पटना जो पेरिस न बन सका

पेरिस की तरह सजने चला था पटना। इतराने की भी हद हो गई थी। दो चार नेताओं ने वादा क्या किया शर्म से लाल हो रहा था पटना। बिना नकवी छाप लिप्स्टिक के । एस्नो पाउडर लगाये बिना पटना चमकने लगा था। एफिल टावर के इंतज़ार में पूरे शहर में मोबाइल टावर खड़े हो गए हैं। पटना स्टेशन से निकलते ही पोता अभिषेक आइडिया के बैनर तले बोलता है वेलकम टू पटना। राजधानी से उतरते ही निगाह पड़ी तो लगा कि अपने नीतीश बाबू श्याम बेनेगल की तरह पटना आने पर पोता अभिषेक से वेलकम करा रहे हैं। दो बैनर बाद बाप अमिताभ रीड एंड टेलर के विज्ञापन में सज धज कर खड़े हैं। उन्हीं के बगल में एयर टेल द्वारा प्रायोजित एक शाम बच्चन के नाम का बैनर है।

मिलन का ऐसा संयोग। सामने हनुमान मंदिर। नीचे रेक्सा वाला। ट्रैफिक पुलिस वाला डंडे से हांकता। चल बढ़ाव। जाम मत कर। आयातित मुद्रा से अमीर बने लोगों की गाड़ियाँ। हार्न का कानफोड़ू शोर। पटना जो पेरिस न बन सका।

पेरिस न बनने का दर्द सीने को और छलनी किये जा रहा था। बेली रोड पर जाम है। हार्डिंग रोड पर कभी न बन सकने वाला फ्लाई ओवर है। डाकबंगला दांत चियार कर तड़प रहा है। पूरे शहर में मोबाइल टावर एफिल टावर का भ्रम फैला रहे हैं। आइडिया,एयरटेल और बीएसएनएल और वोडा फोन के भयंकराकार बोर्ड। लगता था कि फोनियाना ही पटनियाना है। अगर आपके पास फोन नहीं है तो फोन वाले आपके पास हैं।

लोगों से पूछा। पटना जो पेरिस न बन सका। जवाब मिला। दिल्ली से आकर डिमांड मत कीजिए। एडजस्ट कीजिए। नीतीश कुमार जितना कर दिये ओतना किसी से नहीं हो सकता। फिल गुड को महसूस तो कीजिए। लोग खुश हैं। बिहार सरकार ने लोगों की ज़िंदगी नहीं बदली है लेकिन लोग खुश हैं तो सरकार का श्रेय बनता ही है। क्रेडिट पर जब बाज़ार है तो क्रेडिट पर सरकार क्यों नहीं?

पटना जो पेरिस न बन सका। मोहल्लों के भीतर नाली का पानी। मकानों के ऊपर काई की छाईं। बड़ी कार खरीदते लोग। सायकिल चलाती लड़कियां। सुधा डेयरी का पेड़ा और स्टेशन रोड का चंद्रकला। ट्रैफिक जाम से बिलखता एक शहर। अपनी तकलीफों के साथ एडजस्ट करता एक शहर। पटना जो पेरिस न बन सका।

चोर डाकू का डर नहीं है। चोर डाकू का घर है। पंजाब नेशनल बैंक के चेस्ट से सात करोड़ रुपये गायब होने की ख़बर है तो इलाहाबाद बैंक में एक मैनेजर ने आंधे घंटे बाद बताया कि फलां बाबू पांच दिन की छुट्टी पर हैं। अपहरण, चोरी और कमीशनखोरी सब मौजूद हैं मगर खबरों में नहीं हैं। सड़के बन रही हैं और ठेकेदार भी बन रहे हैं।

निराश होने की ज़रूरत नहीं है। बहुत कुछ बदल गया है पटना में। दो चार दुकानें बंद हो गईं हैं और चार पांच खुल गईं हैं। पांच से छह साल का टारगेट लिये फ्लाई ओवर बनते रहने का खुशनुमा अहसास करा रहे हैं। कभी एशिया का सबसे लंबा पुल गंगा ब्रिज अब दरक रहा है। पुल पर जाम रहता है। हरा चना खाकर इन तकलीफों से मुक्ति मिल जाती है। बोआरी, पोटेया और कवई मछली खाकर मियाज़ टनाटन हो जाता है। दोस्तों से मिलकर मन गदगद हो जाता है। किसको टेंशन है कि पटना जो पेरिस न बन सका।

16 comments:

Pramod Singh said...

