नीतीश-नरेंद्र के झगड़े में हलवाई की मेहनत बेकार गई

10 मई २००९ को इसी कस्बा पर नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी के हवा में उठे हाथ पर एक लेख लिखा था। पंजाब में एनडीए की रैली थी। बिहार में मतदान खत्म हो चुका था। उससे पहले नीतीश यही कहते रहे कि नीतीश के साथ मंच साझा करने की ज़रूरत नहीं है। बरखा दत्त बार बार पूछ रही थी कि कभी नहीं करेंगे तो नीतीश का यही जवाब था कि ज़रूरत नहीं है। उसके तुरंत बाद नीतीश और नरेंद्र को यह फोटू टीवी और अखबारों में दिखा था।

ठीक एक साल बाद वही फोटू फिर से दोनों के बीच की नौटंकियों का कारण बन गया है। इस खेल में दोनों ने एक दूसरे को घेरने की कोशिश की। पहली चाल में सूरत का सांसद बिहार के अखबारों में विज्ञापन देता है और इस तरह से कैप्शन लगाता है जैसे नीतीश नरेंद्र का स्वागत कर रहे हों। अब इतनी सी बात पर नीतीश को भड़कना चाहिए था या नहीं ये तो वो बतायेंगे। लेकिन ये फोटू तो सच है। दोनों बिहार में न सही लेकिन बिहार के बाहर मंच साझा तो करते ही है। क्या नीतीश यह कहना चाहते हैं कि बीजेपी सेक्युलर पार्टी है और उसमें एक ही कम्युनल है नरेंद्र दामोदर मोदी। बीजेपी के साथ पांच साल सरकार चलाई है नीतीश ने। एनडीए सरकार में केंद्रीय मंत्री रहे हैं। लोकसभा में एक बार वाजपेयी सरकार गिरने वाली थी। नीतीश ने भाषण दिया था कि प्रधानमंत्री तो बिहारी ही बनेगा,अटल बिहारी बनेंगे। खूब ताली बजी थी। नरेंद्र मोदी जिस नीति पर चलते हैं वो तो संघ और भाजपा की बुनियाद है। आपको बुनियाद और इमारत से प्रॉब्लम नहीं है सिर्फ एक कमरे की बालकनी से इतनी चिढ़ हो गई है।

नीतीश का गुस्सा समझ में आता है। बीजेपी के साथ रहकर सेक्युलर बनने की चाहत रंग नहीं ला रही है। चुनाव आने हैं। नीतीश को एक शाबाशी मेरी तरफ से भी। बीजेपी की ये हालत कर दी है कि वो भी सत्ता की लालच में अलग होने का फैसला नहीं कर पाती है। बीजेपी वाकई में सत्तालोलुप एक कमज़ोर पार्टी है। जिस पार्टी के नेता के बारे में गठबंध का नेता तय करे कि वो राज्य में आयेगा या नहीं इससे ज्यादा इस पार्टी की दुर्गति नहीं हो सकती। वो नरेंद्र मोदी को लेकर उग्र भी नहीं है और नरेंद्र मोदी के कारण पूरी कार्यकारिणी के अपमान पर शांत भी है। हो सकता है कि बीजेपी के भीतर नरेंद्र मोदी को सड़ा देने की यह रणनीति चल रही हो। नरेंद्र मोदी की भी हालत देखिये बेचारे चूं तक नहीं कर पाये। आखिर विज्ञापन देकर नीतीश को भड़काने की चाल किसकी होगी। गुजरात का सांसद क्या बिना सीएम से पूछे विज्ञापन दे सकता है। अब अगर आपने विज्ञापन देकर नीतीश को भड़का ही दिया है तो फैसला कर लीजिए न। आमना सामना करने के लिए तैयार भी रहते। एक ही घुड़की में मांद में क्यों घुस गए।

