आओ मिलकर मीडिया की आलोचना करें

१९८४ के दंगे के हालात में नया प्रस्तावित सेंसरशिप किस तरह लागू होगा। अभी तक आश्वासन मिला है कि नहीं लागू होगा मगर ये फाइल अभी बाबू की मेज़ पर है। संपदकों की एकजुटता और राजनेताओं की दिलचस्पी का नतीजा तो यह निकला कि खतरा टल गया है। मगर खत्म नहीं हुआ है। तीन हज़ार लोग मार दिए जाते रहेंगे। आप पत्रकार न्यूज़ रूम में चाय पीते रहेंगे और पांच बजने का इंतज़ार करेंगे। सवा पांच बजे तक डीसीपी ईस्ट आएगा और एक फुटेज देगा। छोटी सी बाइट देगा। आप शाम को खबर चला देंगे कि डीसीपी ईस्ट ने कहा है कि स्थिति सामान्य है।

इस प्रस्ताव का खतरा यह है कि उग्र कानून व्यवस्था की स्थिति में भी ज़िलाधिकारी मीडिया पर लगाम कस देगा। ज़िलों में पत्रकार पहले से ही नक्सली बनाकर जेल मे ठूंसे जाते रहे हैं अब डीएम की समझ के नेशनल इंटरेस्ट में अंदर जायेंगे। सवाल जेल जाने के डर का नहीं है। सवाल है कि ये डीएम और बाबू कौन होता है हमें नेशनल इंटरेस्ट समझाने वाला। नेशनल इंटरेस्ट क्या गवर्मेंटल इंटरेस्ट ही होता है??

इस तरह की पत्रकारिता से मीडिया को ज़िम्मेदार बनाने के ठेकेदारों की बुद्धि पद्म श्री के लायक है। भारत देश सर्वदा संकट काल से ग्रसित एक भूखंड है। यहां कोई राजू कोई टाइटलर कोई मेहता कोई गौतम दिन दहाड़े घपला कर जाते हैं। सत्यम का राजू हो या डीडीए घर घोटाले का एक आरोपी क्लर्क एम एल गौतम। इनमें से किसी के बारे में आप ज़्यादा बता दें तो लोगों को परेशानी होने लगती है। होनी चाहिए। क्योंकि हमारा समाज एक भ्रष्ट समाज है। मैंने पहले भी लिखा है। आप दहेज के खिलाफ एक शो बना कर देख लीजिए। टीवी देखने वाला ज़्यादातर दर्शक जब दहेज में मिले टीवी पर शो देखेगा तो उसे अचानक इंडियन आइडल की याद आएगी। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम दहेज के खिलाफ न दिखायें। ज़रूर दिखायें और बार बार दिखाते रहें। लेकिन भ्रष्ट समाज के बारे में जानना ज़रूरी है।

क्या हम अखबारों के लिए तय कर सकते हैं कि मुंबई धमाके की खबर सिंगल कालम छपेगी। उसमें डिटेल नहीं होंगे। क्या टीवी और अखबारों के डिटेल में कोई फर्क है। क्या हमला करने वाले आतंकवादी टीवी देखने आए थे? क्या सरकार ने कोई ठोस सबूत दिये हैं कि टीवी कवरेज की वजह से उनका आपरेशन कामयाब नहीं हुआ। ओबेराय होटल में भी हमला हुआ। लेकिन मीडिया को ढाई सौ मीटर से भी ज़्यादा की दूरी पर रोक दिया गया। पूरे कवरेज़ में ओबेरॉय की सिर्फ बिल्डिंग दिखाई देती रही। यहां ज़रूर कोई समझदार अफसर रहा होगा जिसने मीडिया को दूर कर दिया होगा। किसी को ध्यान भी है कि ओबेराय के कवरेज़ में इतना एक्शन क्यों नहीं था।

ताज में ऐसा क्यों नहीं हुआ। इसके लिए मीडिया दोषी है या वो अफसर जो इस तरह की कार्रवाई के विशेषज्ञ हैं। क्या हमने नौकरशाही पर उंगली उठायी। नहीं। जब भी ऐसे मौके पर सुरक्षावाले मीडिया को चेताते हैं मीडिया सतर्क हो जाता है। मामूली सिपाही ठेल कर कैमरे को पीछे कर देता है। ताज के पास क्यों नहीं हुआ। जैसे ही कहा गया कि लाइव कवरेज़ मत दिखाओ...ज़्यादातर मामलों में नहीं दिखाया गया।


एक ही फुटेज को बार बार दिखाने के पीछे की दलील देने वाले टीवी को नहीं जानते। हमारे लिए हर बुलेटिन एक एडिशन होता है। हम हर बुलेटिन उसके लिए नहीं बनाते जो दिन भर बैठकर टीवी ही देखता है। देखे तो अच्छा है। लेकिन फुटेज दोहराने की मंशा यही होती है कि अलग अलग समय में अलग अलग लोग देखने आएंगे तो उन्हें पता होना चाहिए कि क्या क्या हुआ।

मीडिया के कवरेज से एक फायदा यह हुआ आतंकवाद को मज़हबी बनाकर टेरर फाइटर नेताओं की फौज की दुकान नहीं चली। न तो आडवाणी निंदा करते दिखे न मोदी दहाड़ते। वैसे मोदी गए थे शहीदों को एक करोड़ रूपये देने। सिर्फ वर्दी वाले सिपाहियों को। बाकी डेढ़ सौ लोगों के लिए नहीं। भारत वर्ष के बाकी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को गद्दार कहा जाना चाहिए क्योंकि वो तो गए नहीं मुआवज़ा बांटने। इसी आचरण की पोल खोल दी मीडिया ने। लाखों लोगों का गुस्सा इस फटीचर किस्म की राजनीति पर भड़का। क्या गलत था।

