इस बार बस्ती के बसने की कहानी- रवीश की रिपोर्ट



तस्वीर में दिख रही पंक्ति रिया नाम की एक लड़की ने लिखी है। अंकुर एनजीओ ने इसे सावदा घेवरा की दीवारों पर चिपका दिया है। लक्ष्मीनगर की एक झुग्गी से उजड़ कर आई थी रिया। सावदा घेवरा। दिल्ली हरियाणा की सीमा पर। रोहतक रोड से दायीं तरफ मुड़ते ही सावदा घेवरा आ जाता है। मेन रोड से पांच छह किमी अंदर। कॉमनवेल्थ गेम्स के कारण पिछले चार साल में दिल्ली की १४ बस्तियों को उजाड़ कर यहां बसाया जा रहा है। अंकुर के लोग यहां बस्ती के बसने की पूरी प्रक्रिया स्टिल और वीडियो कैमरे में दर्ज कर रहे हैं।

वाकई बस्तियों के उजड़ने की कहानी एक दौर में खूब कवर की है। अब तो ऐसी कहानियों के लिए स्पेस ही नहीं है। मगर बस्तियों के फिर से बसने की कहानी कभी नहीं की। कभी जाकर नहीं देखा कि कैसे गेहूं के खेत में प्लाट काट कर ब्लॉक बनाया गया,वहां सभी बस्तियों को बसाया गया। कई ब्लॉक बने। हर बस्ती के लोग यहां आकर बसे। चार साल में भी इनकी पुरानी पहचान नहीं बनी। आज भी ये लोग खुद को खानमार्केट,लक्ष्मीनगर के ठोकर नंबर ग्यारह,नांग्लामाची का ही नाम लेते हैं। एक महिला से पूछा कि जब आपसे पूछता है कि आप कहां की हैं तो सबसे पहले आप क्या बोलती है,जवाब मिला- खान मार्केट,सावदा घेवरा का तो नाम ही नहीं आता। इतना ही नहीं खान मार्केट के पास बसी बस्ती के लोग खुद को वीआईपी कहते हैं। वो अपनी भाषा,बोली और रहन सहन में दूसरों से फर्क करते हैं। कहते हैं लक्ष्मीनगर वाले तो तू तड़ाक करते हैं,हम खान मार्केट वालों के रहने की स्टाइल अलग है। कुछ तो अलग थी। खान मार्केट से आए लोगों के ब्लॉक के मकान बेहतर दिखे। अंदर की सजावट और स्पेस का मैनेजमेंट अलग था। बारह गज के मकान में भी शाही अंदाज़ का अत्यंत लघु रूप दिख रहा है। वाशिंग मशीन से लेकर लैब्रडर कुत्ता भी।

अंकुर ने कई कहानियों को यहां दर्ज किया है। बच्चे अपनी स्मृतियों को किस्से के रूप में दर्ज कर रहे हैं। जिसका किताबी रूप आप अंकुर और सराय के बहुरुपिया शहर में देख चुके होंगे। हरीश ने अपना कंप्यूटर सेंटर खोल लिया है। बसंती आज भी लक्ष्मीनगर काम पर जाती है। कहती है जिन कोठियों में काम करती हूं,उनसे तीस साल का रिश्ता है। जिन बच्चों को गोद में खिलाया अब उनके बच्चे हो गए हैं। सब नानी दादी कहते हैं मुझे। उन्होंने मेरा वेतन भी बढ़ा दिया है लेकिन सावदा घेवरा से लक्ष्मीनगर जाने के लिए चालीस किमी की दूरी तय करनी होती है। सुबह निकलती हूं तो रात में लौटती हूं। बसंती बोलते बोलते रोने लगी कहा कि अब तो दुख का पता ही नहीं चलता। इसी में जीते हैं बस। सुख तो पास भी नहीं आता। आप चले जाओ साहब। क्या करोगे सवाल पूछ कर।