लेकिन जो हुआ वो अच्छा नहीं था। बीजेपी के नौ नो मुख्यमंत्री पटना में हैं। नीतीश ने गुस्से में आकर डिनर तक रद्द कर दिया। ये कौन सी मेहमाननवाज़ी का नमूना पेश किया उन्होंने। अगर पोस्टर नहीं छपता तो क्या नीतीश डिनर के लिए आ रहे नरेंद्र को गेट पर रोक देते। जब डिनर का आयोजन हुआ होगा तो उस सूची में नरेंद्र मोदी भी होंगे। उन्हें भी जानकारी दी गई होगी कि आप सादर निमंत्रित हैं। डिनर रद्द कर नीतीश ने भी वही किया जो सूरत के सासंद ने विज्ञापन में बिहार को मदद देने की बात कर की है। इस लानत-मलानत के गेम में दोनों का स्कोर बराबर है। बस गुजरात और बिहार के रिश्तों को दांव पर लगाकर यह खेल नहीं खेला जाना चाहिए था। उस हलवाई पर भी रहम करते जो बेचारा मेहनत से खाना बना रहा होगा। उसका चूल्हा तो बीच में ही बुझा दिया गया। नीतीश बिहार के मुख्यमंत्री हैं,दरबान नहीं। क्या वो नरेंद्र मोदी की पार्टी को अपने राज्य में बैन करेंगे। झूठमूठ के बौखला जाते हैं। कामयाबी से विनम्र होना चाहिए। इतनी दिक्कत है तो रास्ते से हटाइये बीजेपी को।

अब रहा सवाल सिद्धांत का। अगर नरेंद्र मोदी से प्राब्लम है तो नीतीश को आज फैसला करना चाहिए। क्या वो अकेले चुनाव में जा रहे हैं? बीजेपी को फैसला करना चाहिए कि इतनी बेइज्जती के बाद क्या सुशील मोदी नीतीश के सामने फाइल लेकर हाज़िर होंगे। वोटर को सोचना चाहिए कि इसमे बिहार के विकास को लेकर चाल नहीं है बल्कि वोट की नौटंकी है। नरेंद्र मोदी का विरोध होना चाहिए। लेकिन राजनीतिक रूप से। डिनर टेबल पर बिठाकर थाली पर लात मार देने के तरीके से नहीं। इस नेता की दुर्गति राजनीतिक रूप से चुनावी मैदान में होनी चाहिए न कि संस्कारों को ताक पर रखकर।

(आखिर की ये पंक्तिया १० मई के लेख की हैं।)नीतीश जी आप बिहार का विकास करते रहिए। कानून व्यवस्था और सड़क तो चाहिए भाई। लालू के बस की बात नहीं है। बस ड्रामा मत कीजिए। आप नरेंद्र मोदी से ज़रूर मिलिये। क्योंकि वो बड़े कद वाले संघी नेता हैं। आज आडवाणी जी की डफली बजा रहे हैं कल मोदी के लिए तो बजानी ही पड़ेगी। अब ड्रामेबाज़ी की इस सूरत में आप पीएम तक का ख्वाब छोड़ ही दीजिए। लुधियाना में मोदी भाई से हाथ मिलाकर आप उनके नंबर टू तो बन ही गए। ये क्या कम है। बस मलाल यही है कि बिहार में वोटिंग के पहले आप ये कर के दिखा देते? कम से कम मेरा भी तो भ्रम टूट जाता कि आप मामूली नेता हैं।

24 comments:

Aadarsh Rathore said...
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Aadarsh Rathore said...

ये राजनीति है
सब दिखावा है
ये कूटनीति है
सब छलावा है

रंजन said...

कल देर रात पटना के "चंद्रगुप्त मैनेजमेंट संस्थान' के एक लडके से बात हो रही थी जो थोडा नेता टाईप है और किसी कारणवश नीतिश की छवी से प्रभावित होकर उनसे नज़दीक हुआ और जब नज़दीक हुआ तो उसे नीतिश का 'इगो' वाला झटका लगा !

गोली मारिये बी जे पी को ! ये आदमी तो अपने पार्टी के मिनिस्टर और विधायक से भी महीनो नहीं मिलता है !

बी जे पी को तो इसने सुशिल मोदी के साथ मिल कर "खा" गया !
आप ने एक बार कहा था - नीतिश 'विकल्पहीनता" का फायदा उठा रहे हैं , और कुछ नहीं !

JC said...

प्राचीन हिन्दुओं ने कहा कि यद्यपि माया के कारण परम सत्य उजागर नहीं होता किन्तु जीवन का सत्य वही है जो काल पर निर्धारित नहीं होता, और किसी ने अंग्रेजी में भी कभी पहले सत्य वचन कहे थे, "पूर्व पूर्व है, और पश्चिम पश्चिम / दोनों कभी नहीं मिलेंगे."

