हमारी सोसायटी का मंदिर

मैंने बचपन से देखा है किसी खास दिन लोग अपने घरों से निकल कर मंदिर जा रहे हैं। पटना के महावीर स्थान मंदिर में दूर दूर से लोग आते थे। आज भी आते हैं इस बात के बाद भी कि रास्ते में हनुमान जी के कई छोटे छोटे मंदिर हैं। अगर आप पश्चिम से आ रहे हों तो रास्ते में राजा बाज़ार का हनुमान मंदिर पड़ता है। अब यहां भी उतनी ही भीड़ होती है जितनी स्टेशन वाले महावीर स्थान मंदिर में। बाद में कई शहरों में इस तरह के सार्वजनिक और बड़े मंदिरों में गया हूं। दिल्ली आया तो दोस्तों को सीपी वाले हनुमान मंदिर और आईएसबीटी वाले हनुमान मंदिर जाते देखा। किसी मंगलवार को चार्टर्ड बस में जा रहा था, तभी आईएसबीटी के पास बस रूकी और कोई कोई भक्त बुनिया लेकर आ गया। सब एक साथ चिल्लाये- जय बजरंगबली। फिर बुनिया वितरण हो जाता था।

धीरे धीरे हनुमान जी को चुनौती देने के लिए कई दूसरे भगवानों के आकर्षक मंदिर बने। दिल्ली के मंदिर पैकेज की तरह हो गए। कोशिश की गई कि एक ही मंदिर में सभी देवताओं की प्रतिमा लगा दो। वैसे ही जैसे दर्शक को टाटा स्काई लगाने से सारे चैनल मिल जाते हैं। लेकिन यह व्यवस्था भी बदल गई। शनि महाराज और साईं मंदिर ने ऐसी चुनौती दी कि हनुमान और दुर्गा वाले मंदिरों की रौनक फीकी पड़ गई। कमलानगर मार्केट के पीछे एक मोहल्ले के मंदिर गया था। पुजारी ने कहा कि बाहर शनि मंदिर बना दिया है ताकि लोगों को दिख जाए कि हमारे यहां शनि मंदिर भी है। लोगों ने आना बंद कर दिया था और वो किसी और जगह जाने लगे थे जहां शनि का मंदिर था। इसी तरह से दिल्ली में कई शनि मंदिर खुल गए। काले कपड़ों वाले राजस्थानी टीवी एंकर भी बन गए। सब टीवी पर।

अब धीरे धीरे शनि के समानांतर साईं कृपा की धूम है। हर मोहल्ले में साईं मंदिर खुल रहे हैं। मेरे वैशाली में तीन चार साईं मंदिर पिछले तीन चार सालों में बने हैं। शाम को काफी भीड़ होती है। हनुमान मंदिर पर दीया जलता रहता है। कोई भीड़ नहीं होती। साईं ने लोकप्रिय दैनिक ईश्वरों में से चैंपियन रहे हनुमान को शिकस्त दे दी है। दिल्ली की बसों में पहले कई लोग हनुमान चालीसा पढ़ते मिल जाते थे। अब साईं कृपा बांचते रहते हैं। दुर्गा जी का साल में दो बार टाइम फिक्स है इसलिए वो कंपटीशन में नहीं हैं। शिव भक्तों ने भी अपनी एक संस्था बना ली है। शिव गुरू है का अभियान चल रहा है। लेकिन अब शिव मंदिरों की कोई बात नहीं करता। शिवरात्रि कब आती है,कब जाती है,पता नहीं चलता। यहां तक कि पुरानी दिल्ली में डिलाइट सिनेमा के किनारे एक मंदिर है। मंदिर की छत पर शिव की प्रतिमा बना दी गई है। पुजारी से पूछा तो जवाब मिला कि भाई लोगों को पता तो चले कि मंदिर है। दूर से दिखाई ही नहीं देता। बड़ी बड़ी इमारतें बन गईं हैं। इसलिए शिव की प्रतिमा छत पर लगा दी है। अपार्टमेंट के मंदिरों के साइनबोर्ड भी अब प्रायोजित होने लगे हैं।

