डिस्क्लेमर होती ख़बरें- न्यूज़ दनादन-दर्शक टनाटन

डिसक्लेमर की तरह ख़बरें पढ़ी जाने लगी हैं। बीमा विज्ञापन के बाद तेजी से बड़बड़ाने की आवाज़ आती है कि इश्योरेंस इज द सब्जेक्ट टू..टाइप से। जो सुनाई तो देता है समझ नहीं आता। तमाम न्यूज़ चैनलों पर न्यूज़ अब पांचवें गियर में पढ़ा जाने लगा है। बैकग्राउंड म्यूज़िक से ही अहसास हो जाता है कि या तो आप वीडियो पार्लर में कार चला रहे हैं या नोएडा दि्ल्ली एक्सप्रेसवे पर कार भगा रहे हैं। एक्सलेटर जैसी कानफोड़ू आवाज अहसास दिलाती है कि एक खबर खत्म हो कर दूसरी आ गई है। फटाफट,सुपरफास्ट,तेज,स्पीड टाइप के नामों के कवर के नीचे न्यूज उसेन बोल्ट की तरह दौड़ लगा रहा है।

ज़रूर दलील होगी कि लोगों के पास वक्त कम है। उन्हें दफ्तर से लेकर पखाना जाना होता है। इस बीच टीवी भी देखना होता है तो क्यों न दरवाज़े तक पहुंचते पहुंचते पूरी बुलेटिन खत्म कर दी जाए। जल्दी ही ऐसा पत्रकार नौकरी पा जाएगा जो पांच सेकेंड में पांच ख़बरें पढ़ देगा। मीडिया में स्पीड एडिटर का पद बन सकता है। ये सभी न्यूज़ शो लोकप्रिय हैं। टीआरपी के बीस हज़ार बक्सा परिवार में सराहे जा रहे हैं। वर्ना टीआरपी से निकले आइडिया उत्पादक ऐसे शो को पांच मिनट में गाड़ कर देते। लेकिन न्यूज दनादन के इस काल में खबरें चटपटी के साथ झटपटी होती जा रही हैं।

मालूम नहीं किस डाक्टर ने बताया कि दर्शक पांच मिनट में एक खबर को नहीं समझ सकता। उसके पास वक्त कम है इसलिए पांच मिनट में पचास ख़बरें परोस दो। वो भकोस लेगा। जब पांच मिनट में एक खबर के लिए टाइम नहीं तो किसने किसके कान में जाकर नापा है कि पांच मिनट में पचास खबरें सुनना चाहता है। क्या हम यह मानने लगे हैं कि खबरें इतनी ज़रूरी हो गई हैं कि आदमी डिस्क्लेमर की तरह पढ़े जाने वाले न्यूज को सुनने के लिए तैयार है। ये ख़बरों को मार कर उलटा लटकाने का नया तरीका है। दलील यही होगी कि आजकल लोग बदल रहे हैं। वो ऊर्जावान ख़बरों को पसंद करते होंगे। कुछ दलील ऐसी भी होती है कि ख़बरें बदल गई हैं। मालूम नहीं खबरें बदली हैं या खबरों को लिखने वाले बदले हैं। शायद वो लोग सही भी हैं। न्यूज में लोगों की दिलचस्पी कम होती जा रही है। लेकिन टॉप के चैनलों के किसी भी कार्यक्रम को देखकर नहीं लगता कि न्यूज चैनलों को देखने वाले दर्शकों की संख्या गिर गई हो। थोड़ा बहुत अंतर आता रहता है। लेकिन अगर न्यूज इतना ही ज़रूरी है तो वो क्रेक मेल सेवा की तरह आकर समाज और दर्शक का क्या भला करता है। सुपर फास्ट या क्रेक सेवा या बिना ब्रेक की ख़बरें।