क्या हमारी नौकरशाही इतनी योग्य हो गई है जिसके यहां मीडिया अपनी आज़ादी शाम पांच बजे तक के लिए गिरवी रख दे। संकट काल में। इनका क्या ट्रेक रिकार्ड रहा है। तब तो कल यूपी के डीजीपी जी औरैया का फुटेज ही नहीं दिखाने देते। एक इंजीनियर को चंदे के लिए मार दिया गया। आप घर बैठिये और शाम पांच बजे वीर बिक्रम फुटेज भिजवा देंगे।


सेंसर खतरनाक है। मीडिया की आलोचना सही है। भूत प्रेत और रावण का ससुराल भी सही है। लेकिन क्या मीडिया में सिर्फ इसी तरह के लोग बच गए हैं? टीआरपी की आलोचना तो टीवी के ही लोग कर रहे हैं। पेज थ्री और तांत्रिकों और सेक्स कैप्सुलों का विज्ञापन अखबार ही छापते हैं. वो क्यों नहीं मना कर देते कि जापानी तेल की सत्यता हम नहीं जानते। किसी ने इस्तमाल किया तो क्या होगा हम नहीं जानते। दवा है या नकली सामान। छापते तो हैं न।

मकसद यह नहीं कि उनकी गलती बताकर अपनी छुपा लें। टीवी की इस बुराई की आलोचना किसी दूसरे स्वर और लॉजिक के साथ हो। टीवी की आलोचना करने के लिए टीवी को समझिये। अखबार भी किसी खबर को फार्मेट करता है। बाक्स बनाता है। हेडर देता है। हेडलाइन कैची बनाता है। हम भी स्लो मो करते हैं। डिजाल्व करते हैं। म्यूज़िक डालते हैं।

फर्ज कीजिए कि सेंसर लग गया है। हमें मुंबई हमले का न्यूज़ दिखाना है.

सुबह आठ बजे का न्यूज़-

नमस्कार। मुंबई में आतंकवादी हमला हुआ है। हमले में कितने लोग मारे गए हैं शाम पांच बजे बतायेंगे। ताज होटल में कितने लोग बचे हुए हैं शाम पांच बजे बतायेंगे। अभी अभी खबर मिली है कि दक्षिण मुंबई के डीसीपी ने शादी ब्याह की शूटिंग कर रहे वीडियोग्राफरों को बुला लिया है। इसमें चुनाव आयोग के लिए फोटो आईकार्ड बनाने वाले वीडियोग्राफर भी शामिल हैं। यहीं लोग हमले की रिकार्डिंग कर रहे हैं। पांच बजे इनकी तस्वीर को हम दिखायेंगे। देश में सकंट काल है। प्लीज़ समझिये। हम अभी कुछ नहीं बता सकते लेकिन न्यूज़ देखिये। राष्ट्रहित में सरकार आतंकवादियो से मुकाबला कर रही है। इस पूरे प्रकरण में कोई भी अधिकारी या मंत्री दोषी नहीं है। हमें इनकी आलोचना नहीं करनी चाहिए। क्योंकि यह संकट काल है। संकट काल में भी तो हम देशभक्त हो सकते हैं। फिर बता दें कि मुंबई में हमला हुआ है। सब पांच बजे बतायेंगे जब डीसीपी बता देंगे। अगर आपको लगता है कि हमारे पास रिपोर्टर नहीं है तो गलत है। हम आपको थ्री वे बाक्स में दिखा रहे हैं कि हमारी तीनों रिपोर्टर आज आफिस आए हैं और चाय पी रहे हैं। शाम पांच बजे यही जाकर डीसीपी से खबर लेकर आयेंगे। धन्यवाद।

सुबह नौ बजे

नमस्कार। मुंबई में हमला हुआ है। मगर आगे कुछ नहीं बतायेंगे क्योंकि रिपीट हो जाएगा। बार बार एक ही न्यूज़ बताना ठीक नहीं होता। अगर बतायेंगे कि कोई अखबार में हमारी आलोचना कर आर्टिकिल लिख देगा और पांच सौ से हज़ार रुपये तक कमा लेगा। धन्यवाद।

भाई लोग। चौबीस घंटे के न्यूज़ चैनल का मतलब ही यही है कि खबर कभी भी। वो एक स्क्रीन पर पड़ा हुआ अखबार है। जैसे एक अखबार छपने के बाद से लेकर रद्दी में बेचे जाने और ठोंगा बनने तक अपने ऊपर छपी खबरों को ढोता रहता है वैसे ही हम है। अब रही बात रावण के ससुराल बीट के रिपोर्टर की तो वो आप उनके संपादक से पूछ लीजिए। तुलसीदास के रिश्तेदार लगते होंगे। डीसीपी ईस्ट तो खुद शाम पांच बजे से पहले किसी तांत्रिक को फोन करता रहता है। किसी उंगली में पुखराज तो किसी में मूंगा पहनता है। फटीचर सोसायटी के फटीचर लोगों। भाग त ईहां से रे। के कहिस है रे कि मीडिया समाजसेवा करता है। और कोई काम न है रे मीडिया को। सेंसर लगावेगा तो एक दिन कैबिनेट सेक्रेटरी बोलेगा कि बोलो कि यूपीए या एनडीए ने देश के विकास के लिए महान काम किये हैं। बोलेगा कि नहीं...जेल भेजे का तोरा। जी मालिक...बोल रहे हैं। शाम पांच बजे से पहीलहीं बोल दे कां....सोर्सेज़ लगा के...।

हद हो गई है। मीडिया की आलोचना से यही समाधान निकलना था तो अब आलोचकों की जांच करवायें। ये दिन भर भूत प्रेत देखते हैं। उन्हीं के बारे में लिखते हैं और पैसा कमाते हैं। जो अच्छा काम करता है उसके बारे में कब बोलते हैं। कब लिखते हैं।

44 comments:

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

क्योंकि हमारा समाज एक भ्रष्ट समाज है। मैंने पहले भी लिखा है। ...लेकिन भ्रष्ट समाज के बारे में जानना ज़रूरी है।

बिल्कुल सही बात कहते हैं आप। लेकिन मीडिया भी इसी भ्रष्ट समाज का एक अभिन्न अंग है।

गिरीन्द्र नाथ झा said...