ओह, सो टचिंग. एंड सैडेनिंग आल्‍सो. इज़ट देयर इज़ ए सिंगल लार्जर देन लाइफ़ लीडर जो चार दिन में चप्‍पल मार-मारके पटना को पैरिस में बदल दे? या पहाड़गंजे में बदल दे?

सतीश पंचम said...

पटना जो पेरिस न बन सका ठीक वैसे ही जैसे कि मुंबई जो शंघाई न बन सका।


आज फुरसत से बैठा हूँ इसलिये टिपियाये जा रहा हूँ ...ठीक आप ही की तरह जो पोस्ट पर पोस्ट ठेले जा रहे हैं। लगता है हम दोनों ही फुरसतायमान चल रहे हैं :)

ravishndtv said...

प्रमोद जी

क्या बात है। हम तो जार ज़ार रोए जा रहे थे कि पटना के नाला नाली में बाढ़ आ जाए और वेनिस माफिक नाव चला कर पटना घूम

Arvind Mishra said...

ओह ! चलिए इसे छोडिये रवीश भाई नए साल की मुबारकबाद कबूल फरमाईये !

ravishndtv said...

अऱविंद जी

आपको सबको नया साल मुबारक। जम के मुबारक।

KAUSHAL KISHORE / Kharbhaia / Patna said...

रविशजी
हाँ यह हुई न बात. अपने पटना प्रवास पर और लिखें
पटना कि हकीकत और उस हकीकत से रु- ब - रु होते वहां के लोग.
बदहाली से तंग लोगों को सरकार से उम्मीद बनी हुई है.. सरकार के प्रति लोगों के सद्भाव कि हद तो देखिये अगर आप के स्वर में आलोचना दिखी तो तुरत सरकार और खास कर नीतीश कुमार के पक्ष के तर्क दिए जाने लगेंगें. ऐसा लगता है कि लोग उम्मीद में पागल हो गए हैं . फिलहाल तो सरकार और सरकार के मुखिया का सब खून माफ़ करने के अंदाज़ में पब्लिक लगती है. पता नहीं पब्लिक ,सरकार का यह हनीमून कब तक चलता है.
रविशजी , शासन के इस दौर में कुछ स्थाई बदलाब कि संभावना दिखती है या फिर वही धाक के तिन पात .
जनता फिर ठगी जायेगी.
जब तक चार पाँच पोस्ट न हो जाए तो पटना यात्रा के साथ न्याय नहीं हो पायेगा .
सादर

prabhat gopal said...

sir aaj mera avkash tha. aur dekha ki aap to blog ko patna ke post se range ja rahe hai. waise pawanji gajab ke cartoonist hai aur patna to patna hi hai. paris na sahi kam se kam bombay ban jaye yahi bahut hai.

waise aapka message mila tha.
again

very very happy new year

Vivek Gupta said...

रवीश जी चलिए पटना कुछ तो बना | पेरिस भी बन जायेगा धीरे धीरे | आपको नया साल मुबारक।

creativekona said...

Raveesh ji,
Pavan ke kartoon jahan vyavastha par hathauda marne vale hain,vaheen apkee patna yatra ka sansmaran us shahar kee bechargee ka ahsas bhee kara raha hai.Patna Patna hee rahega ..use Peris to koi khaddardharee naheen bana sakega.Theek usee tarah jis tarah Atal ji lakhnau ko peris landan naheen bana sake.
Seedhee see bat hai jab tak bihar aur u p kee janta khud men badlav naheen layegee yahan sab kuchh aise hee chalta rahega.Gundagardee,dadageeree,rishvat,aur usase bhee badh kar haramkhoree(bina mehanat ke mufat men sab pa jane kee hod),in donon pradeshon kee janata ke andar se jab tak naheen niklega tab tak yahan ka koi vikas, kuchh bhee naheen ho sakta.Khaddar dharee janta ko sapne dikhate rahenge,aish karte rahenge,janta bevakoof bantee rahegee.Baharhal raveeshji,achchhe lekh ke liye badhai.
Naya sal apke jeevan men dheron khushiyan le kar aye is mangal kamna ke sath.
Hemant Kumar

Tarun said...