ये एक नया ट्रेंड आ गया है। फार्मूला वन की रफ्तार पकड़े ख़बरें ब्रूम ब्रूम कर रही हैं। ऐसी रफ्तारवान ख़बरों से कैसा मानस बन रहा है भगवान जाने। इन सबका विरोध करने वाले हमारे जैसे लोग पुरातनपंथी ज़रूर कहलाने लगेंगे। लेकनि आप देख रहे हैं कि ख़बरों को प्रस्तुत करने का फार्मेट ही बदल रहा है। ख़बरें तो फिर भी वही हैं। अगर सब कुछ बदल गया है कि तो कोई यह भी साबित करें कि ख़बरें भी बदल गईं हैं। अगर वक्त की इतनी ही कमी हो गई है तो क्या यह माना जाए कि अब न्यूज देखने वाले लोग ही नहीं रहे। अगर न्यूज देखने वाले लोग हैं तो न्यूज शो की टीआरपी अच्छी क्यों नहीं है। टीआरपी एक घपले की तरह परिभाषा के सभी मानकों को बदल रहा है। आज तक कोई ऐसा नहीं मिला जिसके घर कभी टीआरपी मीटर लगा हो। क्या ऐसा हो सकता है कि आपके घर में टीआरपी वाले तीन रिमोट दे जाएं। क्या यह मुमकिन है कि स्त्री,पुरुष और बच्चा अलग अलग समय में एक टीवी को तीन रिमोट से चलाएगा ताकि उसका कोड दर्ज होते ही यह पता चल जाए कि दस बजे बच्चे ने देखा और एक बच्चे महिलाओं ने। फिर यह धारणा बन जाती है कि दोपरह में महिला दर्शकों की संख्या ज़्यादा होती है तो बेलन भी बन गया फैशन टाइप के शो दिखाइये। आम तौर पर हम और आप यही करेंगे कि थोड़े दिनों बाद एक ही रिमोट का इस्तमाल करने लगेंगे।

न्यूज़ को लेकर इतने फार्मूले गढ़े जा रहे हैं या बदले जा रहे हैं कि ठिकाना नहीं। हम सब फार्मेट के चैंपियन कहलाने लगे हैं। कोई खबरों को खोजने और गढ़ने का खिलाड़ी नहीं बन पा रहा है। अगर सुपरफास्ट खबरें ही हकीकत हैं तो आधे घंटे के बुलेटिन के खात्मे का वक्त आ गया है। अब यह हो सकता है कि एक आधे घंटे में पांच बुलेटिन लांच कर दिये जाएं। खबरों को पढ़ने की जगह कोई डिस्क्लेमर ही पढ़ जाए। किसे पता चलेगा कि न्यूज था या डिस्क्लेमर।

26 comments:

Girdhari khankriyal said...

rAVISH JI AAP TO khud news channellon ke khiladi ho to esa kyon likha? kahne ka matlab bilkul saf hai ki news channel aur new reader evam nes editor hi sab bakbas karne lage hain. kisi ko bolne ki jaldi hai, to kisi ko likhne ki, bolte waqt kya bola ye bhi inko pata nahi hota , repitition yani puravriti dosh to news channelon mein alankar ka kaam kar raha hai. AAp swyam eske khilaf kyuo aur kaise likh dete hain? kahin esa to nahi hai ki blog mein pathak khsh aur TV par darsh khush ka formoola apna rahe hon. jo bhi ho achchha likh . dad deni padegi.

vkrajanus said...

Aaj ke time jabardasti kuch bhi dikha do aur bolo ki aaj ki jarurat hai.Jarurat kaun decide karta hai dekhne wala ya dikhane wala ?.

Muskil dekhne waale ke liye hoti hai.Dekhna ya kaho ki jhelna jo padta hai.No option channel change karo lekin agar dusre channel per bhi aisa hi kuch hai to......

martin देहाती said...

खबरें फटाफट, खबरें खटाखट, खबरें गटागट, खबरें चटाचट, खबरें लटालट, खबरें महाचट,
मुझे लगता है कि इस होड़ में वो प्रोग्राम कहीं खो जाते हैं जो थोड़े बड़े होते हैं और काफी रिसर्च और मेहनत के बाद बनते हैं।

JC said...

