अब तो ये मेरी मां का घर है

स्थायी पता वाले इस मकान का पता
पहले से थोड़ा बदल गया है
पहले बाबूजी का लगता था
अब मां का हो गया है

आते ही लगा कि मां कहां हैं
जिसका घर है वो कहां हैं
खड़ा रहा दरवाज़े पर,बेसब्र होकर
लगा कि लौट आया हूं मायके में
बेटी जैसा होकर


पहले कभी नहीं लगता था,पर
अब तो ये मां का ही घर है
मलकिनी कह देते थे बाबूजी
तब ऐसे हंस देती थी मां
मानो मालिक से मतलब है
मालिकाने से नहीं

अपनी मांओं के संग कुछ पल बिताने
सुख दुख का कुल जमा हिसाब चुकाने
बेटियां हर दम कितना मरती होंगी
मायके में अपनी मां को ऐसे देख कर
मां बन चुकीं बेटियां तड़पतीं होंगी
जब ही बिलखती हैं मायके से लौटते वक्त
रास्ते में रोती हैं मां को सोच सोच कर

रात ही भतीजी के साथ कर रही थी
तिरेपन साल के साथ का हिसाब मां
आधी सदी साथ रही थी बाबूजी के
लड़कपन में ही ससुराल आ गई थी मां
सदियां गुज़रती रही इस आधी सदी में
कभी नाम ही न ले सकी बाबूजी का,मां
जाने किस बहीखाते से निकालती रही
अपनी यादों का हिसाब किताब,मां

पचीस साल अलग रही थी बाबूजी से,मां
पचीस साल साथ साथ रही थी बाबूजी के,मां
पचीस लोगों का खाना बनाती थी गांव में,मां
पचीस लोगों के बर्तन धोती थी सुबह शाम,मां
फिर क्यों नहीं मिला खाने को दाल भात, मां
फिर क्यों खाती रही भात और मिर्च का आचार मां
ससुरालों की यही कहानी है,रिश्तेदारों की यही निशानी है
हम सब बेटियों के बाप,कभी न समझ पायेंगे
जब तक बेटा बनकर घर आते रहेंगे
अपनी मां को कभी न समझ पायेंगे

अब तो ये मां का ही घर है
लगा कि लौट आया हूं मायके में
बेटी जैसा होकर
लौट कर जाइये अपने उन तमाम घरों में
जहां एक बाप की मिल्कियत होती है और
रसोई में खाना बनाती रहती है मां की ममता
मिल्कियत के आप वारिस होते हैं
ममता मुफ्त में परोसी जाती रहती है
कभी थाली को खुद धोकर देखना दोस्तों
अपने घर में इक बार बेटी होकर देखना दोस्तों
घर जब मायका बन जाता है,घर का मतलब बदल जाता है।

21 comments:

S K Kulshrestha said...

Man ko choo diya is rachna ne. Isse zyada kuchh kah nahin sakta.
Shelandra Kulshrestha
Dehradun

satyendra... said...

बहुत बेहतरीन। सरल शब्दों में कठिन चीजें लिखी हैं आपने। कठिन इसलिए कि इसका कोई समाधान नहीं दिखाई देता। यही समाधान हो सकता है कि आदमी मशीन बन जाए। पति पत्नी दोनों कमाए। सारे रिश्ते भूल जाएं। वैसे दिल्ली में पड़ रही कड़ाके की ठंड में मां की ही याद आती है। अगर गांव पर होता तो निश्चित ही वे कउड़ा जला देतीं।

मोहन वशिष्‍ठ said...

बहुत बेहतरीन लिखा है आपने एक एक शब्‍द सीधा दिल में उतर गया

सुशील कुमार छौक्कर said...

बहुत ही मार्मिक रचना। दिल में उतर गई।

creativekona said...

Raveesh ji,
Apne Ab to ye meree man ka ghar hai...kavita ke madhyam se sirf apnee mata jee ke prati lagav,bhavnaon ko hee naheen abhivyakt kiya hai.Dar asal apkee ye kavita/abhivyakti hamare madhya varg kee har stree kee gatha hai.
Ek betee ko apne mayake se vida ho kar jane ke bad sasural men kitnee badee jimmedaree uthanee padtee hai(Pachchees logon ka khana banatee thee man),kitne samjhaute karne padtee hain,(Pachchees sal alag rahee thee babuji se man),Aur in sab ke bad bhee use milta kya hai...(fir kyon khatee rahee bhat aur mirch ka achar..)?
Vakai..yah to ek jeeta jagta chittha hai hamare purush pradhan samaj men naree kee halaton ka.
Is sundar kavita ke liye meree hardik badhai sveekar karen.
Hemant Kumar

prabhat gopal said...

kafi acha laga

PD said...

