अत्यधिक ओबामा

अमेरिका में ओबामा कम हो रहे हैं। भारत में ओबामा अत्यधिक हुए जा रहे हैं। पांच दिनों से ओबामा के बारे में हर आतंरिक जानकारी दी जा रही है। ओबामा और भारत के तथाकथित रिश्ते को लेकर लाखों पन्ने विश्लेषण के छप चुके हैं। सैंकड़ों घंटे न्यूज़ चैनलों की चर्चाओं में विश्लेषण के ढेर उत्पादित हो चुके हैं। दिल्ली में मौजूद सभी विशेषज्ञों ने यथासंभव समीक्षा कर दी है। सोच रहा हूं कि अगर इतना ही विश्लेषण भारतीय विदेश सेवाओं के अफसरों को करना पड़ गया होगा तो उनकी तो गत निकल गई होगी। अंडरवीयर की साइज़ छोड़ हर आतंरिक जानकारी जनरल नॉलेज की किताब की मानिंद छप चुकी है। दिखाई जा चुकी है। कुछ विवादित खबरें भी छपी हैं। ओबामा की यात्रा पर ९०० करोड़ रुपये प्रतिदिन खर्च होंगे। सीएनएन के एंडरसन कूपर ने दो सौ मिलियन ड़ॉलर के मिथ पर कार्यक्रम कर पोल खोल दी है। भारतीय मीडिया की इस जानकारी की खिल्ली उड़ाते हुए कूपर के शो में आए मेहमानों ने काफी मज़ेदार टिप्पणियां की हैं।

एक अध्य्यन किया जाना चाहिए। ओबामा के आने से कितने टन पेपर छपे और कितने घंटे की फुटेज बनी। दस साल बाद कोई दिवाली के बाद के तीन दिनों में हिन्दुस्तान की घटनाओं को खंगालेगा तो उसे ओबामा के अलावा कुछ नहीं मिलेगा। हालांकि आज कुछ स्थानीय चैनलों में हत्या वगैरह की खबरें दिखाईं जा रही थीं। आज के दिन भारत में एक ही घटना घट रही है। ओबामा अवतरित हो रहे हैं। मैं भी एक तटस्थ ब्लॉगर के रूप में इसे दर्ज कर रहा हूं। मीडिया का हर मंच अपने पाठक और दर्शकों को जागरूक तो करेगा ही। उन्हें जानकारी तो देगा ही। कौन रोक सकता है। इसे रोकना असंभव है। इसलिए इस प्रक्रिया पर अपनी टिप्पणी दर्ज कर रहा हूं। यह लेख विरोध टाइप फ्रेमवर्क में नहीं है। मैं खुद कई दिनों से ओबामा साहित्य पढ़ रहा हूं। लोकसभा टीवी पर एक अच्छी चर्चा भी सुनी। लगा कि काफी है। फिर अखबार निकाला तो ओबामा भार से दब गया। आज टीवी पर ओबामा ऐसे आ रहे हैं जैसे फरहान अख्तर की फिल्म में कोई डॉन आ रहा हो। ओबामा के जहाज़ को लेकर ग़ज़ब का रोमांच है। एयरफोर्स वन को काफी प्रमुखता मिली है। इतने वाक्य कहे और लिखे जा चुके हैं कि पार्थसारथी का कहा हुआ सी उदय भास्कर का लगता है और भास्कर का लिखा हुआ ब्रह्मा चेलानी का लगता है। बारीक विश्लेषण बालू की तरह दिमागी छलनी से ससर कर निकल जा रहा है।