पटना के बांसघाट के बगल में जब मैं हर दिन गंगा नहाने जाता था तो वहां के मंदिरों में काफी भीड़ देखा करता था। लेकिन गंगा के मलिन होने के बाद अब नदी का यह किनारा दाह संस्कार के ही काम आता है। नहाने वाले लोग कम हो गए। नदियों के किनारे नहाने का चलन लगभग समाप्त होता जा रहा है। बाथरूम ने काफी कुछ बदल दिया। वहां के मंदिर अब वीरान नज़र आते हैं। कोई पूछता नहीं। पुजारी की आंखें धंसी हुई लगती हैं। उसे समझ में नहीं आता कि क्या हो गया? लोग कहां चले गए? और गंगा जो इतने करीब थी, वो कहां चली गई?

यहां से मंदिर व्यवस्था में एक और बदलाव आ रहा है। शहरों में अपार्टमेंट कल्चर ने पुराने मोहल्लों को विस्थापित कर नए तरह के मोहल्ले बना दिये हैं। एक मोहल्ले के भीतर कई मोहल्ले बन गए हैं। एक मोहल्ले में कई अपार्टमेंट हो सकते हैं। बदलाव एक और है। अब हर अपार्टमेंट का अपना एक मंदिर होने लगा है। मेरे अपार्टमेंट के सामने आशियाना सोसायटी में भी एक मंदिर है। मगध अपार्टमेंट में हाल ही में एक नए मंदिर का उद्घाटन हुआ। पटपड़गंज की कई सोसायटियों में भी अलग अलग मंदिर बने हैं। बंगलूरू में मेरा दोस्त रहता है। उसकी सोसायटी में जैन मंदिर है। इसलिए वहां मांस मछली बनाना मना है।

यह बदलाव हिंदू धर्म में ही नहीं है। पंजाब के मलेरकोटला में पिछली बार गया था। वहां के पुराने नवाब ने एक प्राइवेट मस्जिद बना रखी है। सजावट और डिज़ाइन में बेहतरीन। घर के अहाते में पहली बार मस्जिद देखी। जबकि मलेरकोटला की शाही मस्जिद इतनी खूबसूरत और बड़ी है कि शहर में और मस्जिदों की ज़रूरत ही नहीं। जामा मस्जिद या भोपाल,देवबंद और लखनऊ की मस्जिदों के टक्कर में मलेरकोटला की मस्जिद का जवाब नहीं। लेकिन प्राइवेट मस्जिद देखकर हैरान हो गया था।

हमारी सामाजिकता और सार्वजनिकता के ठिकाने बदल रहे हैं। मंदिर मस्जिद रोज़गार के एक बड़े केंद्र हैं। इनके प्रसार को मैं इसलिए भी अच्छा मानता हूं। इन्हें कभी अतिक्रमण के तौर पर नहीं देख सका। जब मेरे मोहल्ले में कोई मंदिर बनता है तो मुझे यही लगता है कि एक दफ्तर खुल गया है। आंशिक रूप से आस्तिक और नास्तिक होते हुए भी मंदिरों में मेरी दिलचस्पी रही है। पहले नदियों के किनारे पाप धुलते थे,अब नदियां नाली में घुल गईं तो पाप कर्म की वाशिंग के लिए भांति भांति के आकर्षक मंदिर बन रहे हैं। रिकार्डेड मंत्र तो कब से बज रहे हैं। पुजारी सिर्फ घंटी टनटनाता रहता है।

जल्द ही आप इस पर एक स्पेशल रिपोर्ट भी देखेंगे।

35 comments:

जितेन्द़ भगत said...

कई मंदि‍रों के बनने से इनका वि‍केंद्रि‍करण हुआ है, और आस्‍था अपने दायरे में सि‍मटकर मंदि‍र के मार्केटिंग को चूना भी लगा रही है। सरस व्‍यंग्‍य।

इरशाद अली said...