आने वाले समय की परछाइयां पहले से ही दिखाई देने लग पड़ती हैं: जब गेंद ऊपर जाती है तो एक स्थान पर रुक फिर नीचे की ओर आने लगती है,,, और जैसे-जैसे धरती पर गिरने ही वाली होती है तो उसकी गति द्रुत से द्रुततर हो जाती है... क्रिकेट के खेल में भी कैच अनुभवी और सधा हुआ खिलाडी ही ले पाता है... तेज़ गाड़ी से भी बाहर के नज़ारे मानस पटल पर रफ़्तार बढ़ने से धुंधले ही नज़र आने लगते हैं; एक के ऊपर एक ओवरलैप होते से...और अंत में सोचे तो मष्तिस्क पर उनकी, किसी एक की भी, कोई छाप शेष नहीं रहती...

mukesh meena said...

aapaki baat to ek dum thik hai par ravish ji hame yah samajh me nahi aa raha hai ki aap khud bhi isi chhetra se jude huye hai fir aap esa kyo kah rahe hai?

Raushansubah said...

वाकई जिस तरह मीडिया तेज़ से तेज़ होता जा रहा है । ऐसे में किसी मुद्दा पे बात करने के लिए मीडिया के पास समय नही है । हम आपके इस लेख से पुरी तरह सहमत हैं और आशा करते हैं कि आप इसमें भी जरुर कुछ नया खो़ज निकालेगे ।

Aadarsh Rathore said...

सही कहा रवीश जी..
साथ ही ब्लॉग का नया रंगविन्यास अच्छा लगा..

pankaj mishra said...

रवीश जी, हमेशा तो नहीं लिखूंगा पर अक्सर की तरह यह पोस्ट भी धारदार रही। महत्वपूर्ण मुद्दे को उठाया है आपने। आप टीवी में हैं तो टीवी की बात लिख रहे हैं, मैं अखबार में हूं तो अखबार की बात लिखूंगा। पहले जिस तरह किसी खबर को विस्तार दिया जाता था वह अब लगभग खत्म सा होता जा रहा है। प्रथम पृष्ठ पर केवल इनफॉमेटिव खबर अगर बड़ी खबर है तो अंदर के पेज पर पैकज मिल जाएगा। कई अखबरों में सिगल डबल करके करीब 20 से 25 खबरे पहले पन्ने पर होती हैं। आप तो सब जगह घूमते हैं दिल्ली में भी देख सकते हैं। पहले प्रथम पृष्ठ का बॉटम वह खबर होती थी जो हार्ड न हो लेकिन जानकारीपरक हो। क्राइम बगैरा की खबरें बॉटम नहीं होती थीं। लेकिन अब बॉटम या एंकर का कान्सेप्ट खतम सा हो गया लगता है। पेज भरना है, बस। पहले सिंगल कॉलम सार संक्षेप होता था। उसकी जगह अब खबरें फटाफट, न्यूज एक्सप्रेस या सुपरफास्ट न्यूज ने ले लिया है। कहीं खबरें फटाफट से खबरें सफाचट न हो जाएं। और भी कई बातें हैं समय मिलने पर लिखूंगा।
हां, एक बात और लिखना चाहूंगा रवीश जी। मीडिया पर कुछ लिखा करें तो लोगों के सवालों के जवाब भी दिया करें। मैंने देखा की कई कमेंटकर्ता अपसे पूछना चाहते हैं कि आप भी मीडिया में हैं तो इस तरह की प्रवृत्ति को रोकते क्यों नहीं। यह आप जानते हैं और हर मीडिया से जुड़ा व्यक्ति जानता है कि कई चीजों को बदल पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन होता है। आप उसे पसंद नहीं करते फिर भी आपको मानना ही पड़ेगा क्योंकि.......।
एक चीज और ब्लॉग का नया रूप रंग अच्छा लगा। अखबार की भाषा में कहेंं तो नई स्टाइल शीट अच्छी लगी। बधाई।

Ashu said...

Ravish bhai.....baat to aap sahi keh rahe hain.par padhke aisa laga jaise taunt maar rahe hain aap apne baki hindi news channel walon pe.

sach kahun to maine kabhi khabron ki speed pe dhyan nahi dia.18 saal ka hun,to waisi speed chalti hai mere lie.mind nahi karta.
jo baat matter karti hai vo hai khabren.aap kya bata rahe hain,kya dikha rahe hain.
haan isme saaf kahunga ki santushti nahi hoti.
kayee baar kuch ahem khabron ko vistaar se batane ki jagah kuch special shows chal rahe hote hain.jaise kisne kya pehna,kya khaya blah blah.