एक और बात सामने आई है। दिल्ली अब विशेषज्ञों की सबसे बड़ी मंडी है। कोलकाता,मुंबई और चेन्नई में एक भी आदमी नहीं है(होगा भी तो आमंत्रित नही है) जो टीवी पर आकर अपना नज़रिया रखने लायक समझा गया हो। सारे के सारे दक्षिण दिल्ली के आसपास या कुछ पड़पड़गंज टाइप के इलाकों से उदित हो रहे हैं और स्टुडियो में मुखरित हो रहे हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति को मालूम होगा कि उनका दौरा किसी जगह पर कितनी दुकानें खुलवाता है। जितने दिनों का दौरा उतने दिनों की दुकानें। विशेषज्ञ न होते तो भगवान जाने भारत अमेरिका की दोस्ती का क्या हाल हुआ होता। पता ही नहीं चलता कि कहां समस्या है और कहां समाधान। दिल्ली भारत के राष्ट्रीय विशेषज्ञों की राजधानी बन चुकी है।

भारत जनरल नॉलेज की सालाना किताब का ख्वाब पाल रहा है। सुपरपावर होने का ख्वाब। ये ख्वाब कब और कहां से हमारे नेशनल डिस्कोर्स में आ गया मुझे ज्ञात नहीं है। अज्ञात सूत्रों के मुताबिक भारत के संविधान में भी नहीं लिखा है कि हम भारत के लोग एक दिन मिलकर भारत को सुपरपावर बना देंगे। कुल मिलाकर ऐसा लग रहा है कि जैसे किसी कार्यकर्ता के घर राहुल गांधी खाने चले गए हों और उनके जाने के बाद वो प्रदेश कांग्रेस के दफ्तर में चौड़ा होकर घूम रहा हो कि देखो हमारे रिश्ते बेहतर हो रहे हैं। राहुल जी सुपरपावर हैं तो हम उनके साथ खाकर एडिशनल सुपरपावर तो हो ही गए हैं। उसका दिल तब टूटता है जब सुपरपावर राहुल जी किसी और राज्य के कार्यकर्ता के घर जाकर खा लेते हैं। वैसे इसी बहाने आम दर्शक और पाठक भारत और अमेरिका के हर पहलु का ज्ञाता बन जाएगा। उम्मीद की जानी चाहिए।

ओबामा के दो साल गुजर गए। कर्णप्रिय कथनों के उच्चरण का असर कम हो रहा है। गांधी को अपना आदर्श मानते हैं मगर यह भी कहते हैं कि गांधी जैसे होना मुश्किल है। कैसे होगा। गांधी खादी में थे और आप सूट में हैं। गांधी होते तो एक साधारण विमान से अमेरिका चले जाते और आप भारत आने के लिए विमानों की प्रदर्शनी कराने लगे हैं। गांधी का नाम लेना ओबामा की चालाकी है। अंबेडकर को भी याद कर लेते। जिस लड़ाई के ओबामा प्रतीक हैं उसमें अंबेडकर एक अच्छी मिसाल हो सकते थे। ऐसा करना उनके लिए अच्छा भी होता। मगर गांधी का नाम और उनकी तस्वीर लगाकर ओबामा ने ऐसा कुछ नहीं किया जिससे लगे कि उनकी विचारधारा का एक चेला दुनिया की सबसे ऊंची कुर्सी पर पहुंच गया है। वो उनके जैसा ही कुछ करना चाहता है। ओबामा ने यस वी 'कैन' तो कह दिया लेकिन क्या 'कैन' किया है किसी को मालूम नहीं है। गांधी का नाम लेकर यह आदमी बाज़ार खोज रहा है। किसी को शर्म नहीं आई कि ग्लोबल गांधी को ग्लोबलाइज़ेशन का उपकरण बना दिया। बंदूक और बम का बाज़ार। भारत में। नौकरियां अब राष्ट्रवाद को परिभाषित कर रही हैं। मुल्कों के प्रधान नौकरियों के लिए बिजनेस खोज रहे हैं। पहले राष्ट्र का विस्तार उसकी भौगोलिक सीमाओं से होता था अब नौकरियों की संभावनाओं से हो रहा है। आइये ओबामा का विमान टच डाउन कर गया है। कुर्सी से खड़े हो जाइये और कहिये ज़ोर ज़ोर से,
बाअदब,बामुलाहिज़ा,होशियार...
सारे मुल्कों के मामा आ रहे हैं।
सर झुकाइये,ओबामा आ रहे हैं।