रवीश दा के कहिस हाउ की मीडिया में कोई कम करत है, अरे काम ता सरकार और अफसर लोकिन करत हैं और हाँ मीडिया को भी इन्ही की बात माननी चाहिये. इहे कहना चाहते है और सेंसरशिप लगये के ...लेकिन कह दीजिये इ हो नही पायेगा...एक गो पवन का कार्टून दिजीये न इ गप्प पर. उ सबको ठीक कर देगा.

सुशील कुमार छौक्कर said...

वाकई हद हो गई। रवीश भाई।

jitendra said...

bahut badhiya alochana hain lekin webjournalism ki alochana to nahin hui..........?

agli post ka intazaar rahegaa

रश्मि प्रभा said...

दुखद है पर सत्य यही रहा है......विस्तृत ढंग से
एक जानकारी का जो कार्य आपने किया है,वो सही है....

gurmeet said...

मुंबई पर हुए देश के सबसे बड़े आतंकी हमले के बाद के घटनाक्रम में नेता और मीडिया दोनों ही कटघरे में खड़े दिखाई दे रहे हैं। नेता व पुलिस दो ऐसे वर्ग हैं जिनकी विश्ववसनीयता आम लोगों में हमेशा से कम रही है। इस बार के हमले में जिस तरह से मुंबई पुलिस के तीन बहादुर अफसरों के साथ कई जवानों ने आतंकवादियों से मुकाबला करते हुए अपनी जान की कु्र्बानी दी है और बाद में एनएसजी के कमांडो ने एक मुश्किल आपरेशन को अंजाम दिया उससे पुलिस या सुरक्षाबलों की सीधी आलोचना की गुंजाइश थी नहीं और यह हिमाकत किसी ने की भी नहीं। रह गए नेता। जनता का गुस्सा भी उनके प्रति ही था और मीडिया ने भी खासकर इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने भी अपनी तोपों का मुंह उधर मोड़ दिया। लोकतंत्र में कहने के लिए तो खुद को जनता का सेवक कहने वाले नेता असल में तो खुद को देश का मालिक ही समझते हैं। इसीलिए तो मीडिया ने जब तीरों की बौछार की तो बहुत से नेता बौखला गए और जनता से ही उलझते नजर आए। रोचक बात यह रही कि संतुलन खोने के इन मामले में दक्षिणपंथी व वामपंथियों में कोई अंतर भी नहीं रहा। भाजपा के मुख्तार अब्बास नकवी से हमलों के बाद मुंबई में विरोध प्रदर्शन करने वाली महिलाओं नहीं देखी गई और केरल के वामपंथी मुख्यमंत्री एक शहीद के पिता की पीड़ा को नहीं समझ सके। दोनों ने शिष्टता की सीमाएं लांघी और मीडिया ने उन्हें लपेट लिया। आखिर में उनकी पार्टियां सफाई देती नजर आई। उधर महाराष्ट्र के कांग्रेसी मुख्यमंत्री माफिया गिरोहों को लेकर फिल्म बनाने वाले चर्चित फिल्मकार रामगोपाल वर्मा के साथ ताज की तबाही देखने पहुंचे तो वे भी मीडिया की आंखों से नहीं बचे। उनके डिप्टी एनसीपी के आरआर पाटिल का बयान मीडिय़ा में इस तरह उछला कि उनका बोरिया बिस्तर भी बंध गया। कुछ ना नुकर के बाद मुख्यमंत्री देशमुख को भी जाना पड़ा। महाराष्ट्र का ही प्रतिनिधित्व करने वाले गृह मंत्री की विदाई का माहौल तो उससे भी पहले बन चुका था। मुंबई हमलों से पहले भी गृह मंत्री हमेशा मीडिया के निशाने पर रहे हैं। कुछ महीने पहले दिल्ली में हुए बम विस्फोटों के बाद भी उनका बार बार सूट बदलना मीडिया के लिए बड़ी खबर बना था।
लेकिन मुंबई हमलों के बाद केवल नेता ही कटघरे में हों ऐसा नहीं है। लगातार 60 घंटों तक मुंबई हमले की रिपोर्ट को लाइव चलाकर अपनी टीआरपी बढ़ाने वाले टीवी चैनलों के लिए भी कई सवाल मुंह बाए खड़े है। मीडिया के हमलों से बौखलाए नेता भी अपने तरीके से मीडिया पर जवाबी कार्रवाई करने की फिराक में हैं। हालांकि यह भी सही है कि नेताओं के विपरीत मीडिया ने लगातार मौके पर रहकर देश के लोगों तक हर पल की तसवीरे पहुंचाई हैं। इस तरह का हमला पहली बार हुआ था इसलिए इस तरह की रिपोर्टिंग भी पहली बार हुई है। यही वजह है कि इस बार सवाल भी अधिक खड़े किए जा रहे हैं। घटनास्थल से हर बात का प्रसारण करना क्या आतंकवादियों के लिए मददगार नहीं होगा,यह बात उसी वक्त शुरू हो गई थी जब आतकंवादियों के खिलाफ एनएसजी की
कार्रवाई चल रही थी। कुछ चैनलों ने उस वक्त खुद को संयमी व जिम्मेदार साबित करने का प्रयास भी किया था। एक चैनल ने जब एक आतंकवादी से नोबाइल पर हुई बातचीत का प्रसारण कर दिया तो उसे लेकर भी काफी बावेला मचा। इस मामले में उसे नोटिस भी जारी किया गया है जबकि चैनल ने अपनी सफाई में कहा है कि अमेरिका में हमले के बाद वहां के चैनल ने भी ओसामा बिन लादेन के टेप प्रसारित किए थे। बाद में केंद्र
सरकार ने एक कदम और आगे जाकर टीवी चैनलों को मुंबई हमलों के दृश्य बारा बार प्रसारित न करने का फरमान जारी कर दिया जिसका टीवी चैनलों के संगठन ने विरोध किया। इसी बीच देश के नौ सेना प्रमुख ने भी कुछ टीवी पत्रकारों के लिए मूर्ख जैसा शब्द इस्तेमाल कर दिया।
असल में देश के नेता तो तभी से चैनलों पर लगाम कसने की फिराक में है जब से स्टिंग आपरेशनों का दौर शुरू हुआ है। केंद्र सरकार काफी समय से नया प्रसारण कानून बनाने की कोशिश कर रही है लेकिन उस पर अभी एक राय नहीं बन पाई है। इसमें कोई नयी बात नहीं है कि टीवी चैनल टीआरपी या एक दूसरे से आगे दिखने की होड़ में कई बार गैर जिम्मेदार आचरण कर जाते हैं लेकिन नेताओं को भी यह बात समझ में आ जानी चाहि्ए कि लोकतंत्र में मीडिया की जवाबदेही जनता के प्रति है जनता के प्रतिनिधियों के प्रति नहीं। नेताओ व मीडिया में तो चोलीदामन का साथ रहा है और एक को दूसरे का बॉस बनने की कोशिश करनी ही नहीं चाहिए। इसीलिए मीडिया पर लगाम डालने की नेताओं या सत्ता प्रतिष्ठान की मंशा कम से कम आज के युग में सिरे नहीं चढ़ पाएंगी।

