नाइंसाफी की रात और खुशगवार मौसम

दसवीं मंज़िल की खिड़कियों से हवा बालकनी में उड़ी आ रही है। दिल्ली की आज की सुबह खुशनुमा है। शाम से ही हवा बदलने लगी थी। भोपाल से आने वाली हवा के असर को कम करने के लिए। हम ऐसे ही वक्त में रूमानी हो जाया करते हैं। दिल को बहलाने लगते हैं। लाखों लोगों की चीख और जज का वो मामूली फ़ैसला नाइंसाफ़ी के स्लोगनों के हवाले हो गया है। बालकनी से नीचे दिख रही सड़क रात ही बारिश में धुल चुकी है। नाइंसाफ़ी के इस घोर दौर में सब निकल रहे हैं,अपने अपने सिस्टम में आठ घंटे के लिए समाने। वो लड़का कैसा होगा जो इसी तरह चौरासी की किसी सुबह बीएचयू से इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद भोपाल के लिए निकल गया होगा। इंसाफ़ की लड़ाई लड़ने। टीवी पर सारंगी को बोलते देखा तो तमाम शब्द किसी गरम हवा में हल्के होकर उड़ने लगे थे। आज की ठंडी हवा इन तमाम शब्दों को लौटा लाई है। काइट्स फिल्म के गाने की तरह ‘तुम भी वही,हम भी हैं वही, क्या हुआ ग़लत,क्या सही’। काश इन छह लाख घरों में भी यू ट्यूब होता और ये गाना बज रहा होता।

भोपाल के गैस पीड़ितों,अभी सदियों का इंतज़ार पूरा नहीं हुआ है। इंतज़ार कभी इंसाफ़ का नहीं होता। बेबसी का होता है। राजनीति फिल्म देख आइये। ‘ऐ मेरी सुबह..हंसती हंसाती,बोली आके,तेरे लिए संदेशा है,जागी आंखों को कोई सपना मिलेगा,कोई खुशी आने का भी अंदेशा है..हां है..हा हा..गुलाबी सी सुबह..हा हा..शराबी सी हवा..भीगी सी भागी सी मेरे बाजुओ में समा...’ सब संवेदनशील ही है तो पीड़ितों का सब्र क्या है। उनमें सिस्टम का कपार न फो़ड़ने की जो संवेदनशीलता है उसका क्या है। नेताओं के भाषण मज़ाक लगते हैं। अच्छा है राजनीति के मैदान में विचारधाराएं पिट चुकी हैं। उन्हें अब फिल्मों में भी जगह नहीं मिलती। टीवी पर कल रात के बासी टिकर चल रहे हैं। कब मिलेगा इंसाफ़, ये कैसा इंसाफ़, एक जीवन एक रुपया। एंकर गली के कुत्ते की तरह भौंक रहे हैं...एंडरसन चुपचाप निकला जा रहा है। अभी तक अख़बार नहीं आया है। हवा आ गई है। ठंडी हो गई है। फेसबुक पर संदेश है कि भोपाल फैसले पर लिखियेगा। हवाओं की बेइमानियों पर लिखें या इंसाफ़ की बेमानियों पर। हर शब्द एंडरसन के जूतों के नीचे मचल जाता है। हर तल्खी एंडरसन की मुस्कुराहट में धुल जाती है। ‘मोरा पिया मोसे बोलत नहीं...द्वार जिया के खोलत नाहीं’.. गानों का ही सहारा बच जाता है मेरे लिए। पत्रकारिता स्लोगन की दुकान नहीं होती तो हम जैसे को कोई काम नहीं मिलता। भारत की बेरोज़गारी की लिस्ट में गिन लिये जाते और किसी योजना के रहमोकरम के भरोसे छोड़ दिये जाते। ‘कोई जतन अब...कोई जतन अब काम न आए..उसे कछु सोहत नहीं..मोरा पिया मोसे बोलत नाहीं’....। भोपाल की हवा गरम लग रही हो तो दिल्ली आ जाइये। यहां की हवा सुहानी हो गई है।

26 comments:

संगीता पुरी said...

लाख कानूनों के बावजूद नाइंसाफी तो होती ही है .. और हम भाग्‍य भरोसे ही जीने को मजबूर रहे हैं .. पर खुशगवार मौसम आ ही जाते हैं और हम सब कुछ भूलने को बाध्‍य होते हैं !!

Vidhu said...

