भंडारे का समाजशास्त्र



इस नोटिस को ठीक से पढ़िये। मेरी सोसायटी के लिफ्ट के पास सटा था। इसमें लिखा कि निवासी और मेहमान से अनुरोध है कि आप सभी गेट से बाहर लगे भंडारे तक आए और माता का प्रसाद ग्रहण करें। भवदीय अर्थात निवेदक के नाम की जगह फ्लैट का नंबर 301-B लिखा है। पूजा कब हुई और भंडारा क्यों आयोजित हुआ इसका विवरण नहीं है। गेट तक आया तो भंडारे के बाहर पूड़ी,सब्ज़ी और सूज़ी का हलवा खाने के लिए अच्छी खासी भीड़ थी। आयोजक के संयोजक से बात की तो पता चला कि जनाब खुद बिहार में चुनाव लड़ने गए हैं। व्यस्तता के कारण नवरात्रा में भंडारा नहीं करा सके थे। अब करा रहे हैं। सुबह से पंद्रह सौ लोग खा चुके हैं। कोई दस से पंद्रह हज़ार के बीच अनुमानित खर्च बताया।

भोज खाना और खिलाना सभी समाजों का पारंपरिक हिस्सा रहा है। एक ज़माने में लोग शान बघारते थे कि हमारे यहां के भोज में तीन दिन तक लोग खाते ही रहे। मगर लिफ्ट के बाहर नोटिस और गेट पर भंडारा कुछ और कह रहा है। हम सब जीवन में चाहे जितने भी सफल हों लेकिन सामाजिक आयोजनों के लिए लोगों की कमी हो रही है। पता ही नहीं होता किस को बुलाए या फिर बुलाएं भी तो आएगा या नहीं। यह भी नहीं कि इंटरकॉम से फोन कर या फिर खुद मिल कर आग्रह करें कि भाई भंडारा लगवा रहा हूं आइयेगा। हमें भरोसा ही नहीं है कि जब पूरे साल मिले नहीं तो भंडारे के लिए कैसे बुलायें। आदमी आदमी से दूर तो नहीं रह सकता इसलिए अच्छा है कि वह गेट के बाहर खुला भोज का आयोजन कर रहा है। उसका एकाकीपन बता रहा है कि अब पारंपरिक सामाजिक संस्कारों में उसका आत्मविश्वास कम हो गया है। एक तरह से अच्छा है कि हाउसिंग सोसायटियों के बाहर के दुकानदारों,रिक्शावालों,चायवालों,कपड़ा प्रेसवालों और बच्चों को अच्छा खाना मिल जाता है। भंडारे के वही उपभोक्ता हैं।

16 comments:

ajit gupta said...

भारत में भोजन कराना बड़ा पुण्‍य का कार्य समझा जाता है तो भंडारे का चलन तो सफल ही रहता है।

डॉ टी एस दराल said...

अक्सर भंडारे में खाने वाले प्रसाद नहीं , खाना खा रहे होते हैं ।
यहाँ इस तरह खाने वालों की कमी नहीं । इसलिए भंडारे सफल रहते हैं ।

Anand Rathore said...

gaon mein angya de kar bhoj , ke liye bulaya jaata tha..aaj bhi aisa ho raha hai..lekin dheere dheere ..vahan bhi kam ho raha hai, jab se card chapne lag gaye hain..chahe vahan ho ya yahan.. hum bahut bade samajik badlaw ke daur se guzar rahe hain..jise savedanshil man dekhta hai to use ehsaas hota hai, ki kya se kya ho gaye .....

Neeraj Rohilla said...

Beautiful handwriting. I am so glad that someone wrote it by hand rather than sticking a print out.

It is so rare these days to see any handwritten notice.

Thanks,
Neeraj

केवल राम said...

हमारे देश में इस समय पारंपरिक उत्सवों की तरफ लोगों का ध्यान कम ही जा रहा है , अगर कहीं इस दिशा में कदम बढ़ाये भी जाते हैं मात्र ओपचारिकता के सिवा कुछ भी नहीं ..आप हमेशा ऐसे विषयों को उठाते हैं जिनकी तरफ आम व्यक्ति भी ध्यान नहीं देता ...सोचने पर मजबूर करती पोस्ट ..शुभकामनायें

प्रवीण पाण्डेय said...

नाम देखकर बुलाना तो पार्टी हो गयी। भंडारा का समाजशास्त्र तो सर्वजन हिताय है।

Dhirendra Giri said...
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Dhirendra Giri said...