अब कलियुग के अंत के निकट जब '८४ भूपाल गैस कांड से अधिक विष, वायु, जल, भोज्य पदार्थों और मानव के मानस में भी सारे देश में व्याप्त हो गया है, आप ड्रामे में क्या उम्मीद करते हैं गणतंत्र में नाटक के मुख्य पात्रों जनता के 'हिन्दू' प्रतिनिधियों से?

pratibha said...

ये राजनेता हैं रवीश जी ये हलवाई क्या लोगों के घरों के चूल्हे भी बीच में बुझाते हैं फिर उन्हीं बुझे हुए चूल्हों को जलाने के नाम पर वोट मांगते हैं. कोई दूध का धुला नहीं है...बीजेपी तो खैर हर कदम पर खुल ही रही है...अब उसके बारे में किसी को कुछ कहने सुनने के ज़रूरत भी नहीं बची... राजनैतिक मनोरंजन जनता के लिए है वो भी लाइव...

sahespuriya said...

चुनाव की आमद है , अभी तो बहुत ड्रामा बाक़ी है... लाइव मनोरंजन का इंतेज़ाम अभी से हो रहा है.
अब फिल्में तो कुछ खास बनती नही है. जनता इसी से अपना दिल बहला लेती है.

Ratan Singh Shekhawat said...

ये सब चुनावी राजनैतिक ड्रामा है जिसकी कोई जरुरत नहीं थी |
इस लेख के माध्यम से आपने जो सवाल नितीश से किये है उनसे सहमत |

Suresh Chiplunkar said...

अकेले नरेन्द्र मोदी ही अछूत हैं… क्योंकि उनसे सभी डर रहे हैं… और वे हिन्दुत्ववादी भी हैं।

वरना 3000 सिखों को मारने वाले, न तो सज्जन कुमार और टाईटलर अछूत हैं, न ही 15000 लोगों को मारने वाले को गायब करने वाले अर्जुन सिंह, और राजीव गाँधी…।

इससे पता चलता है कि नरेन्द्र मोदी कितनी तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं कि बाकियों के पिछवाड़े में आग लग जाती है…।

सभी का संदेश स्पष्ट है कि - हिन्दुत्व की बातें करोगे तो अछूत रहोगे। सड़े हुए सेकुलरिज़्म, हत्यारे वामपंथ, देश को बेच खाने वाले कांग्रेसी बने रहोगे, तो सभी के प्यारे रहोगे…

नदीम अख़्तर said...

@ सुरेश चिपलूनकर
और नरेंद्र मोदी ने जो कत्लेआम किया गुजरात में उसे लेकर अगर उनकी भर्त्सना न की जाये, तो क्या किया जाये। हिन्दू होने का मतलब हत्यारा होना नहीं हो जाता। मेरे मित्रों में बहुसंख्य हिन्दू हैं, लेकिन मोदी कैटगरी के नहीं हैं। क्या वे हिन्दू नहीं हुए। मार-काट इस देश को कहीं नहीं ले जायेगा। हत्यारों का फेवर नहीं होना चाहिए, फिर चाहे वो सज्जन कुमार हों, जगदीश टाइटलर हों, नरेंद्र मोदी हों या फिर अजमल कसाब। सब का एक ही प्रकार है। कोई आत्मा को तृप्त कर रहा है, तो कोई कुर्सी से चिपके रहने के लिए हत्याएं करता आया है।

लोग लोग said...

बड़े भाई जब तक हम हलवाई (भारत की जनता) खुद खुदाबक्श और नेताओं तो खुदा समझते रहेगें, तब तक तो हमारा खाना-खराब यूं ही होता रहेगा..। ये लोग स्वयं को राम दिखाकर, हमसे खाना बनवाकर, हमारी ही रोटियों पर राजनीति करते रहेगें..। और हम हलवाई नीतीश-नरेंद्र के राम-राज्य की प्रजा बने रहेगें..।
जरा सोचियें साहब, हम हलवाई प्रजा है या जनता..।

प्रज्ञा said...

inner radd karane ke bhi kuchh na kuchh fayade toh honge hi ..ye neta aise koi gamen thode khelate hain .nisheeth ji itane kachche khilaadi hain kya ....

निखिल आनन्द गिरि said...

नीतीश कुमार का एक चिड़िया भर मांस घट गया होगा, रात का खाना नहीं खाए तो घट जाता है....

Media today said...

vastav me nitish apne ko secular chavi wala neta banane ki koshish me lage rahte hai lekin shayad wo bhul rahe ki jis party k sath wo gatjhod ki rajnit me lage hue hai wo hi hindustan ki sabse badi communal party hai aise me apne ko secular chavi ka btana bemani hi hai. nitish ji ya to aap BJP se gatjod chodiye ya for apni hi alag secular party bna daliye ..

