hai otherwise please ho sake to us program ko fir se shuru karwaiye.

Nirala said...

Ravish jee, Jab hum babul ka per ropte hai to aam ki umeed hi bekar hai. Kapil Sibbal kys chiz hai hum jante hai or aap to or ache se jante hai. Rahi sikasha ki to mid-day - meal de dene se school behater nahi ho jata na hi Quality sikasha ki gurantee hai. Ha koi maa ka lal yadi is desh me common education for all and common health for all lago kar de to baat ban sakati hai.

Mahendra Singh said...

Bahoot khoob

Ankit mutreja said...

sir.. muje yeh jankar kafi khusi hui ke apka show wapas aa raha hai :)
ji ha.. sir ke jitne bi chane wale hai fan's hai.. ab phir se ek bar tyar rahe dhekne ko.. Ravish ki Report jo bdhati hai hindustan ki growth .. :)
congrat's sir.. mubarak ho

Ankit mutreja said...

:(

Ankit mutreja said...

sir.. Maaf kijiyega jisse mei Ravish ki Report samj baitha tha wo toh prime time ka vigyapan tha.
Maine show ki script nai ravish sir se umeedey rakhi thi aur rakhunga islie mei prime time bi dhekunga.
muje aksar yeh fan naam kafi hadh tak bevakufi bhara lagta tha jab mei news mei kuch jyda badhey fans ke barey mei sunta yeh dhekta tha.
mei aksar sochta tha ki yeh junoon bewakufi ke siva kuch ni hai jab mei khud iss chiz se guzra tab muje samaj aya yeh bewakufi ke siva aur bahut kuch hai..

Ankit mutreja said...
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