निखिल आनन्द गिरि said...

"अगर आपको लगता है कि हमारे पास रिपोर्टर नहीं है तो गलत है। हम आपको थ्री वे बाक्स में दिखा रहे हैं कि हमारी तीनों रिपोर्टर आज आफिस आए हैं और चाय पी रहे हैं। "

मस्त लिखा है....रहमान के संगीत की तरह लिखते हैं आप....

निखिल

संजय बेंगाणी said...

स्वस्थ लोकतंत्र के लिए स्वतंत्र मीडिया अनिवार्य है. स्वतंत्र मीडिया से समझदारी की अपेक्षा की जाती है. समझदार मीडिया जनता की आवाज होता है, जनता को उस पर विश्वास होता है. क्या आप लोगों पर भारत की जनता विश्वास करती है?

लोकतंत्र के लिए सेंसर का विरोध करता हूँ. मगर आप लोग सुधरेंगे? जो अपने तंत्र को नहीं सुधार सकते वे देश और समाज को क्या सुधारेंगे?

MUKHIYA JEE said...

हुज़ूर ! "दालान" पर थोड़ी आलोचना हुयी और आप इस कदर बौखला गए ? हम तो अपने गाँव में शाम ७.३० बजे "घुरा" के पास आग तापते हुए "प्रादेशिक समाचार" सुनते थे ! और रात ८.४५ पर पुरा समाचार ! आज भी कानों में वोह आवाज़ गूंजती है और उसके सामने आपका ( टीवी मीडिया वालों ) सब कुछ फीका लगता है ! वैसे आप , आपका चैनल और आपका बॉस काबिले तारीफ है !

mega vision said...

chalan hai aak kal yah bhi. keep it up.

sujeet said...

sir aapne bahut achha likha hai . wastaw me media ki poori tarah aalochna karna galat hai lekin gehun ke saath ghoon bhi pistaa hai na isliye shayad yah baat uth rahi hai . aapke channal ne achha kaam kiya hai lekin poore media ne achha kaam nahi hi kiya hai . ab kuchek sansthan yadi aatankwaadi ki baatcheet sunate hain to galat hai. lekin iske liye poora media jagat doshi nahi hai. inko gaali bhi ham media wale log hi de rahe hain na. aapka lekh mujhe bahut achha laga .

अनुनाद सिंह said...

आवश्यकता से अधिक आजादी ही भारत की सबसे बड़ी समस्या है। मिडिया को मनमाना विवेकहीन गन्दगी दिखाने की आजादी होनी चाहिये ; वकीलों को आजादी चाहिये ताकी दो सौ साल पुराना सिस्टम ज्यों का त्यों बना रह सके। न्यायधीशों को आजादी चाहिये ताकि वे भी भ्रष्टाचार की मलाई चाट सकें। नेताओं को आजादी चाहिये ताकि आय से अधिक सम्पत्ति पर सीबीआई उन्हें न चूए। सीबीआई को आजादी चाहिये कि वह जिसको चाहे बरी करे, जिसे चाहे फसाये। सरकारी अधिकारियों को आजादी चाहिये ताकि लाख रूपये से भी अधिक मिलने पर उन्हें कोई काम न करना पड़े और उनसे इमानदारी की उम्मीद न की जाय। पुलिस को आजादी चाहिये ताकि वे इमानदार लोगों को परेशान कर सकें और चोर-उचक्कों का प्रयोग करके 'अतिरिक्त' कमाई कर सकें। चर्च को इस बात की आजादी चाहिये कि वह हिन्दुओं को बहलाकर, फ़ुसलाकर, 'जादू दिखाकर, 'कारनामे' दिखाकर क्रास पहना सके। विद्यार्थियों को छात्रसंघ के चुनाव लड़ने की आजादी होनी चाहिये और परीक्षा में नकल करने की स्वतन्त्रता भी।

अन्त में केवल बचते हैं असंगठित किसान, मजदूर, मेहनतकस, सीधे-साधे लोग - इन्हे ही किसी आजादी की कोई जरूरत नही है।

अखिलेश सिंह said...