Media today said...

vastav me nitish apne ko secular chavi wala neta banane ki koshish me lage rahte hai lekin shayad wo bhul rahe ki jis party k sath wo gatjhod ki rajnit me lage hue hai wo hi hindustan ki sabse badi communal party hai aise me apne ko secular chavi ka btana bemani hi hai. nitish ji ya to aap BJP se gatjod chodiye ya for apni hi alag secular party bna daliye ..

anoop joshi said...

no cooment, (bade logo ki badi baat) bus dekhte hai. aage kya hota hai

कुलदीप मिश्र said...

हलवाइयों का वोट तो फिर भी फिसल गया नीतीश जी...:)

anant said...
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Ashu said...

ek badi sidhi aur saaf baat hai ki sidhanton ki rajneeti ab is desh me rahi nahi.
Koi party ya koi neta is se achuta nahi hai.Nitsh Ji bhi koi apwad nahi hain.

sushant jha said...

नीतीश के पांच सलिया 'वन मेन शो' को मोदी ने एक ही दौरे में 'हाईजेक' कर लिया। दरअसल, बिहार में अपनी दूसरी पारी के लिए एनडीए को एक 'मजबूत' नीतीश नहीं बल्कि 'मजबूर' नीतीश की जरुरत है और इसमें ताज्जुब की कोर्ई बात नहीं। बीजेपी ने मोदी का दौरा करवा कर नीतीश को संकेत भर दिया है कि अगर उन्होंने सीट शेयरिंग के वक्त ज्यादा सख्त होने की कोशिश की या कांग्रेस के साथ पींगे बढ़ाई तो नरेंद्र मोदी बिहार का कई दौरा कर सकते हैं और नीतीश का 'सेकुलर इनवेस्टमेंट' तबाह हो सकता है। इस बार बीजेपी इस फिराक में है किसी भी तरह मुस्लिम वोटों को लालू के पक्ष में मजबूती से 'कंसोलिडेट' करने का प्रयास किया जाए जिसे कांग्रेस और नीतीश ने पिछले पांच साल से 'कंफ्यूज' कर दिया है! नीतीश और कांग्रेस को एक सीमा में रखने के लिए लालू को मजबूत करना जरुरी है...शायद इसीलिए पिछले दिनों गडकारी ने लालू-मुलायम के खिलाफ अभद्र टिप्पणी तक की थी...नीतीश की पार्टी में शरद खेमा बीजेपी का एजेंट जैसा बन चुका है...अब नीतीश इस दुविधा में है कि क्या उन्हें अलग राह चलना चाहिए...? एक तरफ विषकन्या की तरह बांहे फैलाती कांग्रेस, सेक्यूलर होने की मानद उपाधि और दिल्ली का असीम खजाना है...तो दूसरी तरफ बीजेपी का एक ठोस वोट वैंक और एक लंबे समय से चल रही 'यारी' है...

मनोज खलतकर said...

मोदी जी की जय हो.

SACHIN KUMAR said...

मोदी के साथ वाले तस्वीर पर नीतीश ऐसे भड़के मानो किसी ने उनके मोदी के साथ अवैध संबंध की बात कर दी हो। अचानक ही किसी ने कमेंट किया और सारे लोग हंसने लगे।
FOR MORE sachinachin.blogspot.com

राकेश said...
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aam bhartiya-bade sapne said...

jd.u - bha.ja.pa ki shadi me nitish ek mard ko sab haqe hai ki mansikata rakhne wale pati ki tarah hain.pichale pure panch salon ke unke vyavahar se es bat ki pusti ho jayegi.waisa pati jisko patni ki kamai to chahiye per ,lanchan lagne par charitraheen hone ka aarop lagakar sabse pahle dur bhag jaye.
laloo prasad ke sath bhi unhone yahi kiya tha, ab phir........

hamarijamin said...

VINMRA-SANJIDA NETA NITISHJI SE PUCHHANE KA MAN KARATA HAI--'PARTNER! TUMAHARI POLITICS KYA HAI?' modi aap hi ki tarah janta ke bahumat se CM BANE HAIN, WAH BHI BINA KISI GATHBANDHAN DAL KE.nitish ko boj-bhat ke mamale mein rajniti nahi karni chahiye.