चुनाव के मौसम में अलग हट के लिख दिये हो। बहुत अच्छा। अब धर्म का भी बजारीकरण हो गया है।

मुनीश ( munish ) said...

This is very confusing scenerio. Lack of some kind of central command among Hindus is responsible for this. Building temple is easy ,but it is hard to maintain the sanctity. I was there during Kargil episode .Having spent 12 days in that town, first time in life i longed to see a temple or some calendar having a Hindu God on it which i generally alvez took for granted in Delhi. Too much of anything is troublesome . There should be a blanket ban on constructing new places of worship by any religious group.

ajay kumar jha said...

ravish bhai,
mujhe to santoshee maataa kaa jamaana bhee yaad hai, uske baad hanumaan jee kaa bhee, fir brahaspati dev kaa aur aajkal sai baba kaa hai, mandir bhee unheee ke anuroop bante chale jaate hain, aur aajkal kin blolgon kee taiyaaree hai hindustaan ke lieye, aapkaa coloumn main sambhaal ke rakh letaa hoon.

tanu sharma.joshi said...

काश इस बाज़ार को जल्द से जल्द लोग समझ पाएं...

Mahendra Singh said...

Hamare yahan Mandir aur Masjid/Dargah rojgar muhaiyya karane ke bahut bade sansthan hain. Tirupati, Shirdi,Ajmer sharif,Vaishnodevi, Golten temple jaise dharamsthal kitne parivaron ka pet paal rahen hain.Aabadi badhne ke sath sath dharamsthalon kee jarurat bhi badh gaye hai.

Dipti said...

मेरे मुताबिक़ तो मंदिर अतिक्रमण करने का सबसे अच्छा रास्ता है। एक दिन रात में किसी भी खाली मैदान में पेड़ के नीचे एक पत्थर को सिंदूर से पोतकर रख दिजिए और एक अगरबत्ती लगा दीजिए। फिर कुछ दिन बाद एक चबुतरा। फिर मंदिर और फिर पुजारी का घर...
भोपाल में ऐसा ही मंदिर है कर्फ्यूवाली माता। जिसके बनने के चलते इतनी अशांति फैली थी कि कर्फ्यू लगाना पड़ गया था। देवास में ऐसे ही एक जबरेश्वर महादेव है। क्योंकि वो बीच चौराहे में जबरन में स्थापित किए गए थे।
भोपाल में जवाहर चौक पर एक मंदिर ऐसा ही है। वहाँ एक पत्थर की पूजा की जाती है। मम्मी की बुआ वही रहती है और हर मंदिर में जाती है केवल उसे मंदिर को छोड़कर। वजह ये कि उन्होंने उस पत्थर को सालों तक सड़क किनारे पड़े देखा है। कई जानवरों को उसे गीला करते देखा है। वो कहती उसे देखकर श्रद्धा जैसी को भावना मन में आती ही नहीं है...

JC said...

मानव शरीर स्वयं एक मंदिर है जिसमें निराकार परमात्मा का निवास स्थान माना जाता रहा है - 'हिन्दुओं' द्वारा सनातन काल से.

मानो तो भगवान/ नहीं तो 'लल्लू' ('लालू' हो या 'लाल कृष्ण'!)!

prabhat gopal said...

bhagwan par bharosa kam ho ya jyada, lekin mandir badhte ja rahe hai. ab jaha tak bhakti ki baat hai, man kab kidhar jhuk jaye, ye to khud bhagwan bhi nahi jante. jamane ke sath mandir culture bhi badal rahe hai aur ham bhi.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

कोई ये तो बताए कि भारत में मंदिर कब से बनने लगे हैं? राम के जमाने में तो मंदिर थे नहीं। वे तो पूजा के वक्त प्रतिमा बनाते थे और बाद में उसे नदी आदि स्थान पर विसर्जित कर देते थे। जैसा दुर्गापूजा और गणपति पूजा में होता है।

Science Bloggers Association said...