दो दिनों तक देखता रहा कि कैसे इस बस्ती में राजनीति से लेकर त्योहार तक जीवन का हिस्सा बनता रहा। आरएसएस की शाखा लगी। शाखा लगाने वाले ने कहा कि यहां किसी की पहचान नहीं थी। इज़्‍ज़त नहीं थी किसी। शाखा में आने लगे तो पहचान मिल गई। पंडित ओमकार ने अपने प्लाट पर मंदिर बना दिया। बस्ती के बगल में श्मशान की जगह थी तो लोगों ने तो़ड़ दी। वहां पर बाल्मीकि और शंकर का मंदिर साथ साथ बना दिया। लक्ष्मीनगर और नांग्लामाची वालों ने अपनी अपनी मस्जिद बना ली।

ऐसे बहुत सारे किस्से हैं रवीश की रिपोर्ट में। लेकिन हरीश की बात भूल नहीं पा रहा हूं। उसने कहा कि हमारे लिए तो कॉमनवेल्थ २००६ में ही शुरू हो चुका था। जब हमारी बस्तियां उजड़ीं। हम हर दिन बीस से पचीस किमी की दूरी तय करते हैं। बस पकड़ने के लिए तीन चार किमी की दौड़ लगाते हैं। हम तो कॉमनवेल्थ के लिए चार साल से दौड़ रहे हैं। दिल्ली वाले तो अब दौड़ेंगे। कॉमनवेल्थ में वही दौड़ेंगे जो अभी आराम कर रहे हैं।

वाकई बस्ती के बसेन की कहानी में कितने रंग होते हैं। आज रात(शुक्रवार) साढ़े नौ बजे और रविवार रात साढ़े दस बजे आप रवीश की रिपोर्ट देख सकते हैं। कार्यक्रम का नाम है रवीश की रिपोर्ट।

12 comments:

CSNikhilesh said...

Lekh Padh liya hai. Comment Report dekhne ke baad hin karna thik hoga.

Jandunia said...

एक बस्ती के उजड़ने और बसने की कहानी। जिसका जिक्र आपने किया है वाकई उसमें भी कई रंग है। किसी बस्ती के उजड़ने और बसने के दौरान जिंदगी आसान नहीं होती। भले ही कॉमनवेल्थ खेल के नाम पर बस्ती को उजाड़ी गई है लेकिन एक बात गौर करने वाली है क्या कोई खेल इतना महत्वपूर्ण हो सकता है कि आप किसी की जिंदगी को ही अस्त-व्यस्त कर दे। बस्ती वालों के दर्द को समझा जा सकता है। सरकार इस बात को क्यों नहीं समझ पाती है। एसी कमरे में बैठकर बस्ती की दुनिया बदल दी जाती है। किसको कितनी परेशानी हो रही है उससे न नेताओं को मतलब है और न ही नौकरशाही को।

Jai Prakash Pathak said...

namaskaar!

khed hai bijali kii katautii ke kaaraN aapakii riport tiivii par nahiin dekh sakataa huun.

mahaanagaron yaakaheen aadhunik bhaarat ke sabhii nagaron ke vikkas men aadamii kii saarii aavasyakataaon ko dhyaan me rakh kara vikaas kii yojanaa nahiin bannayii jaatii hai. jisake kaaraN un logon ko jhuggiyon men rahanaa paDataa jinase jindagii chalatii hai.

puurvii uttarpradesh aur bihaar yaa desh ke tamaam hisson ke gariib log jo nagaron tatha mahaanagaron ke aam aadamii ke jiivan ko sahaj banaa rahen hai unke niwas kii vyavasthaa yadi thiik se nahiin kii jaayegii to mahaanagaron kaa jiivan narak hotaa jayegaa.

mahaanagaron kaa prasaar vikaas ka lakshan aur parinaam hai.isliye mahaanagaron ko aise raston kii talaash karanii hogi ki mahaanagaron ko jindagii dene vaale logon ko bhii thikaanaa mile aur ujaDane basane kaa silsilaa khatma ho.u.pra. ke maanniiyaa maayaavati jii kii aavaasa yojanaa jaisii koi yojanaa bananii chaahiye tathaa lagat muulya par kishton par diyaa jaanaa chaahiye.

namaskaar.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

देखते हैं इस रिपोर्ट को।

नवीन कुमार 'रणवीर' said...

