लालू को लू

लालू कैमरे के सामने बेचारे क्यों लग रहे हैं? हमारे पेशे की भाषा में आउट ऑफ फोकस लग रहे हैं। शुक्रवार को दरभंगा में बाबरी मस्जिद का ज़िक्र कर दिया। कांग्रेस को ज़िम्मेदार बता दिया। बाबरी का मुद्दा हर चुनाव में उठाया जाना चाहिए। क्योंकि उसका गिरना एक राजनीतिक गुंडई का परिणाम था। लेकिन जिस तरह से लालू इसका ज़िक्र कर रहे हैं उससे साफ है कि इस मुद्दे के बहाने वो मुसलमानों को बंधुआ समझते हैं। मुलायम की भी यही गत होने वाली है। पता नहीं क्यों लग रहा है कि लालू का वाटरलू हो चुका है। गए भाई साहब। लालू भले नेता बने रहे लेकिन वाकई अब आरजे़डी की कोई प्रासंगिकता नहीं बची है। लालू ने खुद कहा था कि २० साल राज करेंगे। बिहार और दिल्ली मिलाकर उनके २० साल हो गए हैं। बिहार में एक नई राजनीतिक धारा के उदय का इंतज़ार होना चाहिए। ब्रांड न्यू। इसका उसका मिलाकर नहीं। अप्रैल में ही लालू को लू लग गई है। वाटरलू तो मई में होगा।

19 comments:

creativekona said...

अब लालू भैया लगता है सत्तू पीना छोड़ के कुछ और ...सेवन करने लगे हैं ..तो लू तो लगेगी ही.........
हेमंत कुमार

काफी टाइम said...

रवीश भाई, सुप्रीम कोर्ट के SIT ने तीस्ता सीतलवाड के फर्जीवाड़े के बारे में जो रिपोर्ट दी है उस पर आपका क्या मत है?

नीचे दिये लिंक को जरूर पढ़ना

http://sureshchiplunkar.blogspot.com/2009/04/teesta-setalvad-gujrat-riots-supreme.html

prabhat gopal said...

lalu ji gaye kam se. lagta to yahi hai.

Shiv Kumar Mishra said...

सुना है लू से बचने के लिए प्याज बड़े काम आती है. यूपीए के राज में प्याज का दाम बढ़ा भी नहीं है. उन्हें ट्राई करना चाहिए.

वाटर-लू से कैसे बचें, इसके लिए रिचर्ड निक्सन की जीवनी वगैरह पढें. शायद कुछ आराम मिले.

Harsh said...

raveesh ji is chunav ke vatralu me laltain bujhne wali hai... .sahi farmaya hai aapne

विनीत कुमार said...

तो क्या समझे,लालू की भैलिडिटी खतम। अब बिहार की जनता को कोई और कार्ड स्क्रैच करना होगा।..

संजय बेंगाणी said...

लालू तो आपके हिरो है, उन्हे कहाँ लू ला लगेगी.

बाबरी का जिक्र हर दिन होना चाहिए, ताकी देश में अशांति बनी रहे.

JC said...

"...बिहार में एक नई राजनीतिक धारा के उदय का इंतज़ार होना चाहिए।..."

शायद मायावती का सपना, अन्य व्यक्तियों के भी अन्य सुखद सपने भी, प्राचीन 'माया सभ्यता' द्वारा अनुमानित प्रलय की तिथि (?) के सही निकलने पर भगवान् ही जाने भविष्य क्या नाटक दिखलाता है... अभी तो आसार अच्छे नज़र नहीं आते...'उम्मीद पर दुनिया कायम है'

काजल कुमार Kajal Kumar said...

२० साल बहुत होते हैं..नगरवधू का जीवन इतना ही होता है, अब loo जाने के ही दिन हैं...ये कितने भी खीसें निपोरे / छिनालाई करे ..ग्राहक नहीं लौटेंगे...बस यौवन गया, बहुत हुआ.

Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna said...

रविश भाई ,
बाबरी मस्जिद विध्वंस की तुलना मेरे एक मित्र ने " खेतिहर ग्रामीण धर्म परायण समाज की वृधा हिन्दू विधवा के साथ सामूहिक बलात्कार " से की थी .तब से न तो मैं उस विध्वंस को भूल पाया हूँ और न हिन् मित्र की उस तुलना को .क्या वाकई लालू आउट ऑफ़ फोकास दिखाते हैं या फिर उनकी premature ओबितुअरी लिखी जा
रही है ?
सादर

sushant jha said...