Chuttiyon me ghar aaya hun to aaj kal aapki "Ravish Ki Report" dekh raha hun.bura mat maniyega par vo Ravan wala show waqt ki nazakat ko dekhte hua acha nahi laga.
Bhopal ya hamare nitish ji ke bigde mizaaz pe kuch hota to jyada acha lagta.
jaise kaha bura mat maniyega ye meri apni rai hai.

Dipti said...

आपके इस आर्टिकल का औचित्य कुछ समझ नहीं आया। आपको फ़ॉर्मेट से नाराज़गी है या टीआरपी सिस्टम से। वैसे कुछ घर है जिनके यहां ये मीटर लगते हैं। एक मेरा भी घर उसमें है। इन मीटर के डब्बों में घरवालों से लेकर मेहमानों तक की उम्र और लिंग की जानकारी भरना होती थी।

MOHD JALISH said...

सर जी आपने तो पूरा लुक ही बदल दिया ब्लॉग का, अच्छा है| वैसे हम आपकी बात से पूरी तरह सहमत है....सिर्फ इसीलिए हम सबसे ज्यादा ndtv ही देखते है क्यूंकि ये सही और भरोसेमंद खबर के साथ-साथ आराम से खबर बताता है जो समझ आता है| वैसे इसके बाद ibn भी देखते है क्यूंकि ये भी खबर की बात करता है ये अलग बात है कि थोडा तेज़ है| पर इसपर हम ज़्यादातर आसुतोष सर का आज का अगेंडा प्रोग्राम ही देखते है या तो फिर सन्डे को ऋचा अनिरुद्ध मैम का ज़िन्दगी लाइव प्रोग्राम देखते है| वैसे सर जी हमे भी आजतक कभी कोई ऐसा घर नही मिला जहाँ टीआरपी मीटर लगा हो सच्ची| खैर और बताइए आपकी अगली कौन सी स्टोरी लेकर आ रहे है| वैसे हमने ndtv social पर भी आपको ढूंढ लिया है|

आशीष मिश्रा said...

पता नहीं क्यों आप ऐसी बातें करते हो ?? न्यूज़ चेंनेल्स को पैसा चाहिए ( सिर्फ पैसा ), उनका उद्देश्य है दर्शक को चाहे जैसे भी हो अपने चेंनेल पर रोके रखना ( सिर्फ रोके रखना ), जब से स्टिंग ऑपरेशन बंद हुए है. आम दर्शक की न्यूज़ में रूचि कम हुई है. दर्शक पहले ही जनता है की क्या हो रहा है , जैसे राजनेतिक नाटक होने ही हैं, भोपाल गैस कांड होना ही था , न्यूज़ चेंनेल्स को उस पर रोना ही है. अपराध होने ही हैं, भ्रस्टाचार बढ़ना ही है, भारतीय नागरिक सब मंजूर कर चुका है,
आज कोई भी न्यूज़ चेंनेल आम नागरिक के लिए नहीं चलता , सब अपनी कमाई करने मैं लगे हैं, न्यूज़ देखकर टाइम बर्बाद करने से अच्छा है की "9XM हक से" देखकर कुछ तनाव कम करा जाये.
रविश जी, शायद आपको मालूम हो की मीडिया वाले आजकल न्यूज़ कवर करने के पैसे मांगते है. जिसने दिए उसकी बात मीडिया मैं आएगी. इसीलिए आज सबसे ज्यादा न्यूज़ चेनल्स ही हैं. क्योंकि न्यूज़ चेनल एक फायदे का सौदा है

Nikhil Srivastava said...