अगले तीन दिनों तक टीवी देखिये, अखबार पढ़िये और लगे हाथ भारत अमेरिका संबंधों पर एक सार्वजनिक कंपटीशन भी करा लिया जाए। देखें कितने लोग टॉप करते हैं। मीडिया में ख़बरोत्सव एक हकीकत है। एक बड़ी ख़बर की तलाश रहती है जिसे उत्सव के पैमाने पर लिखा और दिखाया जा सके। सीएनएन की साइट पर ओबामा की यात्रा को पहली खबर के रूप में लिया गया है। दो और न्यूज़ हैं। मगर बाकी दुनिया की भी ख़बरें हैं। हमारे यहां तो देसी ज़ुबान में ओबामा की खबरों ने पूरे मीडिया स्पेस में छेर दिया है।

14 comments:

honesty project democracy said...

सादगी,त्याग और इंसानियत का सौदा करने वालों का दूसरा नाम ही है बराक ओबामा,मनमोहन सिंह,सोनिया गाँधी ,प्रतिभा पाटिल और नयी पीढ़ी में राहुल गाँधी ......जय हो इन सौदागरों की इसके सिवा कोई चारा भी नहीं छोड़ा है इन सौदागरों ने ........देखे नहीं अभी हाल ही में सोनिया गाँधी ने त्याग और सादगी के मूर्ति महात्मा गाँधी के वर्धा आश्रम का दौरा करने के लिए कितने करोड़ का सौदा किया अपने पार्टी के मंत्रियों और कार्यकर्ताओं के द्वारा .........ऐसे सौदागरों का ही नाम बचेगा गाँधी जी तो सिर्फ बिकेगा...

प्रवीण पाण्डेय said...

घटनाओं को जितना उचित हो, उससे अधिक महत्व देकर नाटकीयता को बढ़ावा दिया जाता है। नाटक के रूप में देखें तो मनोरंजन। महत्व की वेदी पर यह यात्रा तो कोई विज्ञ ही समझ पायेगा।

J M Parakh said...

Obama to ek mohre hain. Asal cheej hai Amriki samrajyavaad, Jiski sewa kiye bina Obama ek din nahin tik sakte. Baki sab baaten hai,baaton ka kya.
Jawarimal Parakh

रवि कुमार, रावतभाटा said...

बाअदब,बामुलाहिज़ा,होशियार...
सारे मुल्कों के मामा आ रहे हैं।
सर झुकाइये,ओबामा आ रहे हैं। ...

तुर्तु..तुतू..तुतू....

JC said...

भारत में दिवाली को सदियों से आदि शक्ति अथवा ऊर्जा को ब्रह्माण्ड में व्याप्त अनंत भौतिक शरीर की जन्मदाता मान पूजा करने वाले, 'बंगाली ', (अमृत शिव और शक्ति यानि सती अथवा 'काली जो शिव के हृदय में निवास करती है', उसको जननी यानि माता के रूप में पूजा करने वाले) 'काली पूजा' कहते आये हैं,,,और भारत में बंगाल में ही दिवाली के पहले (अथवा 'अज्ञान के अँधेरे को ज्ञान के उजाले से मिटाने' के पर्व के रूप में) यद्यपि अन्य उत्तरी भारत के प्रदेशों में जब 'सत्य की असत्य के ऊपर विजय' के रूप में 'दशहरा' मनाया जाता है, 'नवरात्री' के दौरान 'दुर्गा पूजा' धूम-धाम से मनाते आ रहे हैं...
दीपावली की शुभ कामनाएं! कृष्ण ओबामा को भी!

Dhirendra Giri said...