रवीशजी, लालू का वाटरलू वाकई इसीबार हो जाता लेकिन अब मुझे इसमें संदेह हो गया है। इसकी कुछ ठोस वजहें हैं।
लालू भले हीं अदर से खौफजदा हों जैसा कि उनका वाडी लेंग्वेज बता रहा है लेकिन नीतीश ने कुछ काम अतिआत्मविश्वास में दुस्साहसजनक तरीके से कर दिया है जो लालू को एक और मौका दे सकता है। चुनाव जिन तीन बातों के सहारे लड़ा जाता है उसमें नेतृत्व की छवि,प्रचार अभियान और टिकटों का सही वितरण अहम है। नीतीश शुरुआती दोनों में बढ़त लिए हुए दिखते हैं लेकिन टिकटों के वितरण में लालू उनपर बीस पड़ गए हैं-और यहीं आशंका है कि फिर से लालू बिहार के माथे पर न सबार हो जाएं।
नीतीश ने पार्टी में अपनी सत्ता निर्विवाद रखने के लिए कमजोर उम्मीदवार उतारे हैं और हेवीवेट्स को बाहर का दरवाजा दिखाया है। बिहार की जनता आजतक नहीं जान पाई कि जार्ज फर्नांडिस, दिग्विजय सिंह, नीतीश मिश्र और नागमणि का टिकट क्यों काटा गया। इसकी कोई ठोस वजह नीतीश कुमार नहीं गिना पा रहे। मतदाताओं के खास वर्ग का गुस्सा उन्हे झेलना पड़ सकता है। उनके स्टार प्रचारकों में उनके अलावा शरद यादव और लल्लन सिंह हैं जो कल तक उनके सेक्रेटरी जैसे थे।
हां, ये बात सही है कि लालू का भूत मतदाताओं को इतना डराता है कि इसका लाभ नीतीश को ही मिलना है और लालू के पास नया कुछ देने को नहीं। लेकिन बिहार जैसे जातिवाद ग्रस्त और राजनीतिक संवेदनशील(या जागरुकता?!!!) समाज में कहीं नीतीश को लेने के देने न पड़ जाएं।
हलांकि मेरी शुभकामनाएं नीतीश जी के ही साथ है।

आदर्श राठौर said...

लालू पर तीखी टिप्पणी के लिए बधाई के पात्र हैं, प्रसन्नता हुई।

उपाध्यायजी(Upadhyayjee) said...

बुझात बा की गईल भैसियाँ पानी में. देखिये जाती के अंक गणित में लालू जी बाकी लोगो से आगे थे. वो कुछ फार्मूला लेकर आये थे. लगता था की जाती के आधार पर फार्मूला बनाने में पि एच डी कर के आये हों. उनके देखा देखि सब फार्मूला सिख गए. ऊपर से विकास का हवा. बिहारियों को विकास और शांतिप्रिय माहौल का स्वाद मिल गया. उनकी बौखलाहट लाजिमी है.

anil yadav said...

ch.....के मनाने से डांगर नहीं मरते.....
बहुत पुरानी कहावत है लेकिन आज भी प्रासंगिक hai......
चुनावों के बाद अखबार और टीवी की हेडलाइन्स आज ही देख लो ....LALOO HIT BACK.....

JC said...

क्या तब किसी ने सोचा था की '७७ (?) की हार के बाद इंदिरा गांधी '८० में फिर लौट आयेगी, और '८४ में गोली भी खायेगी???

ऐसे संकेत हैं की 'भारत देश' सबसे प्राचीनतम देश है. यहाँ पर काशी से आरंभ कर निराकार ब्रह्म ने विन्द्याचल पर्वत के अमरकंटक से नर्मदा का उद्गम स्थापिट कर, धरती के गर्भ से हिमालय को निकाल, पार्वती से विवाह रचा, कैलाश पर्वत पर बैठ गंगा, यमुना को भारत भूमि की ओर प्रवाहित कर फिर वहां से ही मानव की मूर्खता का ड्रामा, पूर्व निर्धारित स्क्रिप्ट के अनुसार देख रहे हैं अपने परिवार के साथ - शायद अपने मनोरंजन के लिए या कुछ ढूंढ रहे हो. शायद अपनी माँ को :)

dharmendra said...

ravish sir lagta hai aapke blog ke sabhi log lalu virodhi hi hain. ek lalu ko harane ke liye itne logo ka shraap. phir aap socho lalu ko aap abhi tak khatam nahi kar paye. lalu se aaplogo ki personally koi dushmani hai kya. aaplogo ne bihar ka kaun se udhar kar diya hai. delhi me baith kar ac ka hawa lekar lalu ko shraap rahe ho. satta se abhi bukh nahi mitti hai kya. kya aaplogo ko hi malai khane ka huk hai. 90 tak to aapne hi raaj kiya to bihar ko newyork nahi bana diya aap logo ne.

ravish kumar said...

दोस्तों, जब मैं नीतीश पर लिखता हूं तो कहते हैं लालू को बचाते हैं। जब लालू पर लिखते हैं तो कहते हैं नीतीश को बचाते हैं। अरे इन सबको जहां है जैसा है के आधार पर लिखते देखते रहते हैं।कल जब लालू जीत जाएंगे तो लिखेंगे कि कमाल कर दिया। किसी दुश्मनी की वजह से नहीं लिख रहा।

ravish kumar said...

दोस्तों, जब मैं नीतीश पर लिखता हूं तो कहते हैं लालू को बचाते हैं। जब लालू पर लिखते हैं तो कहते हैं नीतीश को बचाते हैं। अरे इन सबको जहां है जैसा है के आधार पर लिखते देखते रहते हैं।कल जब लालू जीत जाएंगे तो लिखेंगे कि कमाल कर दिया। किसी दुश्मनी की वजह से नहीं लिख रहा।

sushant said...

ravish bhaiya mai aapka bahut bada fan hu.matlab ki nahut achcha likhelu aur bolelu. soch vichar v achcha ba. lekin laloo g ke mamle me sab bhula gelu ka.je kaha tu lekin kuchh kharabi ke baad v sabse achchha neta hain laloo g. aapke is blaog se mai dehmat nahi hu. khair aap v apna ye sab gussa chhodiye. garib ke aadmi ba laloo g