शानदार टेम्पलेट. शानदार विश्लेषण. सच पूछिए तो ये रूपर्ट मर्डोक का मीडिया है. वो इसे अपने अंदाज़ में नचा रहा है. सब पीछे पीछे भाग रहें हैं. २४ घंटे २४ रिपोर्टर जैसे शोज से इस डिस्क्लेमर नुमा ख़बरों की शुरुआत हुई और आज आपके चैनल को छोड़कर हर चैनल इसे फॉलो कर रहा है. जहाँ तक टीआरपी की बात है तो मुझे ये ऐसा टेंडर लगता है जिसमें बोली लगती है. जिसकी ज्यादा बोली उसकी उतनी टीआरपी. जिसने अन्दर सेट्टिंग कर ली वो सिकंदर. बीते कुछ दिनों से स्टार ने अपना अंदाज़ बदला है. घटनाओ को उस दौर में ले जाकर सजीव करने की कोशिश कर रहा है. लोग उसे पसंद भी कर रहे हैं. फिर भी, सुना है न्यूज़ २४ की टीआरपी इस बार आईबीएन, आज तक और एनडीटीवी से आगे निकल गई. अब इसे क्या कहेंगे. खैर, ये भी तो एक धंधा ही है. सभ्य भाषा में कहें तो बिजनेस. तो ये दुविधा और ये घुटन क्यूँ? कुछ भी हो, अच्छा लगता है आपको इन सरोकारों की बात करते हुए. हम लड़ेंगे साथी....

Manoj Sinha said...

T= Tujhe R= Rona P= Padega.
Ravish jee yahi paribhasha rah gayi hai TRP ki.Jahan tak baat fatafat news ki hai to, purani dilli me chalene wale fatafat gadi pe logon ko jitna bharosha hai utna news chanels pe nahin.

कुमार विनोद said...

रवीश जी, जिंदगी ही कितनी सुपरफास्ट हो गयी है, आपने तो इसका इशारा क्या खूब किया है. 24 घंटे में से 12 घंटे दफ्तर- आने जाने और नहाने धोने तैयार होने को मिलाकर. गरीब को कम से कम 6 घंटे सोने में. 2 घंटा खाने पीने नहाने और शौच-वौच को दीजिएगा. कितने हो गए-20 घंटा. एक घंटा अखबार पढ़ने में दीजिएगा. 21 घंटे हो गए. 1 घंटे तो कम से कम दो कामों के बीच ट्राजिंजन पीरियड में जाएगा ही. बचा कितना- 2 घंटे. दो घंटे में बंदा घर संभाल ले, या आपकी सुस्त या सुपरफास्ट खबर देख ले. दिन भर में आधे घंटे टीवी के लिए निकल जाए यही काफी है. आप जरूर सहमत होंगे मेरे अंकगणित से. इसलिए मेरी निजी राय है कि खबर में सच चाहिए, जरा भी बू मिलेगी तो लोक सब ठप्प कर अभियान में शामिल हो जाएंगे. स्पीड तो ससुरी गौण चीज है. 24 घंटे में आधे घंटे चल भी जाएगी, तो क्या होगा, जाने दीजिए, ऐसा सोचने वाले और बनाने वालों की खुजली तो जाएगी. जोर होना चाहिए कि हम खबर में किसकी बात करते हैं. बडी आसानी से हॉट रेड कलर में HONOR KILLING लिख कर टेक्स्ट से खून टपका देते हैं, टीवी पर तानते दिन भर हैं, लेकिन घटना को सिर्फ टॉप एंगल से दिखा कर रह जाते हैं. ये कभी नहीं दिखाते कि हमारे समाज में हमीं है, जिसकी हंसी, दूसरों को नीचा दिखाने की प्रवृति इन हत्याओं की वजह बनती है. गांव का ढांचा ऐसा है कि किसी छोटे की बेटी गांव में किसी से हंसकर बोल दे, तो क्या क्या बातें, कैसे कैसे उलाहने लड़की के मां-बाप पर दिए जाते हैं. लड़का-लड़की का मेल मिलाप ज्यादा हो जाए, तो पहले अपने ही छुपाने-दबाने-समझाने का काम करते हैं, लेकिन दूसरे? वो तो जात बाहर और हुक्का पानी बंद करने पर उतर जाते हैं. अगर लड़का लड़की शादी कर ले- जात के पैमाने पर गैरबराबरी में तो पूछिए मत. अगर ऐसे जानलेवा आइसोलेसन में किसी को 'अपने' पर खून खौल जाए. तानों से वो अकेला कैसे लडेगा. कभी इस बात पर हमारी खबरों ने सोचा है. खाप पंचायतों और दूसरे तानाशाह संस्थाओं का क्या उखाड़ पाए हैं हम कुछ नही- हम खबरे अपने सुविधा से दिखाते हैं- आपकी सोच आदर्शवादी है, अच्छी है- लेकिन इसकी किसको पड़ी है सर- सच चाहिए देखने वालों को- सच दिखाने की आपकी हिम्मत चाहिए- पत्रकारों को एक बार फिर से लोग पूजना शुरु कर देंगे. आपको देखकर पढ़कर सुनकर ऐसा लगता है, आप ऐसे सच के समर्थक होंगे