कोई जतन अब काम न आए....रविश जी.ना इंसाफी की तो क्या कहें जिन्होंने यहाँ का नजारा देखा है उनकी आत्मा दिल दिमाग और नजरों से सोचें ,पूछे ...अक्सर कुछ फैसले पहले से तय होते हेँ शायद यहाँ भी यही हुआ है इन्साफ की पट्टी काली है...उसके पीछे अन्धेरा है ...लोगों ने ज्यादा ही उम्मीद लगा रखी थी ...जबकि होना यही था ..हालांकि इस लिजलिजे फैसले से घिन आती है पर एक सवाल, क्या सजा या फांसी की सजा ही काफी होगी ? क्या उसके बाद 25 साल पहले खोई जिंदगियों की वापसी संभव है..और बेचारगियों की इस लीपा- पोती पर दुःख इसे कमीनगी की हद कहे या बेमानियों की, उपरी मौसम तो यहाँ भी बदलेगा लेकिन कुछ मौसम ताउम्र स्थिर हो जातें हेँ दिलों में ...गैस त्रासदी का वो काला मौसम...आमीन

Archana said...

Ek aye raat hai ..Ek wo raat thi...
Aaj fija mein Rumaniyat hai..us fija mein jahrili hawaye thhi...kal insaan mar rahe thhe..
aaj insaniyat mar gayi hai...

anoop joshi said...

सर कुछ कह नहीं सकते. क्योंकि भोपाल में उस समय andreson ने नहीं खोला था वाल्व, गलती करने वाले हमारे लोग थे.गलती हमारी सरकार की है,जिसने वो फैक्ट्री यहाँ लगाने दी, जिसे अमेरिका ने रिजेक्ट की थी.गलती हमारे घुशखोर polution बिभाग(जिसकी पुष्टि खुद प्रधान मंत्री कर चुके है) और फैक्ट्री एक्ट की है, जानते है polustion बिभाग से आप फिर से union carbiod जैंसी फैक्ट्री चलाने की इजाजत फिर से ले सकते है.और रही सजा की बात तो, वो तो ''भारतीय'' सविधान के अनुरूप ही हुआ होगा.और सज़ा अगर उम्र कैद की भी होती तो जितेने भी आरोपी है उन सबकी उम्र तो वैंसे भी ख़तम हो गयी है.

honesty project democracy said...

पूरी इंसानियत के लिए शर्मनाक है भोपाल गैस कांड पर आया फैसला ,ऐसे ही फैसलों से अच्छे से अच्छे लोगों का भी आस्था खत्म हो जाता है कानून और न्याय पर से ,इस बारे में मिडिया को लगातार तथ्यों के आधार पर सही न्याय के लिए दवाब बनाना चाहिए |

माधव said...

Ravish jee i disagree with you

The law has its own definition. The punishment for the "culpable homicide not amounting to murder" is just Two years then how can you lynch Anderson. there is no room for emotion in the law. If you respect the rule of Law then respect the verdict. just criticizing the law and courts are become fashion for the media/People.
it may be presumed that the said tragedy is not done in cold blood or done deliberately, it was merely a accident which occurs due to negligence and you can not penalize a person to Capital Punishment for a crime of negligence.

Yes i admit that the said Tragedy was a Havoc but it can not be defined as a genocide/mass killing. that was a very unfortunate story, and it needs to be dealt with a sound and logical reasoning

i admit that the people affected due to that accident should be compensated properly and this is the task of Government. if affected people were not compensated properly how is Anderson responsible. Take the responsibility and compensate the people. that will be the right Justice

अशोक सिँह रघुवंशी said...

emotional.........

daddudarshan said...