सरकारी बाबु ख़बरों को पास करने लगे तो घोटालो की फेरहिस्त में नया घोटाला "न्यूज़ घोटाला" जुड़ जायेगा...

ray said...

Hi,

I was reading ur blog posts and found some of them to be very good.. u write well.. Why don't you popularize it more.. ur posts on ur blog ‘कस्‍बा qasba’ took my particular attention as some of them are interesting topics of mine too;

BTW I help out some ex-IIMA guys who with another batch mate run www.rambhai.com where you can post links to your most loved blog-posts. Rambhai was the chaiwala at IIMA and it is a site where users can themselves share links to blog posts etc and other can find and vote on them. The best make it to the homepage!

This way you can reach out to rambhai readers some of whom could become your ardent fans.. who knows.. :)

Cheers,

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

मीडिया वह शक्तिशाली स्तंभ है जिनको विशेषाधिकार प्राप्त है किसी को भी गाली देने का ,भ्रष्ट कहने का ,इज्ज़त तार तार करने का .
ऐसे मीडिया वालो को जानता हूँ जिनका ख़ुद का खर्चा उनकी आमदनी से दुगना है . कभी आप लोगो ने अपनी कमियो को उजागर किया . नही क्योंकी आप भी उतने ही अपवित्र हो जितना एक राजनेतिक व्यक्ति

पवन *चंदन* said...

एक ही बात समझ में आती है कि अधिकता हर चीज की बुरी होती है।
किसका कितना रोल कहां कहां होना चाहिए ये तय कर पाना बड़ा तिरछा काम है। आपकी बेबाकी पसंद आती है।

समयचक्र - महेद्र मिश्रा said...

आलेख विचारणीय है . बेलगाम मीडिया पर देश हित में बंदिश लगाया जाना जरुरी है .

सुबोध said...

इसे कहते हैं भीगो भीगो कर मारना

अमित अग्रवाल said...

अब तक मीडिया को पूरी स्वतंत्रता मिली हुई है, कौन से तीर मार लिए?? क्या कर लिया?
सिवाय टी आर पी बढ़ाने के आलावा कहीं और दिमाग जाता है किसी समाचार चैनल का? कोई भी समाचार बुलेटिन खोल
के देख लो, कितनी बार काम की खबरें दिखाते हो? केवल भूत-प्रेत, आत्मा या फ़िर नेताओं के भाषण|
एक बार अपने अन्दर झाँक के देखो..... क्या जरूरत थी मुंबई हमलों के सीधे प्रसारण की? आम जनता को खून खराबा
दिखा कर क्या सिद्ध करना चाहते हो?
कहीं जानबूझ कर तो नहीं दिखाई गई थी ये सीधे प्रसारण? ताकि पकिस्तान में बैठे आतंकी सब कुछ जान सकें?
मीडिया के इन्वोल्वेमेंट की जांच होनी चाहिए| और इन पर तुंरत लगाम लगनी चाहिए|

विष्णु बैरागी said...

आपका गुस्‍सा तो वाजिब है किन्‍तु वर्णन अतिरेकपूर्ण है। प्रत्‍येक समझदार व्‍यक्ति 'स्‍वतन्‍त्र मीडीया' का पक्षधर है। किन्‍तु तनिक यह भी विचार करें कि चैनल किस सीमा तक उच्‍छृंखल और गैर जिम्‍मेदार हो गए हैं। आपको समझाने का मूर्खतापूर्ण साहस नहीं करूंगा किन्‍तु प्रभु,बिना आग के धुआ नहीं होता। यकीनन, सरकार का (मीडीया पर नियन्‍त्रण का) सोच मूर्खतापूर्ण है किन्‍तु तनिक यह भी तो देखिए कि सरकार को ऐसा सोचने का अवसर और साहस किसने दिया।
सब तरह के लोग सब जगह होते हैं। हम आपके साथ हैं किन्‍तु अपनी गरेबान में झांकने की जहमत भी उठानी पडेगी। गिनती के लोग गन्‍दे हैं किन्‍तु वे सब के सब आपके साथ ही, आपकी सफेद चादर पर बैठे हैं।

creativekona said...

Raveesh ji,
Hamare desh men media par lagam kasne kee koshishen to barabar hotee rahee hain.Chahe print mediya ho ya electranik.Sab samaya aur kal kee bat hai.
Mere pas aj bhee Kaheen SARIKA ka vo ank daba pada hoga,jiske poore ke poore prishth ,linen,vakya imargensee ke dauran kale rang se rang diye gaye the.Meree apnee kai kahaniyan,laghukathayen radio par sirf isliye prasarit naheen kee gayee ki unmen NETA shabd aya tha.
Ek jamana tha jab shasan/satta ke virodh men kuchh likhna akhbaron ke sampadakon kee himmat manee jatee thee.tab na itne dher sare news channel the na hee manoranjan vale chainal.Sab kuchh sirf doordarshan ke hathon men tha .
Par vakt ke sath chainalon kee badh aai.aur vyavastha se le kar porre duniyan kee alochna,pratyalochna,khandan..sab kuchh chainalon ke hathon men aa gaya.ab isamen bhee kuchh chainalon ne to apna star,gambheerata,samacharon kee pramanikta,prasangikta,sabhee kuchh manten kiya hai .Lekin kuchh chainal to sirf apna nam janta tak pahuchane,t r p badhane ya tathakathit bade admiyon,khaddardhariyon se sambandh badhane kee jugad men hee lage rahte hain.Ap khud dekhte honge jis veebhats dhang se hatya,balatkar,ke samacharon ko mahima mandit kiya jata hai vah kya sahee hai..Aise chainalon par to nishchit roop se shikanja kasana chahiye.
Lekin sirf Bambai hamlon ke mudde ko lekar chainal ya meediya kee barabar alochna ho ye achchha naheen.Kyon ki bahut sare utsahee reporters,camera mans ko bhee ye ilm naheen raha hoga ki unkee futage ko atankee bhee dekh rahe honge ya desh ka koi ahit ho sakta hai.
Fir bhee ek achchhe vacharik chintan,bahas kee shuruat karne ke liye badhai.
Hemant Kumar

creativekona said...
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creativekona said...
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एस. बी. सिंह said...