सही कहा आपने, आजकल धार्मिक स्थल रोजगार केन्द्र में तब्दील हो गये हैं।
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तस्‍लीम
साइंस ब्‍लॉगर्स असोसिएशन

JC said...

भारत में पहले योगी होते थे जो हिमालय की गुफा में चले जाते थे और मन को साधते थे - शुन्य में जीवित अवस्था में ही पहुँचने हेतु तपस्या करते थे.

मंदिर तो गृहस्त के लिए बनाने लगे. मानो तो भगवान, नहीं तो पत्थर की मूर्ती भर.

आज की भाषा में, हीरा तराशने के बाद ही मूल्यवान होता जाता है - नहीं तो कोयला ही तो है!

भूटान में अखरोट वृक्ष आग सेकने के लिए प्रयोग में लाया जाता था कभी. जबकि भारत में वो कीमती माना जाता है...

प्रश्न आस्था का है. मंदिर कोई विमान नहीं है जो स्वर्ग लेजायेगा सभी को :)

Harsh said...

raveesh ji post achchi lagi.. special report ka intjaar rahega.....

अनिल कान्त : said...

kya baat hai ...majedar
bahut achchhi lagi ye post

मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

anil yadav said...

कई बार विंध्याचल गया हूं वहां पर माता के दरबार में पंडित जी द्वारा कई तरह के हवन पैकेज का प्रस्ताव देखकर हैरान रह गया हूं.....51 रुपये से शुरु होने वाले ये हवन पैकेज 5100 रुपये तक के होते हैं ....और भक्तों के न मानने पर पंडित जी 11 रुपये में सिर्फ टीका लगाकर ही 5100 रुपये वाले पैकेज का लाभ दिलाने का वादा करते हैं....

वैसे बजरंग बली आज भी मेरे लिए सबसे हिट हैं....जय बजरंग बली की

नितिन माथुर said...

सदक से शुरू हुई धामिर्कता अब सड़क तक पहुंच गई है। समझ नहीं आता की धर्म स्थानों का बढना अच्छा शगुन है या बुरा।

जहां एक तरफ धार्मिक लोगों का इजाफा होने का भ्रम होता है तो वहीं दूसरी तरफ लोगों की अनंत इच्छाओं को पूरा करने की एक तरकीब के रूप में धर्म को देखो तो बेचैनी बढती है।

एक फिलास्फर ने कहा है कि अगर भगवान होता तो इंसान उसे मार डालता और अगर भगवान नहीं होता तो इंसान उसे इजाद कर लेता। यह एक ऐसी व्यवस्था है जिसकी जितनी ज्यादा जरूरत है, उतनी है व्यर्थ भी है।

क्या लगता है कि उन धर्म स्थानों पर आखिर कौन लोग जाते हैं। हम और आप जैसे ही न।

JC said...

Ravishji - इंदु का मतलब चाँद, हिन्दू का मतलब हर एक व्यक्ति क्यूंकि उसके माथे में चंद्रमा का सत्व है - शिवजी के ही नहीं. अहम् शिवोहम, कह गए ज्ञानी!

मानव शरीर अष्ट चक्र से बना है - अष्ट सत्वों से, आठ 'ग्रहों' के, जिनमे सर्व श्रृष्टि का सत्व जमा है - भानुमती के पिटारे समान.

अफ़सोस, काल के प्रभाव से 'हिन्दू' आज हनुमान जी के पीछे हाथ धो कर पड़ा है, अज्ञानता वश कि मूलाधार चक्र में सबके मंगल गृह का सत्व है जिसे कुण्डलिनी जगा कर माथे तक लेजाना है. तभी संपूर्ण ज्ञान हासिल हो सकता है :)

जय बजरंगबली/ तोड़ दुश्मन की नलि - कहना ही होगा!

cmpershad said...