जिन्हें नाज़ है हिंद पर वे कहाँ हैं | नाज़ जैसी तो कोई चीज नहीं है फिर भी नाज़ तो हो ही जाता है, अपना देश जो है,इसकी मिट्टी में ही अंत में मिलना है | पच्चीस हजार तो क्या पच्चीस लाख मरते फिर भी नाज़ तो देश पर होता ही | सी. बी.आई खामोश है, जिसने इस जघन्य मामले को इतना लचर बना दिया कि जब सजा हुई तो लगा कि किसी ने चोरी के मुकद्दमे की सजा पाई | वे जज खामोश हैं,जिन्होंने न्याय के नाम पर एक घटिया मजाक किया (मुझे माननीय न्यायलय के न्याय पर उंगली उठाने का कोईहक नहीं,फिरभी .....?)
जिन्हें सजा मिली है वे गर्दन झुकाए इस का इन्तजार कर रहे हैं कि कहीं ये मुद्दा देश की जनता न लपक ले और मजबूर हो कर न्यायालय को पुन: इस मामले पर तबज्जो देनी पड़े | वे भी खामोश है जो किसी गुरू की फांसी में देरी होने पर आसमान सिर पर उठा लेते हैं | आज फिजा में कल से बढ़िया महक है | होना भी चाहिए; कौन किसी मुद्दे को पच्चीस साल तक याद रखे | न्यायलय भी भूल जाते शायद इस लिए याद रहा कि उनके खातों में दर्ज था | भारत की जनता की तो नियत में है ,इस तरह कीड़े मकोड़े की तरह मरना | कौन रिश्क ले | मैं बेबकूफ हूँ जो इस तरह रक्त-चाप बढ़ा रहा हूँ | मुझे भी क्या पडी ,मेरे पास तो थोडा सा बक्त
निकल आया था सो हाथ-पाँव मरने लगा | लेकिन जाते-जाते इतना तो कहूँगा कि अन्याय तो हुआ है |देश की आत्मा तो काँप रही है ,आबाज तो भर्राई हुई है | इति इलम |

JAI SINGH said...

@माधव
Ofcourse but there is a lot of room for money. Respect for law is a relative term as no law guarrantees absolute justice.
Its a prime task of all sensitive people to criticise the law and courts wherever they fall short of doing justice. The law and the courts act like a cover under which all injustices of the system prevail.
The laws and the courts are not above logical criticism.

पी.सी.गोदियाल said...

Dear Madhav, As you said " If you respect the rule of Law then respect the verdict. just criticizing the law and courts are become fashion for the media/People." If I'm a law abiding citizen, it is not mandatory for me to accept and respect all the verdicts with folded hands.Our judges has made us a laughing stock in front of international community.

My question to you is Why the Indian courts could not decide the issue after 26 years?

शहरोज़ said...

भोपाल की हवा गरम लग रही हो तो दिल्ली आ जाइये।

यह पंक्ति बहुत कुछ अनकहा ब्यान कर जाती है.

अपन तो शकील शम्सी के हवाले से अपनी बात रखेंगे:

फैसला भोपाल में आया है इतने साल बाद

हो गए कछुए फ़िदा कानून की रफ़्तार पर

आठ लोगों को मिली है दो बरस की बस सज़ा

जबकि होना चाहिए था क़ातिलों को दार पर

नोट: दार यानी फांसी

गजेन्द्र सिंह भाटी said...

आपका यह पोस्ट पढऩे से पहले अपने दोस्त के लिंक http://vizanta.blogspot.com/2010/06/blog-post_07.html पर गया। मैंने वहां कॉमेंट किया कि दिल्ली के बदले मौसम पर उसकी हल्की-फुल्की कवरेज सबसे बेहतर थी। मगर कस्बे की इस पोस्ट को पढऩे के बाद अपनी टिप्पणी को बदलने का मन कर रहा है। मैं कभी टिप्पणी नहीं करता हूं। मगर अबकी बार रोक नहीं पाया।

sahespuriya said...

न्याय देर से मिलना क्या अन्याय नही है?
२६ साल के बाद फ़ैसला...
१५००० से ज़्यादा लोगो की जान की क़ीमत बस इतनी सी...
क्या सी ब आइ और सरकार के पास ज़मीर नही है. क्या हुआ इन लोगो को आख़िर ये कैसा इंसाफ़ है.
अब इस फ़ैसले की भी क्या ज़रूरत थी ? २६ साल में जब कुछ नही बदला तो अब कोन सा तीर मार लेंगे भोपाल के लोग.

Parul said...

ek lambe intazaar ke baad mila bhi to kya mila..ye unke zakhm hare karne ke liye kafi hai..!

शशांक शुक्ला said...

अब क्या कहें भोपाल मसले पर...इतना कुछ कहा जा चुका है कि कुछ कहने का मन नहीं है...अफसोस इस बात का है कि हम अदालत के फैसले को ऑफिसियली गलत भी तो नहीं बता सकते

pragya pandey said...

aapka aalekh sach ki gawahi ke roop men toh kaam aayega hi aaj nahin to kal ....

निखिल आनन्द गिरि said...

http://baithak.hindyugm.com/2010/06/25.html

विनीत कुमार said...

पोस्ट लिखते वक्त आपका मन स्थिर नहीं था,साफ झलक रहा है। एक बेचैनी,एक बल्र इमेज,कुछ असर छोड़ते-छोड़ते मिस्स हो गयी।.

arvind said...