पटना को छोड़िये, भारत का कोई भी शहर पेरिस ना बन सका।

ganand said...

किसको टेंशन है कि पटना जो पेरिस न बन सका।
waise aapne kya kiya ek mahaj lokpriya Title wala post likhne ke alawa Patna ke liye. Jo log karne wale hain kar rahe hain aur Patna ko पेरिस nahin Patliputra banne ki jarurat hai aur wo Jarur banega. Agar vishwas nahin to dekhiye kis tarah IIM Graduate Kaushlendra bhai ka "Kaushalya Foundation" kam kar raha hai, IRMA Gradutae Dr. Ravi Chandra je ki Microfinance NGO BDT(Bihar Development Trust) kaam kar raha hai...aur bhi kai log lage hain. Aap bhi aise post likhne ke bajay kuchh kaam karte ya fir kuchh sakaratmak samachar laate Patna ke baare mein to achchha hota. Par nahin aap to MEDIAWALE (kuchh apwad bhi hote hain) hai na aapko masala chahiye...

Regards,
Guneshwar Anand

sushant jha said...

उत्तर भारत के हिंदी पट्टी के शहरों के बारे में हाल ही में इंडिया टुडे ने एक सर्वे छापा था, जिसमें पटना का भी जिक्र था। लेकिन पटना को 20 में से 7 वां स्थान मिल रहा था जो उसके हिसाब से काफी उत्साहजनक था। मैंने इस पर एक पोस्ट अपने ब्लाग आम्रपाली(amrapaali.blogspot.com) पर डाला है कि कैसे पटना सातवें जगह का हकदार नहीं है, और अगर है भी तो कितना भ्रामक है ये सर्वे। हां अगर कुछ सुधरा है तो थोड़ा बहुत अपराध-लोग अब मास-क्राइम की शिकायत कम करते हैं।

Abhishek said...

शासन की शैली में ही परिवर्तन से संतुष्ट हैं लोग, नहीं तो जनता को भी पता है की 'पेरिस 5 साल में नहीं बना'.

kumar Dheeraj said...

लगा था कि विहार में सत्ता परिवत्तॆन के बाद विकास की लहर जरूर बनेगी । लेकिन नही बन पाया तो रविश जी उसमें विहार की जनता का कोई दोष नही है । विहार के भाग्य में विकास ही नही लिखा है तो आम जनता क्या कर सकती है । कभी जातिवाद ,कभी साम्पदायिकता ,कभी कोई समीकरण के मारे विहार पिसता था पिसता जा रहा है । रही बात पटना के विकास की । केवल पटना के विकास से ही विहार का विकास संभव नही है

Vinod Srivastava said...

दो दसक पहले पटना जाने का अवसर मिला था I तब राजधानी होने के वावजूद वहां की आबो हवा में मिटटी की महक थी I तब चारा खाने का अपराध शिर्फ़ गायें ही करती थीं I लोगों को न तो पेरिश का एफिल टावर चाहिए था और न ही हेमा मालिनी के गालों जैसी सड़कें I आधा बिहार तो वैसे ही बम्बई, लुधियाना, गुवाहाटी, कलकत्ता और दिल्ली के लिए पैदा होता है I आधे लोगों को ट्वेंटी नाइन खेलने और गाँधी मैदान पर बिकने वाली रंगीन पुस्तकें पढने से फुरसत नही I पता नही एफिल और हेमा के जाल में कोई फसा भी तो कैसे ? सिंघासन पाने के लिए सदियों पहले युद्ध लड़ना पड़ता था अब चुनाव I चुनाव जीतने के लिए एफिल टावर और गालों जैसी सड़के बनवानी पड़ती हैं और जीतने के बाद "सेहत" के लिए चारा भी खाना पड़ता है I इस साल के बाढ़ में सैकड़ों करोड़पति और हजारों लखपति हो गए होंगें I चुनाव फिर पास है, खर्चा बहुत है I शायद फिर कोई चारा खा रहा होगा या खाद ही या टेंट, किरोसिन, सरिया, सीमेंट, बोल्डर या मिटटी ही I खाने की कोई कमी है ? बिहार आगे नही बढ़ रहा है क्या ?
***विनोद श्रीवास्तव***

Nirmla Kapila said...

kyaa khoob likhte ho aap jesi najar her uva ki ho to tasveer badal jaaye