सही है रवीश जी जो आपने लिखा है। मगर लोकतंत्र का अनिवार्य अंग होने मात्र से ही मीडिया का हर काम आलोचना से परे नहीं हो जाता। समाचार के नाम पर जो कुछ कचरा चल रहा है उसे अंधा भी देख सकता है। मगर जो देखना ही न चाहे तो उसका क्या। प्रतिबन्ध की बात को निमंत्रण मीडिया ने ख़ुद दिया है। केवल दुनिया भर को गरियाने से आप भगवान नहीं हो सकते। कभी कभी अपने घर में भी झाडू लगानी पड़ती है। पहले अपना घर भूत प्रेतों से मुक्त कराइए फ़िर लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ होने का दावा कीजिये। शुभकामनाओं सहित

Indian news channel said...

रविश जी ..
आप का लेख सराहनीय है ...और जितने भी महान आलोचकों ने टिपण्णी की है उन सब को मीडिया का महत्त्व तब समझ में आएगा जब देश में इमरजेंसी के हालत होंगे ...पुलिस जब इनके पिछवाडे में दौडा दौडा कर पीटेगी तब ये समझेंगे ..सड़क चलते कोई भी पुलिसवाला इन्हे उठाकर लेजायेगा और रात भर सेकेगा..इनकी ज़मीं पर कोई गुंडा या नेता कब्ज़ा कर लेगा ...बिना पैसे दिए fir नहीं लिखी जायेगी ...सरकारी डाक्टर बिना इलाज किए भागादेगा ...इनकी बेटी दहेज़ प्रताड़ना की शिकार होगी ...इनके बेटे को स्कूल के टीचर ने नंगा करके करंट लगाया हो ...इस तरह की जब अनेक समस्याएँ जब इनके सामने आएगी ...तब इन्हे समझ आएगा ....मीडिया का महत्त्व ......

Vishal Mishra said...

bilkul sahi likha hai. kabhi kabhi media me jadu aadi ki cheeze dikhai jati, kuch log kahte hain ki ye channel bjp ka ye channel congress ka hai...par isse kya fark padta hai, zyada se zyada kisi party ka supporter channel us party ki burai nahi karege. par wo galat to nahi dikhayega usi pal dusra channel us party ki kalai khol deha . kul milakar janta tak sach pahunch raha hai aur tabhi amarmani tripathi jaise kitne saalon se se jail me hain. isliye kisi ko haq nahi media par sawal khade karne ka... print walo ke bare me bhi apne sahi likha hai ki wo bhi to japani tel adi ka vigyapan chapte hain isliye unhe bhi adhikar nahi ungli uthane ka. Rajesh Khanna ki film ka gaana yaad hona chahiye inko ki "pahla patthar wo marega jisne paap na kiya ho jo papi na ho". aaj ke daur me ye baat thik nahi par kam se kam paap karna jo chod kar patthar mara jaye.... likhte rahiye. aap ummeeed hain is naye journalism ke source ki.

आदर्श राठौर said...

विडंबना ये है कि जिस घटना के बाद से इस तरह का कानून बनाने की मांग सबसे पहली उठी थी, उस घटना के दोषी आज भी मीडिया में काम कर रहे हैं। मीडिया सरकार को क्यों दोष दे रहा है? क्यों नहीं पहले खुद अपने लेवल पर उन घटनाओं के दोषियों को ब्लैक लिस्ट कर दिया जाता है। फर्ज़ी स्टिंग याद है? क्या हुआ उसका?
जय हो!

jayram said...

media bika bajar main . ...........
aaj ka media bajar main bik chuka hai isse jyada kahne aur samajhne ki koi jarurat nahi .
aaj na jane kitne patrkar bandhu blogging main jute hain par jo baat blog par likhte hain wo apne akhbaron aur chenalo main kyu nahi likhte ,kyun nahi dikhate ......kitna wirodhbhas hai yahan.

are aaj jise koi kaam nahi wo patrkar bana baitha hai . dukh hota hai jab tathakathit patrakaron ko 200-400 ka ghus lete dekhta hoon . gramin kasbo main to netao aur police se milkar ye dalali ki dukan bakhubi chala rahe hain! ye to chhote patrakaron ki baat hai . bade star par jane mane chahre akadh sting opretation kar dalalike is khel main kroron ki rakam dakar jate hai. sansad ghus kaand main media ki bhumika se sab saaf hai.
wo din door nahi jab aam log neta, police ke saath patrkaron se bhi darne lage . jara sochiyega ...................

आदर्श राठौर said...

जयराम जी,
किसा आधार पर मीडिया के बिकने की बात कह रहे हैं आप?
मीडिया कोई धर्मशाला या परोपकार करने के लिए खोली गई संस्था नहीं है जिससे आप समाज के सुधार के लिए बीड़ा उठाए रखने की अपेक्षा रखें...
आज़ादी से पहले और आज़ादी मिलने के बाद मीडिया में तुलना करना भी बेवकूफी होगी। परिस्थितियां अलग हैं, इसलिए कार्य प्रणाली और लक्ष्य भी अलग होंगे। आपको मीडिया की कमी तो दिख जाती है लेकिन वो बेसिक कमियां नहीं दिखतीं जिनकी वजह से देश का बंटाधार हो रहा है।
आपने कहा है कि जिसे कोई काम नहीं मिलता, पत्रकार बन जाता है, ये बात आप पर लागू हो सकती है मित्र....
हो सकता है कि आप कहीं थक हार कर जर्नलिज़्म के स्कूल में डिप्लोमा, डिग्री लेने आ गए हों। लेकिन कई लोग ऐसे हैं जो पहले से ही पत्रकारिता को लक्ष्य बनाकर चलते हैं।
और हां, एक पत्रकार कोई समाजसेवी नहीं है, वो पेशेवर है, और भले ही उसके पेशे को जो नाम दें। पत्रकार अपने ब्लॉग पर जो लिखता है, वो उसके मन के विचार हैं और उसके ब्लॉग पर क्या छपना है क्या नहीं, उसके लिए फैसला वो खुद करता है। हर संस्था, जिसमें वो काम करता है, में वो खुद फैसले नहीं ले सकता।

कुमार विनोद said...