बस्तियों के उजड़नें और बसनें की कहानी दिल्ली के इतिहास में ही है। ये शहर ही ना जानें कितनी बार उजड़ा और बसा। पहले सल्तनतें उजाड़ती बसाती थी, अब वो जिम्मा सरकारों का है। 2007 तक दिल्ली में 44(सरकारी आंकड़ों के अनुसार) जे.जे कॉलोनियां थी, जिनकी संख्या सन् 62 से आज तक बढ़ ही रही है। 80 गज़ के प्लाटों से चलनें वाला ये सिलसिला आज साढ़े 12 गज़ तक पहुंच गया। औऱ अभी भी ना जानें कितनी कॉलोनियां है जो अनाधिकृत है और जिनका नियमित होना ना होना सरकार के पिटारे पर निर्भर है। जे.जे. कॉलोनियां नियमित होती है, वहां से उजड़नें का तो ख़तरा नहीं है, हां दूरी शहर से होती है, पर इतिहास गवाह है कि इन जे.जे कॉलोनियों नें अपनी दुनिया खुद बसाई है। सुल्तान पुरी,मंगोलपुरी,मदनगीर,दक्षिणपुरी,इंद्र पुरी,त्रिलोक पुरी,कल्याण पुरी,खिचड़ी पुर,रघुवीर नगर(राजौरी गार्डन)मजनूं का टीला, मादीपुर, ज्वालापुरी, हस्ताल, ख्याला, नंदनगरी...फेरहिस्त लंबी है रवीश जी।

डॉ टी एस दराल said...

रवीश जी , विकास की कुछ कीमत तो चुकानी पड़ती है।
डी डी यू मार्ग का हाल आप आज देखिये और तब देखते जब सड़क पर बनी झुग्गियों के बच्चे बीच सड़क पर खेलते थे । क्या गलत किया उन्हें वहां से हटाकर ।
मुफ्त में ज़मीन और सारी सुविधाएँ देकर आज सबके घर बसे हैं । क्या हुआ यदि वो यहाँ से वहां चले गए । एक दिन हम भी तो वहां से यहाँ आये थे सब छोड़कर ।

वैसे घेवरा रोहतक रोड के दायीं तरफ पड़ता है। घेवरा मोड़ के बायीं तरफ हमारा गाँव है भाई।

ravishndtv said...

दराल साहब

हां दायीं तरफ पड़ता है। भूल सुधार कर लिया गया है।

Avtansh Chitransh said...

दिल्ली की हस्ती मुन्हसिर कई हंगामों पर थी.

क़िला, चांदनी चौक, हर रोज मजमा जामा मस्जिद का,

हर हफ्ते सैद यमुना के पुल कटे,

हर साल मेला फूल वालों की सैर का.

यह पांच बाते अब नहीं.

फिर कहो, दिल्ली कहां?

हां कोई शहर कलम रू-हिन्द में इस नाम का था.

दिल्ली वल्लाह अब शहर नहीं है.

कैम्प है. ना क़िला है, न शहर, न बाज़ार न नहर है
ग़ालिब की लाइनें आपकी रिपोर्ट पर फिट बैठती हैं...

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति।
इसे 10.04.10 की चिट्ठा चर्चा (सुबह ०६ बजे) में शामिल किया गया है।
http://chitthacharcha.blogspot.com/

kamlakar Mishra Smriti Sansthan said...

sir
आह! जो दिल से निकाली जायेगी
क्या समझते हो की खाली जायेगी
अकबर अल्लाहाबादी
vikas shabd sabke liy ek hi matlab rakhe ye baat en logo se behtar kayon bata sakta hai........kisi ka vikas aur kisi ka binas
maine apka tv report 09 apr 10 ko dekha tha. thanks a lot

CSNikhilesh said...

Ravishji,

Report achhi lagi. Kai tarah ke bhawnao ko samete ek yatharth jise Jindagi kahte hain.

Agli report ka intazar rahega.

कुलदीप मिश्र said...

रवीश जी प्रणाम!, भाई वाह! "रवीश की रिपोर्ट" जैसा कार्यक्रम किसी न्यूज़ चैनल पर पहले कभी नहीं देखा...दिल्ली का लापतागंज और बस्ती को बसते देखना अविस्मरणीय था....मैं तो पूरी रिपोर्ट की विडियो के जुगाड़ में हूँ...यूट्यूब पर भी नहीं मिला...आभारी रहूँगा यदि मदद करेंगे...कुछ ना हो तो कृपया यूट्यूब पे तो डलवा ही दें...