जितना पाप बढेगा, उतने भक्त और मंदिर बढेंगे...आखिर उन्हें पाप जो धोना है:)

mohit said...

janaab aaj kal manidr reh he kaha gaye hai..wo to museum bantey jaa rahey hai..entry karney ke paisey lag rahey hai(akshar dhaam mandir) aur waisey bhi mandir ho ya maszid wo zameen pe kabza karney ka ek asaan tareeka hai..dam hai to tod ke dikha do.. 50 trah ki baatey nikal ayengi dangey ho jayengey...

**ravish ji aapki jaankari ke liye-- kaaley kapdey waaley baba shani maharaj..news24 aur india tv pe aatey hai...unki trp bhi bad chuki hai aur ..aur kafi demand me hai baba...

vijay gaur/विजय गौड़ said...

सुंदर रिपोर्ट है रवीश जी। आपका अनूठा अंदाज पसंद आया। बहुत ही सहजता और बिना हल्ले-गुल्ले के आपने बहुत कुछ कह दिया है- एक जिम्मेदार नागरिक और जिम्मेदार पत्रकार की भूमिका से भरा आपका यह आलेख मुझे तो अनूठा लग रहा है।

JC said...

एक joke याद आता है जो SRK ने AVB की पुस्तक के विमोचन के उपलक्ष्य में कहा था की यह इस देश का दुर्भाग्य है की जिसे कवि होना चाहिए था वो प्रधान मंत्री बन जाता है!

अंग्रेजी में भी एक कहावत है, "Square peg in a roiund hole".

चंद्रमा जैसे गोल गोमुख से गंगा अवतरित हो धरती पर फ़ैल जाती है, चौड़ी हो जाती है, या कन्याओं की चोटियों जैसे बट जाती है - जिस कारण शायद नाम भी कन्या के नाम पर रखा गया. फिर भी कोसी के समान बाढ़ आने पर चंडी रूप धर लेती है! अपने निरंतर प्रवाह के कारण यह अनंत शिव यानि धरती को प्रिय है क्यूंकि चंद्रमा इसीके माथे पर है! आज का मानव जिस थाली में खाता है उसी में छेद भी करता दीखता है - भस्मासुर समान शिव से वरदान पा, शिव को ही जलाने की सोचा! विष्णु के मोहिनी रूप, चाँद को, भूल गया, जो उस्ताद है माथा घुमाने में - किसी का भी कभी भी!

जय माता की! गंगा की, और गौ की भी!
हो सकता है यह भैंस के सामने (ज्ञान की देवी सरस्वती) वीणा बजाने जैसा हो :)

creativekona said...

भाई रवीश जी ,
आपका ये कहना सही है कि मंदिर मस्जिद या अन्य धार्मिक स्थलों से बहुतों के रोजगार जुड़े होते हैं ..नए स्थलों के खुलने से मन खुश होता है ..लेकिन इन धार्मिक स्थलों का जब राजनैतिक इस्तेमाल शुरू हो जाता है ....इन्हें कैश कराया जाता है तो यही हमारे समाज के लिए मुसीबतें भी खड़ी करने लगते हैं ..
आप खुद सोचिये ..पहले लोग विवाह के लिए लडकी देखने दिखाने ,शादी के बाद दर्शन करने धार्मिक स्थलों की और ही रुख करते थे लेकिन अब इसमें भी कमी आती जा रही है ...धार्मिक स्थलों का अब वो स्वरूप नहीं रह गया जो अज से एक दशक पहले था ...वहां अब वो शांति नहीं मिलती जो पहले मिला करती थी ...क्या कारन हैं इसके पीछे जरा इस पर भी विचार करियेगा .मंदिरों के सहारे ही जूता ,फूल माला ,जेब कतरों कितने ढेर सारे लोगों का रोजगार जुडा है अगर ये मंदिर नहीं बनेंगे तो इन सबका क्या होगा .

हेमंत कुमार

JC said...

फार्मूला एक ही है - मंदिर इत्यादि पूजा के स्थल की भी काल के साथ उत्पत्ति हुई, आदमी ही केवल बन्दर के बच्चे से आरंभ कर परिपक्व शरीर और मस्तिष्क वाला मानव नहीं बना. इस फार्मूला बनाने वालों या वाले को क्या कोई ढूँढ पायेगा??? क्या वो रविशजी या 'NDTV' के बस में है?