कुमार विनोद said...
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शहरोज़ said...

रविश भाई क्यों इतना सच बोलते हो डर लगता है!

JC said...

news channels ki samasya chutkule jaisi ho gayi hai:

club mein naye sadasya ko aschary hua jab koi vykti ek numbar bolta tha aur sab hanste the,,, phir doosra nambar koi anya bolne se bhi sab hans uthte the!

poochhne par pata chala ki wohi chutkule baar baar dohraye jaane se log bore ho gaye the aur ab kisi ke pas itnaa samay bhi naheen tha,,, jis kaaran unhone har chutkule ko ek vishesh numbar de diya tha jis kaaran numbar se hi pata chal jaata tha aur wo hans lete the :)

anoop joshi said...

satya ki prakastha

saurav said...

ravish sir.........namaskar
hindustan ki sampadikiya mein padhne ke baad pehli baar yahan padhne ka mauka mila ........
salaam kabool larein

सहसपुरिया said...

GOOD

Jai Prakash Pathak said...

नमस्कार!

लोग कैसी खबर चाहते हैं यह तय कैसे होगा ? यह भी खबर वाले ही तय करते हैं . तय करने के बाद कह देते हैं कि लोग यही चाहते हैं . यही नया ट्रेंड है . लोग नए ट्रेंड के साथ रहने के लिए मान लेते हैं कि वास्तव में यही नया ट्रेंड है .
दर्शक अगर रोये भी तो टीआरपी वाले कहेंगे कि दर्शक टनाटन है.
नमस्कार.

अशोक सिँह रघुवंशी said...

kya ise hum aap ki aatm sameeksha maan le......

गजेन्द्र सिंह भाटी said...

I liked the post a lot but the new color of the blog disappoints me. Please change it or do something about it. It is not tolrable.

thanks...

बिक्रम प्रताप सिंह said...

दर्शकों के पास समय कम है, जल्दी-जल्दी दिखाओ, पाठकों के पास टाइम कम है कम शब्दों में ही काम चलाओ, ग्राफिक्स ज्यादा दो। नेट पर एक यूजर के पास लाखों ऑप्शंस हैं कहीं चला जाएगा। ----ये सब हमारे युग की मीडिया की बड़ी भ्रांतियां हैं। जिसने टीवी देखने की सोच ली है वह देखेगा ही। अगर टाइम नहीं है तो कितना भी तेज पढ़ो, फटाफट दिखाओ नहीं देखेगा। हम भारतीय (पज्ञकारों की बात नहीं कर रहा) तसल्ली से आराम से खबरें देखते-पढ़ते हैं। उस पर चर्चा करते हैं। आज भी अखबार के ग्राफिक्स की तुलना में शब्द ज्यादा पसंद आते हैं। अगर भारत ने कोई क्रिकेट मैच जीता तो अगले दिन उसी जीत के समाचार को पढ़ते हैं बार-बार पढ़ते हैं भले ही हमने पूरा मैच टीवी पर देखा हो। ऐसे ही इंटरन पर बैठने वाले के पास सच मायनों में लाखों विकल्प नहीं होते। किसी शब्द या तथ्य को गुगल करने की बात छोड़ दें तो इंटरनेट पर किसी आम यूजर का समय तीन-चार वेबसाइटों पर ही गुजरता है।

अशोक सिँह रघुवंशी said...

raveesh ji..........!
vikra pratap singh ji ne bilkul sahi kaha hai.