क्या राठौर जी, क्या जयराम जी, बहस में शामिल हो रहे हैं तो सच के करीब रहिए. पाबंदी के जितने नुकसान रविश जी ने गिनाए हैं, उससे भी सच का इशारा नहीं लगा? कई सारे सच में से एक ये भी है- अभी न्यूज चैनल, खासकर हिंदी वाले जिस हाल में हैं, उसके लिए वो जिम्मेवार वो खुद ही है. रावण की ससुराल वाले रिपोर्टर शौकिया पैदा नहीं होते, वो बनाए जाते हैं. जिन्होंने बनाया है मीडिया की जगहंसाई वही करा रहे हैं, वर्ना सरकार की क्या हिम्मत जो पाबंदी की बात भी सोचती. बाप रे, ऐसी मोटी चमड़ी- देखने वाले थूक रहे हैं-फिर भी 'शनिबाजी' बाज नहीं आ रहे, हवा-हवाई और भूत प्रेत के चक्कर में बुनियादी नैतिकता की बलि चढ़ा रहे हैं. एक शब्द में कहें- तो अंधविश्वास फैला रहे हैं. खबरों का समाजशास्त्र ही बदल चुका है. सच को तो भूल ही जाईए...

संतोष कुमार सिंह said...

रवीस जी आपके आलेख पर लोगो की जो प्रतिक्रियाये सामने आयी हैं उससे सबक लिजिए।आज आप भी समाज पर नेताओं और ब्योरोक्रेट की तरह बोझ बनते जा रहे हैं।
इतराई मत इस खतरे की घंटी से सबक ले नही तो मुखिया और पंचायत सचिव से खबर दिखाने और खबर छापने की अनुमति लेनी पङेगी।आप किस मीडिया की बात करते हैं ।देश के तमाम चैनल कोसी के महाप्रलय को कभरेज करने बिहार पहुंचे थे।आम लोगो की प्रतिक्रिया जानना चाहेगे।आप की छवी एक वेश्या से बेहतर नही हैं जिस तरह से आपके मित्रों ने होटलों में शराब और कबाव के साथ साथ शवाब के लिए ओछा हरकत किया आज भी यहां के लोगो के जेहन में हैं।आप जैसे कुछ लोग हैं जिनके प्रति लोगो के मन में सम्मान है और मीडिया के प्रति थोङी सी हमदर्दी बची हैं नही तो आज की मीडिया हमारे समाज पर बोझ हैं ।यह एक पत्रकार की व्यथा हैं जो आये दिन आपके असली चेहरो को देखते रहता हैं।किस तहर खबर लेने के समय आप प्रोफाईल पुछते हैं।
कभी आपने सोचा देश में रोजाना कई आरुषि मारी जा रही हैं लेकिन वह खबङे नही हैं।
क्यों कि न तो इस आरुषी में गलैमर हैं और ना तो बङे घर की बेटी हैं।जब आपके खबङ चूनने का मापदंद ही भारतीय समाज का धनांढय वर्ग हैं तो आप अपने आप को किस हैसियत में लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ होने का दंभ भरते हैं।

वरुण कुमार सखाजी said...

क़बिले तारीफ है लेख उस सच पर भी नज़र ज़रूरी है जो कहीं प्रिंट के साथी ज़बरन की नैतिकता की दुहाई देकर कल्पना लोक में ही रहना चाहते हैं। क़रारा जबाव है इन आलोचको के लिए।।।।।।। लेख के लिए सादूवाद

राजीव करूणानिधि said...

९० के आखरी दशक में चौबीस घंटे प्रसारित होने वाले न्यूज़ चैनल के आगाज़ ने मीडिया को नई शक्ति दी। इसकी अपार लोकप्रियता देख कुछ विदेशी टीवी नेटवर्कों ने भी 24/७ न्यूज़ चैनल की शुरुआत की। बड़े शहरों की बड़ी ख़बर के साथ-साथ छोटे शहरों की छोटी-छोटी खबरें भी सुर्खियाँ बनने लगी। भ्रष्टाचारी बरबाद होने लगे, अपराधी गिरफ़्तार होने लगे, सफ़ेदपोश बेनकाब होने लगे। घूसखोरी-कमीशनखोरी अब सुरक्षित नहीं रही, शोषितों को जुबान मिल गई, और तभी से मुहीम तेज़ हो गई इलेक्ट्रोनिक मीडिया पर तालाबंदी की. वही कोशिश जो ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में तेजी से फ़ैल रहे 'प्रेस' पर लगाने के लिये की थी। उसका असर भी हुआ, जब पहली बार १७९५ में प्रेस सेंसरशिप मद्रास में लागू हुआ। एक के बाद एक कई तरह की पाबंदी प्रेस पर जबरन लाद दिए गए। हद तो तब हुई जब १८२३ में पहला प्रेस ऑर्डिनेंस इशू हुआ और प्रेस पर पेनाल्टी-फ़ाइन भी जारी कर दिया गया। आज़ादी की जंग के वक़्त प्रेस को मजबूत बनाने का बीड़ा उठाया महात्मा गाँधी, नेहरु, लाला लाजपत राय, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी, गोपाल कृष्ण गोखले, बाल गंगाधर तिलक, अरबिंदो घोष और मौलाना अबुल कलाम आजाद ने। गाँधी जी ने अगस्त १९४२ को 'यंग इंडिया' में लिखा कि ''It is better not to issue newspapers than to issue them under a feeling of suppression''. फिजूल की बंदिश प्रेस का कुछ बिगाड़ तो नहीं पाई उल्टे प्रेस धीरे-धीरे आवाम की आवाज़ बनता चला गया।

latikesh said...