जहाँ तक मेरा निजी अनुभव रहा है यह चैनल भले ही सबसे आगे हो, किन्तु मामले की तह में जाने में समर्थ नहीं है - वैसे ही जैसे विज्ञानं को अभी बहुत लम्बा सफ़र तय करना है सत्य की तह में पहुँचने के लिए!!!

जय माता की!

आदर्श राठौर said...

और मंदिर भी ख़ास देवी देवताओं के हिट हो रहे हैं, साईं बाबा की पूजा धन लालसा में होती है और शनिदेव की भय से...

आदर्श राठौर said...

एक समया था जब हनुमान पूजा स्त्रियों के लिए वर्जित समझी जाती थी लेकिन आजकल हर सोसाइटी में सुन्दर काण्ड पढ़ने वाले ग्रुप बने हुए हैं।

vikram singh bathyal said...

aajkal to publicity pane ke liye bhagwaan tak ko nahi chodte

JC said...

उन दिनों UP के पहाडी इलाके में दो dialects थे, कुमाऊनी और गढ़वाली. हमारे बाबूजी एक किस्सा दोहराया करते थे की कैसे शिमला में एक आदमी कुमाऊनी ही बोलता था. सबने यह जानने के लिए की उसकी असली जुबान क्या है, एक रात जब वो सोया हुआ था तो उसे चूंटी काट दी. वो तुंरत जाग गया और उसके मुंह से निकला "ओह बुई"!

उपर्युक्त किस्से से पता चल गया की वो गढ़वाली था, और कैसे हर आदमी के माथे के सबसे उपर 'माँ' रहती है!

JC said...

मंदिर की चर्चा हो तो जूते चप्पल की चर्चा आवश्यक हो जाती है, और आज तो यह नेताओं पर भी चल रहे हैं! त्रेता में तो राम की खडाऊं भैय्या भरत के परोक्ष रूप में राज्य चलाने के काम आई...आज के नेता भी तो आम आदमी की ओर से काम चलाऊ राजा ही नहीं है क्या?...

खैर छोड़ो - मंदिर पर आओ. 'आम आदमी' आज भी श्रद्धा भाव से बाहिर ही सबके जूते-चप्पल मुफ्त में सम्हालते हैं, भरत समान. किन्तु ख़ास-ओ-आम आदमी भगवान के लिए मजबूरी के कारण मत्था टेकता है - 'श्मशान वैराग' समान, क्यूंकि मंदिर से निकलते ही कहीं शायद किसी रैली में चला जाता है. क्या करने? भगवान ही जाने, जिसके मंदिर में माथा टेक कर आया था. भीड़ में बहुत काम हो सकते हें - नेता हो तो भड़काऊ भाषण देने, गरीब हो तो राशन...'बिगडा' हो तो पत्थर आदि फँकने, पुलिस हो तो लाठी/ गोली चलाने, आदि आदि ('पोथी पढ़ा' पत्रकार हो तो जूता/ चप्पल नेता पर फेंकने को:)

zakir khan said...

this is a good blogging please give me ideas about the blogging

zakir khan said...

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sorry i cant speak english

JC said...

Shri Zakhr ji, Ravishji is a busy anchor. He hardly has time to react to comments...

I find that you are a student of Class XI, ie., you are around 17 yrs of age.

You might know that writing comes with experience, and lots of practice. Keep on writing your thoughts on different subjects in whatever language you feel you can handle easily, say in a diary till you are confident enough to express it in the blog.

When I was your age, I used to run away if somebody spoke to me in English! Now as an old man I am not afraid to express my views, whether anyone reads it or not, because I feel everyone has certain different inclination of mind and today everyone wants to speak and not hear.