आज कल दिमाग से नहीं, दिल से लिख रहे हैं..
तभी हर पोस्ट दिल में उतर रही है..

Mired Mirage said...

बहुत सुन्दर ! स्त्री सा सोचने के लिए धन्यवाद। स्त्री के लिए सोचने के लिए धन्यवाद। पुरुष द्वारा रचित स्त्री मन को बयाँ करती यह कविता मन को छू गई।
घुघूती बासूती

रश्मि प्रभा said...

अब तो ये मां का ही घर है
लगा कि लौट आया हूं मायके में
बेटी जैसा होकर
लौट कर जाइये अपने उन तमाम घरों में
जहां एक बाप की मिल्कियत होती है और
रसोई में खाना बनाती रहती है मां की ममता
मिल्कियत के आप वारिस होते हैं
ममता मुफ्त में परोसी जाती रहती है
कभी थाली को खुद धोकर देखना दोस्तों
अपने घर में इक बार बेटी होकर देखना दोस्तों
घर जब मायका बन जाता है,घर का मतलब बदल जाता है।.......
....एक-एक पंक्तियों में बेटे की मार्मिक सोच उभरी है और मेरी हिचकियाँ बांध गई है,माँ,बहन दोनों की ज़िन्दगी का फलसफा उतारा है और उससे जन्मे एहसासों को सबके अंतर में उतारा है.......
बहुत ही ऊपर की रचना है,यानि superb

ipnnews said...

shabd shabd andar utar gaya, maa kisi ki bhi ho. lekin har maa ki yahi kahani hai.bahut-bahut-bahut shukriya dil ke kisi kone main saans le rahe eis ehsaas ko jagane k liye.......sanjay singh. lucknow.

शोभा said...

पचीस साल अलग रही थी बाबूजी से,मां
पचीस साल साथ साथ रही थी बाबूजी के,मां
पचीस लोगों का खाना बनाती थी गांव में,मां
पचीस लोगों के बर्तन धोती थी सुबह शाम,मां
फिर क्यों नहीं मिला खाने को दाल भात, मां
फिर क्यों खाती रही भात और मिर्च का आचार मां
ससुरालों की यही कहानी है,रिश्तेदारों की यही निशानी है
हम सब बेटियों के बाप,कभी न समझ पायेंगे
जब तक बेटा बनकर घर आते रहेंगे
अपनी मां को कभी न समझ पायेंगे
बहुत अच्छा लिखा है।

Nirmla Kapila said...

aapki kavita ne dil chhoo liyaa badhaai

अक्षय-मन said...

आपकी अधिकतर रचनाये पारिवारिक होती है जो सीधे दिल में उतरती हैं.......
बहुत ही बढ़िया......


अक्षय-मन

vipin dev tyagi said...