रविश जी ,
यह सही है की सेंसर लागु होने के बाद न्यूज़ चैनल का कोई mutlab नही रह जाएगा , लेकिन न्यूज़ के नाम पर चैनल जो परोस रहे है , वोह भी तो सही नही है . न्यूज़ के नाम पर खबरों को तोड़ मरोड़ कर दिखाना कहा तक सही है .सेंसर तो जरूरी है . लेकिन सरकारी सेंसर नही , आत्मा की आवाज वाला सेंसर .
लेकिन हम पत्रकारों के पास आत्मा होती है क्या , या फिर जिनके पास आत्मा जीवित है , उसे kaam करने दिया जाएगा क्या .......अहम् सवाल है .
लातिकेश
मुंबई

Nirmla Kapila said...

अपकी बात भी सही है लेकिन मेदिअ को भी आत्ममन्थन करना चाहिये कि वो समाज को क्या परोस रहे हैं चैनलों पर अश्लीलता बण्द होनी चाहिये
आज ब्च्चों को राष्ट्रप्रेम का पाठ सिखाने की जरूरत है नाचगाने और बेहूद नाटक् दिखा कर वो क्या साबित करना चाहते हैं1फिर भी इस बात से सहमत हैं कि मीदिया की स्वतन्त्रता रहनी चहिये

Indian news channel said...

रविश जी आप ने इन गधे टिपण्णीकारों को यह नहीं बताया क्या ...की न्यूज़ चैनल वही दिखाते है जो आप जैसे टिप्पणीकार देखते है इसलिए इंडिया टीवी की टी आर पी १९.६ है ?

Upadhyayjee said...

Media ki alochana me pathako ne apani tippadi se sahmati jatai hai ki censor ki naubat media ki apani harkato ke kaaran hui hai. Eesake liye khud media jimmedar hai. Eesame bahut saare patrakar bandhu bhi sahamati jatate nazar aaye.

Ek baat kahna chahunga ki Emergency lage ek arsa ho gaya. Kab tak emergency ka bhut dikha dikha kar daraya jayega. Ab emergency nahin lagane waala hai. Eesliye please janta ko nahin daraya jaye. Emergency ke naam par bahut rajniti ho gayee.

chandan bangari said...

ravish je media pe pratibandh lagana galat hai.iska to jawab dena yakinan jaruri to hai hi magar ye bhi jaruri hai ki trp badhane k naam par kisi bhi haad pe chale jana iska bhi mukhar virodh hona jaruri hai.iski pehal bhi ki jani aaj k daur me jaruri hai.

vipin dev tyagi said...

बेहतरीन पोस्ट..अपने आप में संपूर्ण...
सारा जिस्म बोझ से दबकर दोहरा हुआ होगा..
मैं सजदे में ना था आपको धोखा हुआ होगा...
सच कहना.सच दिखना..सच सुनना..सच समाने लाना.सबके बस की बात नहीं..
इसी तरह सच लिखते...दिखाते..कहते रहिये...

राजीव जैन Rajeev Jain said...

आपकी बात से सहमत

hamarijamin said...

Aksaraha hum bhi khijhate rahate hai Ravish electronic media ke kishorochit harakatoan par! (print ki jawan budhape par bhi!)lekin sensor kitana ghatak hoga--yeh aapne likh mara hai,hum bhi bakhubi jante hain.bus gujaris yehi ki hamari(overall media) ki jo shakti hai(janta ke bal par)use or bhi milkar dhar dein. sata-sanskriti hamesha se sach ko janta tak jane se rokti rahi hai--lekin hamari takat hai ki log hami se umid rakhate hain.unhi umidoan ke liye sach ki roshani jalaye rakhane ki koshish honi chahiye. ye netaon ke aage pichhe dum hilakar sensor na lagane ki dayaniyata aqkharti hai. aao milkar media ko shakti dein.

shitcollector said...

Ravishji,

trpbaad pe to badi badi baatein karte hain, khud kabhi apne samne bhi sheesh rakhkar dekhiye...

http://silencerocks.blogspot.com/
http://retributions.nationalinterest.in/ndtvs-assault-on-free-speech/
http://bit.ly/13rca
http://www.ipatrix.com/muffling-a-blogger/

gd said...

Aap ne likha, usme bhi kuchh adhura chhod diya. Aapko un unprofessional mediamen ke bare me bhi likhna chahiye tha jo logon ko kabhi abhishek ki shadi aur kabhi salman-katrina ka romance saare din dikhate rahte hain. Asal me unke mukhya samachar hi aise hote hain. kabhi aapne analysis kiya hai ki kitne channel aise hain jo samaj ke anya pahaluon ko bhi dikhate hain. waise bahut achha likha mai sahmat hoon. Sarkar me jo PRO hotey hain we bhi qualified media men hotey hai par wa bhi burocracy ke neeche dab kar apni pratibha kho dete hain. yadi sarkari pros aur media ka samanwaya sahi se ho jaye to aise stithi kabhi bhi nahi aayegi kyonki PRO sarkar ko samjha sakega ki media ki swatantrata jaruri hai aur sarkar ka drishti kone bhi saath me janata tak inhi ke dwara inhi ki bhasha me jane do. tab media wakai me dono paksho ki chowkidari kar sakega.
Aap ne bahut achha likha , Sadhuwad
GDSAKLANI

gurmeet said...

ravish ji
bahut baria likha