ओबामा दीपावली पर भारत में पटाखे फोड़ने आये है .......हैप्पी दीपावली सर

praksh said...

kaun hai ye obama

JC said...

यह पृथ्वी ही स्वयं दीवाली के पटाखों में 'अनार' समान है, जो लगभग सभी टीवी पर यदाकदा देखते हैं और पहचान सकते हैं जब कहीं ज्वालामुखी विस्फोट होता है (जैसा हाल में आइसलैंड में हुआ और अभी भी इंडोनेशिया में चालू है)...हम भारतवासी वर्तमान में भाग्यवान हैं कि प्रत्यक्ष रूप में यहाँ कोई ज्वालामुखी नहीं है यद्यपि हमें मालूम है कि गर्म और पिघली चट्टानों के हिमालय के नीचे करीब में ही होने के कारण हिमालय के निकटवर्तीय क्षेत्रों में कभी-कभी बड़े-बड़े भूकंप आते रहते हैं,,,जो भारी जान-माल कि हानि के कारण रहे हैं,,,और दक्षिण भारत की भूमि में पाई जाने वाली अनुमानित लगभग साढ़े छह करोड़ वर्ष पहले बनी चट्टानों का स्रोत ज्वालामुखी में ही माना जाता है,,,जो इस प्रकार हिमालयी क्षेत्र से जुड़ा है...अनुमान है कि पृथ्वी ही आरम्भ में आग का गोला थी! यह चमत्कार ही है कि कुछेक लाख वर्षों से इतने विभिन्न प्रकार के सुन्दर-सुन्दर, अस्थायी ही सही, प्राणियों को पाल-पोस रहा है यह बम का गोला! कोई अनुमान कि क्यूँ?

पंकज मिश्रा said...

इतने वाक्य कहे और लिखे जा चुके हैं कि पार्थसारथी का कहा हुआ सी उदय भास्कर का लगता है और भास्कर का लिखा हुआ ब्रह्मा चेलानी का लगता है।
कुछ इसी तरह की स्थिति मेरी भी हो गई है। कभी-कभी लगता है कि ज्यादा अखबार पढऩा और न्यूज देखना भी घातक हो सकता है। दिमाग कनफ्यूजिया जाता है।
दीपावली की देर से शुभकामनाएं स्वीकार करें।

केवल राम said...

मैं इस बात से हमेशा हेरान रहता हूँ कि क्योँ इस तरह कि बातें हमारे मीडिया में कि जाती हैं , जिस मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ माना जाता है , क्या सच में ऐसा है ? खेर ओबामा हो या कोई हमारी मानसिकता हमेशा ऐसी ही रही है ...क्या कहा जा सकता है ....

सम्वेदना के स्वर said...

कुछ भी कहो रवीश भाई!
पट्ठा "बिना पड़े" बोलता जोरदार है..
हमारे प्रधानमंत्री जी कभी इस तरह किसी कालिज में जाकर अपने दिलो दिमाग की बातें युवा वर्ग से नहीं कहते देखे गयें। न ही सोनिया जी...

हम तो कहते हैं कि 2012 में जब ओबामा अमेरिका से फारिग होते हैं उन्हें हमारा प्रधानमंत्री या एन.ए.सी का चेयरमैन बना दो तब देश सुपर पावर भी बन जायेगा और 10% क्या, 20% की जी.डी.पी हो जायेगी!!
चलाओं सर! आप मीडिया वाले ऐसी कोई मुहिम ही चलाओ!!

susmita panda said...

ravish sir....

kya isme kuch naya hai???ye to insani pravarti kam bhartiya pravati jyada lagti hai...to narajgi kis baat kt??

राकेश पाठक said...

एनडीटीवी पर आपका कार्यक्रम देखा अच्छा लगा ओबामा पर दिनभर...

Pammi said...

america starting se hi b...mailer raha hai kyon na Obama visit ko swiss account info se joda jaye jo badte hi ja rahe honge !