बहुत अच्छी पोस्ट है...घर... मां और पिता दोनों का पता होता है..होना चाहिए...दरअसल मां को सिर्फ ममता..दुलार से मतलब है..बेटा भले चपरासी हो या कलेक्टर या कुछ नहीं..मां के लिये उसके बेटा से बड़ा दुनिया में कोई दूसरा नहीं है...मां के लिये बेटा हमेशा सिर्फ और सिर्फ गोद में खेलता वहीं नन्हा सा फरिश्ता रहेगा..भले ही बेटा तीस साल का हो गया हो...और तीस दिन का बेटे का बेटा हो गया हो...मां के लिये बेटे का माथा चूमना..उसकी पसंद की सब्जी बनाकर खिलाना और अकड़ के साथ अपनी बहू से कहना कि पता नहीं कैसा ध्यान रखती है,क्या खिलाती है कितना कमजोर हो गया मेरा लाल(भले ही बेटे की तोंद तानपुरा हो रही हो)..मां,बेटे की पत्नी को ये सबकुछ ताना मानने के इरादे से नहीं कहती..बस वो मां है..उसे लगता है उसका बेटा आज भी दूध पीने वाला बच्चा है जिसका उससे अच्छी तरह कोई और ध्यान नहीं रख सकता...वहीं घर में चल-फिरते,धूमते,थके हुए,धीर गंभीर पिता को देखकर हमेशा यही लगता है जैसे सपनों का पहाड़ सामने हो,मानो अभी तो आधी चढ़ाई भी पूरी नहीं की हो,मानो अभी कुछ पाया ना हो...कुछ सपने वो जो पिता के अपने थे..लेकिन समय की रफ्तार,मजबूरियों के चलते पूरे नहीं हो सके...कुछ सपने वो जो उन्होंने ऑफिस में देखे,अपने साहब के बच्चों,साथ में काम करने वालों के बच्चों के इंजीनियर,डॉक्टर,अफसर बनने की खबर से पैदा हुए सपनें,कुछ सपने वो जो उन्होंने सिर्फ अपने बेटे को बनाने के देखे..अपने बेटे के साहब के बेटे से ज्यादा बड़ा आदमी,नाम वाला आदमी बनने का सपना,ऐसे ना जाने कितने सपनों का गहरा समुंद्र..पिता की आंखों में अकसर तैरते हुए दिखता है..हम सब ने कभी ना कभी देखा होगा..महसूस किया होगा...दुलारा पिता भी मां से कम नहीं करते...फर्क सिर्फ इतना है कि उनके आंसू पलकों पर आकर रूक जाते हैं..मां के झलक जाते हैं...

Rajesh Roshan said...

मैंने अपने किसी पोस्‍ट में लिखा था कि मैं पुरुष होकर सभी कुछ पा सकता हूं लेकिन मां होने का एहसास कभी नहीं पा सकता...वह मां जो बच्‍चे को जन्‍म देती है...उसकी अनूभूति करना ही....कई बार डिस्‍कवरी चैनल में ए बेबी स्‍टोरी नाम की डाक्‍यूमेंट्री देख चुका हूं...वह मां बनने का एहसास....कभी नहीं समझ पाऊंगा...

वैसे रिश्‍तों की बात में एक ही चीज समझ आती है कि आप जो भी हों ईमानदारी से उसका निर्वाह करें और इस पोस्‍ट के जरिए आपका बेटा होना झलकता है.

anil yadav said...

behtrin.....
delhi me ek baar fir se aaj ma ki bahut yaad aa gayi.....
man karta hai ki turant hi vapas ghar laut jaon....

फ़िरदौस ख़ान said...

मन को छू लेने वाली कविता है...
नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं...

पटिये said...

घर जब मायका बन जाता है,घर का मतलब बदल जाता है....तीन बरस होने को आये मेरे लिये घर मायका ही है...आपकी कविता की बेटियों की तरह मैं भी तड़पती हूँ अपना दुख सुख अपनी माँ से बाँटने के लिये....यकीन जानिये आपने जो कुछ लिक्खा है...उसे रोज़ जीती हूँ मैं...आपसे पूछे बगैर आपकी कविता का प्रिंटआउट निकाल लिया है मैनें.... और अपनी ही तरह की, लेकिन ब्लॉग से बावस्ता नहीं बेटियों और माँओं को सुनाई आपकी लेखी...सबको रुलाई आ गई...फिर उनको ये भी बताया कि ये एक पुरुष ने लिक्खी है....रवीश कुमार ने....

mrinal said...

Ravish bhai,
kehne ko shabd nahi hai mere paas. Jab se padha hai , sabko pakad pakad ke sunata hoon, aur (garv se) batata bhi hoon ki mai aapko jaanta hoon. "WO MISS INDIA BANANA CHAHTI HAI" bhi maine padha tha. " AB TO YE MA KA HI GHAR HAI" ka mizaz bilkul alag hai.

रज़िया "राज़" said...

Bahot khoob!!!!!!!!!
मां की ममता
मिल्कियत के आप वारिस होते हैं
ममता मुफ्त में परोसी जाती रहती है
कभी थाली को खुद धोकर देखना दोस्तों
अपने घर में इक बार बेटी होकर देखना दोस्तों
घर जब मायका बन जाता है,घर का मतलब बदल जाता है।

निखिल आनन्द said...

Bahut Khoob Sir! Ultimate. I have No Words to Express. Bahut ApnaPan hai Aapki Is Kavita Me/