Most of the time you would find that you are likely to misinterpret what another says or writes because of your limited experience and immature mind-set. For example, if your shoes are torn, you might feel an inferiority complex. And, if you find someone smiling you might believe he or she is smiling at your poor material status for no one can enter your mind! That only reflects your 'material' status, but not the 'spiritual', which matters more in the eyes of God...it is said that a fakir, who has nothng to lose, can sleep more peacefully than a king even!

Best wishes!

Deepak Choubey said...

दरअसल पूरे मंदिरों को हम आजादी के बाद से अबतक की राजनीतिक व्यवस्था से जोड़ सकते हैं।
आमआदमी, छुटभैय्ये नेता, हाई प्रोफाइल वीआईपी।
मंदिर बाजार एक दिलचस्प प्लॉट है। स्पेशल रिपोर्ट तो आनी ही चाहिए। करीब दो दशक पहले जब बिहार में हाईवे टाइप का कॉन्सेप्ट आया, तो सारे देवी देवता गांवो से निकल कर सड़कों पर मुस्तैद हो गए. टोल टैक्स वसूलने। कुछ वैसे ही जैसे धान के खेत में पानी घुसने पर चूहे मेंडों पर आ भागते हैं। साफ कर दूं, मैं भयानक आस्तिक हूं। निशाना भगवान नहीं, उनके नाम पर धंधा करने वाले हैं।

JC said...

चौबे जी, आज एक सोलह साल का बच्चा भी गर्व से कहता है कि वो भगवान में विश्वास नहीं करता! वो भी पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव में भारतीयों के लम्बे समय तक आने के कारण ही यह कहता है. हम जानते हैं कि हिन्दू मान्यता के अनुसार पश्चिम दिशा का राजा शनि है, यानि शैतान कृष्ण, या नटखट नन्दलाल जिसे नीलाम्बर भी कहा गया. किन्तु उसका पीताम्बर रूप ही सर्वोच्च माना जाता है, जो उत्तर दिशा का राजा है. ज्ञान कि देवी सरस्वती कि पूजा बसंत ऋतू के आगमन पर मनाई जाती है, जब पीली सरसों बहार में होती है! रंगों में सुनहरी रंग गुरु माना जाता है. और यह भी सब जानते हैं कि कैसे इससे लगाव रावन के पतन का कारण बना...राम के हाथ मोक्ष पा गया फिर भी!

कृष्ण, सच कहें तो, शैतान ही होगा! उसकी माया वो ही जाने. ज्ञानी किन्तु संसार को ही मिथ्या बता गए - इसे एक झूठा बाज़ार कह गए, जहाँ झूठ ही बिकता है...

मंदिर के अन्दर प्राण-प्रतिष्ठित मूर्ती आवश्यक मानी गयी...और वैसे ही मानव शरीर के भीतर आत्मा ही VIP...

छ्तहार said...

स्पेशल रिपोर्ट में वसुंधरा गाजियाबाद का जिक्र करना मत भूलियेगा। हिन्डन के किनारे-किनारे सेक्टर 15 से लेकर सेक्टर चार तक पूरे ग्रीन बेल्ट पर मंदिर माफिया ने कब्जा कर लिया। साई मंदिर, केदारधाम, बदरीधाम, कालिका माई, अंबेडकर, शिव, गुरुनानक.. सौ-सौ मीटर की दूरी पर तमाम मंदिर मिल जाएंगे आपको। छह महीना पहले तक जहां हरे पेड़ बड़े हो रहे थे, वहां रातों-रात साई मंदिर खड़ा हो गया। सुबह शाम शोर होता रहता है। मंदिर माफिया का हित तो समझ में आता है लेकिन लोग क्यों वेबकूफों की तरह वहां श्रद्धा के नाम पर चले आते हैं समझ में नहीं आता। जरा पूछिये उन लोगों से जो मंदिर के पास के मकानों में रहते हैं। सुबह शाम के शोर से उनका रहना दूभर हो गया है। प्रशासन कहां है? सरकार कहां है? सरकारी जमीन पर कब्जा करने के खिलाफ बनाए गए कानून कहां हैं? कोई इसकी बात नहीं करता।