रविश सर प्रणाम
भोजन कराना तो समाज में पुण्य का काम माना ही गया है ....पर शायद इसके पीछे तृप्ति का गणित छुपा है ...भोज भंडारा करा कर भूखो ज़रूरतमंदो को तृप्त करो तो भगवान् तुम्हे तृप्त करेगा ....वैसे लिफ्ट के पास नोटिस (आमंत्रण )लगाने का आइडिया अच्छा है

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

वैसे भी भंडारे का उद्देश्य तो उन्हीं लोगो तक भोजन पहुँचाने का होना चाहिए जो ज़रूरतमंद हैं....

JC said...

'भारत' किसी समय योगियों, ऋषियों, सिद्धों, आदि का देश रहा है जो 'परम सत्य' निराकार आदि शक्ति को जाने जो काल से परे है: अजन्मा और अनंत परमात्मा कहा जाता है,,, और 'माया' को 'सत्य' जो सूर्य (जिसका सार मानव शरीर में, 'माटी के पुतले' में, पेट में जाना गया) और पृथ्वी (जिसका सार 'तीसरे नेत्र' के स्थान पर जाना गया, और 'आज्ञा चक्र' कहा गया) आदि अन्य ग्रहों के घूमने द्वारा जनित काल के साथ सम्बंधित है और जिसका आभास हमें अपनी पांच मायावी इन्द्रियों के माध्यम से होता है - किसी को कम तो किसी को अधिक,,,और यद्यपि वो सब प्राणियों के भीतर विद्यमान है, किन्तु किसी एक समय किसी-किसी विशेष व्यक्ति में एक छठी इन्द्रिय की उपस्तिथि का एहसास सर्वाधिक होता है, (जिसे आत्मा कहा गया)...

प्राचीन ज्ञानियों द्वारा 'माया' अथवा 'मिथ्या जगत' शब्दों का उपयोग संकेत करता है कि भौतिक संसार/ अनंत ब्रह्माण्ड और उस पर आधारित जीवन वर्तमान ko किसी मायावी फिल्म जगत समान बनावटी समझा गया है,,,
उपरोक्त पृष्ठभूमि को ध्यान में रखे बिना, हम आम व्यक्तियों का मानवी कार्य कलापों, जो प्रकृति द्वारा चालित हैं (ग्रहों के माध्यम से, जैसा ज्ञानियों, प्राचीन खगोलशास्त्रियों ने जाना), और उनमें कमी की चर्चा पर 'गहराई' में जाने का प्रयास करना शायद सही नहीं होगा क्यूंकि वो गंतव्य पर नहीं पहुंचा पायेगा, जैसा 'त्रिशंकु' की कहानी के माध्यम से भी समझाया गया है (अकेले विश्वामित्र मुनि उसे स्वर्ग तक पहुंचा नहीं पाए!)...

anoop joshi said...

isi bahane garib aadmi ko ek din to pet bhar mil jata hai...

susmita panda said...

ravish sir....apne bhandare ka anand uthaya ya nahi????asha hai nahi uthaya hoga...kyunki aise bhandaro me apki society ke log waise bhi kam hi dikhenge...wo to garibon k liye hota hai aur ek bhookha garib hi bhandare k samajshastra ko behtar samajh sakta hai...

सुज्ञ said...

भडारा कोई भी करे, और उसका भोजन लाभ कोई भी ले। एक व्यक्ति के व्यय से यदि लोगों को भोजन प्राप्त होता है तो निश्चित ही पुण्य-कर्म है।

इसी तरह ही संसाधनो का विकेंद्रियकरण तो होता है।

Ek Shehr Hai said...

ye jindgi ka sach he, sunder

Bikash said...

Navratri ki ek raat main or mera ek sahpathi Press se training se aate waqt late ho gye or dekha ki Bhandara ho raha hai. Bas kya that din bhar ki thakan se bachne hetu wahi par Prasad cum Bhojan grahan kar liya.........
Kabhi Kabhi hum jaise Media Students ke bhi kaam ajata hai ye Bhandara.........
Ravish jee bahut accha likha hai.

VARUN GAGNEJA said...

RAVISH JI, BHANDAARE KA SAMAJ SHASTER BAHUT KUCH KEH GAYA. ISE PADH KAR DUSHYANT JI KI KUCH PANKTIYAAN YAAD AA RAHIN HAIN


अब किसी को भी नज़र आती नहीं कोई दरार

घर की हर दीवार पर चिपके हैं इतने इश्तहार


आप बच कर चल सकें ऐसी कोई सूरत नहीं

रहगुज़र घेरे हुए मुर्दे खड़े हैं बेशुमार
SAMAJ TO TUKDON MEIN BANT RAHA HAI. KHAAS KAR BADE SHAHRON MEIN
KAARAN KOI BHI HO MASLA TO TOOTNE KA HI HAI
BEWAFA TUM NA SAHI HUM HI SAHI