सच ही तो हैं. जब सारा सिस्टम ही anderson को बचाने mein लगा था तो भला gas से तडपते लोगो की चीख सुनता भी भला कौन..... तब भोपाल में SP रहे स्वराज पुरी कह रहे हैं की धारा बदल दी गई.......... कल अभिग्यानजी के शो mein राम जेठमलानी भी kah चुके हैं...अब इस फैसले के बाद kuchh भी नहीं हो सकता..... हो भी कैसे सकता हे जब उसे बचाने वाले भी हम में से ही थे... ये मान कर मन को समझा ले की शायद इन्साफ की देवी को आंखो पार बंधी काली पट्टी में से kuchh दिखा ही न हो.....!!!!!

ASHoo said...

बिलकुल सही फैसला है, मान लो अगर किसी देश में क़त्ल करना जुर्म नहीं है, और कोई आ के १००० क़त्ल कर देता है, फिर उस देश की आख़े खुलती हैं और नया कानून बन जाता है जिसमे क़त्ल करना एक जुर्म बन जाता है , तो क्या उस पुराने कातिल को कानूनन सजा होगी? बिलकुल नहीं .... , क्योंकि ये वारदात कानून बनने से पहले की है. जब आपके पास इस बारे मैं कानून ही नहीं है तो क्या फैसला होगा? भारतीय फैक्ट्री एक्ट मैं पहला सुधार ही भोपाल गैस कांड के बाद हुआ, वो भी अंतररास्ट्रीय फैक्ट्री आयोग की जाँच के बाद, जिसने हमें बताया की हमारे पास कोई कानून ही नहीं है, उससे पहले हम अंग्रेजों के बनाये हुए फैक्ट्री एक्ट के अनुसार चल रहे थे, वो इतना पुराना था की सुरक्षा की कोई बात ही नहीं करता.
रविश जी, वारेन andersan को गाली देना बहुत आसन है क्योंकि वो यहाँ नहीं है , भापाल गैस कांड में अमरीकी कंपनी से अधिक हमारा श्रम मंत्रालय दोषी है, मीडिया उसके खिलाफ क्यों नहीं बोलता ??

Mohan said...

Bhopal verdict just an eye opener.

Hum hamesha sun tay hain ke saja sabutoon kay adhar par diya ja ta hay na ke bhawana key adhar par. To is judgement may bhi bilkul wahi map dand apna ya gaya hay. Yahan par bhi saja sabutoon kay adhar par hi diya gaya hay..
Saja milay gi bhi to kayaisay jab sabut jutanay walon ko dawabon may dabaya gaya hay. Jai bharat ke sarkar... jai bharat ke janch agencies...CBI teri sad hi jai..

Mohan said...

Bhopal verdict just an eye opener.

Hum hamesha sun tay hain ke saja sabutoon kay adhar par diya ja ta hay na ke bhawana key adhar par. To is judgement may bhi bilkul wahi map dand apna ya gaya hay. Yahan par bhi saja sabutoon kay adhar par hi diya gaya hay..
Saja milay gi bhi to kayaisay jab sabut jutanay walon ko dawabon may dabaya gaya hay. Jai bharat ke sarkar... jai bharat ke janch agencies...CBI teri sad hi jai..

Tarkeshwar Giri said...

ITs very nice,

Kabhi mauka mile to jarur padhiyega.
www.taarkeshwargiri.blogspot.com

JC said...

जब देवता और राक्षश समुद्र मंथन आरंभ किये तो क्या निकला था? और उसे जनहित में किसने पी लिया था ?
ज्ञानी हिन्दू कह गए कि वही, केवल एक शेष अमृत, अब अपना भूतकाल का इतिहास देख रहा है - किन्तु उल्टा - अनंत से शून्य तक, कैलाश की बर्फीली चोटी से नीचे खारे पानी वाले समुद्र तक, बार-बार!

kamlakar Mishra Smriti Sansthan said...

yah kaisa insaf hai.....jisme julam karne wala kush ho raha hai.

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा, सम्पादक-प्रेसपालिका (पाक्षिक), जयपुर (राजस्थान)/Dr. Purushottam Meena Editor PRESSPALIKA,(Fortnightly) Jaipur, Rajasthan said...

जिन्दा लोगों की तलाश!
मर्जी आपकी, आग्रह हमारा!!


