होस्टल चाहिए?





















यह तस्वीर ग्रेटर नोएडा की है। इस उपनगर को इतने विस्तार में बसाया गया है कि एक अपार्टमेंट से दूसरे अपार्टमेंट के बीच नदी जैसी चौड़ी सड़के हैं। यू टर्न का अभाव है इसलिए आपके पास सीधे चलते जाने के अलावा कोई रास्ता नहीं। ऊपर से जब कोई बसावट नई होती है तो वहां लोग कम होते हैं। बसने वाले लोगों को सारा वक्त लंबी दूरी तय करने में ही खप जाता है इसलिए मेलजोल का वक्त नहीं होता। ऐसे में विज्ञापन एक मुश्किल काम हो जाता है।

ग्रेटर नोएडा में सैंकड़ों कमरे खाली पड़े हैं। इन्हें किराये पर देने के लिए लोगों को कितनी मेहनत करनी पड़ रही है इसका नमूना है कार के पीछे लगा बैनर। इस इलाके में कई संस्थान खुल गए हैं। यहां पढ़ रहे लड़के ही इन खाली मकानों की उम्मीद हैं। इसलिए ग्रेटर नोएडा में कार के पीछे इस तरह के बैनर दिखाई देते हैं। मेरे मित्र मनहर ने बताया कि चाट की दुकान से लेकर परचून की दुकान तक का विज्ञापन इसी तरह किया जाता

8 comments:

सौरभ said...

आपने मेरी एक समस्या दूर कर दी

Udan Tashtari said...

:) इस बार भारत यात्रा में ग्रेटर नोएडा में देखा था ऐसा ही विज्ञापन. मजबूरी है क्या करें.

amit kumar said...

शर्मा जी किस्मत के धनी हैं। फ्री में ही उनका सारा विज्ञापन हो जाता है। चाहे कार में हो या फिर ब्लॉग में। लेकिन आपको ज़रूर उनसे अपनी फीस वसूलनी चाहिए।

neelima sukhija arora said...

अमित जी की बात जमती है, अपने ब्लाग पर छापने के लिए आपको इन शर्मा जी से पैसा ले ही लेना चाहिए ।
वैसे विज्ञापन का क्या तरीका है मजेदार :-)

अंशुमाली रस्तोगी said...

भाई रवीशजी
अभी हिंदुस्तान में दिनेशजी के ब्लॉग पर आपका लेख पढ़ा। बेहद करीने और खूबसूरती से इस लेख को लिखा है आपने। दिनेशजी कई साल हमारे शहर में रहे। सिनेमा पर उनका काम और लगाव अद्भुत है। यहां दिनेशजी जब तक रहे बड़ा मिलना-जुलना हुआ करता था मेरा उनसे। मैंने तो कुछ समय अमर उजाला में उनके साथ काम भी किया है। दिनेशजी की भाषा का तो कायल हूं।
इस लेख की उनसे जरूर चरचा की करूंगा। इस लेख पर उनकी तरफ से मैं आपको बधाई देता हूं।

दिनेश श्रीनेत said...

रवीश जी, ब्लाग चर्चा में इंडियन बाइस्कोप को शामिल करने के लिए शुक्रिया। इस बात के लिए भी कि इसकी चर्चा आपने उन्हीं सरोकारों के तहत की जिनको ध्यान में रखकर मैंने लिखना शुरु किया था। वैसे अंशु मुझसे पहले मेरा धन्यवाद आप तक पहुंचा चुके हैं। हां, मेरा नेटिव बरेली नहीं बल्कि पूर्वांचल यानी गोरखपुर रहा है। बरेली में मैंने कई साल गुजारे हैं। मुझे खुशी है कि बिना किसी 'प्रमोशन' के मेरा ब्लाग पढ़ा और पसंद किया जा रहा है। संभव हो तो अपना मेल आईडी मुझे मेल करने का कष्ट करें...
dshrinet@gmail.com

prasun said...

ravish ji namashkar,

aapko ndtv per bahut suntey hai, aapki vaani adbhut hai, kuch thehri hui se per ekdam dil mey prahar karti hai..........barey dino sey mera bhai kuch kehney ( likhney )ka mann karta thaa per kaha likhu samjh mey nahi aata , aapkey blog ka pata chala to check kiya , jaisa socha tha waisa hi paya ........ car per lagey vigyapan mey koi burai nahi hai meyrey khayal sey , aap soochiyey koi larka bahar gaon sey greater noida gaya hai aur ad dekh kar usko koi sahi jageh mil jayey to uskey liyey to yey vardan hoga....

रंजन said...

अमित, नीलिमा - अगर शर्मा जी के पास पैसे होते तो विज्ञापन कहीं और कर देते.. और पता रविश ने फीस वसूली हो ? :-)