काले अंग्रेजों के विरुद्ध जारी संघर्ष को आगे बढाने के लिये, यह टिप्पणी प्रदर्शित होती रहे, आपका इतना सहयोग मिल सके तो भी कम नहीं होगा।
=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=

सच में इस देश को जिन्दा लोगों की तलाश है। सागर की तलाश में हम सिर्फ बूंद मात्र हैं, लेकिन सागर बूंद को नकार नहीं सकता। बूंद के बिना सागर को कोई फर्क नहीं पडता हो, लेकिन बूंद का सागर के बिना कोई अस्तित्व नहीं है। सागर में मिलन की दुरूह राह में आप सहित प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति का सहयोग जरूरी है। यदि यह टिप्पणी प्रदर्शित होगी तो विचार की यात्रा में आप भी सारथी बन जायेंगे।

हमें ऐसे जिन्दा लोगों की तलाश हैं, जिनके दिल में भगत सिंह जैसा जज्बा तो हो, लेकिन इस जज्बे की आग से अपने आपको जलने से बचाने की समझ भी हो, क्योंकि जोश में भगत सिंह ने यही नासमझी की थी। जिसका दुःख आने वाली पीढियों को सदैव सताता रहेगा। गौरे अंग्रेजों के खिलाफ भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस, असफाकउल्लाह खाँ, चन्द्र शेखर आजाद जैसे असंख्य आजादी के दीवानों की भांति अलख जगाने वाले समर्पित और जिन्दादिल लोगों की आज के काले अंग्रेजों के आतंक के खिलाफ बुद्धिमतापूर्ण तरीके से लडने हेतु तलाश है।

इस देश में कानून का संरक्षण प्राप्त गुण्डों का राज कायम हो चुका है। सरकार द्वारा देश का विकास एवं उत्थान करने व जवाबदेह प्रशासनिक ढांचा खडा करने के लिये, हमसे हजारों तरीकों से टेक्स वूसला जाता है, लेकिन राजनेताओं के साथ-साथ अफसरशाही ने इस देश को खोखला और लोकतन्त्र को पंगु बना दिया गया है।

अफसर, जिन्हें संविधान में लोक सेवक (जनता के नौकर) कहा गया है, हकीकत में जनता के स्वामी बन बैठे हैं। सरकारी धन को डकारना और जनता पर अत्याचार करना इन्होंने कानूनी अधिकार समझ लिया है। कुछ स्वार्थी लोग इनका साथ देकर देश की अस्सी प्रतिशत जनता का कदम-कदम पर शोषण एवं तिरस्कार कर रहे हैं।

आज देश में भूख, चोरी, डकैती, मिलावट, जासूसी, नक्सलवाद, कालाबाजारी, मंहगाई आदि जो कुछ भी गैर-कानूनी ताण्डव हो रहा है, उसका सबसे बडा कारण है, भ्रष्ट एवं बेलगाम अफसरशाही द्वारा सत्ता का मनमाना दुरुपयोग करके भी कानून के शिकंजे बच निकलना।

शहीद-ए-आजम भगत सिंह के आदर्शों को सामने रखकर 1993 में स्थापित-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)-के 17 राज्यों में सेवारत 4300 से अधिक रजिस्टर्ड आजीवन सदस्यों की ओर से दूसरा सवाल-

सरकारी कुर्सी पर बैठकर, भेदभाव, मनमानी, भ्रष्टाचार, अत्याचार, शोषण और गैर-कानूनी काम करने वाले लोक सेवकों को भारतीय दण्ड विधानों के तहत कठोर सजा नहीं मिलने के कारण आम व्यक्ति की प्रगति में रुकावट एवं देश की एकता, शान्ति, सम्प्रभुता और धर्म-निरपेक्षता को लगातार खतरा पैदा हो रहा है! अब हम स्वयं से पूछें कि-हम हमारे इन नौकरों (लोक सेवकों) को यों हीं कब तक सहते रहेंगे?

जो भी व्यक्ति इस जनान्दोलन से जुडना चाहें, उसका स्वागत है और निःशुल्क सदस्यता फार्म प्राप्ति हेतु लिखें :-

(सीधे नहीं जुड़ सकने वाले मित्रजन भ्रष्टाचार एवं अत्याचार से बचाव तथा निवारण हेतु उपयोगी कानूनी जानकारी/सुझाव भेज कर सहयोग कर सकते हैं)

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा
राष्ट्रीय अध्यक्ष
भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)
राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यालय
7, तँवर कॉलोनी, खातीपुरा रोड, जयपुर-302006 (राजस्थान)
फोन : 0141-2222225 (सायं : 7 से 8) मो. 098285-02666

E-mail : dr.purushottammeena@yahoo.in